गहरे अर्थों और प्रतीकों के सहारे जैसे इतिहासबोध, आदमी … न.. सम्पूर्ण मानव जाति, धरती …. नहीं…. धरतियों का जीवन आलाप | सभ्यता या सभ्यता के प्रस्फुटन के आईने में वर्तमान को देखने समझने का प्रयास करती “प्रमोद बेड़िया” की लम्बी कविता …..| – संपादक 

धरती भयानक हो गई !

भयानक धरती

यह धरती जब हुई तो

उबड़- खाबड़ ,ऊँचे- नीचे

रास्तों और पहाड़ों से भरपूर

होगी  लेकिन भयानक

तब भी नहीं होगी ,हाँ सुना

गया है कि भूख लगने पर

आदमी आदमी को खा लेता था

क्योंकि तब इसे अपने खाने का

पता नहीं था ,लेकिन फिर भी

मुझे उत्सुकता तो होती है

कि जब मुझे उस समय किसी ने

खाया होगा ,तो सब अपना- अपना

हिस्सा ले कर चुप रहे होंगे

शायद तब से ही भयानक

होने  लगी थी धरती !

 

फिर कब हुई होगी धरती भयानक

यों तो पता नहीं ,इतिहास भी – लगभग

सच ही होता है ,लेकिन लगता है

जब वे माँस के लोथड़े मिलने में कम

रह जाते होंगे तब ज्यादा

रक्त पिपासुओं से कम रक्त पिपासुओं

के झगड़े में और भी कुछ लोग मरते

होंगे और उनकी लाशों के लिए

धुंधुमार हुआ होगा तब हुई होगी

धरती भयानक !

 

धरती का क्या है ,वह तो

देने ही के लिए थी ,लेकिन  आदमी

दूसरी धरती को खोदने लगा निर्विकार

निर्विचार ,राक्षसों की तरह ,वह दूसरी

धरती क्या करती !

उसे तो इस मर्द नामक प्रजाति के

साथ ही रहना था ,जब वह हर रात

के बाद आधी होती जाती थी

हर रात के बाद वह काटे गए

खेत के बाद बची पृथ्वी- सी

होती थी ,निपट उदास और अकेली

अंगुलियों में धागे लपेटते हुए

तब से लगता है धरती औरभी

भयानक होती गई

 

फिर ये जो दूसरी धरती जुड़ी

पहली धरती के साथ तो मनुष्यों की

जिह्वाएँ लपलपाते लगी ,लार टपकने लगी

हथियाने को दोनों धरतियाँ ,एक बोले

मेरी ,तो दूसरा बोले मेरी तो इस कश्मकश

में तो युद्ध का ऐलान होना ही था होना ही था

नर संहार गाजर की तरह कटते मुंड और

पौधों की तरह उखड़ती शिशुओं की क़तारें

घरों की तरह ढहते घर और अंतत: क्या होना था

धूसर मैली धरती पर चक्क लाल रंग और

उनमें तैरते नर- मुंड और अबलाओं की चित्कारें

और बच्चों का रुदन और हाहाकार

तब शायद ,तब और भयानक

होती गई यह धरती !

 

जीतता तो कोई है ही ,और वह एक

सतत उजाड़ के बाद और वादे करते हुए ही

कि हम  देंखेंगे – देंखेंगे सबकुछ ,सबकुछ का

सबकुछ पुनर्निर्माण कर देंगे ,सबको बसा देंगे

सबको सुख देंगे ,सबको आश्रय देंगे – आपलोग

यह गाना नहीं गाएं कि सब दुखियों को सुख

देहों दाता – अरे हम तो सेवक हैं आपलोगों के

,दाता नहीं हैं ,दाता तो आपलोग हैं ,आपलोग हैं ,तो

हमलोग हैं – अच्छे दिन आएँगे ही ,जिन्हें हमने ,युद्ध मे

पराजित किया है ,उन्होंने आपको भूखा रखा

कुपोषण से आपके बच्चों को बीमार कर दिया

हमने खोल दिएं है भूख मंत्रालय ,हमने शुरु कर दिया

है कुपोषण मंत्रालय ,भले ही उनके मंत्री भूखे नहीं मरें

हों कभी भले ही उनके बच्चे कुपोषण से

नहीं मरे हों ,क्या हुआ ,क्या हुआ हम उन्हें कहेंगे

वे आपके यहाँ एक समय का भोजन करें

वे सब सीख जाएँगे और आपतक

चल कर आएँगे ,हम विदेश जाकर इसकी नई तकनीक

लाएँगे ,जिससे ,न तो कोई भूखों मरें

और न मरे कुपोषण से

हमने अपने क्लबों को भी कह दिया है

वे आपके लिए साप्ताहिक कार्यक्रम करेंगे ,

वे आपसे मिल कर

फोटु उतराएँगे ,हम सब समझ जाएँगे !

जब धरती पर यह झूठी धरती रखी गई जब धरती को

कहीं का न रखा और फिर भी बिगुल बजा कर रोज

ऐलान करते रहे ,रोज नए लबादों में पुराने ही लोग

मसखरों की तरह रोज नए झूँठ की

नौटंकी  खेलते रहे और चुगद की तरह वोट को

मरोड़ते हुए कमर टूटती रहीं उन एक- से ही लोगों की

तब ,शायद तब और भयानक

होती गई हो धरती !

 

मर्द को हमेशा नंगी ही अच्छी लगी धरती

चाहे पहली या दूसरी ,वे उसे नंगी ही चाहते थे

सारे पेड़ों के फ़र्नीचर बनवा लिए ,तो क्या हुआ

सारे श्रोतों से पानी ले लिया ,तो क्या हुआ

सारे खेतों को उजाड़ कर ,कारख़ाने बनवा लिए ,

मल्टी- स्टोरीज़ बनवा लिए ,फ़ार्महाउस बनवा लिए ,

मॉल बनवा लिए ,आलीशान मकान बनवा लिए ,जिन पर

गाड़ियाँ सीधे चढ़ती हैं भद्दी हसीनाओं को लेकर

वहाँ बने स्वीमिंग पुल में तैरने ,उनके अर्दली और

खानसामें देख कर खुश होतें हैं मालकिनों के चंदन- से

बदन ,तो क्या हुआ , उनके यहाँ तो छिपकली भी

कमोड पर हंगती है ,अरे क्या हुआ

यों पहली औरत याने

धरती को नंगी करने के बाद दूसरी धरती को कहा

आधुनिक होना है तो अधनंगीं हो जाओ ,उपर से आधी ,

नीचे से आधी बीच  से पूरी ,कुल जमा हो ऐसी कि

जो नंगा नहीं है उसका पक्का अंदाज लग जाए

जिंस बन जाओ तुम थोड़ा और- थोड़ा और नितंब

मटका कर ,थोड़ा और छातियाँ दिखा कर

क्योंकि तुमको आदत हो गई है रात को तो नंगी

होने  की ,फिर दिन में क्या हर्ज है ,क्या हर्ज है

अगर छिनालों का अभ्यास भी हो जाए ,हमें तो

सिर्फ संभोग के लिए चाहिए औरतें और

नाचने- गाने को ,तब ,तब

और भयानक लगी थी धरती ,क्योंकि भीतर में

दबी सिसकी थी ,घुटता रुदन था

भयानक था सबकुछ

भयानक थी धरती !

 

तुमने भी धरती के एक हिस्से को देखा

जो हरा था ,ख़ुशहाल था ,लहलहा रहा  था

तुमने नीचे दबी सूखी घास नहीं देखी ,नहीं

देखी वह भूख से क़ातर हँसी ,जिसके पीछे

अनगिनत सिसकियाँ दबी थी ,नहीं देखे लटके पेंट

और फटी गंजी में रुलता बचपन ,अपने

बच्चों के बरक्स ,बेशरमी की हदें पार

करते हुए तुम पहुँच चुके थे मुहाने पर

कि तुमने झंडा उठा लिया अपनी सुरक्षा

के लिए ,उनसे बचने ,

ढोंग करते रहे

उनमें शामिल होने का

ठगते रहे उनकी

भूख को ,बनाते रहे रोज- रोज

उन्हें मोहरा ,नयी चालें चलने को

ऐसा कुछ करते रहे कि वे सीधे चल

नहीं पाएँ ,ऐसा कुछ करते रहे कि

उन्हें अपनी रीढ़  की हड्डी की जगह

बाँस की खपच्ची लगे और वे

सीधे ही नहीं हों पाए

तो भयानक होती गई धरती

धरती भयानक हो गई !

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