यह सब आपके  तथाकथित विकास का परिणाम है। विकास के  नाम पर पूरा शहर खोद रखा है।सड़कों पर गड्‌ढे ही गड्‌ढे हैं,पुरानी सड़कों की रिपेयरिंग भी मात्र दिखाने के  लिए ही होती है,कुछ  दिनों में ही सड़केँ  फिर उखड़ जाती हैं। कोई कब तक कैसे  और कहाँ तक बच सकता है।‘ ………

नई थैरेपी…

ब्रजेश कानूनगो

गत रविवार को जब मैं अपने मित्र साधुरामजी के घर गया तो देखा कि उनके दाहिने पैर में प्लास्टर चढ़ा हुआ है। वे आराम कुर्सी पर बैठे थे तथा पट्‌टायुक्त पैर उन्होने सामने रखे स्टूल पर टिका रखा था ।’यह क्या हो गया साधुरामजी ?’ मैने अचंभित उनसे पूछा।
‘यह सब आपके तथाकथित विकास का परिणाम है। विकास के नाम पर पूरा शहर खोद रखा है।सड़कों पर गड्‌ढे ही गड्‌ढे हैं,पुरानी सड़कों की रिपेयरिंग भी मात्र दिखाने के लिए ही होती है,कुछ दिनों में ही सड़केँ फिर उखड़ जाती हैं। कोई कब तक कैसे और कहाँ तक बच सकता है।’ उन्होने कहा-‘ अपनी मोपेड पर जा रहा था, पानी भरे गड्‌ढे में अगला पहिया गया और मोपेड पलट गई।पैर में फ्रैक्चर हो गया।’ उन्होने आगे बताया। ‘अंरे यह तो बड़ा दुखद रहा । ‘मैंने संवेदनाएँ व्यक्त कीं।
लेकिन साधुरामजी ऐसी छोटी-मोटी परेशानियों की कहाँ चिन्ता पालते हैं तुरंत अपने स्वभाव के अनुसार बात की गंभीरता को खत्म करते हुए बोले-‘उस वक्त मैं स्वयं ही शायद थोड़ा असावधान था। खैर जो होता है अच्छा ही होता है।पिछले पन्द्रह दिनों के विश्राम के दौरान मुझे अद्भुत ज्ञान प्राप्त हुआ है।’
‘कैसा ज्ञान? साधुरामजी।’ मैने जिज्ञासा व्यक्त की।
‘आपने अकसर देखा होगा, अनेक नीम-हकीम और डॉक्टर अखबारों मे विज्ञापन छपवाते हैं कि पुराने और निराश रोगी ही मिलें, हम फलाँ बीमारी का शर्तिया इलाज करते हैं। वे बोले .’हाँ,वो तो है नीम हकीम खतरे जान।’मैंने कहा। ‘लेकिन अब मेरे चिंतन ने मुझे अनेक परेशानियों,समस्याओं से मुक्ति का रामबाण नुस्खा उपलब्ध करा दिया है। यों कहें कि यह एक नयी चिकित्सा पद्धति है।
वाष्प चिकित्सा, चुम्बक चिकित्सा,स्पर्शचिकित्सा,एक्यूपंचर,इलेक्ट्रोचिकित्सा आयुर्वेद, होम्योपैथी,एलोपैथी की तरह ही यह चिकित्सा पद्धत्ति भी मरीजों के लिये बेहद कारगर साबित होगी।’ वे धाराप्रवाह बोल रहे थे। ‘ये कौनसी पद्धत्ति है साधुरामजी, कहीं आप गधे के सींग तो नही खोज लाए हैं।’मैने चुटकी ली।
भाई,यह कोई गधे के सींग वाली बात नही है,यह बहुत असरकारी है,लेकिन इसके विकास में सरकार का बड़ा योगदान है।’ उन्होने कहा।’महात्मा बुद्ध को बोधिवृक्ष के नीचे सत्य मिला था,आर्किमिडीज़ बाथरूम से बगैर टावेल लपेटे बाहर भागे थे और मैं अपनी खोज के बाद इस दुर्घटना की वजह से तुम तक नही पहुँच सका। दरअसल इस खोज का बीज उस वक्त पड़ा जब मैं अपनी मोपेड पर शहर की सड़कों पर गुजरता था। कुछ सड़कों की स्थिति तो ऐसी थी कि गड्‌ढों के बीच उसे खोजना कठिन होता था। जब दुर्घटना हुई, पैर पर प्लास्टर चढ़ा तो चिंतन का अवसर मिला तब इस चिकित्सा पद्धत्ति का जन्म हो सका।’ उन्होने कहा।
‘अब आप बता ही दें कि आखिर है क्या यह चिकित्सा पद्धत्ति ?’ मेरी अधीरता बढ़ती ही जा रही थी।
‘तो सुनो! ‘ उन्होने किसी दार्शनिक की तरह अपना चेहरा नीचे से ऊपर उठाया और कहा-‘हमारे शहर की सड़कों पर मरीज को वाहन यात्राओं के नियमित डोज देना ही इस पद्धत्ति का मूल मंत्र है।’
‘वह कैसे ? ‘मैने पूछ लिया।
‘मरीज पुरानी कब्ज से परेशान हो,उसे शहर की विशिष्ठ सड़क पर पाँच दिन नियमित स्कूटर यात्रा के लिए परामर्श दिया जाए,छठे दिन वह स्वयं को हल्का महसूस करने लगेगा। किसी मरीज की प्रसूति में विलम्ब हो रहा हो और शल्यक्रिया संभव न हो तो ऑटो रिक्शा से किसी दूरस्थ चिकित्सालय ले जाएँ, सामान्य प्रसूति सहज रूप से संपन्न कराई जा सकती है। कोई व्यक्ति बचपन से हकलाता हो,बोलने में शब्द गले में ही अटक जाते हों, उसे एक माह तक शहर की विशिष्ठ सड़क पर तेज गति से मोपेड चलाने का परामर्श दें, शब्द ही वस्र्या चित्कार निकलने लगेगी। अगर डॉक्टर ने शल्य क्रिया के दौरान गलत हडि्‌डयाँ जोड दीं हों; छह माह शहर की सड़कों पर तेज गति से मोटर सायकिल चलाने से अपने आप हड्‌डी सही स्थान पर बैठ जाएगी। स्नायुविकार और पुराने सिरदर्द में लगातार पंद्रह दिनों का स्कूटर चालन लाभ पहुँचाता है। शरीर की ऐंठन,कान से कम सुनाई देना जैसी समस्याओं मे भी शहर की सड़कों से वाहन यात्रा के मियमित डोज लाभप्रद हो सकते हैं। डॉक्टरोँ की थोडी सी सूझबूझ और यात्रा की प्रामाणिक खुराक का परामर्श मरीजों को कष्टों से मुक्ति प्रदान करवा सकता है।’
साधुरामजी किसी मेडिकल कांफ्रेंस के मुख्य वक्ता की तरह बोले जा रहे थे,जहाँ मै अकेला एक सौ पच्चीस डेलिगेट्‌स का प्रतिनिधित्व कर रहा था।’ और हाँ, शहर की ऐसी असरकारी सड़कों का नामकरण भी-‘कनिप-वन,कनिप-टू,कनिप-टेन,आदि किया जा सकता है।’ वे बोले।
‘यह कनिप-वन,टू,थ्री क्या है?’ मैने पूछ लिया।
‘कनिप याने-कष्ट निवारण पथ,’। इन सड़कों की गुणवत्ता के आधार पर इनकी रोग निवारक क्षमता का आकलन करके इनका नामकरण किया जा सकता है। जैसे दवाइयों में होता है-‘सिपलाक्स100 ,विक्स 500 ,एविल-.5 ।’ उन्होने स्पष्ट किया।
मैने साधुरामजी से विदा ली। घर लौटते हुए सोंच रहा था- चिकित्सा विज्ञान में एक गैर चिकित्सकीय व्यक्ति के योगदान के लिए क्या साधुरामजी का नाम सर शांतिस्वरूप भटनागर पुरस्कार के लिए प्रस्तावित करना उचित नहीं होगा।

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