सदियों से सत्ताधारी अपनी सत्ता के लालच में आमजन में पनपे भाई चारे को कभी जाति के नाम पर, कभी धर्म के नाम, तो कभी भाषा को हथियार बना कर आम जनता को बांटकर हमेशा अपनी सत्ता कि रोटियां सेकते  रहे  हैं | इसी दर्द को सिद्दत से महसूस करती है डॉ मोहसिन खान की यह कविता – अनीता चौधरी 

नए-नए जुमले और मुहावरे

डा0 मोहसिन खान ‘तनहा

डा0 मोहसिन खान ‘तनहा

नए-नए जुमले और मुहावरे,
पिछले कई महीनों से उछल आए
और रच-बस गए
ज़हन, दिलो-दिमाग़ में,
जनता के,
लेकिन ग़लत परिभाषा के साथ।
भाषा तो समाज गढ़ता है,
लेकिन अब भाषा पर भी अधिकार
सफ़ेद देवताओं या कुछ हरे, कुछ भगवा देवताओं ने जता लिया।
नए-नए जुमलों को उछाला गया हवा में,
एक साज़िश के साथ,
बनाए गए कई बेतुके जुमले और मुहावरे
इस सदी की भाषा को भेंट देने के लिए।
खिलवाड़ हुआ है शब्दों का ऐसे मुँह से,
जिनके जबड़ों के बीच अपनी ज़बान नहीं।
बड़ा बेचैन हूँ मैं,
इस बात को लेकर कि
आज ये जुमले और मुहावरे
जो रच-बस गए हैं जनता के
ज़हन, दिलों-दिमाग़ में,
कल अपना असर दिखाएंगे ज़रूर।
बदल जाएगा ज़हन, दिलो-दिमाग़
जनता का,
क्योंकि रिस रहा है धीरे-धीरे,
एक रसायन विष भरा।
बदल जाएगी भाषा,
आने वाली पीढ़ियों की,
जैसे बदली गई थी साम्राज्य विस्तार के तहत हमेशा।
अब ये काम हमारे चुने हुए
शासक कर रहे हैं,
बड़ी ही चालाकी के साथ।

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