इस तीसरे वर्ग जिसे हिजड़ा, छक्का, ख्वाजासरा, किन्नर या थर्ड जेंडर आदि कहा जाता है, को समाज में वह सम्मान और स्थान नहीं मिलता जो अन्य दोनों वर्गों को प्राप्त है। यह वर्ग आज से नहीं बल्कि सदियों से समाज की प्रताड़ना का शिकार रहा है। संग्रह की सभी कहानियों में भारतीय समाज की परम्परागत कुत्सित सोच दिखाई देती है जो सदियों से लेकर आज भी अपनी संकीर्ण सोच से उबार नहीं पायी। हमारी सामाजिक संरचना बहुवर्गीय है। यहाँ स्त्री और पुरुष के समानांतर ही एक और वर्ग सदैव से समाज का अभिन्न हिस्सा रहा है।……..

नये स्वरों की वाहिका-‘वाड्.मय’ पत्रिका

डॉ अल्पना

वर्तमान समय अस्मितामूलक विमर्शों का समय है। इस विमर्शीय समय में जबकि हासिये पर पड़े विषयों की पड़ताल की जा रही है और विविध द्रष्टियों से उन पर चर्चा की जा रही है, तब भी थर्ड जेंडर पर उतनी बात नहीं हो रही है जितनी अब तक हो जानी चाहिए थी। आज की अग्रगामी और जानी-मानी पत्रिकाएं भी इस पर चर्चा-परिचर्चा करने या विशेषांक निकालने में आगे नहीं कदम बड़ा सकी जो अन्य विमर्शों में सदैव आगे दिखाई देती हैं।
यह विडंबना है कि कला और साहित्य में इस वर्ग की उपेक्षा की गयी है। जहा कहीं इनका उल्लेख हुआ भी है तो बहुत ही हल्के प्रसगों में हुआ है। आज जिस विमर्शीय समय में हम रह रहे हैं वहा कुछ भी स्थिर नहीं है, ना वाद ना विवाद और न ही संवाद। ऐसे समय में जबकि हाशिये के विषय मुख्य धारा में आ चुके हैं और खुल कर उनके अधिकारों पर बात भी हो रही है। तब भी किन्नरों उतना खुल कर बात नहीं हो रही जितना होनी चाहिए। इधर कुछ समय से साहित्य में इसकी आमद सुनी जा सकती है। कुछेक साहित्यकार हैं जिन्होंने बेबाकी से इस समाज के यथार्थ को हमारे सामने लाने का प्रयास किया है। साहित्य की विविध विधाओं में यह प्रयास देखा जा सकता है द्य प्रदीप सौरभ का उपन्यास ‘तीसरी ताली’ इस दृष्टि से खूब चर्चित हुआ।
ऐसे समय में ‘वांग्मय’ पत्रिका का विशेषांक आना निश्चय ही अच्छी पहल कही जा सकती है। वांग्मय पत्रिका का जनवरी-मार्च 2017 अंक प्रकाशित हुआ है। यह अंक सम्पादक डॉ एम. फिरोज अहमद की महत्त्वाकांक्षी परियोजना का एक भाग है। यह ‘थर्ड जेंडर : हिंदी कहानियाँ (हिजड़ों पर केन्द्रित) अंक है। यह अंक अपने आप में दुर्लभ है क्योकि इससे पहले इस विषय पर इकट्ठा इतनी सामग्री संभवतः नहीं उपलब्ध हुयी है। ऐसे समय में इस विषय पर बेबाक पहल कर ‘वांग्मय’ ने एक बार फिर साहसिक कदम उठाया है। इससे पहले भी यह पत्रिका समय समय पर बहु उपयोगी विषयों पर विशेषांक ला चुकी है। वांग्मय पत्रिका की यह विशेषता रही है कि उसके विशेषांक समय सापेक्ष होते हैं। जो पाठकों के लिए हमेशा ही संग्रहणीय रहे हैं। इसके सम्पादक डॉ एम. फिरोज अहमद पहले भी आदिवासी और आदिवासी कहानी विशेषांक द्वारा यह पहले ही पाठकों को पर्याप्त लाभान्वित कर चुके है। कथाकार शानी, राही मासूम रजा, बदीउज्जमा और अब्दुल बिस्मिल्लाह पर आधारित विशेषांकों की दुर्लभ सामग्री के कारण शोधार्थियों के साथ ही साहित्यिक रूचि रखने वालों के लिए द्वारा यह पत्रिका पहले भी पर्याप्त सराही गयी। इस सब के बीच पिछले वर्ष का विशेषांक कई मायनों में विशेष उल्लेखनीय रहा। जो साहित्य के सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार साहित्य अकादमी से पुरस्कृत रचनाओं पर आधारित है। ये सभी विशेषांक किसी न किसी दृष्टि से पाठको के लिए उपयोगी ही रहे।
इस विशेषांक में छोटी बड़ी सब मिला कर अट्ठारह कहानियां संकलित हैं। यह कहानियां इस वर्ग विशेष के जीवन का आइना है। संग्रह की सभी कहानियों में भारतीय समाज की परम्परागत कुत्सित सोच दिखाई देती है जो सदियों से लेकर आज भी अपनी संकीर्ण सोच से उबार नहीं पायी। हमारी सामाजिक संरचना बहुवर्गीय है। यहाँ स्त्री और पुरुष के समानांतर ही एक और वर्ग सदैव से समाज का अभिन्न हिस्सा रहा है। ग्रंथो में इसके प्रमाण उपस्थित हैं। तीसरी सत्ता का एक हिस्सा वह भी है जो जन्म से और अपने बाह्य आवरण से तो पुरुष होता है किन्तु उसके भीतरी गुण स्त्री के समान होते हैं। इस तीसरे वर्ग जिसे हिजड़ा, छक्का, ख्वाजासरा, किन्नर या थर्ड जेंडर आदि कहा जाता है, को समाज में वह सम्मान और स्थान नहीं मिलता जो अन्य दोनों वर्गों को प्राप्त है। यह वर्ग आज से नहीं बल्कि सदियों से समाज की प्रताड़ना का शिकार रहा है।
कथाकार शिवप्रसाद सिंह की कहानी ‘बिंदा महराज’, एस आर हरनोट की कहानी ‘किन्नर’ इस विषय के एक गंभीर पहलु को उजागर करती है। सलाम बिन रजाक के प्रतीकात्मक कहानी है ‘बीच के लोग’। यह कहानी व्यंग्यात्मक तरीके से सामाजिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न उठाती है। ‘ई मुर्दन का गाँव’ की लेखिका कुसुम अंसल इस सामाजिक व्यवस्था पर कुथारागात करती हैं। किरण सिंह की लम्बी कहानी कहानी ‘संझा’ में इस वर्ग की यातना को बहुत ही मनोविज्ञानिक ढंग से व्यक्त करती है तो ‘कौन तार से बीनी चदरिया’ कहानी संबंधों के स्तर पर भावुक कर देने वाली कहानी है।

साभार गूगल

इन कहानियों के पात्रों का अध्ययन करते हुए एक बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि संवेदना के स्तर पर यह बहुत हद तक समाज की दुराग्रही सोच को परिवर्तित करने में सक्षम हैं। बिंदा महराज, खलीक अहमद बुआ, पन्ना बा, पार्वती, संझा, बीलू, सोफिया, सुन्दरी, माधुरी आदि अनेक मानवीय संवेदना की द्रष्टि से किसी भी स्त्री या पुरुष से कहीं अधिक अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करते दिखाई देते हैं।
ये कहानियाँ इस समानांतर दुनिया और समाज का जीता जागता दस्तावेज हैं । पत्रिका के प्रारम्भ में प्रो० मेराज अहमद लिखी गयी भूमिका नें बहुत हद तक समाज के दिलों दिमाग पर छाए कोहरे को छाटने का प्रयास किया है। इस अंक की कहानियां निश्चित रूप से न केवल समाज को एक नयी द्रष्टि देने में सक्षम हैं बल्कि इस वर्ग को लेकर उनके मन-मस्तिष्क पर जो दुराग्रह छाया है उसे दूर करने में भी सक्षम हैं। संवैधानिक स्तर पर तो प्रयास किये ही जा रहे हैं साथ ही इस तरह के सांस्कृतिक और साहित्यिक प्रयासों द्वारा सामाजिक रूप से इस वर्ग को मान्यता प्रदान करने, उन्हें सम्मानपूर्वक जीवन यापन करने में सहायक ही सिद्ध होंगें। वांडमय पत्रिका और इसके सम्पादक डॉ फिरोज निश्चय ही बधाई के पात्र हैं।

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    By: डॉ अल्पना सिंह

    सहायक प्राध्यापक-हिंदी विभाग
    बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर केन्द्रीय
    विश्वविद्यालय, लखनऊ
    7905673737

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