एक और वर्ष का गुज़रना यकीनन मानव सभ्यता का एक क़दम आगे बढ़ जाना, ठहरना…. एक बार पीछे मुड़कर देखना, ताज़ा बने अतीत पर एक विहंगम दृष्टि डालकर सोचना, क्या छूटा, क्या है जिसे पूरा होना था और न हुआ, क्या हम निराश हैं, कितनी बचीं हैं आशाएं जिन्हें शब्दों के पंख देने हैं समता मूलक समाज की संकल्पना में……. फिर आगे बढ़ जाना है अगले कदम की ओर…..| इंसानी वक़्त की इन्हीं आशा-निराशाओं की ज़द्दो-ज़हद से निकलीं हैं ”अश्विनी आश्विन” की ग़ज़लें | आपकी चंद ग़ज़लें लोकतंत्रीय विकास की अवधारणा के सामने उस आईने की तरह हैं जिसके सामने खड़े होते ही ‘हम’ घिरने लगते हैं कई-कई सवालों से जो विवश करते हैं ‘हमें’ यह सोचने को, कि, क्या हमारी सभ्यता तकनीकी विकास की तरह सामाजिक, आर्थिक और मानसिक रूप से भी विकास के क्रम में एक कदम आगे बढ़ पाई…..? ……. लेकिन यह अंत नहीं हमेशा शुरुआत है, इन्हीं आशा और सपनों के साथ फिर से ‘खैरमकदम’ है आने वाले वर्ष के रूप में अगले क़दम का…… 

नए वर्ष की बधाइयों के साथ ”अश्विनी आश्विन” की यह ग़ज़लें……..

१- 

अश्विनी आश्विन

अश्विनी आश्विन

सदी! तू हो गई सोलह बरस की।
न तूने रौशनी तक दस्तरस की।।

सिमट कर रह गई तू भी! खनक में,
हरारत भी नहीं दिखती नफ़स की।।

उजाले आज भी हैं कैद यूं ही
न टूटी एक भी तीली कफ़स की।।

सुबह की आस के झूठे भरम में,
गुजारें और कितनी शब ? तमस की।।

अहम मसले हमारी ज़िन्दगी के,
अभी भी हैं महज बातें, बहस की।।

अभागी हैं यहाँ की बेटियां, जो
रहीं बलि-बेदियां-भर ही, हबस की।।

सोचकर इस वतन का मुस्तकविल
नींद मेरी हराम होती है ।।

२-  

googleसे साभार

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बे-सबब सुबह-शाम होती है।
उम्र यूं ही तमाम होती है ।।

लोग चुपचाप झेलते हैं सब
सल्तनत बे-लगाम होती है ।।

बे-खबर इन्कलाब सोता है
आदमीयत गुलाम होती है ।।

जुल्म बेख़ौफ़ रक्स करता है
जब ज़बां बे-कलाम होती है ।।

तख़्त करते हैं खूब मनमानी
नींद में गर अवाम होती है ।।

३-  

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न जाने लोग कितने, आज भी सोते सड़क पर ही।
रजाई आसमां उनकी, बिछावन है ज़मीं भर ही।।

झुलसते दिन तपन से या सिहरती-कांपती रातें
सभी कुछ झेलते हैं, मानकर अपना मुकद्दर ही।।

कि उनकी बेवसी पर तंज करती हैं हवाएं भी
समय भी बात करता है सदा उनसे अकड़कर ही।।

यही है हश्र, उनकी ज़िंदगी भर की कमाई का
पुराने चार बर्तन और दो खाली कनस्तर ही।।

अंधेरों के सिवा कुछ भी नहीं है इन हयातों में
उमड़ते, आँख से दिन-रात अश्कों के समंदर ही।।

सियासत भी इन्हें कब वोट से ज़्यादा समझती है
गुजरती ज़िन्दगी गुमनाम, बे-दर और बे-घर ही ।।

उजाले, भूल कर इस रहगुजर का रुख नहीं करते
कि हालत हो रही है रोज बद से और बदतर ही।।

उन्हें मालूम क्या होगा, तरक्की कौन चिड़िया है ?
न जिनको आज तक दो वक़्त की रोटी मयस्सर ही।।

भटकती फिर रही है ज़िन्दगी बेकल, परेशां-सी
भरेगा मांग इसकी ‘अश्विनी’ जैसा कलन्दर ही।।

४-  

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नवोदित साल! तेरा खैरमकदम।
ग्रहण कर, हम सभी का खैरमकदम।।

बड़े उत्साह से तकता तुझे है,
सियासत का, मचलता खैरमकदम।।

अँधेरे, फिर चले आये, संभाले
गरम, ताज़ा, महकता खैरमकदम।।

खड़ी है मुफलिसी, चुप-सी, अकेली
लिए, कंपता, लरजता खैरमकदम।।

उजाले भी खड़े हैं, मुँह छिपाए
पहन, रोता-सुबकता खैरमकदम।।

चली आईं कतारों पर कतारें,
लिए अपना उबलता खैरमकदम।।

खड़ी, चिथड़ों-ढकी मासूमियत, ले
शरारत से उछलता खैरमकदम।।

कुदालें, फावड़े, खुरपी हथौड़े
खड़े लेकर, सुलगता खैरमकदम।।

अकड़ कर, शान से पूँजी खड़ी, ले
वज़ूदों को निगलता खैरमकदम।।

खड़ी हैं पायलें, सिन्दूर, घुँघरू
लपेटे, विष-उगलता खैरमकदम।।

ठिठुरती, कांपती, बेबस ज़ईफ़ी
खड़ी, लेकर बुझा-सा खैरमकदम।।

खड़ा है इन सभी में ‘अश्विनी’ भी
लिए बोझिल, अधूरा खैरमकदम।।

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