लेखन और अध्यापन से जुड़ी “रुपाली सिन्हा” की कविताओं में सहज ही वर्तमान सामाजिक, मानसिक वातावरण जीवंत रूप में उठ खडा होता जान पड़ता है | आपकी रचनात्मकता महज़ विद्रूप देखने की आदी नहीं है बल्कि वह कारणों की पड़ताल करती दिखती है …..| आज यहाँ आपकी दो कवितायें …..संपादक 

निंदक नियरे 

रुपाली सिंहा

अब कोई नहीं रखता
निंदक को अपने नज़दीक

निदकों की जगह ले ली है चारणों ने
आँगन में जगह दे दी जाती है उन्हें
और
निंदा की बू आते ही
आदेश दे दिए जाते हैं
आंगन खाली करने के

बहिष्कृत होने के भय से
निंदकों ने भी बदल ली है अपनी चाल
आलोचना अब क्रूरता है
अशिष्टता है, संवेदनहीनता है, फूहड़ता है

मूल्यांकन-विश्लेषण तो
परिपाटी थी पुरानी
अब तो प्रश्नचिन्ह तक लगाने की
नहीं छोड़ी जाती है जगह

किसी कार्टून पर किसी चित्र पर या किसी शब्द पर ही
आहत हो उठती हैं भावनाएं
उद्वेलित हो उठती हैं
संसद और सड़कें
संस्कृति पर आसन्न संकट से निपटने
लहराने लगते हैं लाठी-बल्लम

इंसानों को तब्दील किया जा रहा है
देवताओं में
जिनके सामने सर झुकाने पर
मिलता है मनचाहा प्रसाद

“व्यावहारिकता” नए युग का कौशल है
निंदक हो गए हैं व्यवहार पटु
चढ़ रहे हैं सफलता की सीढ़ियाँ सरपट

इस कौशल ने
प्रशस्तिपत्रों से भर दी है उनकी दीवारें
असफलताओं के सारे दुर्जेय किले
कर लिए हैं फ़तेह उन्होंने
देखते ही देखते।

सपने 

आजकल
मेरी आँखें रहती हैं उदास।
भयानक अनुदारता और घोर अशिष्टता के
मजबूत गठबंधन को देख
अक्सर ही
झुकती रहती हैं शर्म से
पूछती हैं ढेरों सवाल
अपनी ‘गौरवशाली’ परंपरा और संस्कृति से
जिनके उत्तर नहीं दिए जाते
किसी षड्यंत्र के तहत।
कैसे टिकाये रखूं इन्हे एक जगह
‘बुरा मत देखो’ का पाठ
कंठस्थ ही नहीं कर पायीं ये आज तक
उधर ही उठती हैं ये अक्सर
जिधर अन्याय है
यह जानते हुए भी कि
‘अन्याय जिधर है उधर शक्ति’ है।
क्या करूँ
मेरी आँखें बहुत उदास रहती हैं आजकल
आज का खौफनाक रूप
जन्मने ही नहीं देता इनमे कल के सपने
अच्छे नहीं ये लक्षण
कम से कम
सपनो को ज़िंदा रखने की जुगत तो
करनी ही होगी।

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