हमरंग का एक वर्ष पूरा होने पर देश भर के कई लेखकों से ‘हमरंग’ का साहित्यिक, वैचारिक मूल्यांकन करती टिपण्णी (लेख) हमें प्राप्त हुए हैं जो बिना किसी काट-छांट के, हर चौथे या पांचवें दिन प्रकाशित होंगे | हमारे इस प्रयास को लेकर हो सकता है आपकी भी कोई दृष्टि बनी हो तो नि-संकोच आप लिख भेजिए हम उसे भी जस का तस हमरंग पर प्रकाशित करेंगे | इस क्रम की शुरूआत में आज…

वर्तमान सामाजिक, साहित्यिक जरूरतों, चुनौतियों एवं  प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए, एक वर्ष पूरा होने पर ‘हमरंग’ की वैचारिक और सांस्कृतिक प्रतिवद्धता का समग्र विवेचन करता ‘पद्मनाभ गौतम’ का लेख …| – संपादक 

निरुद्देश्य कुछ नहीं होता 

पद्मनाभ गौतम

पद्मनाभ गौतम
जन्म – 27-06-1975
ग़ज़ल संग्रह ”कुछ विषम सा“
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, गज़लें, समीक्षा इत्यादि प्रकाशित।
सहायक महाप्रबंधक
एल.आई.टी.एल.
माजीटार, पूर्वी सिक्किम, सिक्किम
पिन – 737132

बीते दिनों पंडित राहुल सांकृत्यायन का घुमक्कड़ शास्त्र पढ़ा। निबंध ‘मृत्यु-दर्शन’ अपने आप में एक अनूठा निबन्ध है जो घुमक्कड़ों को मृत्यु के भय से बचने के उपाय बताता है। निबंध का आरम्भ है ‘जातस्य ही ध्रुवो मृत्युः’ से अर्थात् जो जन्मा है सो मरेगा। उन्होंने प्रथम ही पैराग्राफ में गीता के इस संदर्भ से परिहार भी बतलाया है- ‘गृहित इव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत् अर्थात् यह समझो कि मृत्यु जैसे तुमको केशों से पकड़े हुए है, तुम धर्म का आचरण करो’।
दर्शन से लेकर आधुनिक जीव-विज्ञान का ज्ञान समेटे, यह सुदीर्घ निबंध ज्ञान-चक्षु खोल देता है। यहां यह देखना है कि सांकृत्यायन ने जिस उद्धरण से अपने इस निबंध का आरंभ किया है, वह गीता का एक श्लोक है। इस श्लोक से उपजी शंका व उसका निराकरण का सहारा भी उन्होंने गीता के ही श्लोक से किया है। निबंध में एक स्थान पर पर उन्होंने कहा है- ’’आज से कुछ हजार वर्षों पश्चात् कितने महापुरुष हैं, जिनका नाम याद रह जाएगा। पिछली सदी के पूर्वाद्ध अर्थात् अपने समकालीन परिदृष्य में उन्होंने जो कल्पना की, सन् 6565 में संभवतः गांधी, रवीन्द्र तथा श्रीनिवास रामानुजन के अतिरिक्त वर्तमान के संभवतः एक-दो जन ही ऐसे होंगे जिनका नाम दुनिया की स्मृति में बचा रह पाएगा। फिर मृत्यु का भय कैसा?’’ गंभीरतापूर्वक पढ़ें तो इस सन्दर्भ में एक और निहितार्थ है या कहिए कि प्रश्न है। वह प्रश्न यह है कि जब आज से कुछ हजार वर्षों पश्चात् हम जैसे आम जनों का कोई नाम लेवा ही न रहेगा तो फिर यह सद्कर्म करने का उद्देश्य ही क्या है? परंतु ऐसा गंभीर प्रश्न आपको ऐसा उत्कृष्ट लेखन पढ़ने पर ही नहीं कचोटता है। आप किसी नत्थू खैरे निकम्मे से पूछिये तो वह तत्काल निश्प्र: भाव से खैनी मलता वकालत पर उतर आएगा, फायदा क्या? कल को सब माटी में मिल जाना है। फिर कुछ कर के लाभ ही क्या? मेरे भी मन में आता है, हम जो यह इतना कुछ लिख रहे, उसका स्वान्तः-सुखाय से आगे क्या होगा। जब आज ही पढ़वैया मुश्किल है, तब कल कौन पढ़ेगा ? मैं जो अपना कीमती समय शब्दों को संजोने में लगा रहा हूं, उसे यदि अपनी आजीविका में लगाऊँ, तो यकीनन और अधिक धन कमा सकता हूं। फिर यह सब करके फायदा क्या?

यहां तक पढ़ कर यह महसूस हो सकता है कि इसका वर्णन प्रासंगिक नहीं। परंतु आप एक कल्पना कीजिए। वह यह कि जिस श्लोक से सांकृत्यायन अपने महत्वपूर्ण निबंन्ध का आरम्भ करते हैं, यदि वह पहले हजारों वर्षों तक वाचिक परम्परा तथा फिर भोजपत्र व कालांतर में छपी पुस्तकों इत्यादि के माध्यम से सहेजा न गया होता तो क्या राहुल उसे उद्धृत कर पाते? उससे भी एक कदम आगे, यदि इन्टरनेट पर इस विद्वतापूर्ण निबंध को संग्रहीत न किया गया होता तो क्या मैं सुदूर उत्तर-पूर्व के सिक्किम के एक छोटे से गांव में बैठ कर, जहां कि दूर तक हिन्दी का कोई पुस्तकालय नहीं है, इस आलेख में पंडित राहुल सांकृत्यायन के निबंध का उल्लेख कर रहा होता? सिक्किम के इस छोटे से नगर में बैठ कर मैंने चुटकियों में गीता के श्लोेकों का अर्थ जान लिया। किसी ने मेरे लिए वह भी इंटरनेट पर डाल रखा था। बस गूगल को याद किया तथा सब सामने हाजिर। मेरे जैसे घुमन्तू प्राणी जिसने दस सालों में आधे से अधिक हिमालय घूम लिया, उसके लिए स्वयं का पुस्तकालय लेकर गांव-गांव घूमना तो असम्भव है। इंटरनेट पर ही मैंने सांकृत्यायन कर आलेख पढ़ा, प्रश्नों के उत्तर ढूंढ़े तथा उसका संदर्भ इस आलेख में लिपिबद्ध कर दिया।
ज्ञान यदि संजो कर न रखा जाए, आने वाले पीढ़ियों को न हस्तांतरित किया जाए, फिर उसके अर्जित करने का उद्देश्य सीमित हो जाता है ? चलिए, मान लेते हैं कि लंकाधिपति रावण के पास पुष्पक विमान उपलब्ध था। परंतु न तो रावण और न ही भगवान राम ने ही यह जहमत मोल ली कि वे विमान बनाने की अद्भुत कला अगली पीढ़ियों को दे पाते। साथ ही, यदि महर्षि वाल्मीकि रामायण की रचना न करतेे तब तो शायद किसी को यह भी ज्ञात न होता कि कोई विमान था, जिसने अयोध्या की महारानी सीता का हरण करने में सहयोग दिया। यदि युक्तिपूर्वक वह वैमानिकी का ज्ञान भविष्य के मानवों ने हस्तांतरित कर दिया गया होता तो राइट बंधुओं को उड़ने का रहस्य खोजने में अपना कीमती समय न खराब करना पड़ता और हम बहुत पहले ही एयर बसों में उड़ रहे होते।

यह तो रही ठिठोली की बात। परंतु वास्तव में ज्ञान को संजोकर रखा जाना, हमारा मानवीय कर्तव्य हैै। ज्ञान का निरंतर अर्जन-परिमार्जन मनुष्यत्व का आधार है तथा उसका आने वाली पीढ़ियों को विरासत में दिया जाना हमारा दायित्य। जिस प्रकार से सूचनाओं की बहुलता के कारण आज मनुष्य के पास जहां एक ओर अपने ज्ञान को निरंतर बढ़ाने की सुविधा है, वहीं इंटरनेट के माध्यम से उसका आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेजा जाना भी सुगम हो गया है। इंटरनेट निर्विवाद रूप से आज सूचना संग्रहण व उसके आदान-प्रदान का सबसे सहज, सुगम तथा वृहद स्रोत है। इस स्रोत के महत्व को समय रहते पहचान कर संपादक भाई हनीफ मदार तथा उनके साथियों ने आज से एक वर्ष पूर्व इंटरनेट पर संजोने का जोे उपक्रम किया, वह था ‘हमरंग’।

‘हमरंग’ के प्रथम संपादकीय अर्थात् अपनी बात के पहले अंक में संपादक हनीफ मदार, वर्तमान पीढ़ी के द्वारा अर्जित ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहंुचाने में इंटरनेट के महत्व को रेखांकित करते हुए ‘हमरंग’ के आरम्भ किए जाने की आवश्यकता का उल्लेख करते हैं। वे मानते हैं कि साहित्य व कला के क्षेत्र में प्रचलित पारंपरिक प्रेषण-प्रकाशन व संरक्षण के साधनों के साथ समयानुकूल आधुनिक संसाधनों का भी उपयोग किया जाना आवश्यक है। इस संकल्प के साथ ही संपादक मंडल ने ‘हमरंग’ की नींव डाली। संपादक संसाधनों की विवशता के कारण ’हमरंग’ के द्वारा संजोए जाने वाले ज्ञान के क्षेत्र का भी वर्गीकरण करते हैं – ’साहित्य, कला-संस्कृति व रंग-कर्म’। उन्होंने ’हमरंग’ वेब-पटल की बुनियाद रखते हुए इसकी स्थापना का उद्देश्य भी बतलाया – एक ऐसे कोश या थेजारस की स्थापना जो नए-पुराने समस्त साहित्यकारों के सृजन के साथ-साथ, रंग-कर्म व देश की साझा सांस्कृतिक विरासत का एक दस्तावेज हो; जिस पर भविष्य के साहित्य के पाठकों के अतिरिक्त शोधार्थियों को शोध से सम्बंधित प्रामाणिक तथ्य, इंटरनेट पर ही उपलब्ध हो सकें। यह लिखते हुए संपादक ने यह भी साफ किया कि यह समय लेने वाला कार्य है , कम से कम पच्चीस-तीस वर्षों का समय लगेगा, जब कि यह एक परिपक्व कोष के रूप में विकसित हो सकेगा।
इस वेब-पत्रिका का आरंभ करते समय संपादक के मन में संशय था। संशय यह कि वे ऐसा करने का न केवल साहस अपितु दुस्साहस भी कर रहे हैं। परंतु अपने सीमित संसाधनों व सहयोगियों के साथ प्रथम दृष्टया ऐसा सोचना सामान्य भी था। परंतु इसके आरंभ को अभी एक वर्ष नहीं बीता है और यह पोर्टल एक परिपक्व विचारधारा के साथ, साहित्य-कला तथा रंगकर्म के क्षेत्र में अपनी गंभीर उपस्थिति दर्ज करा चुका है। जब संपादक हनीफ भाई से चर्चा में पता चला कि आगामी दिसंबर मास में ‘हमरंग’ का प्रथम जन्म दिवस है, सहसा मुझे विश्वास ही नहीं हुआ। कोई छह महीने पूर्व मेरा ‘हमरंग’ से जुड़ाव हुआ था। तब मुझे महसूस हुआ था कि ‘हमरंग’ एक स्थापित वेब-पटल है। यहां मुझे महसूस होता है कि संपादक मंडल ने इसका आरंभ करते समय एहतियातन इसे एक दुस्साहस कहा था; जबकि वह दुस्साहस न होकर एक सुदृढ़ संकल्प था।

‘हमरंग’ की स्थापना करते समय जिस कोश या थेजारस की परिकल्पना की गई थी, यदि एक वर्ष के अंतराल में उसका आकलन किया जाए तो निश्चय ही उसकी बुनियाद बहुत मज़बूत पड़ी है। आरंभिक परिकल्पना के अनुसार इस समूचे एक वर्ष में, साहित्य की मुख्य धारा की विधाओं- कहानी, कविता व ग़ज़ल के साथ-साथ, कम लिखी जाने वाली व ंिकंचित उपेक्षित विधाओं तथा रिपोर्ताज, यात्रा वृतांत, संस्मरण इत्यादि पर केन्द्रित रचनाओं के साथ-साथ रंग-मंच, तथा सिनेमा से संबंधित रिपोर्टिंग भी शामिल हैं। निश्चित रूप से ‘हमरंग’ में बहुप्रचलित विधाएं अर्थात् कहानियां तथा कविताएं पिछले एक वर्ष में बहुतायत से प्रकाशित हुई हैं। रंग-मंच खण्ड में नाटकों की प्रस्तुति व रंग-मंच से जुड़ी खबरों का समावेश करके ‘हमरंग’ ने इस उपेक्षित विधा को एक मंच प्रदान किया है। सिनेमा खंड समकालीन फिल्मों की स्तरीय समीक्षाएं समावेषित की गई हैं। साथ ही संपादक मंडल ने व्यंग्य विधा को भी महत्वपूर्ण मानते हुए व्यंग्य को भी विशेष स्थान दिया है।मुझे ‘हमरंग’ में जो खण्ड विशेष रूप से प्रभावित करता है वह खण्ड है विमर्श-आलेख का। डाॅ. नमिता सिंह, सूरज प्रकाश, विजय शर्मा , विष्णु खरे, अनवर सुहैल तथा अन्य महत्वपूर्ण व विश्वसनीय लेखकों के द्वारा इस खंड में दिया गया योगदान निश्चय ही भविष्य में इस कोष की पूंजी साबित होगा। मूल रूप से व्याप्त विषमताओं को उकेरते विमर्श आलेख समकालीन परिदृश्य के लगभग समस्त आयामों को छूते हैं, प्रश्न खड़े करते हैं तथा वे भविष्य के लिए इस पटल की थाती बनेगें।

यहां पर मुझे ईमानदारी से यह स्वीकार करना होगा कि इस समूचे बीते वर्ष में प्रत्येक खंड में प्रकाशित सामग्री की अलग से चर्चा कर पाना कठिन है पर थोड़ी सी चर्चा ’अपनी बात’ अर्थात् ‘हमरंग’ के संपादकीय की। अपनी बात में पहली बार हनीफ मदार जी ने सहजता के साथ, इसे एक साहित्यिक कोष के रूप में स्वीकार करते हुए इस पीढ़ी से आगे आने वाली संततियों तक, ज्ञान के स्थानांतरण का माध्यम निरूपित किया था परंतु इस एक वर्ष में, यह पटल अपने इंगित लक्ष्य से कहीं आगे निकल गया है। इस पोर्टल की प्रस्तावना में किसी वाद विशेष का घोष नहीं किया था। यद्यपि संपादक मंडल की निजी लेखकीय जनवादी प्रतिबद्धता, परोक्ष रूप से नियमित प्रकाशनों पर अपना प्रभाव दिखाती रही। उधर जब हम समूचे पोर्टल की वर्ष भर की यात्रा का आकलन करते हैं, तब इस मंच का व्यापक उद्देश्य अधिक स्पष्ट होता है | ‘हमरंग’ साहित्य के कोष से एक कदम आगे बढ़ कर, जनपक्षधर प्रगतिशील साहित्य का थेजारस है। इस एक वर्ष में मूल रूप से परंपरागत चारणीय व हिपोक्रेटिक साहित्य को स्थान न देते हुए, ‘हमरंग’ की सामग्री चयन में पर्याप्त सतर्कता बरती गई तथा वर्ग चेतनामूलक साहित्य ही ‘हमरंग’ में विशेष रूप से स्थान पा सका है। इस प्रकार संपादक इस पूरे वर्ष में ‘हमरंग’ को एक दिशा देने में सक्षम रहे।

एक और बात। जब कभी भी वर्ग चेतना से जुड़े मुद्दे आते हैं, उसके पक्ष में उठने वाले अधिकांश स्वर कहीं न कहीं परिवर्तनकामी प्रतिरोध के भीतर समाहित एक दीर्घकालिक प्रतिशोध की प्रतिध्वनि समेटे होते हैं। स्त्री, दलित, सर्वहारा व अल्पसंख्यक के अधिकारों की बात करने वाली आवाज़ में कहीं न कहीं एक निहित कंुठा का स्वर, किंचित वैमनष्यता के रूप में अपना सर उठाता है तथा उसे अगड़े, बहुसंख्यक तथा पुरूष प्रधान व्यवस्था के प्रति आक्रोश व्यक्त करते हुए, एक प्रकार के टकराव की परिस्थिति में लाकर खड़ा कर देता है। हम निश्चित रूप से वर्तमान में इस वैमनष्यता को टकराव की स्थिति में बदलते देख रहे हैं तथा आज किसी भी प्रकार के यथास्थिति परिवर्तन के आह्वान पर अभियक्ति का खतरा मंडरा रहा है। पर ‘हमरंग’ ने इस एक वर्ष के अंतराल में लगभग प्रत्येक विषमता पर व्यापक जन चेतना का प्रवर्तन करते हुए भी अपने को इस वैमनस्यता से इतर रखा है। ठीक वैसे ही जैसे मुंशी प्रेमचन्द के साहित्य ने बिना किसी कटुता के निरंतर ही परिवर्तनकामी सत्य कहा। ‘हमरंग’ अपनी बात तो कहता है, परंतु एक समझ के साथ हल खोजते हुए, समग्रता में, व्यापकता में। जैसे कि मजकूर आलम ’अपनी बात’ कहते हुए लिखते हैं –
’तमाम तरक्की और विकास के बावजूद कहीं न कहीं हमारे भीतर आदिम हिंसक प्रवृति विराजमान है, जो गाहे-ब-गाहे सामने आती रहती है। यानी कबीलाई सभ्यता की लंबी पूंछ जो भले ही अब न दिखती हो, लेकिन अपेंडिक्स की तरह अब भी पूरे खतरनाक रूप में हमारे भीतर मौजूद है, जो मौके-ब-मौके इतने खतरनाक रूप से फूल जाती है कि पूरी इंसानी सभ्यता को बस्ट करने की काबलियत रखती है। इस वजह से हमें बारम्बार ऑपरेशन टेबल पर जाना पड़ता है और अपेंडिक्स के रूप में तमाम खतरों को समेटे विराजमान पूंछ को काट कर निकलवाना पड़ता है।
यानी आज पूरा विश्व संघर्ष और संक्रमणकाल से गुजर रहा है, लेकिन नहीं यह कहना सही नहीं होगा। सच तो यह है कि अगर हम मांझी की तरफ नजर उठा कर देखें तो ये न दिखने वाली खतरनाक पूंछ हर दौर में रही है। हर दौर को ऐसी हिंसाओं से गुजरना पड़ा है और हर काल में इसके खिलाफ सदा बुलंद हुई है। इस प्रक्रिया में कई लोगों ने ऑपरेशन टेबल पर दम भी तोड़ा है, लेकिन अपेंडिक्स को इंसानी शरीर से समूल निकाल देने की उनकी कोशिशें कभी कमजोर नहीं पड़ी, न थकी न हारी। हमारी विरासत में इसकी एक लंबी शृंखला किन्हीं न किन्हीं नामों से मौजूद है।’
मजकूर इसका समाधान इस प्रकार देते हैं – सिर्फ इसांनियत को मूलमंत्र माना जाए और सबको अकाउंटेबल (जवाबदेह) बनाया जाए- केंद्र-राज्य सरकार के साथ, सरकारी सारी मशीनरियों- विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के साथ जनता को भी। इसके अलावा लोकतंत्र के अघोषित चैथे खंभे को भी, लेकिन यह तभी संभव है, जब कोई ऐसी नीति सरकार बनाएं कि सरकारी विज्ञापनों पर से उसकी निर्भरता खत्म हो यानी उसकी हिस्सेदारी विज्ञापनों पर फिक्स हो। साथ में उसकी जवाबदारी के लिए एक स्वतंत्र आयोग हो। और जो भी अपनी जवाबदारियों से भागे, उसके लिए सजा का प्रावधान हो।’’ और इस गंभीर मांग के साथ ही हल्के-फुल्के स्वर में कहते हैं – ’’अब जब नये साल में हम प्रवेश कर गए हैं तो रटे-रटाये जुमले से आप सबको नये साल की मुबारक बाद भी दे देते हैं।’’ स्पष्ट है कि ‘हमरंग’ का उद्देश्य सभी को साथ लेते हुए परिवर्तन की बात करना है।
इसी प्रकार संपादक मंडल की अहम सदस्या सुश्री अनीता चौधरी भी निरंतर गम्भीर मुद्दों को सरल-सहज रूप से उठाती रही हैं। अक्सर जब मैं स्त्री मुक्ति के स्वरों में लिखी जब कुछ कवियत्रियों की कविताएं या कहानियां पढ़ता हूं, तब ऐसा लगता है कि वह एक तीखी कर्कश आवाज़ है, जो नारी की पीड़ा नहीं है अपितु उस कवियत्री की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का घोष है पर अनीता निरंतर अपने मृदु सौम्य लेखन के साथ स्त्री मुक्ति तथा उसे बराबरी का दर्जा देने का अलख जगाती हैं। सेंसर पर आधी आबादी शीर्षक से अपनी बात कहते हुए में उनका मत है –
’जैसे किसी भी गाड़ी को चलाने के लिए उसमें दोनों पहियों का आपसी तालमेल जरुरी होता है, उसी प्रकार किसी भी देश का विकास व व्यक्ति का विकास भी महिलाओं के सम्पूर्ण विकास में ही निहित है। महिलाओं की स्थितियों में सुधार तभी हो सकता है जब पुरुष वर्ग उसमें बराबर की भूमिका निभाये।
अनीता महिलाओं के आर्थिक विकास को ही उनकी आजादी व इस यातना से मुक्ति का मार्ग मानती हैं। उनके हिसाब से मनचाहा करने की आजादी , दैहिक स्वच्छन्दता की आजादी महिला मुक्ति का मार्ग नहीं है। उसकी असली आजादी उसकी आर्थिक आजादी है –
’’महिलाओं के पूर्ण सशक्तिकरण के लिए उनका स्वावलंबी होना बहुत ही जरूरी है | जीवन के लिए साँसें, तब ही आर्थिक मजबूती उन्हें पूरी तरह से स्वतंत्र होने का संबल प्रदान कर पाती है। इसकी वजह से स्त्री के भीतर एक आत्मविश्वास पैदा होता है क्योंकि उन्हें लगता है कि उनका आर्थिक पक्ष मजबूत है और वे किसी पर निर्भर नहीं है। रुपया-पैसा पास है तो वह अपने मन की सभी चीजों को आराम से जुटा सकती है, उसे अपनी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए किसी के सामने हाथ फैलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। खुद कमाने की वजह से स्त्रियाँ कहीं भी आने-जाने व घूमने के लिए स्वतंत्र होती है। जहाँ आत्मनिर्भर न होने की स्थिति में कई बार उन्हें अपनी जरूरतों के लिए पैसे माँगने पर लताड़ भी दिया जाता है, वहीं स्त्रियों की आत्मनिर्भरता से आर्थिक पक्ष मजबूत होने पर घर में उनकी स्थिति भी मजबूत होती है और तब बड़े से बड़े निर्णय लेने में उनकी खासी भूमिका रहती है बल्कि उनमें एक सामाजिक नेतृत्व की भावना भी जागृत होती है, निर्णय लेने की वजह से वह परिवार में जिम्मेदार मानी जाती है | सबको लगता है कि वह जो भी फैसला करेगी वह ठीक ही होगा ।

महिला का आत्मनिर्भर होना घर की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने में भी सहायक होता है, उसे आत्मसम्मान से जीना और अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी रखना भी सिखाता है। आर्थिक पक्ष महिलाओं को मानसिक मजबूती भी देता है क्योंकि वह आज के इस बदलते ग्लोबल समय में अपने आप को इस इन्टरनेट की दुनिया से जुड़ने के लिए, तमाम सारी इलेक्ट्रोनिक व आधुनिक सुविधाओं को इस्तेमाल करने के तरीको को सीखने से लेकर, खरीदने तक के लिए आजाद होती है। वह उस अनोखी आभासी दुनिया में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है। आर्थिक आजादी ने ही एक औरत को सक्षम नागरिक बनाया है। समाज के हर क्षेत्र में उसकी सहभागिता बढ़ी है लेकिन इन सभी जगहों पर महिलाओं का प्रतिशत उतना नहीं है, जितना कि होना चाहिए जबकि आधी आबादी महिलाओं की है।’’
अनीता जी का यह आलेख निश्चय ही महिलाओं को प्रेरणा देता है कि वे छद्म दैहिक स्वतंत्रता से आगे बढ़ कर अपनी आर्थिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करें। यह सोच ही ‘हमरंग’ को एक विशिष्टता प्रदान करती है।
यह थीं ‘हमरंग’ की कुछ झलकियां। यदि ‘हमरंग’ के समूचे वर्ष भर के संचय की चर्चा की जाए, तो जाने कितने ‘कागद कारे’ हो जाएं। बहुत कुछ अतिरिक्त लिखने की इच्छा भी थी पर किंचित कारणों से संक्षेप में ही रुकना पड़ रहा है । फिर पाठकों का विवेक भी कुछ विशेषाअधिकार रखता है पर संक्षेप में इतना ही कहना होगा कि ‘हमरंग’ ने इस एक वर्ष के अंतराल मंे अपने कहे को निभाया है न केवल एक वृहद-कोष का अंकुर फूटा है, अपितु इसने जनपक्षधर सार्थक लेखन को आत्मसात करके अपना भविष्य काल का भी परिचय दिया है। जैसा कि संपादक हनीफ मदार स्वयं मानते हैं, इस में समय लगेगा जब कि यह एक संपन्न साहित्य कोष के रूप में विकसित हो पाएगा। ऐसा है भी पर जिस गति से ‘हमरंग’ में लेखकीय योगदान आया है, वह इसके बढ़ते महत्व को रेखांकित करता है। सोशल मीडिया के माध्यम से संपादक ‘हमरंग’ ने पोर्टल को सामान्य जन तक पहुंचाने का भी प्रयास किया है जो फलीभूत होता दिख रहा है। एक वर्ष के भीतर बने इस पाठक वर्ग ने ‘हमरंग’ को आने वाले वर्षों के लिए भरपूर् ईंधन दिया है। हां कभी-कभी कुछेक रचनाओं में स्तरीयता का भी अभाव दिख जाता है परंतु उसमें भी संपादक मंडल की सदस्यता ही दिखती है जो समकालीन लेखन में हाथ आजमा रहे नवागंतुकों को एक मंच देना चाहते हैं। ‘हमरंग’ को लेखक वर्ग की तो शुभकामना है ही।
इस आलेख का समापन भी एक उद्धरण के साथ ही। यह अंतिम पैराग्राफ है, घुमक्कड़शास्त्र के अंतिम निबंध ’स्मृतियां’ से। सांकृत्यायन लिखते हैं – ’’नम्रतापूर्वक कहूंगा कि घुमक्कड़-शास्त्र लिखने का यह पहला उपक्रम है। यदि हमारे पाठक-पाठिकाएं चाहते हैं कि इस शास्त्र की त्रुटियां दूर हो जायँ तो वह अवश्य लेखक के पास अपने विचार लिख भेजें। हो सकता है, इस शास्त्र को देखकर इससे भी अच्छा सांगोपांग ग्रंथ कोई लिख डाले, उसे देखकर इन पंक्तियों के लेखक को बड़ी प्रसन्नता होगी। इस प्रथम प्रयास का अभिप्राय ही यह है कि अधिक अनुभव तथा क्षमता वाले विचारक इस विषय को उपेक्षित न करें और अपनी समर्थ लेखनी को इस पर चलाएं। आने वाली पीढ़ियों में अवश्य ही कितने पुरुष होेंगे, जो अधिक निर्दोष ग्रंथ की रचना कर सकेंगे। उस वक्त लेखकों जैसों को यह जान कर संतोष होगा कि यह भार शक्तिशाली कन्धों पर पड़ा है।’’

उपरोक्त उद्धरण के साथ अंत करना सायास है जिसकी अब व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है। यह ‘हमरंग’ के पाठकों व सहयोगी रचनाकारों की जिम्मेदारी है कि वे इसे सवंर्द्धित करने में अपना महती योगदान दें। साथ ही संपादक हनीफ मदार जी व समग्र संपादक मंडल को भूरि-भूरि शुभकामनाएं कि यह यात्रा अनवरत चलती रहे। यात्रा जिसमें केवल देना है , लेना कुछ नहीं, एक आत्मिक सुख के अतिरिक्त। आशा है कि एक दिन ‘हमरंग’ एक दिन अपने लक्ष्य के अनुरूप मंजिल पर अवश्य पहुंचेगा ।

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