कबीर नगर  nilay

तुम्हारा नगर तो अजीब है कबीर
सच कहूं तो अदभुत,

क्या तुम्हे पता था
इसीलिए रच दिए एक साथ दो दो प्रतीक
और किया उलटवासियों का विधान
सच कहता हूं मजा आ गया

उलट बांसिया
उलट रही है ,पुलट रही है
सच हो रही है कबीर

समुद्र में आग लग चुकी है
नदियां जल कर कोयला हो चुकी
मछलिया आक्सीजन का मास्क लगाती है
पेड पर घोसला बना रहती है

जो जो कहा तुमने सच निकला
और सच के उलटने से जो बना
वह भी सच निकला

यहां पुरूष चंचल है
औरते चतुर और विलक्षण चतुर
दोनो मिलकर कंबल को निचोड कर बरसाते है
और पानी को भिंगा देते है, पानी डरा हुआ है

जाने दो,और तुम्हारा ही एक प्रतीक
गर सुना दू तुमको
जो लोट पोट हो हंसोगे,कहोगे
क्या कह दिया, यहां गाय बांझ रहती है
बैल बच्चा देता है।

तुम्हारा नगर तो अजीब है कबीर
सच कहूं तो अदभुत,अलौकिक
अपूर्व
नजराने है बछडों के दुहाने के

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स्कूल जा रहे है

खच्च से लगा ब्रेक स्कूटर का
तो आई जान मे जान,
यह आपकी ही दुआ होगी.बच गए आज

मुड के देखा
भरी पूरी देह वाली औरत
एक पांव जमीन पर टिकाए,दोनो हाथो से हैंडल थामे
पीछे दो बच्चे,वो भी मोटे ताजे, कंधो पर
स्कूल का बस्ता बांधे बैठे थे और वह
मेरे भय से बेखबर
गर्दन घुमा कहीं और देख रही थी

समझ गया,
वो जो कंधे में बस्ता लटकाए
बच्चे का हाथ थामे आ रही है उस औरत से
चल रही है आंखो की बतकही, यही कहती है
दोनो की मुस्कान
एक में बसती है दूसरे की जान

निकल गया मन का भय
अच्छा लगने लगा सब कुछ

हे भगवान
आगे एक बच्चा खडा
उसके बाद खुद बैठी , पीछे दूसरी वाली
और उसकी गोद में एक बच्चा
एक दोनो के बीच में पिचका
मेरे बगल से सन से गुजरी तो
सकून मिला ,
आंखों को सुख मिला.नाक में भर गई
उसके आत्मविश्वास की खुशबू

और हैंडल में
टंगे, सामने पांव पसार लटके
उन बस्तों का क्या कहूं,जिसमे कैद है
सारी दुनिया का ज्ञान, इतरा रहे है
चिल्ला रहे है
हम स्कूल जा रहे है।

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