(नीता पोरवाल की प्रस्तुत कविताऐ श्रमिक जीवन की त्रासद स्थिति और भरपेटों के नकली दुखों की पड़ताल करती हैसंपादक )

१- 

कह सकोगे क्या ?

हम मेहनतकशों की

बाजुओं की ताकत

और ज़ज्बा देख

उद्व्गिन रहते हो तुम

 

फक्क पड़ जाता है

तुम्हारे चेहरे का रंग

जब पीठ पर दुधमुंहा बांधे

ईंटों के चट्टे उठाये हुए

गूंज उठते हैं गीत

हमारे सूखे पपडाए होठों से

 

हमारी जिजीविषा के साक्षी

हवा में झूलते इतराते

हमारे चुटीले के फुंदने ,

रंग बिरंगी चूडियाँ कसे

भट्टी में ईंधन झोंकती हमारी कलाइयां

भर देती हैं तुम्हे घोर अचम्भे से

 

यहाँ तक कि

इस परम सत्य से भी किंचित

अपरिचित नही तुम

कि हमारे क़दमों की आहट बिना

तुम्हारे घरों की

सुबह नही होंती

 

मूर्तिवत रह जाते हो तुम

जब हमारे बच्चे

पाठशाला की चौखट छुए बगैर

झट बता जाते हैं

हवाओं और मौसमों के मिजाज़

और दुनियादारी के तमाम जोड़ घटाव

 

हमें पथरीली जमीन पर

खर्राटे लेते देख

आलीशान भवनों में

हिम शिला खण्डों से तैरते

तो कभी साहिल पर

फैन उगलती लहरों से तुम

 

सफ़ेद लाल पीली गोलियाँ निगलते

गुदगुदे गद्दों पर भी रतजगे करते

अपने शुष्क हुए कंठ को

बार बार तर कर उठते हो तुम

भला कह सकोगे क्या …

Otto Muller

Otto Muller

 

ये नन्हे कलंदर हैं

जब ठुमक कर चलते हैं

तो अपनी पैजनियों से,

करधनियों से नूपुर की ध्वनि नही

करतबों के हैरत अंगेज नाद उत्पन्न करते हैं

 

तालियों के शोर में

रस्सी पर

एक पांव से देर तक हवा में झूलते

ये वो बोधि वृक्ष हैं

जिनकी छाँव में यदि चाहो तो

समझे जा सकते हैं

ध्यान औ’ योग के अस्फुट पाठ

 

कनस्तरों, टूटे बक्सों

प्लास्टिक कंटेनरों पर

ओर्केस्ट्रा की धुनें निकालते

ये कलन्दर

महंगे साजों और तालीम के भी

मोहताज़ कहाँ होते हैं ?

 

ककहरा पढ़ने की उम्र में

एक नही कितने ही एकलव्य

अजाने गली- कूचों में

अपनी धनुष सी काया से

कलाबाजियों के तीर साधते

जरूरतों में लिपटे कलाओं के ये जखीरे

आखिर सहेजे क्यों नही जाते  ?

 

चाक पर खुद बी खुद घूमती

जीती जागती ये जिन्द्गानियाँ   ,

बेवक्त चली आँधियों में

बिखर जाने भर के लिए तो नही

अनगढ़ हाथों में पड़

बदशक्ल हो जाने भर के लिए तो नही…

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