नीलाम्बुज ग़ज़ल और कवितायें सामान रूप से लिख रहे हैं | आपकी न केबल ग़ज़लें बल्कि कविताओं में भी राजनैतिक प्रभाव में बनती बिगड़ती सामाजिक मानवीय अमानवीय तस्वीरें साफ़ साफ़ झलकती हैं ….. | कवितायेँ फिर कभी आज हमरंग पर आपकी कुछ ग़ज़लें ….| संपादक 

नीलाम्बुज की ग़ज़लें: 

नीलाम्बुज

नीलाम्बुज

1-  

झूठ-चमक से हारा दिन
कैसा है अँधियारा दिन
कहीं ख़ुदकुशी कर लेगा
विदर्भ-सा बेचारा दिन
जिसके जीतने मीठे बोल
उसका उतना खारा दिन
रात से जिनकी कट्टी है
उन चोरों का प्यारा दिन
कोई न था वो, दरपन था
जिसने आज सँवारा दिन
निरगुन-सा बजने लगता
कभी-कभी इकतारा दिन
क्यों तुम इतने दुखी हो नील
कैसा प्यारा प्यारा दिन !

२- 

साभार google

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दिल में खटका सा रहता है
शायद ये सोया रहता है
उसकी तरफ बड़ी हरियाली
अपनी तरफ सूखा रहता है
शायर की तो बात करो मत
कुछ भी बस बकता रहता है
दुनियादारी कौन निभाए
वो तो ग़ज़ल कहा करता है
उस डाली को यूँ मत तोड़ो
उस पर एक छत्ता रहता है
इन्सानों की कुछ मत पूछो
ख़ुदा पे भी पहरा रहता है
नील तुम्हारी इन ग़ज़लों को
कोई तो है, सुनता रहता है

३-

करों में लगन है हृदय में अगन है
मैं स्वप्नों के सोपान पर चढ़ रहा हूँ।
अरे द्रोण दुनिया ज़रा ये भी सुन ले
मैं इकलव्य बन के समर लड़ रहा हूँ।
मैं फूलों की वीथी में विचरण न करके
गली कंटकों की वरण कर रहा हूँ।
अमा है प्रबलतम तो मैंने भी ठानी
मैं आठों प्रहर जागरण कर रहा हूँ।

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    By: नीलाम्बुज

    डी. यू. से नजीर अकबराबादी की कविताओं पर एम् फिल कर चुकने के बाद जे. एन. यू. के भारतीय भाषा केंद्र से ‘सामासिक संस्कृति और आज़ादी के बाद की हिंदी कविता’ पर पीएच. डी. जारी
    आजीविका के लिए अध्यापन
    केन्द्रीय विद्यालय , क्रमांक 1 , कांचरापाड़ा में में हिंदी प्रवक्ता.
    (शोध लेख, आलोचना, कवितायेँ, समीक्षाएं और रिपोर्ताज) प्रकाशित

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    ‘नीलाम्बुज’ की ग़ज़लें: humrang

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