वे हमारी आवाजें थे… हम उन्हें पा लेंगे क्योंकि हमें उनकी जरूरत है | कवि-पत्रकार पंकज सिंह को जन संस्कृति मंच की श्रद्धांजलि…’राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य जन संस्कृति मंच, ‘कौशल किशोर’ की कलम से ……

‘पंकज सिंह’ वे हमारी आवाजें थे… 

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पंकज सिंह

मशहूर कवि और पत्रकार पंकज सिंह का निधन देश के क्रांतिकारी वामपंथी सांस्कृतिक आंदोलन के लिए एक बड़ी क्षति है। 26 दिसंबर को दिल्ली में दिल के दौरे से उनका निधन हो गया। निधन के चार दिन पहले ही उन्होंने अपने जीवन का 67वां साल पूरा किया था।
वसंत के वज्रनाद ‘नक्सलबाड़ी जनविद्रोह’ ने मुक्ति का जो स्वप्न दिया, उसके साथ पंकज सिंह का आजीवन गहरा सरोकार रहा। राजनीति का क्षेत्र हो या साहित्य और कला का, जिन ‘हाथों पर युवा वसंत के उल्लास का खून’ लगा था, उनकी शिनाख्त करना वे कभी नहीं भूले। 1985 में दिल्ली मे हुए जन संस्कृति मंच के स्थापना सम्मेलन में वे बतौर प्रतिनिधि शामिल हुए थे। 1998 के दिल्ली सम्मेलन में वे जसम के राष्ट्रीय परिषद के सदस्य बने। भाकपा-माले से उनका अत्यंत दोस्ताना संबंध रहा। आखिरी वक्त तक वे मार्क्सवादी-लेनिनवादी राजनीतिक धारा के साथ ही जुड़े रहे। जीवन की आखिरी सांस तक सत्ता की तानाशाही और उसके फासीवादी मुहिम के विरुद्ध वे सक्रिय रहे।

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कौशल किशोर

22 दिसंबर 1948 को पश्चिमी चंपारण के चैता गांव में जन्मे पंकज सिंह ने वंशीधर हाई स्कूल, आदापुर से से स्कूली शिक्षा ग्रहण की। उसके बाद लंगट सिंह काॅलेज से मध्यकालीन भारतीय इतिहास में बी.ए. और एम.ए. किया। 1966 में पंकज सिंह की पहली कविता प्रकाशित हुई। उसके अगले ही साल नक्सलबाड़ी का जनविद्रोह हुआ और उस दौर के संवेदनशील नौजवानों की तरह उन्होंने भी उसे बड़ी उम्मीद से देखा। उस आंदोलन का उनकी कविता पर गहरा असर पड़ा। उदाहरण के तौर पर ‘वह इच्छा है मगर इच्छा से कुछ और अलग’ शीर्षक कविता देखी जा सकती है- ‘‘इच्छा है मगर इच्छा से ज्यादा/ और आपत्तिजनक मगर खून में फैलती/ रोशनी के धागों-सी आत्मा में जड़ें फेंकती/ वह इच्छा है/ अलुमुनियम के फूटे कटोरों का कोई सपना ज्यों/ उजले भात का/ वह इच्छा है जिसे लिख रहे हैं/ खेत-मजदूर, छापामार और कवि एक साथ/ वह इच्छा है हमारी/ जो सुबह के राग में बज रही है।’’ ‘आहटें आसपास’ (1981), ‘जैसे पवन पानी’ (2001) और ‘नहीं’ (2009) शीर्षक से उनके तीन कविता संग्रह प्रकाशित हैं। उन्होंने बांग्ला, उर्दू, अंग्रेजी, जापानी और फ्रांसीसी आदि भाषाओं में कविताओं के अनुवाद भी किए।
1972 में पंकज सिंह रिसर्च के लिए जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय गए, पर आपातकाल के कारण वे इसे पूरा नहीं कर पाए। चाहे इंदिरा तानाशाही का काल हो या सांप्रदायिक फासीवाद का मौजूदा दौर पंकज सिंह न सिर्फ इनका क्रिटिक रचते हैं बल्कि इनसे मुठभेड़ भी करते हैं। 1974 में लिखी ‘साम्राज्ञी आ रही हैं’ कविता में वे कहते हैं ‘साम्राज्ञी का रथ तुम्हारी अतड़ियों से गुजरेगा/रथ गुजरेगा तुम्हारी आत्मा की कराह और शोक से/तुम्हारे सपनों की हरियालियां रौंदता हुआ/रथ गुजरेगा रंगीन झरनों और पताकाओं की ऊब-डूब में’। यह इंदिरा तानाशाही के दौर का क्रूर व हिंसक यथार्थ था, जिसे उन्होंने अपनी कविता के जरिए व्यक्त किया, वहीं आज वे कहते हैं: ‘देखो, कैसा चमकता है अंधेरा/काई की गाढ़ी परत सा/एक निर्मम फासीवादी चरित्र पर/देखो, लोकतंत्र का अलौकिक लेप’। पंकज सिंह की कविता इस कथित लोकतंत्र के सघन होते अंधेरे की न सिर्फ पड़ताल करती है बल्कि जो कभी तानाशाही के रूप में तो कभी फासीवाद के रूप में देश की जनता की छाती पर सवार है, उसकी असलियत से लोगों का साक्षात्कार कराती है। वास्तव में पंकज सिंह इस व्यवस्था के खिलाफ उस स्वप्न के रचनाकार हैं जो देश के करोड़ों-करोड़ हाशिए पर ढकेल दिये गये भारतीय जन की आंखों में है।
जनता के मुक्ति के सपनों और संघर्षों को भारतीय शासकवर्ग ने हमेशा भीषण दमन के जरिए खत्म कर देने दुष्चक्र रचा है, लेकिन पंकज सिंह के शब्दों में वे जन तो ‘जैसे पवन पानी’ हैं, उन्हें खत्म करना मुश्किल है और वे हमारे लिए भी पवन-पानी की तरह जरूरी है। नक्सलबाड़ी भी कहां खत्म हुआ! वह फिर भोजपुर आंदोलन के रूप में सुलग उठा। पंकज सिंह की कविता में नरायन कवि, साधुजी और शीला चटर्जी जैसे भोजपुर आंदोलन के शहीद अकारण नजर नहीं आते। ‘जैसे पवन पानी’ में उन्होंने लिखा है- ‘हमारी आवाजें थीं हमीं से कुछ कहने की कोशिश में।’ वे बार-बार जनता के बुद्धिजीवी और कवि के फर्ज और ऐतिहासिक कार्यभार की ओर संकेत करते हैं- ‘‘एक तरफ होकर अपने ही खोए शब्दों का आविष्कार/ करना होगा जो भले ही बिगड़ी शक्ल में आएं खूनआलूदा/ मगर हमारे हों जैसे कल के…./ वे हमारी आवाजें थे/ अब भी होंगे हमारी ही तरह मुश्किलों में/ कहीं अपने आविष्कार के लिए/ और विश्वास करना चाहिए/ हम उन्हें पा लेंगे क्योंकि हमें उनकी जरूरत है/ अपने पुनर्जन्म की खातिर/ थोड़े उजाले थोड़े साफ आसमान की खातिर/ मनुष्यों के आधिकारों की खातिर/ वे थे/ वे होंगे हमारे जंगलों में बच्चों में घरों में उम्मीदों में/ जैसे पवन पानी…’’
1975 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छोड़ने के बाद पंकज सिंह 1978 से 1980 तक पेरिस में रहे। उसके बाद 1987 से 1991 तक बीबीसी हिंदी सेवा में उद्घोषक के बतौर काम किया। साहित्य कला-संस्कृति के विषयों के अलावा राजनीति पर भी उन्होंने लिखा। ‘सोच’ नाम की पत्रिका का संपादन और प्रकाशन भी किया। वे कला के अच्छे जानकार थे। उन्होंने ‘जनसत्ता’ में लगातार कला समीक्षाएं लिखीं। नवभारत टाइम्स में वामपंथी पार्टियों पर लिखी गई उनक शृंखला काफी चर्चित रही। उन्होंने डाॅक्यूमेंटरी और कथा-फिल्मों के लिए स्क्रिप्ट भी लिखे। दूरदर्शन और अन्य चैनलों के लिए कई कार्यक्रम किए। लेकिन संस्कृति के विविध क्षेत्रों में काम करने के बावजूद उनका मन कविता में ही सबसे अधिक रमा। 2007 में उन्हें शमशेर सम्मान मिला था।
पंकज सिंह जन संस्कृति आंदोलन के हमारे सहयोद्धा थे। हाल के दिनों में खासतौर से प्रो. कलबुर्गी की हत्या के बाद हिन्दुत्व की आक्रामकता व देश में बढ़ती असहिष्णुता के खिलाफ उनकी सक्रियता और प्रेरक भूमिका रेखांकित करने वाली है। जंतर मंतर से लेकर सहित्य अकादमी तक हुए लेखकों व संस्कृतिकर्मियों केे प्रतिरोध के मोर्चे पर वे जिस मजबूती से डटे थे, उसे हम याद करते हैं और अपने प्रिय साथी को जन संस्कृति मंच की ओर से श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उन्हें लाल सलाम करते हैं। उनकी जीवन संगिनी चर्चित कवि सविता सिंह, उनकी बेटियों और परिजनों के प्रति हम अपनी गहरी संवेदना जाहिर करते हैं।

(‘कौशल किशोर’ की फेसबुक वाल से साभार)

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