मानवीय संवेदना को लेकर वर्तमान समय, समाज और सभ्यता से एक सवाल दुहराती छोटी कहानी …..|-

sushil सुशील कुमार भारद्वाज

पगली का तौलिया

बाघ एक्सप्रेस के समस्तीपुर जंक्शन पहुंचते ही, भीड़ के साथ एक पगली भी उसमें चढ आयी| गर्मी में भी मलिन स्वेटर पहने, गंदे व उलझे बालों में सबके आकर्षण का केंद्र बनी वह सीट-दर–सीट घूमती रही| कभी कोई प्रेम से कहता –“नीचे उतार जाओ|” कभी दूर करने के लिए –“उधर चली जाओ|” और कभी सख्त आवाज कान से टकराती – “भागो|“
और वह सुना – अनसुना करते प्रवेश द्वार के पास पालथी मारकर बैठ गई|
एक आवाज आयी –“पागलों को कोई देखने वाला नही है| जहाँ देखो वहीँ नज़र आ जाएं|”
दूसरी आवाज आयी –“कैसे हैं, इसके नाते – रिश्तेदार|”
तभी पीछे से आवाज आयी – “स्वार्थी दुनिया में नाता –रिश्ता क्या होता है, भाई?”
आवाज अचानक रुक गई| जींस – टॉप पहने एक युवती बर्थ नम्बर १ से उठी और उसने अपने बैग से एक नया तौलिया निकालकर पगली को ओढा दिया| उसमें क्लिप भी लगा दिया, ताकि कहीं गिरे नहीं| उसके बालों को कंघी किया और फिर अपनी जगह पर लौटकर कान में ईयरफोन लगा कर बैठ गई| शांति के माहौल में सभी की निगाहें कभी उस युवती की तरफ जातीं तो कभी पगली की तरफ| लेकिन युवती की इस हरकत ने सबके अंदर हलचल मचा दी थी| इन सबसे बेफिक्र वह युवती कभी अपनी डायरी में कुछ लिखती, तो कभी कोई चित्रकारी करती रही| अंग्रेजी का कोई उपन्यास उसके बैग से झांक रहा था| ट्रेन अपनी गति में थी और वह पगली अपने आप में खोयी कभी आंख मटकाती तो कभी मुस्कुरा रही थी|
अचानक हलचल हुई जब गाड़ी ढोली स्टेशन पर पहुंची और भीड़ उतरने को आतुर हुई| भीड़ से एक आवाज आयी – वाह! पगली का तौलिया तो एकदम नया है|”
और जब भीड़ छंटी तो सबके मुंह खुले के खुले रह गए| पगली का तौलिया गायब हो चुका था और पगली पूर्ववत हालत में बाहर की ओर देख रही थी|

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