हमेशा ही सामान्य या सहिष्णु दिखने वाली स्थितियां प्राकृतिक रूप से सामान्य नहीं होतीं अपितु किसी अनचाहे डर और कथित अनुसाशन भी उनके यथार्थ या असामान्य, असहिष्णुता जैसी स्थितियों को किसी आवरण की तरह ढांके रहता है …… तब क्या सही मायनों में उस स्थिति को सामान्य कहा जा सकता है …. अशोक तिवारीद्वारा रेखाचित्र शैली में लिखी यह कहानी मानो मानवीय मनोवैज्ञानिक पड़ताल करती है | – संपादक 

पतंग पर सवार 

अशोक कुमार तिवारी

अशोक कुमार तिवारी

उस दिन सुबह से ही मन में एक उल्लास था। स्कूल की गर्मी की छुट्टियां हो गई थीं। बाबूजी आज गांव जा रहे थे। गांव से मतलब पैत्रिक गांव – कराहरी, ज़िला मथुरा। और जहां से उसी दिन तो वापस नहीं आया जा सकता था। अतः उस दिन हमें घर में छूट मिलेगी, यह सोचकर हम सब भाई-बहिन ख़ुश थे। बाबूजी का गांव जाना और ख़ासतौर से घर से रात भर के लिए कहीं भी बाहर जाना हम सब बच्चों के लिए एक राहत की बात हुआ करती थी। निश्चय ही आप सोचेंगे कि आख़िर ऐसा क्यों था। इसी बात का जवाब ही तो है, जिसे मैं ढूँढ़ने के लिए आज बैठा हूं। बाबूजी घर में रहते तो महसूस होता कि माहौल में एक घुटन तारी हो रही है, धड़कनें एक अनुशासन में धड़कने के लिए बाध्य हैं। न कम न ज़्यादा। बाबूजी के घर से बाहर रहने को हम सभी सेलीब्रेट करते। इसमें हम भाई-बहन तो होते ही थे, कुछ हद तक मां भी शरीक़ हो जाती। कई बार बाबूजी का बाहर जाने का कार्यक्रम काफ़ी पहले बन जाता तो हम सब उनके उस दिन का इंतज़ार करते। इस बात का अर्थ ये कदापि न लगाया जाए कि हम सब भाई बहन या मां बाबूजी को नहीं चाहते थे। बल्कि यहां एक विरोधाभास था जो हमारे साथ अक्सर चलता था। बाबूजी जब घर में नहीं आते तो लगता कि घर अधूरा है, मगर जब बाबूजी आ जाते तो लगता कि हमारी स्वतंत्रता में दख़ल हो गया। बाबूजी का डर इस क़दर था कि हम न तो ख़ुलकर बात कर सकते थे और न ही ख़ुलकर अपनी बात कह सकते थे। हमारे उठने-बैठने, चलने-फिरने पर बाबूजी की पैनी नज़र होती। कोई कुछ कह नहीं पाता था। बाबूजी की घर में उपस्थिति हम सबको अलग-अलग धड़ों में रहने को बाध्य करती थी। मैं आमतौर पर छोटी बहिन के साथ ही घर के किसी कोने में किसी ऐसे खेल में लगा होता जो चुपचाप खेला जा सकता हो, या फिर अपनी किताब-कापियों में मुँह गढ़ाए रहता था। बाहर कहीं खेलने जाना होता था तो बाबूजी की नज़र बचाकर घर से निकलना होता था। कई बार ऐसे में बहाना भी काम कर जाया करता था। जैसे पेशाव जाने के बहाने हम बाहर भाग जाया करते थे। अब क्योंकि पाखाना तो अमूमन घर के बाहरी हिस्से में ही होता था, तो कोई कहां तक नज़र रख सकता था। घर से छूटे तो पहुंच गए खेल के मैदान में, जहां खेल की टीम या तो हमारा इंतज़ार कर रही होती थी या फिर हम उसमें अपनी जगह बनाने के लिए लाइन में लग जाते। मुसीबत तो तब होती थी जब पहले से ही तय खेल में मैं समय से नहीं पहुंच पाता था। झूठ बोलकर घर से निकलकर जाना मेरे लिए वाकई कष्टकर होता था। जिसका एक तनाव मेरे अंदर बराबर बना रहता था जो मुझे इस बात का अहसास कराता था कि मैं कुछ ग़लत कर रहा हूं। मगर मैं पाता था कई बार उसके बग़ैर बात भी नहीं बन पाती थी।

google से साभार

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इस तरह से खेल के मैदान में जाना भी मेरे लिए ज़्यादा कारगर साबित नहीं होता था। कारण – मेरा एक मन तो इस बात पर अटका होता था कि मैं घर में झूठ बोलकर आया हूं। और उस झूठ का सामना मुझे घर जाकर फिर से करना होगा। अतः मैं न तो खेल में पूरी तरह से दिलचस्पी ले पाता और न ही मैं वहां जाने से रुक पाता। जिस दिन बाबूजी शहर से बाहर कहीं जाते – मसलन आफ़िस के किसी काम से, जो ज़्यादातर चुनाव की ड्यूटी होती थी – तब मेरे लिए घर से निकलना बहुत मुश्किल नहीं होता था। और जब इस तरह का मौक़ा आता था तो हम फूले नहीं समाते थे। बहरहाल बात आगे बढ़ाएं –

अब बाबूजी को गांव जाना तो था मगर दोपहर हो गई थी और अभी तक बाबूजी के जाने के कोई आसार नज़र नहीं आ रहे थे। हम भाई-बहिन ने कई बार जाकर मां को इशारे-इशारे में कह दिया था कि बाबूजी वक़्त से ही निकल जाएं वरना फिर अँधेरा-वधेरा हो जाएगा तो दिक़्क़त होगी। बस नहीं मिलेगी। वग़ैरा वग़ैरा, जैसे हमें बाबूजी की इतनी फ़िक्र हो। मगर सच तो ये था कि हमें बाबूजी की फ़िक्र से ज़्यादा इस बात की फ़िक्र थी कि बाबूजी देर से गए तो हमने पतंगउड़ाने के जो मंसूबे बना रखे हैं, वो सब चौपट हो जाएंगे। बाबूजी के घर में रहते हमारे पतंग उड़ाने की छोड़ो, हम पतंग को घर में ला भी नहीं सकते थे। हम अपनी पतंगों को बुखारी में या छत पर बने टांड़ पर छुपाकर रखते थे ताकि उनकी कोई भनक बाबूजी को न लग जाए।

मां ने बाबूजी से कई बार कह भी दिया था- ‘‘जानौंएं तो जल्दी निकर जाऔ, नईं तो देर है जाइगी।’’

दरअसल बाबूजी ऑफ़िस के किसी काम में लगे थे। उन्होंने काम निपटाते-निपटाते चार बजा ही लिए। और थैला उठाकर चल दिए घर से बाहर। मैं उनके क़रीब आया और पैर छूने के लिए झुका। घर में एक रिवाज़ था कि जब भी कोई घर से बाहर जाए या बाहर से आए तो बड़ों के पैर छूने होते थे। कारण क्या थे इसमें हम अभी नहीं जा रहे थे। फ़िलहाल पैर छूकर मेरे मन में इस बात पर पक्की मुहर लग गई थी कि बाबूजी आज तो लौटकर नहीं आएंगे।

बाबूजी के जाते ही सबने के एक लंबी सांस ली, जैसे बहुत देर के बाद खुले में आए हों। मैं बुखारी में रखी अपनी पतंगों को निकालने के लिए घुसा। पतंगों की हालत अच्छी न थी। उन्हें चिपकाना था। लेई बनाई, कापियों में से पन्ने फाड़े और लग गए पतंगों की रिपेयरिंग में। मेरे साथ एक पड़ौसी दोस्त महेश आ गया था। वो दो दिन पहले मंजे और सद्दी ख़रीदकर लाया था – ख़ूब सारी और कुछ मंजा वो था जो मेंने अपने छत से दूसरों की पतंग कटने के बाद लूटा था। हुचका नहीं था मगर एक मोटी सी डंडी पर लपेट रखा था। पतंग और मंजा लेकर हम छत पर पहुंच गए। खुली हवा में सांस ली और पतंग में कन्ने बांधकर मंजे में गांठ लगा दी।

थोड़ी ही देर में पतंग आसमान की सैर कर रही थी। मेरे हाथ का मंजा सरकता ही जा रहा था और पतंग लगातार लहराती हुई कभी इधर तो कभी उधर बढ़ती ही जा रही थी। पतंग के दूर जाने के साथ ही उसके धागे में भारापन आ रहा था। उसको साधने में अब ताक़त लगानी पड़ रही थी। मैं छत की ऐसी मुंडेर के बीचों-बीच खड़ा था जो दो छतों के बीच में बनी थी। और जहां से घर का मेन गेट भी साफ़ दिखता था। आसमान में पतंग उड़ रही थी और ज़मीन पर हमारे मन। पतंग जैसे-जैसे और जिस-जिस दिशा में मुड़ती हमारे शरीर भी उसी दिशा में मुड़ जाते। निगाहें बेहद तेज़ और ध्यान पतंग पर केंद्रित।

किसी की पतंग हमारी पतंग के क़रीब आई। और हमारी पतंग कोलभेड़ने की कोशिश करने लगी। मैं लिभड़ने या लिभड़ाने के मूड में क़तई नहीं था। वैसे भी अगर आप मुझसे पूछें तो मुझे आसमान में उड़ती पतंग अच्छी लगती हैं मगर कटती हुई पतंग मुझे सदैव एक पीड़ा का भाव देकर जाती हैं। पतंग काटना मुझे किसी फूल को तोड़ने जैसा लगता है। वर्चस्ववादी सोच की मुख़ालफ़त मुझे सदैव भाती रही है। हालांकि महेश मुझे बार-बार उकसा रहा था कि मैं अपनी पतंग कोबजाए पीछे खींचने के उस पतंग में लड़ा दूं। मगर इस बाबत मेरा फ़ैसला अटल था और मैं किसी भी सूरत अपनी पतंग को दॉव पर लगाकर उसे खोने के मूड में नहीं था। पतंग को उड़ाना और उसके साथ ख़ुद उड़ना एक अलग ही भाव होता है। पतंग तो बहुत से लोग उड़ाते है मगर ऐसे कितने हैं जो पतंग उड़ाने के साथ-साथ ख़ुद भी उड़ते हैं।

हमारी पतंग आसमान में दूर-दूर तक सैर कर रही थी। कभी ऊपर कभी नीचे। कभी दाएं तो कभी बाएं। मेरा शरीर भी ठीक उसी तरह मुड़ता जा रहा है। महेश के मुंह से लगातार आवाज़ें आ रही थीं।

‘‘होए बेटा, शाबास बेटा…ओए खींच ले-खींच ले….ओए ढील दे-ढील दे।’’

और मैं सच बताऊं तो सिर्फ़ और सिर्फ़ पतंग ही को देख रहा था। जैसे पतंग नहीं मैं ख़ुद ही उड़ रहा हूं आसमान में।

तभी एकाएक किसी परिचित आहट से मेरी निगाह घर के मेन गेट पर चली गई। मैंने जो देखा उससे तो मेरे होश ही उड़ गए। पतंग को साधने वाला मंजा हाथ से कब छूट गया, पता ही नहीं चला। बिना किसी सहारे के पतंग कहां गई, पता नहीं। सब कुछ छोड़-छाड़कर और एक अपराधबोध के साथ में धीरे-धीरे उन निगाहों का सामना करने के लिए छत से नीचे आ रहा था जो बाबूजी की थीं।

जीने से नीचे आकर मैं स्वभाववश बाबूजी के पैर छूने के लिए झुका। मुझे नहीं पता कब बाबूजी ने मुझे उन्हीं पैरों से फ़ुटबॉल की तरह उछालकर दूर फेंक दिया। मैं सर के बल नल के पास गिरा। मैं पुनः चुपचाप और सज़ा मिलने के इंतज़ार में खड़ा था। बाबूजी की निगाहों की आग मेरे जिस्म को जलाकर खाक किए जा रही थी।

सर में निकल आए गूमड़े को सहलाते हुए मां ने रात को बताया कि लेट होने की वजह से बाबूजी की बस छूट गई। अब अगले दिन सुबह जाने का उनका कार्यक्रम बन चुका था। और मैं सोच रहा था अब तो मेरे पास पतंग भी नहीं, मंजा या सद्दी भी नहीं। बाबूजी को पतंग उड़ाने से नफ़रत है या पतंग उड़ते हुए देखने से? क्या उड़ना कभी ग़लत भी हो सकता है? इसका जवाब मैं किससे पूछूं….तभी मेरा हाथ सर पर चला गया जो अब भी दर्द कर रहा था। क्षणभर को मुझे लगा कि काश बस वाले थोड़ा इंतज़ार और कर लेते तो आज की कहानी कुछ और ही होती।

उस रात नींद की खुमारी में मुझे लगा कि बाबूजी मेरे नज़दीक आकर मेरे गूमड़े को सहला रहे हैं, उस गाल को भी जहां थप्पड़ लगे थे।

 

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