आज व्यवसायिकता समाज और राजनीति की आधारशिला है। आज़ादी मिलने के बाद भी प्रमुख अख़बार और पत्रिकाएँ बड़े व्यापारिक संस्थानों से जुड़ी थीं लेकिन उनके लेखक-संपादक-स्तंभकारों को पर्याप्त वैचारिक स्वतंत्रता थी। वे जन-विरोधी सरकारी नीतियों की आलोचना करते थे और उनके प्रतिरोध को सम्मान भी मिलता था।  आज पत्रकारों की विश्वसनीयता कम हो रही है। ज़्यादातर मीडिया चैनल देश के बड़े पूंजीपतियों, उद्योगपतियों की खरीदी हुई संपत्ति हैं। कोई व्यापार-व्यवसाय बिना सत्तापक्ष के समर्थन के नहीं चल सकता। वैचारिक स्वतंत्रता की छूट अभी तक संभव है जब तक वह स्वामी अथवा सत्ता के हितों पर चोट न करे। जैसे   पत्रकार-लेखक-स्तंभकार के विचारों या रिपोर्ट से मालिकों का या व्यवस्था की नीतियों का विरोध होने लगता है, पत्रकार-लेखक की स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है। : 

पत्रकारिता के अब उद्देश्य बदल गये हैं ! 

डॉ० नमिता सिंह

खींचों न कमानों को न तलवार निकालो,
जब तोप मुकाबिल हो तो अख़बार निकालो!

अकबर इलाहाबादी के इस शेर से पहले ही देश के समाज-सुधारकों और देश-समाज के लिये समर्पित विभूतियों ने जीवन के बड़े उद्देश्यों के लिये पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन किया। स्तंभ-लेखन के रूप में हो या संपादकीय, समाज और व्यवस्था की रीत-नीति के प्रति आलोचनात्मक लेखन ने लोगों को जागरुक किया और साथ ही जन-साधारण के दुख-दर्द और और उनकी आशा-आकांक्षाओं को स्वर प्रदान किया। कहा जाता है कि साहित्य समाज का आईना होता है लेकिन पत्र-पत्रिकाएँ सम सामयिक समाज की धड़कन ज़रूर होती हैं।

हमारे देश में पत्र-पत्रिकाओं का इतिहास उन्नीसवीं सदी से ही मिलता है जब हिंदी, उर्दू और भारतीय भाषाओं में अख़बार तथा पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू हुआ। हिंदी का पहला समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ का पहला अंक मई 1826 को कलकत्ता से प्रकाशित हुआ जो साप्ताहिक-पत्र था और वह डेढ़ साल बाद बंद हो गया। भारतीय नवजागरण के अग्रदूत राजा राममोहन राय ने पहले बंगला, अंग्रेजी और फ़ारसी में अलग-अलग अख़बार निकाले। इसके बाद 1829 में अंग्रेज़ी में बंगाल हेरल्ड के बाद ‘बंगदूत’ के नाम से एक साथ बंगला, हिंदी और फ़ारसी में भी साप्ताहिक पत्र शुरू किया जिसके संपादक नीलरतन हालदार थे। हिंदी का पहला दैनिक समाचार पत्र ‘समाचार सुधावर्षण’ जून 1854 में कलकत्ता से शुरू हुआ जो शायद 1868 तक निकला। उन्नीसवीं सदी से लेकर आज इक्कीसवीं सदी की दूसरी दहाई तक अंग्रेजी के अलावा आज हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं में हज़ारों की संख्या में अख़बार और पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही हैं लेकिन आम जनता के दुख-दर्द के साथ खड़ी और व्यवस्था की नीतियों की ओर उंगली उठाने वाली केवल गिनी-चुनी ही हैं। इसके साथ यह भी सच है कि दो सौ सालों के सफ़र में अनेक स्तंभकारों और पत्रकार-लेखकों ने उच्च कीर्तिमान भी स्थापित किये।

लोकतंत्र का चैथा स्तंभ है पत्रकारिता जो समाज और व्यवस्था को आईना दिखाता है। कितने पत्रकारों ने अपने दायित्व का निर्वाह जान की कीमत पर किया। उन्नीसवीं सदी से लेकर बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक अपनी बेबाक लेखनी के लिये स्तंभकार-लेखक अंग्रेजों के कोपभाजन बने। 1857 के स्वाधीनता संग्राम में पत्र-पत्रिकाओं की विशेष भूमिका रही। उर्दू के साप्ताहिक पत्र ‘देहली उर्दू अख़बार’ ने लगातार विद्रोह के समाचार छापते हुए क्रांति सैनिकों की हौसला अफ़जाई की और अंग्रेजों के दुष्प्रचार का खंडन करता रहा। नतीजे में अंग्रेजों ने इसके संपादक मौलवी मुहम्मद बाकर को गिरफ़्तार कर बिना मुकद्दमा चलाये गोली मार दी। ‘पयामे आज़ादी’ अख़बार के संपादक मिर्ज़ा बेदार बख़्त को भी अंग्रेजों के विरुद्ध लगातार लिखते रहने के कारण फांसी पर चढ़ा दिया गया।

आज इक्कीसवीं सदी तक आते-आते पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों, स्तंभ लेखकों का स्वरूप बदल गया है। पत्रकारों को समाज में हमेशा ऊँचा स्थान मिला है क्योंकि उन्हें सत्य को संवाहक माना गया। आज संचार माध्यमों में केवल पत्र-पत्रिकाएँ ही नहीं बल्कि इलेक्ट्रानिक मीडिया का बोलबाला है। ढेर सारे समाचार चैनल हैं। आज व्यवसायिकता समाज और राजनीति की आधारशिला है। आज़ादी मिलने के बाद भी प्रमुख अख़बार और पत्रिकाएँ बड़े व्यापारिक संस्थानों से जुड़ी थीं लेकिन उनके लेखक-संपादक-स्तंभकारों को पर्याप्त वैचारिक स्वतंत्रता थी। वे जन-विरोधी सरकारी नीतियों की आलोचना करते थे और उनके प्रतिरोध को सम्मान भी मिलता था। कहा जाता है कि श्रीमती इंदिरा गांधी नयी नीतियों के बनने और लागू होने से पहले प्रमुख पत्रकारों से विचार विमर्श करती थीं और उनके विरोध के बिन्दुओं को गंभीरता से लेती थीं। इसके बावजूद 1975 में आपातकाल लागू होने पर कुछेक सरकारी प्रकाशनों को छोड़ सभी ने इसका विरोध किया। वे जेल भी गये और कष्ट सहे।

आज पत्रकारों की विश्वसनीयता कम हो रही है। ज़्यादातर मीडिया चैनल देश के बड़े पूंजीपतियों, उद्योगपतियों की खरीदी हुई संपत्ति हैं। कोई व्यापार-व्यवसाय बिना सत्तापक्ष के समर्थन के नहीं चल सकता। वैचारिक स्वतंत्रता की छूट अभी तक संभव है जब तक वह स्वामी अथवा सत्ता के हितों पर चोट न करे। जैसे पत्रकार-लेखक-स्तंभकार के विचारों या रिपोर्ट से मालिकों का या व्यवस्था की नीतियों का विरोध होने लगता है, पत्रकार-लेखक की स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है।

लोकतंत्र के लिये स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता-लेखन बेहद जरूरी है। स्वस्थ, निष्पक्ष आलोचना और आम जनता के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिये पक्षधरता वाली पत्रकारिता बहुत कम हो गयी है। लोकतंत्र के लिये विचारों की विविधता, निष्पक्षता और स्वतंत्रता जरूरी है वर्ना तानाशाही का खतरा पैदा होता है।

पत्रकारिता के इतिहास में पत्रकारों-लेखकों का संघर्ष केवल राजनैतिक स्वतंत्रता के लिये ही नहीं था बल्कि स्त्री-शिक्षा, महिलाओं की आज़ादी के साथ छुआ छूत जैसी सामाजिक कुरीतियों, रूढ़ियों और जादू-टोने जैसे अंधविश्वासों के खिलाफ़ भी इन्होंने मुहिम चलाई थी। आज दो सौ साल बाद विज्ञान-तकनीक के युग में फिर से ये कुरीतियों और अंधविश्वास मीडिया का हिस्सा बन जनता के सामने परोसे जा रहे हैं। इन्हीं अंधविश्वासों के खिलाफ लिखते हुए चार वर्ष पूर्व महाराष्ट्र के डॉ० नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या कर दी गयी। आज के इस कठिन दौर में पत्रकारों-स्तंभकारों को एक बार फिर अपनी गौरवशाली परंपरा को याद करते हुए अपनी भूमिका का निर्धारण करना होगा। व्यवस्था के पक्ष में सुर मिलाने वाले जनता के इतिहास में याद नहीं रहते हैं।

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