व्यंग्यकार की दृष्टि खुद से लेकर अपने आसपास, सामाजिक और राजनैतिक क्रिया कलापों और घटनाओं,  जो आम तौर पर सामान्य घटनाओं की तरह ही दिखाती हैं, उनमें से भी बेहतर सामाजिक सरोकारों के लिए सार्थक तर्क खोज ही लेतीं हैं जो किसी भी व्यंग्य रचनाकार के लिए उर्वरक होता है | देवेन्द्र सिंह सिसौदिया महज़ यात्रा जैसे शब्द और क्रिया में से साहित्यिक सरोकारों के साथ खोजे हुए तथ्यकथ्यों को अपनी रचनाशीलता से व्यंग्य रूप दे रहे हैं | हमरंग पर आपकी पहली रचना के साथ स्वागत है  | संपादक

पद यात्रा,पद और अंतिम यात्रा 

भारत एक विशालतम देश है यहाँ कई प्रकार की यात्राएँ होती रहती है । तीर्थ यात्रा, रथ यात्रा, चुनरी यात्रा, हज यात्रा, दांडी यात्रा, विदेश यात्रा, जेल यात्रा, पद यात्रा और अंतिम यात्रा । हर यात्रा के गर्भ में कोई न कोई उद्देश्य होता है । जिनमें धार्मिक, सामाजिक, कानूनन और राजनैतिक प्रमुख होते है । वैसे कई बार देखा गया है कि कुछ यात्राओं के पीछे एक से अधिक उद्देश्य होते है । कुछ दिखाई देते है तो कुछ अदृष्य ।
देश को आजादी दिलाने के उद्देश्य से कई सैनानियों ने संग्राम के साथ जेल यात्राएँ की थी । जेल यात्राएँ आज भी होती किन्तु इनके पीछे समाज में अपनी दबंगता को बड़ाने का उद्देश्य होता है । तथाकथित रुप से ये जेल यात्रा कर समाज के समक्ष त्याग का पाठ पढ़ाते है । जेल यात्राएँ करे भी क्यों नहीं ? कब ये स्थान इनका स्थाई निवास बन जाए पता नहीं । जिस जेल का उद्घाटन किया हो वहीं पर आपको रात गुजारना पड़े तो आश्चर्य नहीं । जीवन की सन्धया में भी नेताओं को ये आनन्द मिलते हमने देखा है । इसी अनिश्चतता को दृष्टीगत रखते हुए जेल सुधार पर जोर-शोर से काम चल रहा है । पता नहीं किस घोटाले के आरोप में एक सुरक्षा चक्र से निकल कर दूसरे सुरक्षा चक्र में रहना पड़ जाए ।
चुनरी और रथ यात्राएँ धार्मिक आस्था से अधिक राजनैतिक दबंगता दिखाने का एक सुगम साधन बन चुकी है । इस आस्था के प्रदर्शन के दौरान जितनी लम्बी यात्रा उससे लम्बा जाम, शान को बढाने में चार चान्द लगा देता है । कई बीमार और जख्मियों की कराहन इनके ढोल मजीरों और ताशों की आवाज में दब कर लाशों में बदल जाती है । यात्राओं के पश्चात फैला कचरा स्वच्छ भारत अभियान को मुँह चिढ़ाने में कतई शर्म महसूस नहीं करता ।
संत पुरुष, स्वतंत्रता सैनानी और सामजिक कार्यकर्ता सामाजिक सन्देश या आन्दोलन के उद्देश्य से पद यात्राएँ निकालते आए है । इन यात्राओं से कई सामाजिक सुधार हुए । यात्राओं की वजह से अंग्रेजों को ‘पद’ छोड़ना पड़ा । अब ‘ पद यात्राओं ‘ का स्वरुप और उद्देश्य बदल चुका है । ‘ पद यात्राएँ’ , ‘पद’ तक पहुँचने का एक सुलभ साधन बन चुका है । वही ‘पद यात्रा’ सफल मानी जाती है जो तेजी से ‘पद’ तक पहुँचाने में कामयाब हो ।
अब तो पद यात्रा से भी आगे एक और यात्रा होने लगी है जिसे ‘रोड़ शो’ कहते है । हर चुनाव के पूर्व स्टार प्रचारकों के द्वारा ऐसे शो किये जाते है । स्टार प्रचारक का राजनीति से जुड़ा होना जरुरी नहीं है । रोड शो के रुट का निर्धारण करने से पूर्व बड़ी एतिहात बरती जाती है । इसके लिए आवश्यक है वहाँ रोड़ हो, रोड़ पर आवारा पशु विचरण न कर रहे हो, रोड़ पर गन्दगी न हो, रोड़ पर नाले का पानी न बहता हो, रोड़ पर अतिक्रमण न हो और शो के मार्ग में अंडे और टमाटर की दुकान न हो । इन सब बातों से पुख्ता होने के बाद रोड़ शो कर मतदाताओं को रिझाने का कार्य किया जाता है ।
इन सब यात्राओं से गुजरते हुआ व्यक्ति अंततः अन्तिम यात्रा के मार्ग पर पहुँच जाता है । अंतिम यात्रा भी ठण्ड में सुबह सुबह निकले तो बड़ी त्रासदायी हो जाती है । अंतिम यात्रा अगर कार्यदिवस पर निकले तो एक दिन के अवकाश की बली चड़ जाती है । अंतिम यात्रा के दौरान मुर्दा बौर नहीं हो इस हेतु साथ के लोगों के मोबाईल में एक से एक धुन का शुमार रहता है ।ये कहे कि व्यक्ति के साथ रिश्ते, नाते और बैंक बैलेंस नहीं जाते परंतु रिंग टोन बैंक अंतिम संस्कार तक साथ देता है ।पता नहीं कब बज उठे “ ये जीवन है इस जीवन का यही है रंग-रुप….” । मार्केटिंग ऐसी चीज है जिसमें जितना अधिक झूठ बोला जाए उतना माल बिकता है । बस यही काम अंतिम यात्रा के अंतिम संस्कार के पश्चात श्रृद्धांजली के दौरान उद्बोधन में होता है । अंततः उसके व्यव्हारकुशलता, कार्यकुशलता, सामाजिक जिम्मेदारी और नेतृत्व की क्षमता की बखान कर उसे तथाकथित रुप से स्वर्गवासी होने का स्थाई प्रमाण पत्र जारी कर लौट आते हैं । अंत भला, सो सब भला ।

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