हिंदी कविता में प्रखर राजनितिक चेतना और वैज्ञानिक सोच के धनी सूरज बडत्या की कवितायें समय-सापेक्ष हैं और हस्तक्षेप करती हैं अपने समय की चुनौतियों से—संपादक

परले ज़माने का राजा ! 

एक 

परले ज़माने की बात है ..
एक राजा हुआ करता था ..
जितना सुन्दर राजा था …..
प्रजा भी उसकी उतनी ही सतरकी थी…
राजा के किस्से और किस्सों की किस्सई ..
प्रजा खूब ही नहीं ,,,
बखूब समझती थी … !!!
उस परले ज़माने के राजा में
तीन खूबिया थी …
राजा साल में छ महीने सोता था ..
चार महीने देशाटन को जाता था और …
दो महीने जुमलेबाजी किया करता …

दो 

राजा ने मंत्री से संत्री तक ..
भामन से बनिया तक ….
लठैत से फांसीवान तक की…
हुंकारे-ए-अदाएगी की …
नफीस सी ट्रेनिंग कराई गयी थी अमेरिका में …
अमरीका, आज सा नहीं था तब …
उस परले ज़माने के अमरीका में …
जानवर को मनुष्य का साथी बनाने ….
हिंसक को नकेल डाल… …
अपनी इंसानी नस्ल और समाज खातिर,,
हुंकार भरने की ट्रेनिंग कराई जाती थी !!!

तीन 

हमारे परले ज़माने के राजा को…
ये हुंकारा ट्रेनिंग इतनी मन को भा गई थी…
कि उसने,, छंटे-छंटाये अद्भुत लोंगो को …
विशेष रूप से इस कला में निपुण करा लिया था … !!!
अब…
राजा एक दिन के लिए जागता है बस..
जुमलेबाज़ी करने …. और फिर
उसके हुंकार ट्रेनिंग पाए निपुण विशेष …
निपुणता को .. नफासत से पूरा करने लगते हैं ….

संस्कृति

मैंने कहा आलू …
उसने चिकन कहा
मैंने चिकन कह दिया ….
उसने फिर बीफ कहा … तो मैंने भी बीफ कह डाला
और तब उंगलियाँ नचा उसने कुफ्र बका …
मनुष्य …
तो मैंने उसे बताया… भाई रे ..
हम राजा नहीं है ….
मनुष्य हैं …प्रजा हैं ..
हमारे यहाँ पे …
अपनी नस्ल खाने की संस्कृति नहीं बनी है अभी …

आवाजें

आवाज़े नहीं जाती कहीं भी, कभी भी …
वक्त जाता है बस …
तानाशाह भूल से भ्रम में जीता है कि आवाजें चली गई हैं …
घोंट देने से दबती नहीं हैं आवाज़े …
और गला काट देने से घुंट नहीं जाती
वो बुलंद से बुलंद होके …
गूजँती फिरती हैं हवाओं- फिजाओं में ….
यहाँ से वहां अठखेलियाँ करती सी ..
कानों मैं कूकती … धुप में नहाती ……
बहती रहती है आवाज़ हवा सी ….
इसलिए ..
आवाज कभी मर नहीं पाती ..
अगर वो आवाज ज़िंदा आग सी ….
भूख-भुखमरी ……
जात-भामण ….
थाली-चट्टे और अँधेरे के खिलाफत में उठी हो ……!!!
आवाज़ …ध्वनि है …
आवाज़ जीवन है ….
पानी … नदी .. आग …हवा … समुद्र …
सब आवाज़ ही तो है ….
जर्रे-जर्रे में समायी हुई है आवाज़
तब आवाज़ मेरी…मर कैसे पाएगी …
मरोगे तो तुम छप्पन इंची ….
कितनी भी कथाएं करा लो सतनारायण की अब …
चालीसा-वालिसा भी पढ़-पुढा लो यहाँ ….
मर्सियाँ अब रुदालियाँ गा लेंगी ….
आवाज़-ओरतें अभी जिन्दा हैं ….
और वो ज़िंदा रहेंगी … सैकड़ो .. हजारों … लाखों शताब्दियों तक
इंसानी नस्ल जब तलक…..
गेहूं और धान में जिन्दा है …
खेतों-खलिहान में ज़िंदा हैं
ज़िंदा गीत गाती रहेंगी ओरतें …
ऐसे में आवाज़े …….मर कहाँ पाएगी …. !!!!!

  • author's avatar

    By: सूरज बड्त्या

    १५ जन. १९७४
    दयालबाग एजूकेशनल संस्था में अध्यापन
    कृति : दलित साहित्य : पक्ष-प्रतिपक्ष, दलित साहित्य का सौन्दर्य-शास्त्र, कामरेड का बक्सा : कहानी संग्रह
    संपर्क : सी-९७ रामा पार्क, उत्तम नगर नई दिल्ली ५९
    फ़ोन- 09891438166
    मेल- badtiya.suraj@gmail.com

  • author's avatar

  • author's avatar

    See all this author’s posts

Leave a Reply

Your email address will not be published.