परसाई की कलम बिलकुल घिसीपिटी नही थी। उसमे एक चमक थी। धार थी। जो किसी भी बुराई को काटने की ताक़त रखती। कविता, कहानी, उपन्यास, लेख सबमे परसाई ने खूब काम किया। अपने आखरी दिनों तक वह सिर्फ और सिर्फ लिखते रहे। वह भी ऐसा लिखा जैसे एक खिड़की से खड़े यह पूरा मन्ज़र देख रहे हों। मैं दावे से कह सकता हूँ की परसाई लिखते वक़्त आने वाले पूरे दौर को देख पा रहे थे। वह उस वक़्त पैदा हुए बच्चों में उन बुराइयों के बीज भी देख पा रहे थे जिन्हें जवान होने से कोई रोक नही सकता था। इसीलिए उस वक़्त आने वाले वक़्त को लिखकर वह उस दौर के लेखको से बहुत आगे कदम बढ़ा चुके थे।

परसाई का मुँह काला कर दिया जाता…… 

हफीज़ किदवई

….हो सकता है मेरे शब्द आपके कानों को लाल करदें।या यह भी हो सकता है आपके श्रीमुख से एकतार सांस्कृतिक गाली निकले मगर मुझे परवाह नहीं।मैं कहूंगा की अगर आज परसाई होते तो उनका मुँह काला किया जा रहा होता। या मुँह क्या उन्हें ही पूरा काला किया जा रहा होता। या यह भी हो सकता है उन्हें उनके और साहित्य गढ़ने से पहले ही यमराज से मिलवा दिया गया होता,क्योकि परसाई की क़लम आपको यूँ मुस्कुराने तो न देती।परसाई ने व्यवस्था, समाज, राजनीती सबपर अपनी व्यंग्य की तलवार चलाई थी। दिमागों में लगी काई को परसाई के शब्द एक झटके में काट देते थे।

मैं यहाँ परसाई की तारीफ़ करने की हिमाकत नही कर रहा,बल्कि उनकी कलम की तेज़ाबियत को बयान कर रहा हूँ। हाँ तेज़ाब,एक इकहरे बदन की एक कलम से इतनी तेज़ाबियत निकली है की आजतक उसका तोड़ नही मिला। परसाई के हर शब्द ने दिमाग की नस में लगी चर्बी को चूने के मानिंद काटा ही है।
जब परसाई खुद से खुद की तारीफ़ में इतना लिख चुके हों तो हम क्यों तारीफ़ में अपने लफ्ज़ बर्बाद करें। परसाई खुद कहते हैं जब दो तीन महीने लिखने के बाद मेरी हर तरफ तारीफ़ के पुलिंदे कहे जाने लगते और लोग मुझसे मिलने को बेचैन होने लगते तो मैं जान बूझ कर इतनी टुच्चही हरकत करता की। लोग मुझसे आँख चुरा लेते। मिलने से बचते। तब मैं सुकून के तीन महीने गुज़रता। अब बताइये भला इनकी तारीफ़ में मैं अपने लफ्ज़ को लगाऊँ और वह कोई टुच्चही हरकत करके मेरे हर लफ्ज़ को बेरंगा कर दें।
मैं चाहता हूँ की आज परसाई के बहाने उस दौर की उस कलम को आप पढ़िए। जब परसाई “अश्लील” लिख रहे थे तब क्या उनका विरोध हुआ था। यह तो नौजवान क्रान्तिकारियो पर सीधा तंज था। आज हम चाहकर कथित गऊ रक्षक पर नही लिख सकते। प्रधानमंत्री उनपर बोलकर निशाने पर आ गए तो क्या उस दौर में परसाई इतनी तीखी कलम चलाकर मुस्कुराते हुए निकल गए होंगे। आज आप उनकी कई तहरीरों को इसमें पढ़िए,कलम की तेज़ाबियत और समाज के हाज़मे को भी देखिये जिसने परसाई को हमेशा रास्ता दिया।अश्लील के यह लफ्ज़…….
“शहर में ऐसा शोर था कि अश्‍लील साहित्‍य का बहुत प्रचार हो रहा है। अखबारों में समाचार और नागरिकों के पत्र छपते कि सड़कों के किनारे खुलेआम अश्‍लील पुस्‍तकें बिक रही हैं।दस-बारह उत्‍साही समाज-सुधारक युवकों ने टोली बनाई और तय किया कि जहाँ भी मिलेगा हम ऐसे साहित्‍य को छीन लेंगे और उसकी सार्वजनिक होली जलाएँगे।
उन्‍होंने एक दुकान पर छापा मारकर बीच-पच्‍चीस अश्‍लील पुस्‍तकें हाथों में कीं। हरके के पास दो या तीन किताबें थीं। मुखिया ने कहा – आज तो देर हो गई। कल शाम को अखबार में सूचना देकर परसों किसी सार्वजनिक स्‍थान में इन्‍हें जलाएँगे। प्रचार करने से दूसरे लोगों पर भी असर पड़ेगा। कल शाम को सब मेरे घर पर मिलो। पुस्‍तकें में इकट्ठी अभी घर नहीं ले जा सकता। बीस-पच्‍चीस हैं। पिताजी और चाचाजी हैं। देख लेंगे तो आफत हो जाएगी। ये दो-तीन किताबें तुम लोग छिपाकर घर ले जाओ। कल शाम को ले आना।
harishankar-parsai1दूसरे दिन शाम को सब मिले पर किताबें कोई नहीं लाया था। मुखिया ने कहा – किताबें दो तो मैं इस बोरे में छिपाकर रख दूँ। फिर कल जलाने की जगह बोरा ले चलेंगे।
किताब कोई लाया नहीं था।
एक ने कहा – कल नहीं, परसों जलाना। पढ़ तो लें।
दूसरे ने कहा – अभी हम पढ़ रहे हैं। किताबों को दो-तीन बाद जला देना। अब तो किताबें जब्‍त ही कर लीं।
उस दिन जलाने का कार्यक्रम नहीं बन सका। तीसरे दिन फिर किताबें लेकर मिलने का तय हुआ।
तीसरे दिन भी कोई किताबें नहीं लाया।
एक ने कहा – अरे यार, फादर के हाथ किताबें पड़ गईं। वे पढ़ रहे हैं।
दसरे ने कहा – अंकिल पढ़ लें, तब ले आऊँगा।
तीसरे ने कहा – भाभी उठाकर ले गई। बोली की दो-तीन दिनों में पढ़कर वापस कर दूँगी।
चौथे ने कहा – अरे, पड़ोस की चाची मेरी गैरहाजिर में उठा ले गईं। पढ़ लें तो दो-तीन दिन में जला देंगे।
अश्‍लील पुस्‍तकें कभी नहीं जलाई गईं। वे अब अधिक व्‍यवस्थित ढंग से पढ़ी जा रही हैं।”
मैं परसाई के हर शब्द के साथ बैठा सोच रहा था की क्या यह वक़्त अभी बदला। इसी से जुड़ा दिलचस्प क़िस्सा आजकल का है।मैंने अपने साथियो से चर्चा की की क्यों ना पोर्नोग्रॉफी के खिलाफ एक कैम्पेन चलाई जाए। इससे युवा बहक रहे हैं।शराब के साथ इसको भी बन्द करने की मांग की जाए।तो कुछ दोस्त ने तो हाँ की तो कुछ ने हल्की सी हाँ। बाद में ज़्यादतर ने फोन पर अलग अलग कहा की हमे इन मुद्दों से बचना चाहिए। हममे से बहुत से लोग मानसिक रूप से इसे बन्द करने को तैयार नही हैं। मुझे उसवक्त सच्ची में परसाई की अश्लील दिखने लगी और मैं सिहर गया।
खैर परसाई के जन्मदिन या मृत्यु से क्या लेना देना। उन्होंने कभी इसकी परवाह नही की।वह बड़े बेपरवाह इंसान थे। उनका दिल किसी एक खूंटे में रमा ही नही। बस गलत के विरुद्ध परसाई थे, यह ही एक विचार परसाई को बाँधे रखता था। बेहद सधे अल्फ़ाज़ में परसाई हर बुराई को लिख जाते थे। परसाई ने जिस खूबसूरती से “रसोई घर और पाखाना” में सामाजी फासले को लिखा है। वह महसूस करने से ही आएगा। देखिये यह कलम है परसाई की……..
“एक गरीब लड़का है। किसी तरह हाई स्‍कूल परीक्षा पास करके कॉलेज में पढ़ना चाहता है। माता-पिता नहीं हैं। ब्राह्मण है।
शहर में उसी के सजातीय सज्‍जन के यहाँ उसके रहने और खाने का प्रबंध हो गया। मैंने इस मामले में थोड़ी-सी मदद कर दी थी, इसलिए लड़का अक्‍सर मुझसे मिला करता है। बड़ा ही सरल, सभ्‍य और सीधा लड़का है। साथ ही कुशाग्रबुद्धि थी।
एक दिन मैंने पूछा, ‘क्‍यों, तुम्‍हारा सब काम ठीक जम गया न? कोई तकलीफ तो नहीं है उन सज्‍जन के यहाँ?’
वह तनिक मुस्‍कराया, कहने लगा, ‘तकलीफ तो नहीं है, पर वहाँ एक बात बड़ी विचित्र और मनोरंजक है।’
क्‍या बात है?’ मैंने पूछा।
वह बोला, ‘वैसे तो मैं उनके चौके में सबके साथ ही बैठकर खाना खाता हूँ, पर घर में जो एक वृद्धा है, वे मुझसे कहती हैं कि बाहर की टट्टी में पाखाना जाया करो। घर में बड़ी और प्रमुख टट्टी है, जिसमें घर के लोग जाते हैं, एक और है जिसमें नौकर-चाकर जाते हैं। मुझसे वे कहने लगीं कि बाहर वालों के लिए यह बाहर वाली टट्टी है। मुझे चौके में तो प्रवेश मिल गया है, पर टट्टी में प्रवेश नहीं मिला।
अगर तेरी झूठी प्रतिष्‍ठा भोजन में प्रदर्शित न हो पाएगी तो तू मल-मूत्र में ही प्रदर्शित करके रहेगा। अगर मेरे रसोई घर में ऊँच-नीच कोई नहीं रहेगा तो तू संडास मेँ ऊँचा बनकर दूसरे को नीचा बनाएगा। शाबाश”
परसाई की कलम बिलकुल घिसीपिटी नही थी। उसमे एक चमक थी। धार थी। जो किसी भी बुराई को काटने की ताक़त रखती। कविता, कहानी, उपन्यास, लेख सबमे परसाई ने खूब काम किया। अपने आखरी दिनों तक वह सिर्फ और सिर्फ लिखते रहे। वह भी ऐसा लिखा जैसे एक खिड़की से खड़े यह पूरा मन्ज़र देख रहे हों। मैं दावे से कह सकता हूँ की परसाई लिखते वक़्त आने वाले पूरे दौर को देख पा रहे थे। वह उस वक़्त पैदा हुए बच्चों में उन बुराइयों के बीज भी देख पा रहे थे जिन्हें जवान होने से कोई रोक नही सकता था। इसीलिए उस वक़्त आने वाले वक़्त को लिखकर वह उस दौर के लेखको से बहुत आगे कदम बढ़ा चुके थे। मैं परसाई की साहित्यिक आलोचना या तारीफ़ दोनों कर सकता हूँ। जो हमसे बहुत पहले बहुत ज़्यादा किया भी जा चुका है। मेरा मकसद सिर्फ और सिर्फ यह है की आप उनके साहित्यिक सौंदर्य में उलझे बिना उनकी फ़िक्र को महसूस करें। कविताओ के रस और सौंदर्य पर लम्बी बात कर सकता हूँ मगर मेरे लिए कविता में छुपी परसाई के माथे की सिलवटे अहम् हैं।इसीलिए मैं पूरे लेख में परसाई की कलम को छाँट छाँट कर डाल रहा हूँ की आपको परसाई की उलझन दिखे। आपको तब की कलम से आजकी दिक्कते दिखे। आप पढ़िए की परसाई ने “संस्कृति” में क्या लिखा क्यों लिखा।परसाई की। कलम चीखकर कह रही है…
“एक भूखा आदमी सड़क किनारे कराह रहा था । एक दयालु आदमी रोटी लेकर उसके पास पहँचा और उसे दे ही रहा था कि एक-दूसरे आदमी ने उसका हाथ खींच लिया । वह आदमी बड़ा रंगीन था ।
पहले आदमी ने पूछा, “क्यों भाई, भूखे को भोजन क्यों नहीं देने देते ?”
रंगीन आदमी बोला, “ठहरो, तुम इस प्रकार उसका हित नहीं कर सकते । तुम केवल उसके तन की भूख समझ पाते हो, मैं उसकी आत्मा की भूख जानता हूँ । देखते नहीं हो, मनुष्य-शरीर में पेट नीचे है और हृदय ऊपर । हृदय की अधिक महत्ता है ।”
पहला आदमी बोला, “लेकिन उसका हृदय पेट पर ही टिका हुआ है । अगर पेट में भोजन नहीं गया तो हृदय की टिक-टिक बंद नहीं हो जायेगी !”
रंगीन आदमी हँसा, फिर बोला, “देखो, मैं बतलाता हूँ कि उसकी भूख कैसे बुझेगी !”
यह कहकर वह उस भूखे के सामने बाँसुरी बजाने लगा । दूसरे ने पूछा, “यह तुम क्या कर रहे हो, इससे क्या होगा ?”
रंगीन आदमी बोला, “मैं उसे संस्कृति का राग सुना रहा हूँ । तुम्हारी रोटी से तो एक दिन के लिए ही उसकी भूख भागेगी, संस्कृति के राम से उसकी जनम-जनम की भूख भागेगी ।”
वह फिर बाँसूरी बजाने लगा ।
और तब वह भूखा उठा और उसने बाँसूरी झपटकर पास की नाली में फेंक दी।”
कोई भी कलम तब अहम् हो जाती है जब समाज की नब्ज़ पर हाथ रखकर बीमारी पर चोट करती है।परसाई की कलम इसमें महारत रखती थी। मैंने शुरू में कहा की परसाई आज होते और ऐसा लिखते तो बहुत कुछ बुरा देखते। खैर परसाई इससे रत्ती भर न घबराते। वह बन्दा लिखता रहता और विरोधियो का ख़ून जलता रहता।परसाई को कभी तारीफ़ की भूख नही थी। वैसे एक चीज़ सुखद भी है आजभी बहुत से लोग बेहतर कर रहे हैं, लिख रहे हैं और लोग पढ़ भी रहे हैं और बढ़ा भी रहे हैं। ऐसे में परसाई को और पढ़ा जाना चाहिए और खूब प्रसारित भी करना चाहिए। परसाई कल की तरह आज भी ज़रूरी हैं। या यह कहें की जब तक सामाजी बुराइयाँ हैं तब तक परसाई की कलम बहुत कारगर और ज़रूरी है। मैं परसाई को पढ़े जाने से ज़्यादा ज़िन्दगी में उतारे जाने का पक्षधर हूँ। बहुत बार इंसान का व्यक्तिगत जीवन छुप कर उसका साहित्यिक जीवन प्रेरणा देता है। परसाई का साहित्य समाज के लिए प्रेरणा है। वैसे सच बताएँ,इतना कुछ पढ़ने के बाद सड़ा सा मुँह बनाकर परसाई हमसे कहते।क्या तुम्हारे पास कोई काम नही है जो परसाई परसाई किये हो।जाओ और मूँग दलो,यहाँ कलम की निठल्लागिरी न करो और हम मुस्कुराते हुए परसाई की माथे की लकीरे देखते निकल लेते। यही तो परसाई थे, सबसे जुदा।मेरे परसाई।।।।

Leave a Reply

Your email address will not be published.