‘नहीं…नहीं साब। हम हाथ जोड़ता। हमको नई जाना। फिफ्टीन इयर में नायक का रैंक मिला है। एक बार सिक क्वार्टर चला गया तो रैंक चला जाएगा।’ डी.एस.सी. के मरीज गार्ड ने अपनी यूनीफॉर्म की कमीज में हाल ही में लगे नायक के रैंक की तरफ ईशारा करते हुए हांफती हुई आवाज में कहा। ‘ये क्या बकवास है?’ बालन की आवाज न चाहते हुए भी उत्तेजित हो गई।

मरीज के दूसरे गार्ड साथी ने बताया, ‘हां साब। रैंक मिलने से अट्ठाइस दिन तक यह सिक रिपोर्ट नहीं कर सकता। छुट्टी भी नहीं जा सकता। सिक रिपोर्ट करने पर यदि एडमिट हो गया तो रैंक उतर जाएगा।’

‘मान लो इस पीरियड में घर से टेलीग्राम आ गया, कोई मर गया क्या फिर भी लीव नहीं मिलेगा?’ अंग्रेजों के जमाने के इस अमानवीय नियम के बारे में जानकर बालन को आश्चर्य हुआ।…….’धनंजय सिंह’ की कहानी 

परास्त 

धनंजय सिंह

पहले फोन की घनघनाहट उसके कानों तक पहुंची। फिर उसके रेस्ट रूम की तरफ आती हुई बूटों की आवाज ने निश्चित कर दिया कि उसे यूनीफॉर्म चढ़ाना होगा। ट्रीटमेंट रूम से मेडिकल असिस्टेंट सार्जेंट मौर्या ने आकर उसका दरवाजा खटखटाया, ‘हैलो बालन एक पेशेंट लेने जाना है। डी.एस.सी. का है। जी.सी.ए. (रडार स्टेशन) गार्ड पोस्ट पर।’

उसकी निगाह कलाई पर बंधी घड़ी पर गई। रात के साढ़े बारह बज रहे थे। वह लगभग बारह बजे सोने के लिए चारपाई पर आया था। आंख लगी ही थी कि फोन घनघना उठा। उसने मन में सोचा, ‘ब्लडी। सुबह से कोई पेशेंट नहीं आया। जब सोने गया तो पेशेंट एपियर हो गया। वह भी जी.सी.ए. में।’ लेकिन फिर उसके मन से एक और आवाज उठी, ‘मैं तो यहां चौबीस घंटे की ड्यूटी पर हूं। बदले में दूसरे दिन ऑफ होता है। फिर अपनी ड्यूटी से बचना या झुंझलाना क्यों? जब मैं ऑफिसर्स के कहने पर फालतू कामों के लिए इधर-उधर एंबुलेंस ले जा सकता हूं तब तो यह रियल केस है। पता नहीं किस हालत में होगा पेशेंट?’ तुरंत ही नींद के कारण शरीर में घर बना चुके आलस ने अपना ठिकाना छोड़ दिया। यूनीफॉर्म चढ़ाकर वह रेस्ट रूम से बाहर आ गया। बाहर बूंदा-बांदी हो रही थी, बादल गरज रहे थे। चमकती हुई बिजली ने पल भर को उसे भयभीत किया। उसे लगा कहीं एंबुलेंस पर बिजली गिर गई तो? तो वह क्या कर लेगा? इस आशंका को उसने अपनी फौजी यूनीफॉर्म की तरफ कनखियों से देखकर पल भर में अपने जेहन से परे धकेल दिया। उसने सोचा, ‘मैं फौजी हूं।’ और सारा भय, आशंका जैसे भाग गई।

एंबुलेंस की ड्राइविंग सीट पर बैठकर, चाबी लगाकर उसने ‘इग्निशन की’ ऑन की और सबसे पहले चेक किया कि वाइपर काम कर रहा है या नहीं? हो सकता है रास्ते में बारिश तेज हो जाए। आकाश में एक भी तारा नजर नहीं आ रहा था। उसने एंबुलेंस स्टार्ट की, हेड लाइट ऑन किया और एंबुलेंस भागने लगी जी.सी.ए. गार्ड पोस्ट की तरफ। जी.सी.ए. गार्ड पोस्ट सिक क्वार्टर से लगभग दस किलोमीटर दूर था। घने जंगल के बीच। रनवे के बाईं तरफ, ए.टी.सी. के पीछे लगभग तीन किलोमीटर। जंगल ऐसा कि आर-पार कुछ दिखाई न दे। रात में जब फ्लाइंग बंद हो जाती है तो सियार, सेही, खरगोश और जंगली सुअरों का साम्राज्य होता है रनवे पर। दिन में युद्धक विमानों की गर्जना से भयभीत ये जानवर जंगल में दुबके रहते हैं। रनवे को पार कर जी.सी.ए. को जाने वाला रास्ता कहने को तो रास्ता है मगर गड्ढों और जगह-जगह उग आई झाड़ियों से समृद्ध इस रास्ते का प्रयोग बहुत कम होता है। लेकिन यहां ड्यूटी करने वाले डी.एस.सी. गार्डों के लिए तो यह रास्ता ही है।

भांय-भांय करते एयर फील्ड जंगल में एंबुलेंस प्रवेश कर गई। बूंदा-बांदी तेज बौछारों में तब्दील हो गई थी। गाड़ी का वाइपर विंड-स्क्रीन पर अनवरत दौड़ रहा था। बावजूद इसके सामने का दृश्य स्पष्ट नहीं था। ड्राईवर बालन के शरीर की गर्मी की भाप विंड-स्क्रीन के अंदरूनी सतह पर कुहासे सी जम गई जिसे बालन ने ग्लो-बॉक्स से कपड़ा निकाल कर साफ किया। हेडलाइट की ऊपर भागती हुई रोशनी को नीचे करने के लिए उसने डिपर दबा दिया और एंबुलेंस की रफ्तार को कम कर दिया। कहीं ऐसा न हो कि पेशेंट ले जाने की बजाय खुद ही दुर्घटना का शिकार हो जाए। जी.सी.ए. गार्ड पोस्ट की सुरक्षा के लिए तीन गार्ड तैनात हैं। ठीक जी.सी.ए. के नीचे बगल में उनके रहने के लिए तिरपाल का बना फौजी टेंट तना हुआ है। खाना-पानी सब कुछ यहां पहुंच जाता है। पंद्रह-बीस दिन में रिलीवर की उपलब्धता होने पर एक दिन का ऑफ मिल जाता है इन्हें। यदि बटालियन में जवानों की संख्या पर्याप्त हुई तो ड्यूटी और ऑफ के बीच का अंतराल कम भी हो जाता है। लेकिन इसका कोई निर्धारित नियम-कायदा नहीं है। निर्धारित नियम-कायदा सिर्फ रक्षा प्रतिष्ठानों एवं आयुध निर्माणी संस्थानों में है। तभी तो हर डी.एस.सी. गार्ड की चाहत होती है कि उसकी पोस्टिंग रक्षा प्रतिष्ठान या आयुध निर्माणी में हो जाए। कभी-कभी जवानों के छुट्टी चले जाने के कारण जब बटालियन में जवानों की संख्या कम हो जाती है तो ये गार्ड महीनों ड्यूटी करते रहते हैं, मनुष्य की गंध, गहमा-गहमी और तड़क-भड़क से दूर। एंबुलेंस के टेंट के करीब पहुंचते ही डी.एस.सी. गार्ड ने राइफल तानते हुए अपनी ड्यूटी की औपचारिकता पूरी की, ‘कौन हैं?’ एंबुलेंस को देखते ही उसने तुरंत अपनी राइफल नीचे कर दी। अभी थोड़ी देर पहले उसी ने तो ए.टी.सी. जाकर फोन किया था एंबुलेंस के लिए। ऑर्डरली अफसर की गाड़ी तो कभी-कभार ही आती है यहां।

‘साब। अपना एक बंदा बहुत बीमार है। उसको सांस लेने में प्रॉब्लम है। अस्थमा का अटैक पड़ा है।’ ड्यूटी पर तैनात उस गार्ड ने अपने साथी मरीज गार्ड की तरफ ईशारा किया।

स्टेयरिंग छोड़कर नीचे उतर आया बालन फिर से स्टेयरिंग पर बैठ गया और एंबुलेंस को रिवर्स गियर में डालकर ठीक टेंट से सटाकर लगा दिया ताकि मरीज भीग न जाए। एंबुलेंस से नीचे उतरकर वह मरीज गार्ड की तरफ बढ़ गया। दो अन्य गार्ड सहारा देकर उसे एंबुलेंस में चढ़ाने लगे। ‘नहीं। हम सिक क्वार्टर नहीं जाएगा। कोई घबराने का मामला नई। हम ऐसे ही ठीक हो जाएगा। कल मेरा ऑफ होगा। सिविल में जाकर ट्रीटमेंट करा लेगा।’ दक्षिण भारतीय मरीज गार्ड ने अपनी टूटती आवाज में कहा।

बालन ने उसे झिड़का, ‘फूलिश मैन। जब इदर तुमको ट्रीटमेंट का फैसिलिटी है तो सिविल में क्यों जाना। तुमको सिक क्वार्टर चलना है। वहां तुम ठीक हो जाएगा।’

साभार google से

‘नहीं…नहीं साब। हम हाथ जोड़ता। हमको नई जाना। फिफ्टीन इयर में नायक का रैंक मिला है। एक बार सिक क्वार्टर चला गया तो रैंक चला जाएगा।’ डी.एस.सी. के मरीज गार्ड ने अपनी यूनीफॉर्म की कमीज में हाल ही में लगे नायक के रैंक की तरफ ईशारा करते हुए हांफती हुई आवाज में कहा। ‘ये क्या बकवास है?’ बालन की आवाज न चाहते हुए भी उत्तेजित हो गई।

मरीज के दूसरे गार्ड साथी ने बताया, ‘हां साब। रैंक मिलने से अट्ठाइस दिन तक यह सिक रिपोर्ट नहीं कर सकता। छुट्टी भी नहीं जा सकता। सिक रिपोर्ट करने पर यदि एडमिट हो गया तो रैंक उतर जाएगा।’

‘मान लो इस पीरियड में घर से टेलीग्राम आ गया, कोई मर गया क्या फिर भी लीव नहीं मिलेगा?’ अंग्रेजों के जमाने के इस अमानवीय नियम के बारे में जानकर बालन को आश्चर्य हुआ।

‘नहीं साब। लीव मिल सकता है पर रैंक उतर जाएगा।’ दूसरे गार्ड ने बालन का संदेह दूर किया।

बालन थोड़ी देर के लिए जड़वत हो गया। क्या कोई कानून इतना अमानवीय और क्रूर हो सकता है? उसे अपनी वायु सेना की स्थिति पर थोड़ा संतोष हुआ। कम-से-कम यहां ऐसे कानून नहीं हैं। उसने हांफते हुए गार्ड को समझाना शुरू किया, ‘अरे भाई लाइफ से बड़ा रैंक नहीं है। लाइफ रहेगा तो रैंक फिर से मिल जाएगा। चलो सिक क्वार्टर।’ वह उसकी बांह पकड़कर एंबुलेंस की तरफ ले जाने का प्रयास करने लगा।

‘नहीं साब। चिंता का कोई बात नहीं, सब ठीक हो जाएगा। ये पुराना बीमारी है हमारा। साल-दो-साल में अटैक आता है। जब मौसम बदलता है तब थोड़ा परेशानी होता है।’ मरीज गार्ड ने हांफते हुए लंबी सांस लेकर अपने फेफड़ों में पूरे जंगल की ऑक्सीजन खींच लेने का प्रयास करते हुए कहा।

लेकिन उसके साथी नहीं माने और उन्होंने उसे जबरन एंबुलेंस में लाद दिया। एंबुलेंस सिक क्वार्टर आ गई। एंबुलेंस से उतारते वक्त मरीज गार्ड मेडिकल असिस्टेंट के सामने हाथ जोड़कर फिर गिड़गिड़ाने लगा, ‘साब। आप सर से कह देना हमको एडमिट नई करेगा। वो हमको मेडिसिन दे दे, हम ठीक हो जाएगा।’

मेडिकल असिस्टेंट मौर्या ने मरीज की हालत की गंभीरता को समझते हुए ड्यूटी मेडिकल ऑफिसर फ्लाइट लेफ्टिनेंट घोष को फोन कर दिया, ‘सर एक डी.एस.सी. का सीरियस पेशेंट आया है। अस्थमेटिक है। प्लीज आ जाइए।’

फ्लाइट लेफ्टिनेंट घोष मेस से तुरंत सिक क्वार्टर पहुंच गए। मरीज को देखकर उन्होंने दवा लिखी और मौर्या से कहा, ‘इसे ये दोनों इंजेक्शन लगा दो। एंड एडमिट हिम। वी विल सी टुमारो मॉर्निंग।’ एडमिशन का नाम सुनते ही मरीज को जैसे करंट लग गया हो – उसके जीवन से संघर्ष करते शरीर में, जैसे ऊर्जा सी दौड़ गई हो। उसने डॉक्टर घोष के पैर पकड़ लिए, ‘नहीं सर। एडमिट नहीं होना सर। पंद्रह साल में ये रैंक मिला है। आप दवा दे दो सर। हम ठीक हो जाएगा। हम ड्यूटी कर लेगा।’

‘दिमाग खराब है तेरा। पहले अपना शोरीर देखो। रैंक का चिंता कोरता है। तेरे को मोरना है क्या?’ डॉक्टर घोष ने गार्ड को सहानुभूतिपूर्वक फटकारा। ‘सर हम आपका एहसान कभी नहीं भूलेगा। प्लीज सर। एडमिट नई करो। बहुत तकलीफ से ये रैंक मिला है।’ इतना कहकर मरीज गार्ड भरभराकर रो पड़ा। डॉक्टर घोष को उस पर दया आ गई। उन्होंने मौर्या से कहा, ‘इसको इंजेक्शन लगाने का एक घोंटा बाद वापस गार्ड पोस्ट पर भेज दो एंबुलेंस से। क्या कोरेगा जब ये मानता नोहीं? बालन छोड़ के आना।’

फ्लाइट लेफ्टिनेंट घोष के निर्देशानुसार बालन मरीज को गार्ड पोस्ट पर छोड़ आया। इंजेक्शन लगाने के बाद गार्ड कुछ सामान्य लगने लगा था।

दूसरे दिन कॉर्पोरल बालन का ऑफ था। अगले महीने उसे छुट्टी पर जाना था। अंबाला कैंट रेलवे स्टेशन से वह अपना रिजर्वेशन करा कर लौटा था। बिलेट (बैरक) में रहने वाला उसका साथी कॉर्पोरल एस.पी. सिंह कहीं जाने की तैयारी कर रहा था। पूछने पर उसने बताया, ‘यार। फ्यूनरल परेड में जाना है।’

बालन को झटका लगा। उसने आशंका ग्रस्त होकर पूछा, ‘फ्यूनरल परेड। किसका?’

‘वो एक डी.एस.सी. गार्ड सुबह जी.एस.ए. गार्ड पोस्ट पर मर गया।’

बालन सोचने लगा, ‘बियावान जंगल को बूटों तले रौंदने वाला एक जवान अंग्रेजों के जमाने के अमानवीय और क्रूर प्रमोशन रूल से परास्त हो गया। उसने मन ही मन उस जवान को सैल्यूट किया और कल्पना में उस प्रमोशन रूल को अपने बूटों तले मसलने लगा।’

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    By: धनंजय सिंह

    जन्म: जुलाई -1958,कानपुर
    सम्प्रति : 15 वर्ष भारतीय वायु सेना में सेवा।वर्तमान में भारतीय जीवन बीमा में कार्यरत।
    लगभग चौबीस वर्षों के अन्तराल के पश्चात विगत तीन वर्षों से पुनर्लेखन प्रारम्भ ।हंस,आउटलुक,वागर्थ,लोकायत,निकट,दैनिक जागरण,हिन्दुस्तान, शुक्रवार आदि पत्र – पत्रिकाओं में रचनायें प्रकाशित।
    संपर्क- dhananjaysingh540@gmail.com

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One Response

  1. pragya pande

    bahut achchhi kahani . niyam jivan se bade ho jaate hain ki saans ruk jaatii hai . iss achchi kahani ke liye lekhak badhaai ke paatra hain .

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