जीवन में बहुत कुछ है जो शाश्वत है सत्य है ….. बावजूद इसके ऐसा बहुत है जिसे शाश्वत या सत्य बताने और  दिखाने के लिए मुलम्मा चढ़ाया जाता रहा है और आज भी जारी है ……….|  ‘रूपाली सिन्हा’ की लघुकथा

पाँवों में पहिये 

रुपाली सिंहा

रुपाली सिंहा

लगभग चालीस साल पहले उसने इसी प्लेटफॉर्म पर पहली बार अपने सर पर सामान उठाया था। तब से आज तक उसने न जाने कितने यात्रियों का बोझ उठाया होगा। लेकिन तब यात्री उसके हृष्ट-पुष्ट शरीर को देखकर उसे बुलाते, अधिक से अधिक बोझ उस पर लादते। उनका बोझ उठाये ऐसे भागता था मानो उसके पैरों में पहिये लगे हों। दिन भर की जी तोड़ मेहनत के बाद भी मानो वह थकता ही न था। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि उसकी यह शक्ति सदा के लिए नहीं है। उम्र के साथ-साथ यह क्षीण ही होती जाएगी। अब तो कभी-कभार ही कोई यात्री अपना छोटा-मोटा सामान उठवा लेता है। उसे कुछ ही दिनों पहले की घटना याद आ गयी। उसने एक यात्री का भारी सामान उठा तो लिया था लेकिन प्लेटफॉर्म की सीढ़ियां चढ़ते समय वह अपना संतुलन खो बैठा और गिर पड़ा। वह यात्री भला आदमी था , सो उसने उसे डांटा नहीं। लेकिन उसके शब्द अभी भी उसके कानों में गूंजते हैं, “बाबा! अब तुम्हारी उम्र नहीं रही इस काम के लिए। ” लेकिन अब इस उम्र में वह जाये तो कहाँ जाये? कोई भी तो नहीं था उसका इस दुनिया में। इसी जगह पर उसका बचपन और जवानी बीती। उसके लिए तो यही प्लेटफॉर्म उसका सबकुछ है।टिंग-टांग! यात्रीगण कृपया ध्यान दें! भुबनेश्वर से चलकर नई दिल्ली पहुँचने वाली पुरुषोत्तम एक्सप्रेस दो घंटे विलम्ब से पहुँचेगी , विलम्ब के लिए खेद है। टिंग-टाग! उद्घोषिका की आवाज़ सुनकर रेलवे प्लेटफॉर्म पर प्रतीक्षारत यात्रियों के चेहरे उत्सुकता मायूसी में बदल गयी। उनकी सारी बेचैनी शांत हो गयी और वे इधर-उधर आने-जाने लगे। तभी किसी दूसरी ट्रैन की घोषणा हुई और क्षणों में ट्रैन रेंगती हुई प्लेटफॉर्म पर दाखिल हुई। यात्रियों में एक बार फिर से उथल-पुथल मच गयी। प्लेटफॉर्म भी इस हलचल से आंदोलित हो उठा। तभी आवाज़ आई , कुली! कुली! उसने चौंक कर इधर-उधर देखा और आवाज़ की तरफ बढ़ा ही था कि एक
युवा कुली ने लपक कर सारा सामान उठा लिया और तेज़ी से आगे बढ़ गया। वह मन मसोसकर रह गया। ट्रैन प्लेटफॉर्म छोड़कर अपने गंतव्य की ओर रवाना हो चुकी थी। युवा कुली की तूफानी गति ने उसे अपने युवावस्था की याद दिला दी थी। वह पास ही एक बेंच पर बैठ गया और अतीत की यादों में खो गया ।

यात्रियों को लेकर आने-जाने वाली ट्रेनों को वह वर्षों से देखता आ रहा है। प्लेटफॉर्म पर ट्रेन में चढ़ने और ट्रेन से उतरने वाले यात्रियों के साथ उसे एक अदृश्य रिश्ता महसूस होता। वह सोचता जब मैं नहीं रहूँगा तब भी ट्रेनें ऐसे ही आएंगी-जाएँगी। तब भी एक शहर से दूसरे जोड़ने वाला यह चलता-फिरता सेतु यूँ ही गतिशील रहेगा। तभी बेंच पर उसके बगल में सो रहे दादाजी का पोता उनकी छड़ी लेकर भागा। दादाजी चोर! चोर! चिल्ला उठे। उसके चेहरे पर भी मुस्कान फ़ैल गयी और उसका सारा तनाव काफूर हो गया। बच्चा छड़ी को घोडा बनाकर “लकड़ी की काठी ,काठी पे घोडा ” गाने में मस्त था। दादाजी फिर से खर्राटे भरने लगे थे। उसने सोचा सबकुछ बदल गया लेकिन दादाजी की छड़ी नहीं बदली। इस पर समय का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। ऐसा लगता है छड़ी को घोडा बनाकर खेलने की परंपरा शाश्वत है। बच्चा अभी भी “तकबक -तकबक ” किये जा रहा था। “चाय गरम! चाय गरम!” की आवाज़ सुन उसने चायवाले को अपने पास बुलाया। वह कोई आठ-दस साल का लड़का था। दादाजी के उस पोते से कुछ ही बड़ा। उन दोनों के बीच उम्र का फासला भले ही कम था परन्तु उनकी स्थितियों में ज़मीन-आसमान का फर्क था। चायवाले को देख उसे अपना बचपन याद आ गया। उसने एक कप चाय खरीदी और चाय की घूँट अपने गले से नीचे उतारी। उसे थोड़ी ऊर्जा और ताज़गी महसूस हुई। तभी घोषणा हुई, “भुवनेश्वर से चलकर आने वाली पुरुषोत्तम एक्सप्रेस कुछ ही क्षणों में प्लेटफॉर्म पर प्रवेश कर रही है। ” उसने अपनी सारी शक्ति बटोरी और उठ खड़ा हुआ।

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