‘रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून’ क्या हुआ गर रहीम ने कहा था तो,  शहर कोई भी हो क्या फर्क पड़ता है, पानी की समस्या सभी जगह मूलभूत समस्या ही है, फिर चाहे इंसानी आँखों का पानी ही क्यों न हो ….. |  यह त्रासद बिडम्बना जीवन के कितने क्षणों और हिस्सों को प्रभावित करती है कुछ इन्हीं कशमकश के बीच से सफर करते हुए इंसानी चित्रों को रेखांकित करती  ‘मजकूर आलम’ की कहानी …..| – संपादक 

mazkoor

मजकूर आलम

पानीदार …

यूं तो दिल्ली के ज्यादातर इलाकों की तरह इस इलाके में भी बिजली-पानी की स्थिति अच्छी ही है और जिस इलाके की बात हो रही है, वहां की हालत भी कोई अलग नहीं है, बल्कि इस इलाके की एक खास बात यह भी है कि सरकार गंगाजल पिलाती है। इस इलाके में सप्लाई के पानी में गंगाजल भी आता है। लेकिन बारिश-पानी को इस इलाके की गलियां क्या, सड़कें भी नहीं झेल पाती हैं। कोढ़ में खाज ये कि इस बार बरसात में इंद्र देवता भी खूब बरसे। इतनी बारिश… इतनी बारिश… कि पूरा इलाका विकास के नाम पर बनने वाले बांधों की चपेट में आकर डूब जाने वाले गांवों की तरह हो गया।
हां, तो यह बताते चलें कि इस इलाके में देश के विभिन्न हिस्सों से आये प्रवासी मजदूरों की तादाद यहां ज्यादा है, जो किसी तरह इस गंदी बस्ती में सीलन भरे कमरों में अपनी जिंदगी गुजारते हैं, जिनका दिल्ली के वोटर लिस्ट में नाम भी नहीं है। लेकिन इस बारिश ने उनका जीना मुहाल कर रखा है। सड़कें तक पानी से भर गई हैं और पानी है कि निकलने का नाम ही नहीं ले रहा है। इस इलाके के ड्रेनेज सिस्टम का हाल तो दिल्ली के दूसरे इलाकों से भी ज्यादा बदतर है। इसलिए इलाके में पानी काफी दिनों तक भरा रह गया। पानी भरा रह गया, तो बीमारियों ने भी पूरी दिल्ली छोड़कर यहीं डेरा-डंडा जमा लिया।
बीमारी, कुपोण के साथ रहने की आदत तो इन मजदूरों को बचपन से पड़ जाती है, लेकिन पानी के बिना रहने के अभी अभ्यस्त नहीं हुए हैं ये लोग। गांवों में नहर, कुआं, नदियों की वजह से इन्हें पानी की किल्लत नहीं झेलनी पड़ती थी, सो यह एक नया अनुभव था और उसके लिए वे लोग तैयार नहीं थे।
पूरे इलाके में हाहाकार मच गया, ड्रेनेज सिस्टम जाम हो गया है। कमर तक पूरे इलाके में पानी फैल गया। कोढ़ में खाज यह कि अंग्रेजों के जमाने के बने पाइप लाइन से ही अभी तक पानी सप्लाई से काम लिया जा रहा था, जिसमें कहीं लीकेज हो गया। इसलिए नाले के पानी से भरे इस इलाके में पीने का पानी आना भी बंद हो गया।
सीलन भरे किराये के रूमों में चलती जिंदगी पर पानी की दोतरफा मार पड़ी थी। एक तरफ तो पीने के पानी के लिए वे कलप रहे थे, दूसरी तरफ किसी-किसी के रूम में भी गंदे नाली का पानी आ घुसा था।
मकान मालिकों को तो इन सब समस्याओं से कोई लेना-देना था नहीं। उनके अपने घरों में बोरिंग लगा हुआ था। लेकिन ये मजदूर क्या करें, मकान मालिक को कह-कह कर थक-हार चुके थे। उन्हें तो बस किराये से मतलब होता है। वह मिलता रहे तो किरायेदार चिल्लाता रहे, वे एक भी सुविधा मुहैया कराने के पक्ष में नहीं रहते। दूसरी तरफ मजदूरों के पास दो वक्त की रोटी का ही जुगाड़ इतना मुश्किल होता है कि वे अपने पैसे से मकान में बोरिंग करा नहीं सकते।
…तो, घरों में पानी आना बंद हो गया। रुप्पन, बब्बन, सुखिया, दुखिया, महेेंद्र सब परेशान हैं। तीन दिन तक तो किसी तरह वैसे लोगों से मदद मांगी, जिनका यहां अपना घर था। जिनके घर में बोरिंग था, उन लोगों ने हजार-हजार एहसान लादते हुए उन्हें पानी दिया। इसके बदले में इन लोगों ने उनकी काफी आजिजी-मिन्नत की, उनका बाजार-हाट के साथ और भी बहुत सारा काम कर दिया।
इतना मान-सम्मान मिलने के बाद भी कितने दिन पानी देते वे… किसी को पानी देना तो बहुत बूते की बात है। हंसी-ठट्ठा तो है नहीं। बिजली का बिल दोगुना-तिगुना बढ़ जाने की आशंका थी। इसके अलावा पानी से ‘घर… और घर में’ किच-किच होने लगा था। मजदूरों की भीड़ उनके द्वार से हटती ही नहीं थी। और यह दिल्ली थी, गांव तो था नहीं कि द्वार पर आदमी का जुटना शान की बात मानी जाती। द्वार पर आदमी जुटने से काफी शोर-गुल होता। इस भीड़ से पानी मालिकों के बच्चों की पढ़ाई बाधित होने लगी।
इसके बाद तो मोहल्ले में हड़कंप मच गया। लोगों ने काम पर जाना छोड़कर पानी के लिए हंगामा करना शुरू कर दिया। दो-तीन दिन बीतते-बीतते मोहल्ले से शुरू हुई ‘पानी’ की सुगबुगाहट मोहल्ले से बाहर निकलने लगी। ये मजदूर तो होते ही बेसब्र हैं। सो पानी के लिए हो-हल्ला मचाना शुरू कर दिया। बात इलाके के प्रधान तक जा पहुंची। फिर क्या था, उनका जनता प्रेम जाग उठा। उनको लगा कि इसी बहाने पार्लियामेंट में जाने का उनका सपना पूरा हो जाएगा। इसलिए वह मजदूरों का जत्था बनाकर धरना-प्रदर्शन की योजना बनाने लगे। वैसे तो उस इलाके की आबादी वैध रूप से लगभग 4000 के आस-पास थी। लेकिन अवैध रूप से कितनी इसका तो पता नहीं, क्योंकि सरकार इसका पता न तो अभी तक की किसी जनगणना में लगा पाई है और न किसी दूसरी तरह से ही इसका पता चल पाया है। लेकिन जैसे ही क्षेत्र के विधायक जी को मजदूरों के धरना-प्रदर्शन की योजना का पता चला, तो वह भी सक्रिय हो गये। उन्हें यह डर सताने लगा कि कि भले ही इन मजदूरों का वोटर लिस्ट में नाम न हो, लेकिन विपक्षी धरना-प्रदर्शन से पूरी दिल्ली में ऐसी हवा बना देंगे कि लगेगा कि चारों तरफ कुव्यवस्था ही कुव्यवस्था है। इसलिए वह पहल अपने हाथ में लेकर इन मजदूरों को समझा-बुझा लेना चाहते थे। लेकिन विधायक जी के लिए मामला इतना आसान भी नहीं था, क्योंकि वहां का सांसद विपक्षी दल का था। संयोग से जब इस इलाके में पानी आना बंद हुआ तो उस वक्त संसद का मानसून सत्र चल रहा था। तुरत-फुरत में उसने यह मामला संसद में उठा दिया और अपने ही दल के एक विधायक से मामले को विधानसभा में भी उठवा दिया। साथ ही संसद में संक्षिप्त, लेकिन जोरदार तकरीर दे डाली। इस पानी के संकट को राष्ट्रीय आपदा घोषित करते हुए पानी को राष्ट्रीय संपत्ति बनाने की मांग कर डाली।
इस मुद्दे पर पूरा विपक्ष एक होकर सरकार पर हमले में लगा ही था। चूंकि उस इलाके में अब भी पानी लगा हुआ था, इसलिए उसने संसद भवन और विधानसभा के बाहर धरना, प्रदर्शन और सभाएं कर डाली। इसकी एक वजह यह भी थी कि उस इलाके में धरना, प्रदर्शन और सभा करने से पूरे देश भर का ध्यान पानी के संकट जैसे गंभीर मुद्दे पर नहीं जाता। वैसे तो उस इलाके में पानी भरे होने की वजह से साफ-सुथरे कपड़ों वाले नेताओं के लिए वहां धरना-प्रदर्शन की गुंजाइश भी नहीं थी।
पानी में रंग चढ़ता देखकर कुछ समाजसेवी संगठन भी सामने आ गए। जल संकट पर सेमिनारों की झड़ी लगा दी। जन जागरूकता अभियान चलने लगे। मॉडलों को हायर कर उन्हें पानी के रंग के कपड़े पहनाकर पानी का महत्त्व बताने के लिए सिर्फ उस इलाके को छोड़कर, जहां पानी लगा था, पूरी दिल्ली में एक पानी यात्रा निकाल डाली। पानी के रंग के कपड़े में मॉडलों की इस शोभायात्रा को देखने के लिए उमड़ती भीड़ से प्रभावित होकर वे अब इसे पूरे देश में भी निकालने के बारे में विचार करने लगे।
सत्ता के गलियारों से लेकर विपक्ष के हंगामों तक और मीडिया के टीवी चैनलों से लेकर पत्र-पत्रिकाओं तक हर जगह पानी का मुद्दा पूरे उफान पर था।
पांच दिन तक इस मुद्दा के गर्म रहने के बाद भी उस इलाके में कोई खास प्रगति नहीं हुई। पांच दिन बाढ़-सा नजारा उत्पन्न करने वाला यह बारिश का पानी खुद ही फुस्स हो गया। उसके बाद सरकार भी हरकत में आयी। युद्ध स्तर पर पानी के पाइप के लीकेज को बंद करने का काम चालू हो गया। एमसीडी ने सरकार को सूचना दी कि आजादी के पहले का पाइप डाला हुआ है। वह पूरी तरह से गल चुका है। पूरी पाइप ही बदलनी होगी। तुरत-फुरत में बैठक बैठी। तय हुआ कि जब आजादी के पहले की व्यवस्था अब तक नहीं बदली, तो इतनी जल्दी पाइप कैसे बदलेगी। अब क्या किया जाए… अब क्या किया जाए? इस आपदा से निबटने के लिए केंद्र के निर्देश पर राज्य सरकार ने आपात बैठक बुलाई और तय किया कि उस इलाके में जब तक पानी का पाइप बन नहीं जाता तब तक पानी के टैंकर को दिन में तीन बार भेजा जाए।
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उधर उस इलाके में…
जहां कल तक पानी नहीं होने से त्राहि-त्राहि मची थी। आज सन्नाटा छाया हुआ है। सन्नाटे और कीचड़ से अंटे इस इलाके के एक घर में मुर्दनी-सी छाई हुई है। कोई 10-12 लोग बड़ी मुश्किल से इस घर में अंटे खड़े हैं। कीचड़ की वजह से इस घर में पांव तक जमाने में मुश्किल हो रही है। सीलन और बदबू से इस घर का यह इकलौता कमरा भभक रहा है। दिन के ग्यारह बजे हैं। लेकिन इतना अंधेरा कमरा है कि सौ वॉट का बल्ब भी इसे प्रकाशमान नहीं कर पा रहा है। एक खटिया पर पैंसठ-सत्तर साल की एक बुढि़या लेटी पड़ी है। सिर पर लाल निशान की एक हल्की-सी पपड़ी दिख रही है। उसके सिरहाने एक पैंतालीस-पचास साल का आदमी चुपचाप सिर झुकाये बैठा है। एक बूढ़ा आदमी उस बूढ़ी के सिरहाने बैठे आदमी के सिर पर दुलार से हाथ फेर रहा है।
इस दुलार को वह सह नहीं पा रहा है। वह फूट पड़ता है।
फूटा, तो फूटता चला गया- अबहिएं तो आई थी हमरी माई… कवनो दस दिन हुआ रहा। एक महीना पहलहीं तो एक दिन हम मोबाइल पर उनका से बात किये रहे। माई हमार गंगा किनारे की है ना। हम लोग का गांव उजियार पड़ता है। जब हम उनका बताये रहे कि इहां दिल्ली में भी गांवे जइसन गंगाजल आता है। सरकार इहां गंगाजल परियोजना चलाती है, जेकरा में हम लोग को सप्लाई के पानी के रूप में गंगाजल देती है, तभिए से ऊ बड़ा जोर किये रहीं कि हमको भी ले चलो अपने साथ। इहां हमको कोई देखे वाला नहीं है। हम तो अपनी हालत जानते रहे। इसलिए उसको टालते रहे। हम इहां राष्ट्रमंडल खेल खातिर आवे वाला बाबू लोग को डेंगू ना होवे इसलिए गड्ढा से पानी निकाल के उसमें मिट्टी भर के दवाई डालते रहे अउर एही अंधेरा कमरा को घर बूझ के रहते रहे। ऐसे में माई को कैसे बुलाते। ओतने में हमहीं को एक दिन डेंगू होई गया। बस माई को कहीं से मालूम पड़ गया अउर ऊ गांव के एगो लइका को ले के आ गई। उनके आवे के चार-पांच दिन तक तो सब ठीके रहा। सप्लाई के पानी में गंगाजल को देख-देख माई बहुत खुश होती रही… कहती रही कि बिटवा हमार उमरि सत्तर बरिस होई गया। अब न जाने कब भगवान बुला लेवे। हम ई सोच-सोच के उहां बहुत परेशान रहत रहें कि आखिरी सांस लेवे बेरा हमरा गंगोजल नसीब ना होई का। तू तो इहां है बेटा। बहुरानी जो मायके जाके बइठ गई है तो आवे का नामे ना लेवे है। हमरा के अकेले ऊ घर काटत रहे। लागत रहे कि कब जांगर साथ छोड़ दीही अउर हम गिर पड़ब। केहू के मालूमो ना होई अउर हम…
चुप माई… हमेशा उलटा-सुलटा ना बोले के चाहीं। हमरो उमिर तोहरा लाग जाई।
माई कहती बेटा अबहीं तोहरा बहुत दिन जिये के बा। नाती-पोता खेलावे के बा। हमार तो सब साध पूरा हो गया। बस एक ही इच्छा है कि आखिरी सांस लेवे से पहिले गंगाजल हमार हलक पार कर जाता त हमरा परलोको सुधर जाता। दिल्ली एही से हम तुमरा पास ना आवत रहें कि इहां हमरा मरे टैम गंगाजल नसीब ना हो पाई। अब जब सुने की तुमरा तबीयत खराब है, तो हमरा से रहा ना गया अउर जब इहां भी गंगाजल आता ही है, तो फिर फिकिर काहे का?
लेकिन पता नहीं माई के खुशी के केका नजर लग गया। ई बारिश मुआं खाली गंगेजल ना ले के गया। पूरे मोहल्ले से पूरा पानी ले गया। आज पांच दिन बाद पानी का टैंकर आया रहा। मोहल्ले के लोग केतना खुश रहे तो ई… अउर ऊ भोकार पार-पार के रो पड़ा।
वह बूढ़ा आदमी फिर उसका सिर सहलाने लगा।
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वहां खड़े लोग धीमी आवाज में आपस में बात कर रहे थे। आज सुबह जब जल बोर्ड का टैंकर पानी लेकर आया तो यहां जश्न का माहौल था। पांच दिनों से लोग किसी तरह बिना पानी के ही काम चला रहे थे। जैसे ही पता चला की पानी का टैंकर आया है, सब लोग रोड की तरफ भागे, जिधर टैंकर खड़ा था। सबके हाथों में जितना हो सकता था, उससे भी ज्यादा बरतन था। हर कोई समझ रहा था कि सबसे पहले उसे ही पता चला है। सब उस न बोल्ट को मात देने वाली रफ्तार से टैंकर की तरफ भाग रहे थे। लेकिन जो भी वहां पहुंचा, उसे सचमुच भारत में बहुत तेजी से हो रहे जनसंख्या विस्फोट का पता चला और इस वह गूढ़ रहस्य को भी जान गया कि इस पर रोक लगाने की बहुत जरूरत है। यानी अगर वह सबसे पीछे नहीं था, तब भी इतना पीछे जरूर था कि पानी लेने का उसका नंबर आने तक कम से कम उसे दो घंटे लग जाने थे। माई भी भागी थी पानी लेने। चूंकि उसका बेटा डेंगू होने के बाद से ही इतना लागर हो गया था कि अब वह मच्छर के काटने पर भी हाथ से उठाकर मच्छर नहीं भगा पाता था। इसीलिए उसकी जगह पानी लेने उसकी माई गयी थी। पांच दिन से प्यासे इलाके में जहां पानी का नाम ही सुनकर लोग दौड़ पड़ने को तैयार थे, वहां पानी लेने जाना भी सच में बहुत पानी का काम था। माई अपनी समझ से भागी, तो सौ मीटर की दौड़ वाली रफ्तार से ही थी, लेकिन बुढ़ापा उसके आड़े आ गया। वह किसी तरह पूरा दम लगाकर पानी के टैंकर तक जा पहुंची। पांच दिन बाद रोड पर से पानी निकलने के चलते रोड पर कीचड़-कादो, फिसलन तो पहले से ही था, साथ में टैंकर से बहने वाले पानी ने जवान लोगों के भी पैर उखाड़ रखे थे। माई की हड्डी तो वैसे भी काफी पुरानी हो चुकी थी, इसलिए उनके लिए इस फिसलन भरी सड़क पर पांव जमाना आसान नहीं था। पूरे बरतन समेत वह रोड पर ही उलट गयीं। बाल्टी उनके सिर से जा लगी, ठक … उनका माथा फट गया। मुंह से निकला- हाय राम। लेकिन लोगों पर पानी की मार ऐसी पड़ी थी कि किसी ने पानी की लाइन से निकल कर माई को उठाने की जहमत तक नहीं की। और जो लोग लाइन में नहीं थे, उन्हें लाइन में लगने की इतनी जल्दी थी कि उन्हें गिरी हुई माई दिखी ही नहीं। सब लोग लाइन में लगे-लगे ही चिल्ला रहे थे, अरे देखो उस बुढि़या को कोई उठाओ। कुछ बूढ़े लोग लाइन में लगे-लगे ही रांड रुदन कर रहे थे- क्या जमाना आ गया है, हमारे जमाने में कोई आदमी इस तरह गिर गया होता तो लोग-बाग तुरत उसे उठा दिया करते थे।
आखिरकार, पानी लेकर लाइन से निकले कुछ लोगों ने पहचाना कि अरे यह तो बब्बन की माई है और उसे उठा कर उनके बेटे के पास ले गये। गंगाजल बनी उसके बेटे की आंखों से गिरता पानी मां के चेहरे पर टप-टप गिर रहा था। वह बुक्का फाड़-फाड़ कर रो रहा था- माईं हम केतना बड़ नालायक रहे कि आखिरी वक्त में तुमको गंगाजल क्या, पानी भी ना पिलाये पाये। घर में एक बूंद पानी नहीं था माई।
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दिल्ली में सत्ता के गलियारों में जश्न का माहौल था। सत्ता पक्ष के नेताओं का कहना था कि उन्होंने त्वरित गति से कार्रवाई करते हुए विपक्ष को बेपानी करके रख दिया, तो विपक्ष कह रहा था कि हमने तुम्हारा पानी रहने ही कहां दिया। शाम की पेज थ्री पार्टी में भोज-भात का मजा लेते दोनों दलों के नेता कुछ इसी तरह का मजाक एक-दूसरे से करते पार्टी का मजा ले रहे थे।
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भोज-भात तो दूसरी तरफ भी चल रहा था। बब्बन कर्ज लेकर अपनी माई का श्राद्ध कर रहा था। भोज में लड्डू का स्वाद लेते मजदूर कह रहे थे, बड़ी पुण्यात्मा थी बब्बन की माई। अंतिम समय में भी मुंह से राम नाम ही निकला। सीधे स्वर्ग जाएंगी।

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