महात्मा जी ने कभी स्वच्छता का पाठ पढ़ाया था हमें। देश की हर सरकार बापू के विचारों को अपनाने को कृत संकल्पित रहती है, न भी रहती है तो यह विश्वास दिलाने का प्रयास जरूर करती है कि वह गांधीवाद के साथ है.और वह बापू के विचारों के साथ चलती है. उन दिनों भी स्वच्छता का अभियान हर स्तर पर जारी था। शासन-प्रशासन यह जतलाने में सफल हो गया था  कि गन्दगी दूर करने में कई बार कुछ स्वच्छ सामान भी बुहारना पड़ जाता है। ‘ब्रजेश कानूनगो’ का व्यंग्य …..

पिंकीसिंह की प्रेरक कहानी, उर्फ़ पिक्चर अभी बाकी है.. 

ब्रजेश कानूनगो

ब्रजेश कानूनगो

बहुत पुरानी कहावत है कि ‘समय सदा एक-सा नहीं रहता.’ देश पर भी अक्सर संकट आते रहते हैं और वह कठिन समय भी पिंकीसिंह के परिवार पर आये संकट की तरह बीत ही जाता है. आइये आज मैं आपको मैं वह प्रेरक कथा सुनाता हूँ.
कुंवर पिंकीसिंह का जन्म दरअसल तब हुआ था जब जाना माना ‘मुद्रा परिवार’ बड़े संकट के दौर से गुजर रहा था। उसके दादा और प्रपिता के व्यवसाय करने के लायसेंस अवैध घोषित किये जा चुके थे। उस बुरे वक्त में वे दोनों अपने बच्चों को बचे खुचे कारोबार की बागडोर थमाकर हिमालय की ओर प्रस्थान करने को उद्यत हो चुके थे।
श्रीमान मुद्राजी सदा से हमारे क्षेत्र की जानी मानी हस्ती रहे, लेकिन समय का चक्र देखिये कि एक दिन उन्हें अपने पिताजी का हाथ थामें पितामहों का अनुसरण करते हुए वानप्रस्थ के लिए हिमालय की ओर कूच कर जाना पडा.
यो समझ लीजिए जब से देश आजाद हुआ तब से मुद्रा परिवार की प्रतिष्ठा देश-समाज में बनी रही है। आजादी के पहले भी उनके पूर्वज बड़े सम्मानित रहे। दरअसल रियासतों और राज तंत्र के जमाने से ही उनकी साख ऐसी रही कि उनकी मात्र उपस्थिति से सारे कामकाज बड़ी आसानी से हो जाया करते।
गुलामी के दौर में फिरंगी राजा-रानियों से उनके परिवार की काफी नजदीकियां रही, जब देश आजाद हुआ तो वे गांधी टोपी धारण करने लगे। चरखा भी उन्होंने खूब चलाया। सम्राट अशोक के चिन्हों को अपने भीतर संजोया। मुद्राजी के पूर्वजों का मानना था कि महापुरुषों के विचारों की प्रेरणा से उनकी आगामी पीढियां भी विचारवान और नेक बन सकेंगी.
इस प्रतिष्ठित परिवार के सदस्य भी हमारी तरह अमरता का वरदान प्राप्त करके दुनिया में नहीं आये हैं। कुछ ने लंबी उम्र पाई और कुछ असमय भी काल के गाल में समा गए। बरसों बरस पिंकी सिंह का परिवार सात्विक, पवित्र और शुद्धता का उदाहरण बना रहा. दीपावली जैसे त्योहारों पर मुद्रा परिवार को सम्मानित करने की जैसे परम्परा ही पड़ गयी ।
लेकिन दुर्भाग्य से या किसी की कारस्तानी से इस कुटुंब में कुछ दूसरे लोग अपने को इसी परिवार के डीएनए वाला बताकर शामिल हो गए। इन लोगों की नीयत में ही खोट था। मुद्रा परिवार की प्रतिष्ठा का दुरूपयोग कर, इन नकली सदस्यों ने सब जगह अपनी गन्दगी फैलाना शुरू कर दी। भ्रष्टाचार और अराजकता के कुत्सित लक्ष्यों के साथ ये धीरे धीरे अपना काला कारोबार स्थापित करने में संलग्न हो गए। मुद्रा परिवार के पिता और पितामह के नाम को सबसे ज्यादा बट्टा लगाने का घृणित काम इन्होने ही किया । हरेक तरह की गन्दगी और दुराचार के लिए परिवार के वास्तविक वरिष्ठ सदाचारियों पर उंगली उठने लगी।
महात्मा जी ने कभी स्वच्छता का पाठ पढ़ाया था हमें। देश की हर सरकार बापू के विचारों को अपनाने को कृत संकल्पित रहती है, न भी रहती है तो यह विश्वास दिलाने का प्रयास जरूर करती है कि वह गांधीवाद के साथ है.और वह बापू के विचारों के साथ चलती है. उन दिनों भी स्वच्छता का अभियान हर स्तर पर जारी था। शासन-प्रशासन यह जतलाने में सफल हो गया था कि गन्दगी दूर करने में कई बार कुछ स्वच्छ सामान भी बुहारना पड़ जाता है। ऑपरेशन में कुछ स्वस्थ हिस्सा भी सम्पूर्ण शरीर को बीमारी से बचाने के लिए सर्जन अलग कर देता है। इसी अभियान में मुद्रा परिवार के दोनों बड़े सदस्यों से कारोबार का लाइसेंस छीन लिया गया। परिवार के छोटे सदस्य निरुपाय और कारोबार चलाने में अक्षम सिद्ध होने लगे.
उसी दौरान गुलाबी आभा लिए परिवार में तेजस्वी बालक का जन्म हुआ. परिवार की परंपरा के अनुसार उसे मुखिया का मानद पुश्तैनी ताज पहना दिया गया। उसकी वरिष्ठता नए होने के बावजूद सबसे अधिक हो गयी। यही थे कुंवर पिंकीसिंह. मुद्रा परिवार के चश्मों चिराग.
वंश-परम्परा के अनुसार पिंकीसिंह को अब मुद्रा परिवार के बिजनेस को लीड करना था। लेकिन यह भी यथार्थ था कि उसके माथे पर वरिष्ठता का ताज जरूर शोभायमान हो गया था, किंतु था तो वह कम आयु का बालक ही।
दादा और प्रपिता के पलायन के बाद कारोबार की सारी जिम्मेदारी पिता और अन्य युवा सदस्यों पर थी लेकिन वे इतने बड़े कारोबार को संभाल पाने में पूरी तरह सक्षम सिद्ध नहीं हो रहे थे। देश भर में मुद्रा परिवार का व्यवसाय बहुत फ़ैल चुका था, बाजार और दफ्तरों में माल की डिमांड भी असीमित बढ़ गयी थी।
यह प्राकृतिक विडम्बना थी कि पिंकीसिंह चाहकर भी परिवार के काम में हाथ नहीं बटा पा रहा था। बालक होते हुए भी उसकी हालत परिवार के उस बुजुर्ग की तरह हो गयी थी जो गद्दी पर बैठा सब कुछ देखता तो रहता है, लेकिन कर कुछ नहीं पाता। उसका महत्व महज प्रतिष्ठा चिन्ह से ज्यादा नहीं रह पाता।
यों बालक पिंकीसिंह का गुलाबी सौंदर्य सभी को आकर्षित करता था, सब लोगों का सम्मान उसे सहज मिलता था, सब उसे गोद में उठाते, दुलारते,प्यार करते लेकिन इन सबसे मुद्रा परिवार के कारोबार में कोई ख़ास लाभ नहीं हो रहा था। हालांकि परिवार के लोग यह समझते रहे कि पिंकीसिंह के सौंदर्य के आकर्षण में ग्राहकों को लुभाया जा सकेगा लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा था।
मुद्रा परिवार के हितचिंतक उन दिनों को याद करके बहुत दुःखी होते रहे जब पलायन के पहले पिंकीसिंह के पितामह और उसके दादा जी कारोबार सहजता से संभाल रहे थे।
बड़े-बुजुर्गों ने सलाह दी कि जब हमारे हाथ में कुछ नहीं रहे तो हमें सब कुछ भगवान पर छोड़ देना चाहिए और भक्ति-भाव के साथ भजन-कीर्तन में लीन हो जाना चाहिए. मुद्रा परिवार ने भी यही किया. प्रभु की तस्वीर के सामने अखंड दीप जलाया और ‘जाही विधि राखे राम, ताही विधि रहिये’ का पारायण करने लगे.
इसे चमत्कार ही कहिये कि कुछ समय बाद उनके दिन सुधर गए. थोड़े दिनों में, थोड़ी सी परेशानी सहने के बाद फिर सब लाइन पर आने लगा। व्यवसाय में आई मंदी से परिवार आखिर उभर गया। पिंकीसिंह भी अब युवा हो चुके थे। चचेरे भाई स्लेटीसिंह ने भी उनका सहयोग करना शुरू कर दिया था।

One Response

  1. Upendra Awasthi

    यह प्राकृतिक विडम्बना थी कि पिंकीसिंह चाहकर भी परिवार के काम में हाथ नहीं बटा पा रहा था। बालक होते हुए भी उसकी हालत परिवार के उस बुजुर्ग की तरह हो गयी थी जो गद्दी पर बैठा सब कुछ देखता तो रहता है, लेकिन कर कुछ नहीं पाता। उसका महत्व महज प्रतिष्ठा चिन्ह से ज्यादा नहीं रह पाता।………………………..umdaa

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