पुरस्कार वापसी का अर्थ

मंडलेश डबराल

साहित्य अकादेमी ने अगर अगस्त में कन्नड़ वचन साहित्य के विद्वान् एमएम कलबुर्गी की बर्बर हत्या की कड़े शब्दों में निंदा की होती तो शायद नौबत यहाँ तक नहीं आती कि देश की इतनी सारी भाषाओँ के इतने सारे लेखक अपना अकादेमी पुरस्कार लौटाते या अकादेमी की विभिन्न समितियों से त्यागपत्र देते.
कलबुर्गी साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित लेखक थे और उसकी सामान्य सभा के एक सदस्य भी रह चुके थे.
उनकी मौत भी कोई स्वाभाविक नहीं थी जिस पर एक औपचारिक शोकसभा करके अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ ली जाती, बल्कि उन्हें अपने स्वतंत्र विचारों के कारण एक हिन्दुत्ववादी संगठन ने अपनी गोलियों का शिकार बनाया था.
इससे पहले तर्कवादी विद्वान नरेंद्र दाभोलकर और पानसरे की हत्याएं भी हो चुकी थीं.
अकादेमी की इस चुप्पी से क्षुब्ध होकर हम जैसे लेखकों ने पुरस्कार की वापसी शुरू की और अब यह संख्या लगातार बढ़ रही है और उनके इस क़दम का स्वागत हो रहा है.
यह पुरस्कार वापसी इस बात का भी संकेत है कि देश के मौजूदा माहौल में लेखक और बुद्धिजीवी किस क़दर घुटन और विक्षोभ महसूस कर रहे हैं.
वे पिछले करीब एक साल से देश में तेज़ी से बढ़ रही उन ताक़तों के कारण चिंतित हैं, जो हमारे लोकतंत्र के आधार-मूल्यों, सांप्रदायिक सद्भाव, बहुलतावादी जीवन पद्धतियों, धर्मनिरपेक्ष परम्पराओं और संविधान द्वारा दिए गए नागरिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की आज़ादी को कभी धमकी और बाहुबल और कभी हिंसा के बल पर कुचलने में लगी हैं.
ये शक्तियां भारतीय संस्कृति और हिंदुत्व की दुहाई देते हुए अपना एकरूपीकरण का एजेंडा लागू करने पर आमादा हैं, ताकि दूसरी संस्कृतियाँ और भी हाशिये पर ठेल दी जाएँ, उन्हें माननेवाले ‘दूसरे दर्जे के नागरिक’ बन जाएँ और देश के अल्पसंख्यक एक बहुसंख्या की अधीनता मंज़ूर कर लें.
इसकी ज़हरीली अभिव्यक्ति संघ परिवार और केंद्र सरकार के कई नेताओं के बयानों में देखी जा सकती है, जो लगभग रोज़ अल्पसंख्यकों और उनका पक्ष लेनेवालों को अपमानित करने के लिए दिए जाते हैं.
कलबुर्गी की हत्या के बाद उत्तर प्रदेश के दादरी में, कोरी और बाद में नितान्त झूठ साबित होने वाली अफवाह के कारण एक मुस्लिम परिवार पर जानलेवा हमला और उसमें एक व्यक्ति की हत्या इसी माहौल का भीषण नतीजा है, जिसे साप्रदायिक फ़ासीवादी ताक़तें पैदा करने और बढाने में लगी हैं.
ज़रा पीछे जायें तो घटनाक्रम उस दौर तक जाता है जब प्रसिद्द कवि और विद्वान् ए के रामानुजन के निबंध ‘ तीन सौ रामायणें’ को दिल्ली विशाविद्यालय के पाठ्यक्रम से हटाने का दबाव डाला गया और फिर इतिहासकार वेंडी दोनिगर की किताब ‘द हिंदूज़’ को रद्दी के हवाले करने के लिए उसके प्रकाशक को मजबूर किया गया.
यह एक ऐसे व्यक्ति का काम था जिसे मौजूदा सरकार और उसकी राजनीतिक पार्टी का पूरा संरक्षण प्राप्त था. यह दरअसल आनेवाले दौर का, स्वतंत्र विचारों और अध्ययनों और असहमतियों पर लगने वाली संविधानेतर अंकुशों का संकेत भी था जिसकी दुखद परिणति कलबुर्गी की हत्या में हुई.
गौरतलब है की इन घटनाओं को अंजाम देनेवाली या उन्हें प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रश्रय देनेवाली ताक़तों को कोई दुःख , कोई पछतावा भी नहीं है और इस तरह हमारे अमानवीकृत होते समाज में दुःख की भी हत्या हो रही है.
लोकतंत्र’ चेक्स एंड बैलेंसेज़’ की प्रणाली है, लेकिन देखा जा रहा है की इन घटनाओं, ऐसे ज़हरीले बयानों पर सरकार या राज्य का कोई अंकुश नहीं है.
हर मामूली बात पर ट्वीट करने, विदेशों में लम्बी-चौड़ी हांकने वाले देश के प्रधानमंत्री ऐसी घटनाओं पर हमेशा एक चालाक चुप्पी साधे रहते हैं और साफ़ झलकता हैं कि वे इस सबका अनुमोदन कर रहे हैं.
लेखकों द्वारा पुरस्कार लौटाना या पदों से इस्तीफ़ा देना मौजूदा माहौल—जिसमें अकादेमी की चुप्पी भी शामिल है– का एक प्रतिरोध और प्रतिकार है, भले ही उसका महत्व प्रतीकात्मक हो.
इस्तीफों का सिलसिला शुरू होने पर अकादेमी के अध्यक्ष ने पुरस्कृत होने वाले लेखकों द्वारा कमाए गए ‘यश’ की वापसी पर सवाल किये, जो लेखकों ही नहीं , अकादेमी के लिए भी बेहद अपमानजनक और दुर्भाग्यपूर्ण था क्योंकि अकादेमी उन्हीं कृतियों को पुरस्कृत करती है जो पहले प्रतिष्ठा पा चुकी हों.
इस बयान ने लेखकों को यह सोचने के लिए विवश किया कि पूरी तरह स्वायत्त और संप्रभु कही जाने वाली, उनकी अपनी मानी जानेवाली संस्था किसी सरकारी एजेंसी की तरह व्यवहार कर रही है.
यह निश्चय ही अकादेमी का क्षरण है, जिसकी अगली कड़ी यह है कि लेखकों के इस्तीफे पर सरकार के संस्कृति मंत्री महेश शर्मा -–जो कि मूल रूप से बहुत दरिद्र और अनपढ़ हैं— लगातार प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं, हालाँकि अकादेमी का संविधान उसके कामकाज में किसी भी सरकारी हस्तक्षेप की अनुमति नहीं देता.

यह आलेख नवभारत टाइम्स में भी प्रकाशित हुआ है.

(‘पत्रकार praxis’ से साभार)

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