प्रेम गीत या प्रेम कविता भी आक्रान्ता, सामंती मानसिकता की प्रबल खिलाफत ही है इस लिए भी प्रेम कविताएँ लिखी और पढ़ी जानी चाहिए …..| ‘डॉ० रज़ियाकी कविता कुछ ऐसा ही एहसास है |…. 

प्यार मेरा : एवं स्त्री raziya

तुम हो तो में हूँ
ऐसा है प्यार मेरा
सुबह से लेकर शाम तक बस यही इकरार है मेरा
तुम हो तो में हूँ
ज़िन्दगी चाहे मुश्किल हो जाये जितनी
ख्वाब चाहे पूरे न हो
पर साथ है तेरा
तो हो जाये पूरा
हर काम मेरा
न कर बहस और प्रियतम
खलता है मुझे तुम्हारा मुझसे रूठ जाना
क्योंकि तुम हो तो में हूँ
ऐसा है प्यार मेरा |

स्त्री 

साभार google से

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स्त्री तुम कोमल हृदय, प्यार असीम, ज्ञान-बुद्धि लिए हो,
पर अब उचित-अनुचित, सही-गलत, सब भेद समझ
पहचान लो अधिकार अपने,
फिर डंटे रहना, उस अधिकार पर
जो वर्षों से छीने तुमसे
तुम्हे नासमझ समझ कर
पर जब पहचान ली हो, अपने अधिकार
तो बुलंद कर हौसले को अपने
निकल पड़ो तुम उस पथ पर विजय पाने,
डगर आसन नही पर चल पड़ो निडर हो कर
और कर दो ऐलान एक नई पहचान का
जिसका था तुम्हे बरसों से इंतज़ार
डरना नहीं बस चलना है
चाहे हो जाओ तुम अकेली
पर निकल पड़ो उस राह पर
जहाँ तुम्हे सम्मान नहीं, होगा प्राप्त आत्मसम्मान
और जहाँ कोई कर न पाये अब तुम्हारा अपमान.

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    By: डॉ0 रज़िया बेग़म

    सहायक प्रोफेसर
    हिंदी विभाग, विज्ञान एवं मानविकी संकाय
    एस.आर.ऍम यूनिवर्सिटी – 603203

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