‘प्रदीप कान्त’ की दो ग़ज़लें 

‘प्रदीप कान्त’ की दो ग़ज़लें:

प्रदीप कांत
अनुभूति, कविता कोश, रचना कोश, वर्तमान साहित्य, हरिगन्धा, जनसत्ता सहित्य वार्षिकी (2010), समावर्तन, बया, पाखी, कथादेश, इन्द्रपस्थ भारती, सम्यक, सहचर, अक्षर पर्व आदि अनेक साहित्यिक पत्रिकाओं व दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, दैनिक जागरण आदि समाचार पत्रों में गज़लें व नवगीत प्रकाशित।
क़िस्सागोई करती आँखें (ग़ज़ल संग्रह ­­­­अगस्त 2012)
सम्पर्क – डी-8, सेक्टर-3, केट कॉलोनी, इन्दौर – 452 013, मध्य प्रदेश
फोन – 0731 2320041, 94074 23354
इमेल – kant1008@rediffmail.com, kant1008@yahoo.co.in

1- 

जल रहा सारा शहर अब देखिये
बोल का अपने असर अब देखिये
दीप जलने से मना करने लगे
आँधियों का ये कहर अब देखिये
नींद होगी संग कब तक ख़्वाब के
भोर का बजता गजर अब देखिये
छाँव में जिसकी हुआ था मैं जवाँ
काटता हूँ वो शज़र अब देखिये
ख़ुश्बुएँ क़िरदार थी जिनका कभी
उन हवाओं में ज़हर अब देखिये

2- 

अब करें भी हम दुआ क्या
साँस जाने में बचा क्या
गन्ध ही ग़ायब हुई है
आज सहमी है हवा क्या
जुर्म था संगीन जितना
दी अदालत ने सज़ा क्या
बन्दगी तेरी करें क्यूँ
तू हमारा है ख़ुदा क्या
ज़िन्दगी ज़िन्दादिली है
और है इस के सिवा क्या

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