(हिंदी गजलों में एक और शख्सियत : प्रदीप कान्त, उनकी कुछ ग़ज़लें humrang.com में पहली बार)

प्रदीप कान्त की ग़ज़लें

प्रदीप कांत

1-

पेड़ों पर जब झुकते हैं

बादल तभी बरसते हैं

पहचानो, सूरज हैं हम

रोज़ यहीं से उगते हैं

नीयत है बाज़ारों की

लुभा लुभा कर ठगते हैं

बच्चों से कुछ ही भारी

बच्चों के ये बस्ते हैं

होके बड़े जिन्हे तुम भूले

नानी के हम क़िस्से हैं

2-

जिसमें कुछ अच्छा देखूँ

दिन का वो लम्हा ढूंढू

नज़र सभी की हुई बुरी

किस किस का चेहरा नोचूँ

अगर छोड़ दे तू अपना

मैं भी ये लहज़ा छोड़ूँ

दोस्त बना लूंगा तुझको

तुझमें कुछ मुझ सा देखूँ

ख़्वाब सलोने बैठे हैं

पलकों को कैसे खोलूँ

3-

मुमकिन है के बच भी जाऊँ-

अपना बयाँ अगर दुहराऊँ

आज़ादी कैसी होती है

नहीं पता, मैं क्या बतलाऊँ

हाँ बेटा इस बार चलूंगा

तुझको मेरा गाँव दिखाऊँ

रस्ता बच्चे देख रहे हैं

वक़्त हुआ, घर वापस जाऊँ

बड़े बहलते हैं वादों से

बच्चों को कैसे बहलाऊँ

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