आधुनिकता के साथ गजल की दुनियां में अपनी पहचान बना चुके ‘प्रदीप कान्त’ अपनी दो बेहतर गजलों के साथ हमरंग पर दस्तक दे रहे हैं ….आपका हमरंग पर स्वागत है …| – संपादक 

‘प्रदीप कान्त’ की ग़ज़लें

प्रदीप कान्त

1 – 

जल रहा सारा शहर अब देखिये
बोल का अपने असर अब देखिये

दीप जलने से मना करने लगे
आँधियों का ये कहर अब देखिये

नींद होगी संग कब तक ख़्वाब के
भोर का बजता गजर अब देखिये

छाँव में जिसकी हुआ था मैं जवाँ
काटता हूँ वो शज़र अब देखिये

ख़ुश्बुएँ क़िरदार थी जिनका कभी
उन हवाओं में ज़हर अब देखिये

२-

अब करें भी हम दुआ क्या
साँस जाने में बचा क्या

गन्ध ही ग़ायब हुई है
आज सहमी है हवा क्या

जुर्म था संगीन जितना
दी अदालत ने सज़ा क्या

बन्दगी तेरी करें क्यूँ
तू हमारा है ख़ुदा क्या

ज़िन्दगी ज़िन्दादिली है
और है इस के सिवा क्या

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