सभ्यता के विकास के साथ ही प्रेम और युद्ध से सम्बन्धित किस्से कहानियां प्रचलित होने लगी थीं ! प्रेम और युद्ध मानव मन को आकर्षित करतें हैं यही कारण है की प्रेम  और युद्ध से सम्बन्धित  किस्से कहानियां आज भी लिखे जा रहें है और संभवतः सभ्यता के अंत तक लोगो का रुझान इस विषय की तरह रहेगा ! जैसे : लैला-मजनू ,शीरीं-फ़रहाद, हीर-रांझा ,रोमिओ-जूलियट ,बीशलदेव रासो,परमाल रासो,पृथ्वीराज रासो,पद्मावती ,सूरसागर आदि इसके जीवंत प्रमाण हैं !……

प्रेम एवम् विद्रोह के बीच खड़े मनोहर श्याम जोशी 

आशीष जयसवाल

आशीष जयसवाल

प्रेमचंद कहते हैं, “मै उपन्यास को मानव चरित्र का चित्र मात्र समझता हूँ | मानव चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मूल तत्व है !” मनोहरश्याम जोशी अपने एक निबंध ‘बात यह है कि’ में कहतें हैं, “प्रकृति की रहस्यमयता अभेद्य है और उससे भी अभेद्य है प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ कृति मनुष्य की जटिलता !” इसी जटिलता का संधान मनोहर श्याम जोशी अपने साहित्य में करतें हैं जिसे वे मनुष्य का अन्वेषण मानते हैं ! प्रेम और युद्ध साहित्य और अन्य कलाओं के लिए आकर्षक विषय रहा है ! सभ्यता के विकास के साथ ही प्रेम और युद्ध से सम्बन्धित किस्से कहानियां प्रचलित होने लगी थीं ! प्रेम और युद्ध मानव मन को आकर्षित करतें हैं यही कारण है की प्रेम और युद्ध से सम्बन्धित किस्से कहानियां आज भी लिखे जा रहें है और संभवतः सभ्यता के अंत तक लोगो का रुझान इस विषय की तरह रहेगा ! जैसे : लैला-मजनू ,शीरीं-फ़रहाद, हीर-रांझा ,रोमिओ-जूलियट ,बीशलदेव रासो,परमाल रासो,पृथ्वीराज रासो,पद्मावती ,सूरसागर आदि इसके जीवंत प्रमाण हैं !
लोग आज भी प्रेम करतें हैं लेकिन प्रेम का वो परम्परागत रूप और मान्यताएं बदल रहीं है ! प्रेम अपने आप में एक जटिल प्रक्रिया है ! यही कारण है समाज और शिक्षा के अनेक अनुशासन प्रेम की अवधारणा को व्याख्यायित करने ,समझने का प्रयास करतें हैं ! लेकिन प्रेम की समझ अब भी अधूरी है इसीलिए प्रेम के बारे में रोज लोग एक नई धारणा लेकर आ जाते हैं ! सबको लगता है कि वे या उनका अनुशासन प्रेम को समझ चुका है जबकि सच्चाई कुछ और ही है !
प्रेम की गति व् नियति बड़ी विचित्र है ! प्रेम वह तत्व है जिससे सृष्टि का निर्माण हुआ है ! प्रेम के इतने व्यापक ,शुद्ध, सहज रूप को समाज ने इतना दुरूह क्यों बना दिया है? सामाजिक रुढियां ,परम्पराएँ मानसिकता क्यों प्रेम को असहज ,अमानवीय बना रही हैं? मनुष्य के भीतर प्रेम तत्व को समाप्त करने वाली जीर्ण-शीर्ण मान्यताएं ,सोच,मनुष्य को असहज और अस्वभाविक व्यवहार करने पर क्यों मजबूर कर रहीं हैं ? इन समस्यायों का चित्रण अनेक रचनाकारों ने अपने उपन्यासों में किया है ! जिसमे चित्रलेखा ,गुनाहों का देवता उल्लेखनीय हैं ! इस परम्परा में मनोहरश्याम जोशी के उपन्यास कसप का भी उल्लेख किया जा सकता है जो लीक से हटकर है और समस्त साहित्यिक व् साहित्यकार व् साहित्येतर प्रतिमानों को ध्वस्त करती हुई प्रतीत होती है ! मनोहर श्याम जोशी के उपन्यासों में प्रेम शब्द का अर्थ केवल स्त्री-पुरुष संबंधो के सन्दर्भ में ही नहीं है ! वे इन्ही संबंधों की जटिलता को समझना व् समझाना चाहते है ! स्त्री-पुरुष सम्बन्ध सहज,सामान्य,स्वाभाविक होतें है फिर भी समाज और परिस्थितियों ने इन्हें इतना असहज ,असामान्य ,बना दिया है कि आधुनिक मनुष्य मानसिक व् शारीरिक रूप से बीमार हो जाता है ! इसी बीमरी को जानने, समझने व् दूर करने के लिए मनोहर श्याम जोशी मानवीय संबंधो की प्रकृति उघाड़ते है जिससे समाज व् साधारण मनुष्य में सहजता व् स्वभाविकता आ सके ! प्रेम एक स्वछंद हृद्यगत भाव है प्रेम में लें दे का भाव नही होता ! उसमे समर्पण होता है ! जब प्रेम में लेने देने का भाव आ जाता है ! तब वह प्रेम भावगत न होकर स्वार्थ पूर्ति मात्र हो जाता है ! उत्तर आधुनिक, भूमंडलीकरण ,बाजारवाद ,के युग में यह सबसे बड़ी त्रासदी है कि प्रेम जैसा सहज,निश्छल, भाव भी इसकी चपेट में आ गया है ! हर रिश्ता फायदे व् नुकसान कि दृष्टि से देखा जाने लगा है जिससे संबंधों की गर्माहट ,विश्वास का स्थान कृत्रिमता ,धोखाधड़ी ने ले लिया है और प्रेम करने के स्थान पर मनुष्य विद्रोही और कुंठित हो गया है ! मनुष्य एक जटिल प्राणी है | वह हर स्थिति को अपने अनुसार बदलना चाहता है जब समाज उस परिस्थिति या स्थिति को बदलने में अवरोध उत्पन्न करता है तो व्यक्ति विद्रोही हो उठता है और निश्चय करता है कि सभी पारम्परिक रुढियों ,परम्पराओं ,को ध्वस्त कर अपने अनुसार जीवन का एक सरल सहज व् नया मार्ग निकालेगा !
मानव द्वारा अनादि काल से अपने अस्तित्व की सुरक्षा हेतु विद्रोह किया जाता रहा है ! विविध भेदभाव ,भौतिक आवरणों तथा कृत्रिम आरोपित मूल्यों के नीचे दबे हुए मनुष्य ने प्रारंभ से ही विद्रोह की मशाल जलाई है !
मनोहर श्याम जोशी के उपन्यासों ‘कुरु कुरु स्वाहा’, ‘कसप’, ‘हरिया हर्क्युलीत्ज की हैरानी ,’हमजाद ‘, ‘कौन हूँ मैं’, में प्रेम और विद्रोह को देखा जा सकता है ! इन्होने उन सभी खांचों को एक-एक करके तोडा है जो मनुष्य के व्यक्तिक व् सामाजिक कार्य व्यापार को सुचारू रूप से चलने में रोकते है | उसके लिए वे व्यंग व् खिलंदड़ी भाषा का प्रयोग करतें हैं ! उनका मानना है कि हमारा समाज कयियेंपन की सभी सीमओं को पार कर चुका है अतः उसे उसी की भाषा में समझाना उचित है |
मनोहर श्याम जोशी, समय की क्रूरता और घटियापन को अपनी रचनात्मकता बनातें हैं ! हिंसा ,सेक्स प्रतिस्पर्धा से भरे आज के दौर में जीवन सुरक्षित नही है | मनहरिया अनुभव की जुगलबंदी को आत्म व्यंग और विडंबना के सहारे चित्रित करतें हैं | (गप्प का गुलमोहर ,मनोहर श्यम जोशी ) हमजाद , हरिया हरक्यूलीज की हैरानी ,कौन हूँ मैं , में वे समाज व् मनुष्य से प्रश्न करतें है कि मनुष्य को क्या हो गया है ? जीवन में प्रेम ,क्रांति ,स्मृति, इतिहास,लोक व्यवहार सब गायब सा क्यों हो गया है ? भूमंडलीकरण ,उत्तर आधुनिकता के युग में मनुष्य सब कुछ कैसे पचाता जा रहा है और हद तो तब हो रही है जब वमन के पश्चात् निकलने वाले अवशेषों को देखकर भी उसे अपराध बोध नही होता ! वे मनुष्य के मनुष्य होने पर सवाल उठातें हैं कि क्या आज का मनुष्य ,मनुष्य है भी या नही और जब इस बारे में सोचतें है तो उत्तर मिलता है: कसप

Leave a Reply

Your email address will not be published.