प्रेम-गली अति सांकरी…

बसंत और मधुमास से गुज़रते हुए दृष्टि, वर्तमान समय में राजनैतिक इच्छाशक्ति के चलते पूरे सामाजिक परिवेश में एक ख़ास तरह के बदलाव पर आकर ठहर जाती है | ऐसा महसूस होने लगा है कि चारों तरफ अतार्किकता के साथ आपस में भिड जाने की सांस्कृतिकता पनपने लगी हो | आपसी प्रेम या प्रेम की बातें इतिहास में तब्दील होती जान पड़ती हैं | किसी भी संचार माध्यम पर या सर्वाधिक प्रासंगिक सोशल मीडिया पर भी आपसी प्रेम या प्रेम की चर्चाएँ कम ही नज़र आ रहीं हैं और खासकर इन दिनों तो वातावरण प्रेम के उलट हिंसात्मक ही हुआ है | जबकि इन बदलती सामाजिक परिस्थितियों में केवल प्रेम ही एकमात्र वह अस्त्र है जिसे दुनिया भर में फ़ैली इंसानी वैमनस्यता और साम्प्रदायिकता के खिलाफ  इंसानियत को बचाने के लिए चलाया जाना चाहिए |

प्रेम की शुरुआत तो जीव के पैदा होने के साथ ही हुई है | या कहें जीव की पैदाइश ही प्रेम की ही परिणति रही,  जब से सभ्यताएं विकसित हुई हैं तब से स्त्री-पुरुष के बीच प्रेम अलग-अलग भावों में पनपता रहा है | बिना प्रेम के तो जीव का कोई अस्तित्व ही नहीं है और इसके बगैर दुनिया की कल्पना करना बेमानी है | निश्चित ही, प्रेम ही वह शय है जो इंसान को इंसान से और जीव को जीव से जोड़े रखने में समर्थ है | प्रेम ही आस्था के रूप में पनपता है या कई बार हम आस्था को ही प्रेम का नाम देते हैं | यह अलग बात है किसी जीव का प्रेम या आस्था किसी पत्थर में है या किसी इंसान में | यह बहस का मुद्दा हो सकता है कि उसकी आस्था पत्थर में क्यों हो, किसी इंसान में क्यों नहीं ?

अगर हम अतीत में जाकर देखें तो दुनिया में ऐसे तमाम उदाहरण मौजूद रहे हैं, जहाँ प्रेम को एक उर्जा, प्रेरणा और सबक के रूप में देखा गया | अमृता प्रीतम और शाहिर लुधियानवी, सार्त्र और सिमोन आदि जैसे नाम मिलते हैं, वहीँ मध्यकाल में देखें तो मीराबाई और इससे भी आगे जाएँ तो राधा-कृष्ण के प्रेम प्रसंगों से इतिहास भरा पड़ा है | वैश्विक साहित्य में भी अगाध प्रेम की गवाही देती जुलियट  सीजर से लेकर लैला मजनू और हीर रांझा की कहानियाँ और किस्से मिलते हैं | ये सभी पात्र लेखक की कल्पना में रहे हों चाहे वज़ूद में | लेकिन इन लेखकों ने खुद के इंसान होने की सिनाख्त के साथ प्रेम को व्याख्यायित करने की रचनात्मकता से अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है | प्रेम से ही किसी भी जूनून या लक्ष्य को पूरा करने की ऊर्जा पाने के प्रमाण भी मौजूद हैं फिर चाहे वह राष्ट्र, विचार, या जन-भावना ही क्यों न हो | मसलन भगतसिंह, राजगुरु, असफाक, रामप्रसाद बिस्मिल या चंद्रशेखर ऐसे ही उदाहरण हैं जो जिन्दगी जीने के हक़ को त्यागकर ख़ुशी-ख़ुशी मौत को गले लगा लेते हैं |

बदलते समय में प्रेम के वर्तमान परिदृश्य का अवलोकन करें तो प्रेम को भी राजनैतिक स्वार्थों या पूंजीवादी व्यवस्था के लिए एक हथियार के तरीके से इस्तेमाल किये जाने की कोशिश नजर आती है | तब एक बाज़िब सवाल उठ खड़ा होता है कि, क्या प्रेम को व्याख्यायित करने की जिम्मेदारी साहित्य, समाज और मानवीय संवेदनाओं की न होकर बाजार की हो गयी है ? यानी प्रेम को भी एक प्रोडक्ट के रूप में परोसा जा सके | जो बाजार से मँहगे गुलाब, चौकलेट्स, टैडीबियर, कार्ड्स या अन्य तरह के गिफ्ट्स खरीदकर प्रेम का इज़हार कर रहा है, वह तो प्रेम कर रहा है और जो इन सब चीजों को नहीं खरीद सकता, उसे प्रेम का इज़हार या प्रेम करने का हक़ नहीं है ?  ऐसे में इन गीतों के मुखड़ों की याद हो आना भी स्वाभाविक है- पहला शकील बदायूंनी का लिखा –

‘एक शहंशाह ने बनवा के हसीन ताजमहल

सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है |’

और दूसरा साहिर लुधियानवी की कलम से निकला-

‘इक शहंशाह ने बनवा के हंसी ताजमहल

हम गरीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मजाक |’

इन दोनों गीतों में ताजमहल को बिम्ब बना कर प्रतीकों में प्रेम की बात कही गई है। कमाल तो यह है कि ताजमहल एक है, उसे बनवाने वाला एक है- लेकिन बातें दो। दोनों एक-दूसरे के उलट- और दोनों मानीखेज। एक बाजार और सत्तावादी संस्कृति पर प्रहार करता है, तो वहीं दूसरा प्रेम के व्यापक और उदात्त स्वरूप को दर्शाता है।

इन शायरों ने एक ताजमहल और एक शाहजहां-मुमताज के अमर प्रेम पर हमारे सामने, प्रेम पर बात करने के लिए ये दो पैमाने रखे हैं । एक तरफ जहाँ वैलेंटाइन-डे के नाम पर ही भाले-बर्छियां निकलने लगती हैं। कुछ लोग और संगठन भारतीय संस्कारों और परम्पराओं की दुहाई देकर आमने-सामने खड़े होकर लट्ठमलट्ठा होने लगते हैं, तो वहीँ दूसरी तरफ कुछ लोगों का प्रेम वैलेंटाइन-डे पर फाइव स्टार संस्कृति में पनपता है। इस पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है। एक भारतीय संस्कृति की बात करता है तो दूसरा प्रेम प्रदर्शन के बहाने वैभव प्रदर्शन करता है। इन दोनों के बीच सहमति-असहमतियों की घालमेल भी है। किसी तरल पदार्थ की तरह एक-दूसरे की तरफ लुढ़कने का लोच भी है और आपसी सहमति के कई आयाम भी हैं।

इन्हीं के भीतर संस्कृति, पूंजी और बाजार की बात करने वाले भी हैं। फर्क इतना झीना है कि कोई सब-क्राइटेरिया भी नहीं आप तलाश सकते इनमें । इसी में से राजसत्ता तक जाने के लिए कभी लव जेहाद का रास्ता निकलता है तो कभी तलवार-भाले और कटार-गंड़ासे का भी। एक सभ्यता-संस्कृति के नाश होने की बात करता है, तो दूसरा वीर भोग्या वसुंधरा या अमीर भोग्या प्रेमी-प्रेमिका की बात करता  है। कमाल तो यह है कि संस्कृतिवादी और बाजारवादी ये दो रास्ते हैं- लेकिन एक-दूसरे में इतने गड्मगड्ढ कि पता ही नहीं चलता कि कौन सा रास्ता किधर जाता है। पर इतना स्पष्ट है कि दोनों रास्ते सत्ता तक ही जाते हैं। एक राजसत्ता तक,  दूसरा पूंजीसत्ता तक । दोनों की दुकानदारी चलती रहे इसलिए दोनों एक-दूसरे के समर्थन में रहते हैं । दिखावे के लिए आपको विरोध दिख सकता है । वह भी इसलिए कि दोनों को जाना तो एक ही रास्ते पर है, सत्ता के रास्ते पर। इसलिए दोनों नदी के दो छोरों पर चलते बढ़े जाते हैं, ताकि वे एक-दूसरे से अलग भी दिखें और उनके बीच रार भी न हो। हां इस क्रम में आपसी विरोध के नाम पर सिर्फ कुछ मासूम जोड़ों की बलि भले ही ले ली जाय ।

अब व्यवस्थाई इच्छा शक्तियों के चलते, चलिए यह मान लें कि प्रेम के लिए बाजारी प्रोपेगंडे के रूप में रोज डे, प्रपोज डे, चॉकलेट डे, टैडी डे, प्रोमिस डे, हग डे, किस डे और उसके बाद वैलेंटाइन डे इन सात दिनों को राष्ट्रीय उत्सवों की तरह मनाने को  स्वीकार भी लिया जाय तब इस विरोधाभाष को कौन तय करके सुलझाएगा ? कि इन दिनों  में किसी भी प्रेमी युगल पर डंडे नहीं बरसाए जायेंगे या उन्हें मारापीटा नहीं जाएगा या इस दौरान खाप पंचायतों के द्वारा कोई फैसले नहीं सुनाये जा रहे होंगे या इन सात दिनों में कहीं कोई ऑनर किलिंग नहीं हो रही होगी ? वास्तव में अगर हम भारतीय सभ्यता और संस्कृति को बचाए रखना चाहते हैं तो क्या सबसे पहले बाज़ार या मल्टीनेशनल कम्पनियों पर पाबंदी लगा सकते हैं ? अगर नहीं तो फिर सीधा सा मतलब है कि न कोई परम्परा, संस्कृति को बचाना चाहता है न किसी को संस्कारों या मानवीय संवेदना की ही फ़िक्र है |

प्रेम को, बाजार और सत्ता की चौसर पर एक गोटी के रूप में इस्तेमाल किये जाते वर्तमान समय में सच्चे प्रेम पुजारी अलमस्त फक्कड़ रहीम और कबीर का बरबस स्मरण हो आता है | रहीम कहते हैं-

प्रेम पंथ ऐसी कठिन, सब कोउ निबहत नाहिं।

रहिमन मैन-तुरगि बढ़ि, चलियो पावक माहिं।।

रहीम दोनों प्रतीकों में कहते हैं कि अगर प्रेम निभ गया तो फिर वहां किसी और चीज की गुंजाइश ही नहीं। वहीँ कबीर की यह बानी-

प्रेम-गली अति सांकरी, तामें दो न समाहिं।

जब मैं था तब हरि नहीं, जब हरि है मैं नाहिं।

कबीर भी दो की अवधारणा को ही नकारते हैं। वह सीधे कहते हैं कि जब तक हम  दो होंगे, तब तक किसी तीसरे की गुंजाइश है- नफरत की, घृणा की, विद्वेष और साम्प्रदायिकता की … उनके अनुसार अगर प्रेम है तो वह इतना विराट हो कि सब जगह वही हो | जब हर जगह प्रेम ही  प्रेम होगा तो फिर किसी और चीज के लिए जगह ही कहां होगी। तब संकरी क्या, निर्वात भी नहीं घुस सकेगा प्रेम के बीच। जब हम, ‘हम-तुम’ न होकर महज़ एक होंगे।

सामाजिक ताने-बाने में इन वैमनष्य ताकतों के खिलाफ आपसी प्रेम और सदभाव एक प्रतिरोध की आवाज है | क्योंकि नैतिकता का विरोध ही प्रेम है | जब एक पुरुष-महिला के प्रेम करने से भारतीय संस्कृति और परम्पराओं का हनन होता है तो फिर ये जो बाजार सजा रहे हैं और प्रेम के नाम पर हजारों करोड़ का कारोबार कर रहे हैं ये किस की इच्छा या परमीशन से हो रहा है…..?  ऐसे में प्रेम को समझना बहुत जरुरी हो जाता है कि हम किस प्रेम और संस्कृति की बात कर रहे हैं |

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