होली पर विशेष …… होली की अशीम बधाइयों के साथ ….. हमरंग के पाठकों के लिए 

फिर बच जाएंगे रंगों से

ब्रजेश कानूनगो

ब्रजेश कानूनगो

मेरा विश्वास है कि वे इस बार भी रंगों से ठीक उसी तरह बच निकलेंगे जिस तरह हर साल अपने आप को होली के छींटों से सुरक्षित बचा लेते हैं। साधुरामजी यदि पत्नी के बाद किसी से घबराते हैं तो वह होली खेलना ही है।
आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है, रंगों से बच निकलने की आवश्यकता के चलते साधुरामजी का दिमाग फागुन के शुरू होते ही ऐसी नई-नई तरकीबों तथा युक्तियों की खोज में व्यस्त हो जाता है जिससे धुलेंडी या पंचमी पर हुडदंगी टोली के रंगीले आक्रमण और शरीर की फजीहत होने से बच सके।
रंगों से बचने की उनकी इस अजीब खप्त के कारण मित्रों का भी होली पर एकमात्र ध्येय साधुरामजी को रंगना ही हो जाता है। मित्रों में यह जिज्ञासा बनी रहती है कि देखें इस बार वे क्या नया उपाय ढूंढ़कर लाते हैं। रंगों से बचने के उनके आजमाए सफल नुस्खों पर गौर किया जाना यहाँ कम दिलचस्प नहीं होगा।
शुरू-शुरू में वे होली के दिन पत्नी से टिफिन तैयार करवाकर सुबह-सुबह ही अज्ञात वास को चले जाते थे। मित्रों के देर तक दरवाजा पीटने के बाद जब पत्नी दरवाजा खोलतीं और पूरे घर की तलाशी के बाद साधुरामजी बरामद नहीं होते तो रंगबाजों को सिवाय अपना माथा पीटने के आलावा कोई चारा नहीं रहता। बाद में मित्रों ने अपना जासूस उनके घर के आगे तड़के से ही तैनात करना शुरू किया। लेकिन वे भी कच्ची गोटियां नहीं खेले थे, दोपहर बाद तक वे अपने घर से बाहर नहीं निकले तो मित्रों ने उनके घर में घुसकर उन्हें रंगने का फैसला किया। अंदर जाकर देखा तो बड़ा अजीब माहौल था। सफ़ेद चादर वाले बिस्तर पर वे कम्बल ओढ़े पड़े थे। पत्नी उनके पैर दबा रही थी। माथे पर गीली पट्टी पडी थी। होली खेलने वालों का होली बुखार साधुरामजी के नकली बुखार ने उतार दिया। अगली होली पर मित्रों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, जब उन्होंने देखा कि साधुरामजी सुबह से ही आँगन में कुर्सी लगाए बैठे हैं। हाँ, चेहरा जरूर थोड़ा उतरा हुआ दिखाई दे रहा था। लोगों ने समझा शायद वे रंगों से बचने का उपाय नहीं सोच पाए होंगे, इसीलिए थोड़े निराश हैं। जैसे ही किसी ने रंग लगाने के लिए अपना हाथ उनकी ओर बढ़ाया, उन्होंने हाथ पकड़ते हुए कहा- भाई मुझे मत लगाओ। अभी फोन आया है, नानीजी नहीं रहीं। होली खेलनेवालों का मूड ही बदल गया। वे बगैर होली खेले ही लौट गए। यह अलग बात है कि बाद में पता चला साधुरामजी की नानी को गुजरे पूरी तेरह होलियाँ गुजर चुकी थीं।
एक होली पर अपने चेहरे पर मुखौटा और मंकी कैप पहनकर उन्होंने होली-टोली के बीच खूब उछल-कूद की। उनकी विचित्र पोषाख में हुडदंगियों ने उन्हें होली का जोकर समझा और सभी उनके संग नाचते झूमते रहे शाम को साधुरामजी ने अपना आवरण निकाल फेंका, रंगों का एक छींटा भी उनकी काया पर नहीं पड़ा था।
इस बार साधुरामजी ने पहले ही सबकी जिज्ञासा एवं उत्सुकता के उपलों को ठंडा कर दिया है। उनकी घोषणा एक ऐसी तेज बयार के रूप में आई है कि मित्र अपने रंगों की पुड़िया खोलने में भी असहज हो रहे हैं। उन्होंने कह दिया है कि वे इस बार होली नहीं खेलेंगे। जब तक माल्या और ललित मोदी को एवं विदेशों से भारत का काला धन वापस नहीं लाया जाता, तब तक वे रंग नहीं खेलेंगे। बड़ी दुविधा में हैं मित्रगण, होली खेलें या इस बार भी छोड़ दें साधुरामजी को..!

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