“डाॅ. हरिवंशराय ने अपनी आत्मकथा का तीसरा खंड ‘बसेरे से दूर‘ 1971 से 1977 के दौरान लिखा। इस खंड में उनके इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विभाग में अध्यापक होने, देश-परिवार से दूर जाकर ईट्स के साहित्य पर शोध कर केम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में पीएच.डी. की उपाधि लेने, इसके बाद स्वदेश वापसी एवं इलाहाबाद छोड़कर विदेश मंत्रालय में नियुक्त होने (अर्थात् 1952 से 1954) तक की घटनाओं को समेटा गया है। इसमें मुख्य रूप से बच्चन जी एक अध्यापक, शोधक एवं आलोचक के रूप में पाठकों के समक्ष आए हैं। बच्चन जी के लिए उनके विद्यार्थी कितने महत्त्वपूर्ण रहे और अध्यापन के प्रति वे स्वयं कितने गंभीर रहे हैं, इस बात को निम्न कथन द्वारा समझा जा सकता है-“मैं अपने पढ़ाने में इस बात का विशेष प्रयत्न करता कि मैं विद्यार्थियों में स्वयं पढ़ने की रुचि जमाऊँ, शायद इसलिए भी इससे मेरे पढ़ाने में जो कमी हो उसकी पूर्ति हो जाये। लेक्चरर लोग स्वाध्याय के लिए पुस्तकों की लम्बी-चैड़ी सूची का इमला तो जरूर बोल देते थे, पर विद्यार्थियों को पुस्तकें सुलभ न होती थीं……..विद्यार्थियों की इस असुविधा का हल निकालने के लिए मैंने एक सेक्शन लाइब्रेरी की स्थापना की। प्रथम वर्ष में विद्यार्थियों ने मिलकर जितना चंदा दिया उतना मैंने स्वयं उसमें मिलाकर कुछ जरूरी सहायक पुस्तकें खरीदकर क्लास की अलमारी में रख दीं।…….14 वर्ष बाद जब मैंने युनिवर्सिटी छोड़ी पूरी अलमारी, काफी बड़ी, किताबों से भर गयी थी……हर पुस्तक और हर विद्यार्थी को एक निश्चित नम्बर देकर मैंने एक ऐसी सरल विधि बनाई कि लगभग 60 विद्यार्थियों को केवल 5 मिनट में पुस्तकें इशू करने का काम मैं समाप्त कर देता था। सदस्यता सीमित रहने से निश्चय मेरे बहुत-से विद्यार्थियों ने उन पुस्तकों से लाभ उठाया, शायद उससे अधिक जितना मेरे क्लास में व्याख्यान देने से।”3 वस्तुतः वर्तमान में जब अध्यापन सिर्फ एक व्यवसाय बनकर रह गया है और अध्यापकी जीवन की शुरुआत में तैयार किए गए नोट्स ही साल-दर-साल पढ़ाए जाते हैं, ऐसे समय में यह प्रसंग अध्यापकों को अपनी शिक्षण पद्धति पर विचार करने के लिए मजबूर करता है।” शोधार्थी ‘नितिका गुप्ता’ का आलेख …….

बसेरे से दूर: विजन, शिल्प एवं भाषा 

नितिका गुप्ता

नितिका गुप्ता

साहित्य में ‘आत्मकथा‘ विधा का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। आत्मकथा (आॅटोबायग्राफी) से अभिप्राय “अपनी जीवन-कहानी या स्वलिखित जीवनचरित”1 से है। इस विधा के माध्यम से आत्मकथाकार अपने जीवनानुभवों को वाणी प्रदान करता है। वह इसमें कल्पना एवं आत्ममोह का त्याग कर, पूरी ईमानदारी के साथ अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करता है। अतः आत्मकथा ‘आत्म की कथा‘ है।
हालांकि शाहजहाँ के शासनकालीन समय में बनारसीदास जैन कृत ‘अर्द्धकथानक‘ (1641 ई.) हिन्दी की प्रथम आत्मकथा है2, पर यह पद्य में लिखित है। इस वजह से गद्य के रूप में इस विधा का विकास आधुनिक युग में माना जाता है। आधुनिक युग में अनेक लेखकों-भारतेंदु हरिशचन्द्र, अम्बिकादत्त व्यास, राधाचरण गोस्वामी, प्रतापनारायण मिश्र, प्रेमचंद, महावीर प्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, राहुल सांकृत्यायन, यशपाल, रामवृक्ष बेनीपूरी, डाॅ. हरिवंशराय ‘बच्चन‘ आदि ने अपनी आत्मकथाएँ लिखी हैं। हर एक आत्मकथा का हिन्दी साहित्य में विशेष स्थान है, किन्तु डाॅ. हरिवंशराय ‘बच्चन‘ की आत्मकथा में उनका अनुभव बड़ी ही सहजता, सरलता और बेबाकी के साथ पुनर्रचित हुआ है। हरिवंश जी की आत्मकथा चार खंडों-क्या भूलूँ क्या याद करूँ (1969), नीड़ का निर्माण फिर (1970), बसेरे से दूर (1977) एवं दशद्वार से सोपान तक (1985) में प्रकाशित हुई है। इसके प्रथम खंड से अंतिम खंड तक पहुँचने पर, लेखक का व्यक्तित्व पूर्णतः विकसित होकर हमारे समक्ष उद्घाटित हुआ है। बच्चन की आत्मकथा का प्रत्येक खंड एक-दूसरे से पूरी तरह स्वतंत्र है इसलिए मैं इस आलेख में उनकी आत्मकथा ‘बसेरे से दूर‘ के विजन, शिल्प एवं भाषा पर प्रकाश डाल रही हूँ।

डाॅ. हरिवंशराय ने अपनी आत्मकथा का तीसरा खंड ‘बसेरे से दूर‘ 1971 से 1977 के दौरान लिखा। इस खंड में उनके इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विभाग में अध्यापक होने, देश-परिवार से दूर जाकर ईट्स के साहित्य पर शोध कर केम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में पीएच.डी. की उपाधि लेने, इसके बाद स्वदेश वापसी एवं इलाहाबाद छोड़कर विदेश मंत्रालय में नियुक्त होने (अर्थात् 1952 से 1954) तक की घटनाओं को समेटा गया है। इसमें मुख्य रूप से बच्चन जी एक अध्यापक, शोधक एवं आलोचक के रूप में पाठकों के समक्ष आए हैं। बच्चन जी के लिए उनके विद्यार्थी कितने महत्त्वपूर्ण रहे और अध्यापन के प्रति वे स्वयं कितने गंभीर रहे हैं, इस बात को निम्न कथन द्वारा समझा जा सकता है-“मैं अपने पढ़ाने में इस बात का विशेष प्रयत्न करता कि मैं विद्यार्थियों में स्वयं पढ़ने की रुचि जमाऊँ, शायद इसलिए भी इससे मेरे पढ़ाने में जो कमी हो उसकी पूर्ति हो जाये। लेक्चरर लोग स्वाध्याय के लिए पुस्तकों की लम्बी-चैड़ी सूची का इमला तो जरूर बोल देते थे, पर विद्यार्थियों को पुस्तकें सुलभ न होती थीं……..विद्यार्थियों की इस असुविधा का हल निकालने के लिए मैंने एक सेक्शन लाइब्रेरी की स्थापना की। प्रथम वर्ष में विद्यार्थियों ने मिलकर जितना चंदा दिया उतना मैंने स्वयं उसमें मिलाकर कुछ जरूरी सहायक पुस्तकें खरीदकर क्लास की अलमारी में रख दीं।…….14 वर्ष बाद जब मैंने युनिवर्सिटी छोड़ी पूरी अलमारी, काफी बड़ी, किताबों से भर गयी थी……हर पुस्तक और हर विद्यार्थी को एक निश्चित नम्बर देकर मैंने एक ऐसी सरल विधि बनाई कि लगभग 60 विद्यार्थियों को केवल 5 मिनट में पुस्तकें इशू करने का काम मैं समाप्त कर देता था। सदस्यता सीमित रहने से निश्चय मेरे बहुत-से विद्यार्थियों ने उन पुस्तकों से लाभ उठाया, शायद उससे अधिक जितना मेरे क्लास में व्याख्यान देने से।”3 वस्तुतः वर्तमान में जब अध्यापन सिर्फ एक व्यवसाय बनकर रह गया है और अध्यापकी जीवन की शुरुआत में तैयार किए गए नोट्स ही साल-दर-साल पढ़ाए जाते हैं, ऐसे समय में यह प्रसंग अध्यापकों को अपनी शिक्षण पद्धति पर विचार करने के लिए मजबूर करता है।

आत्मकथा स्वयं के साथ ही दूसरों के लिए भी लिखी जाती है इसलिए उसमें स्वाभाविक रूप से समाज भी आ जाता है। तत्कालीन समय में पढ़ा-लिखा युवा वर्ग पाश्चात्य संस्कृति से इतना अधिक प्रभावित था कि वह अपना रहन-सहन, खान-पान, पहनावा, बातचीत का ढंग, सबकुछ हू-ब-हू उन्हीं की तरह करना चाहता था। यहाँ तक कि ऐसे व्यक्ति स्वयं को ऊँचे दर्जें का और दूसरों को नीचे दर्जें का समझते थे। लेखक ने अपने सहयोगी का ऐसा ही चित्रण किया है-“किसी भी हिन्दुस्तानी द्वारा अंग्रेज की नकल जिस हद तक की जा सकती थी उस हद तक उन्होंने (मि. भगवत दयाल) की थी।……..अंग्रेजों की तरह अंग्रेजी बोल सकने की क्षमता पर उन्हें गर्व था और देसी उच्चारण से अंग्रेजी बोलने वालों को वे नीची नजर से देखते थे और मौके-बे-मौके उनका मजाक भी बनाते थे।”4
हमारा समाज आज कितना ही आधुनिक हो गया है लेकिन आज भी कई ऐसे पुरुष हमारे समाज में विद्यमान है जो स्त्री को कमजोर मानते हैं। उन्हें अकेला पाकर उनका शोषण करने की कोशिश करते हैं। आए दिन हमें ऐसी घटनाएँ देखने-सुनने को मिलती रहती हैं। जब हरिवंशराय बच्चन कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में अपना शोध-कार्य कर रहे थे, तब उनकी पत्नी ‘तेजी‘ पर भी ऐसा ही आघात किया जाता है। उनके जान-पहचान के व्यक्ति द्वारा उन पर अनैतिक सम्बन्ध बनाने के लिए जोर-जबरदस्ती की जाती है। उन्हें डराया-धमकाया जाता है। यहाँ तक कि उन्हें मारने की धमकी भी दी जाती है। लेकिन तेजी जी के आत्मविश्वास एवं दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे उस कामी पुरुष को परास्त होना पड़ता है। वस्तुतः यह प्रसंग उन लाखों स्त्रियों के लिए प्रेरणास्रोत है जो अपने-आप को कमजोर एवं असहाय मानती है।

इसके अलावा इलाहाबाद और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की तुलना, शिक्षा पद्धति का पर्यवेक्षण, विश्वविद्यालय में भाई-भतीजावाद प्रवृत्ति के अंतर्गत रीडर की नियुक्ति, अधिकारियों में पनप रही रिश्वतखोरी, तत्कालीन साहित्यिक गतिविधियों आदि का चित्रण आत्मकथा में यथार्थता उत्पन्न करता है। विश्वविद्यालय में व्याप्त भ्रष्टाचार पर हरिवंश जी की लेखनी व्यंग्य-बेधकता की चरम सीमा तक पहुँच गयी है, जिससे उनके गद्य को प्रखरता प्राप्त हुई है-“जब वाइस चांसलर, विभागाध्यक्ष, पदार्थी (पद$अर्थी) एक ही जाति के हों, तब परम्परागत वरिष्ठता की आड़ लेकर भाई-भतीजावादी मनोवृत्ति को सन्तुष्ट कर लेना कितना आसान हो सकता था! क्या रीडर की नियुक्ति में जल्दबाजी इसलिए नहीं की गयी थी कि केम्ब्रिज से डिग्री लेकर वापस आने पर निश्चय मैं उनका एक सबल प्रतिद्वन्द्वी सिद्ध हूँगा?”5 इस प्रकार ‘बसेरे से दूर‘ हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा होते हुए भी सामाजिक सरोकारों एवं विद्रूपताओं से किसी भी प्रकार से कटी हुई नहीं है।

आत्मकथाकार अपने विजन के अनुरूप शिल्प (पद्धति) का चयन करता है। विजन के साथ शिल्प का अभिन्न सम्बन्ध है। शिल्प के माध्यम से ही विजन को प्रस्तुत किया जाता है। इसके आधार पर ही आत्मकथा के रूप की निर्मिति होती है। इसके बिना आत्मकथा निष्प्राण एवं निष्प्रयोजन हो जाती है। वस्तुतः शिल्प पाठक की चेतना में बनता है इसलिए यह केवल अनुभवगम्य होता है। बच्चन जी के अनुसार आत्मकथा को शिल्प में बांधना अत्यंत दुष्कर है। वे कहते हैं कि “जीवन उतना ही नहीं जितना वह शिल्प से सध सके या शिल्प के साँचे में ढल सके। शिल्प से सधा जीवन प्रायः निर्जीव नहीं तो पालतू जैसा लगता है। जब कोई कलाकार जीवन को उसकी उद्दामता में देखना और उसे पकड़ने का प्रयत्न करता है-जैसे कोई मयगल हाथी को-तो शिल्प की जंजीरें टूटने लगती है। भनिति भदेस हो जाती है। कलाकार जब जीवन के किसी बड़े सत्य का साक्षात्कार करता है, तभी वह भनिति के भदेस होने के खतरे की परवाह नहीं करता।”6 अपनी इस मान्यता के बावजूद भी उन्होंने आत्मकथा को रूप प्रदान करने के लिए विभिन्न-आत्मकथात्मक, पूर्वदीप्ति, परिदृश्यात्मक एवं पत्रात्मक पद्धतियों का प्रयोग किया है।

हरिवंशराय बच्चन

हरिवंशराय बच्चन

हरिवंशराय जी ‘आत्मकथात्मक पद्धति‘ का उपयोग करते हुए स्वयं अपनी आपबीती सुना रहे हैं-“आज तो मुझे यह सोचकर आश्चर्य होता है कि उन चिन्ताग्रस्त दिनों में कत्र्तव्य के प्रति निष्ठा और अपने विद्यार्थियों के प्रति सद्भावना मैंने कैसे जुगा रखी होगी।…….मैंने अपनी गहन-से-गहन वैयक्तिक चिन्ता, असन्तोष अथवा आक्रोश में भी अपने और अपने विद्याार्थियों के बीच वह चीज नहीं आने दी जिसका पढ़ने-पढ़ाने से सीधा सम्बन्ध नहीं था।……….अपनी परेशानियों के दिनों में अगर मैं पढ़ाने के अतिरिक्त कोई और काम करता होता…..तो मैं निश्चय अपनी घुटन और घबराहट को अधिक कटुता के साथ अनुभव करता।”7 यह बात हमेशा ध्यान रखनी चाहिए कि जहाँ आत्मकथात्मक पद्धति होगी, वहाँ ‘पूर्वदीप्ति पद्धति‘ भी होगी। बच्चन जी ‘बसेरे से दूर‘ में अपनी स्मृतियों को एक-एक कर पाठकों के समक्ष रखते हैं, जिस वजह से उसमें मनोविज्ञान का भी समावेश हो गया है-“स्मृतियों के प्रदेश में छत्तीस वर्ष पीछे लौटना होगा। जब मैं दिमाग के उस भाग की कल्पना करता हूँ जिसमें सुधियाँ संचित रहती हैं तो वह मुझे विविध रंगों के धागों के उलझे-पुलझे गुच्छे जैसा लगता है, और किसी भी सूत्र को पकड़कर आगे या पीछे चलना चेतना के लिए साधारण तथा कठिन नहीं होता, गो कभी-कभी उससे जुड़े या उससे अटके अन्य धागे भी हिलते, खिंचते अथवा झटके खाते हैं।”8 इसी प्रकार लेखक लन्दन प्रवास के दौरान ‘मार्जरी‘ सम्बन्धित यादों में डूब जाता है “जैसे बच्चे अपनी माँओं का सान्निध्य पाकर निश्चिन्त, क्वचिद् विनोद में, भीड़ में घुसते चले जाते हैं, वैसे ही मैंने मार्जरी को अपने पास पाकर अनुभव किया। मुझे याद है, सबसे पहले स्टूडेन्ट्स होस्टल के लाउंज में बैठकर उसने मुझे पेंस, ट-पेंस, थ्र-पेंस, शिलिंग आदि के सिक्के दिखाये और भारतीय सिक्कों में उनका मूल्य समझाया……..उसने मुझे लन्दन की ट्यूब ट्रेनों का एक नक्शा लेकर दिया, अलग-अलग रंगों से दिखाई गयी उनकी अलग-अलग लाइनें समझायीं, उनका स्टेशन पहचनवाया, बिजली से चलती सीढ़ियों पर उतरना-चढ़ना सिखाया, और वह बहुत कुछ जिसे जानना लन्दन में बिना किसी असुविधा के घूमने-फिरने के लिए जरूरी है।………ऐसे अवसरों पर मैं विनोद से उसे ‘ममी‘ कहता और वह मुझे ‘माई ओल्ड चाइल्ड‘ कहकर मुसकरा देती।”9

लेखक ने अपनी आत्मकथा को आकार देने के लिए ‘परिदृश्यात्मक‘ एवं ‘पत्रात्मक‘ पद्धतियों का भी प्रयोग किया है। परिदृश्यात्मक पद्धति में पाठक के समक्ष एक फैला हुआ दृश्य या अतीत का विस्तार होता है, जिसे समझने के लिए उसे लेखक की सहायता लेनी पड़ती है। निम्न पुस्तक के एक दृश्य में इसी पद्धति द्वारा बच्चन जी अपने अध्यापकी जीवन की शुरुआत से पाठकों को अवगत करवा रहे हैं-“मुझमें अध्यापक का बीजारोपण निःसन्देह उन ट्यूशनों के समय हुआ होगा जो मैंने अपने परिवार की आर्थिक विपन्नता में अपने विद्यार्थी-जीवन से ही करनी शुरू कर दी थीं। मुझे आज भी वह अवसर याद है जब पहली ट्यूशन पर मेरे विद्यार्थी ने मुझे पहली बार ‘मास्टर साहब‘ कहकर सम्बोधित किया था।……..1930 में पढ़ाई छोड़ने और 1937 में फिर से आरम्भ करने के बीच यों तो मैंने कई पापड़ बेले थे, पर मेरा अधिकांश समय अध्यापकी में ही बीता था।”10 इसके दूसरे दृश्य में वे लन्दन अपने शोध-कार्य के लिए जाने वाले हैं। उनकी पत्नी ‘तेजी‘ पति के विदेश जाने के बाद यहाँ अकेले रहने को लेकर भयाकुल हैं, “तेजी के मन की गिरावट के पीछे थी, नारी की सहज दुर्बलता।…….मेरे जीवन में ऐसे भी अवसर आये हैं जिनमें मैंने तेजी का विशुद्ध, सुकुमार, निर्भराकुल, नारी-रूप भी देखा है…….एक दिन उन्होंने कह ही दिया, ‘इतने दिनों के लिए, इतनी दूर जा रहे हो, बच्चे छोटे-छोटे हैं……घर से दूर जाने की कल्पना से ही मैं अपने को बहुत निर्बल-कातर पा रही हूँ।‘ मैंने उन्हें समझाया, ‘तुम यह क्या कह रही हो!…….अगर तुम इस तरह ऐसी दुर्बलता दिखलाओगी तो इंग्लैण्ड में मेरा एक-एक दिन रहना कठिन और कष्टकर हो जायेगा।……तुमसे और बच्चों से अलग होना मेरे मन पर कम भारी नहीं पड़ रहा है‘।”11

इसके अतिरिक्त ‘पत्रात्मक पद्धति‘, आत्मकथात्मक पद्धति का ही विस्तार है। जब कभी भी विदेश में शोध कार्य करते समय लेखक को मानसिक उलझनों का सामना करना पड़ा, तब-तब उनकी पत्नी के पत्रों ने उनके लिए औषधि का कार्य किया। साथ ही उनमें एक नए जज्बे का संचार किया। ऐसे ही एक पत्र में तेजी जी, बच्चन जी को उनके लक्ष्य की ओर अग्रसर करते हुए लिखती है कि-
“आपने जो काम उठाया है, उसमें सफल होने को हमने बहुत कुछ दाँव पर लगा दिया है।

एक जुआ के दाँव पर हम सब दीन लगाय
लाज बचै, इज्जत रहै राम जो देयँ जिताय।

अगर इस काम में भी व्याघात पहुँचता है तो हम सब प्रकार वंचित होंगे। वह तो आपको पूरा करके ही लौटना है। मेरी इज्जत को जो चुनौती मिली थी, उसका उत्तर मैंने अपनी दृढ़ता के साथ दिया है। आपका काम भी आपकी इज्जत के लिए एक चुनौती ही है। आप भी इसका उत्तर अपने श्रम-संकल्प से दें। किसी भी कारण आपको असफलता मिली तो कितनी भी व्याख्याओं से आप उसे सफलता में नही बदल सकेंगे। अपने जीवन-भर का अर्जित धन, मान लुटाकर अगर हम दुनिया की हँसी के पात्र ही बनकर रह गये तो हमसे अधिक अभागा कौन होगा।”12

अतः हरिवंशराय बच्चन ने अपने विजन के अनुरूप मिश्रित पद्धतियों का उपयोग किया है।
आत्मकथा के विजन एवं शिल्प के अलावा भाषा का भी बहुत महत्त्व है। भाषा का मूल प्रयोजन सम्प्रेषण है इसलिए विभिन्न भावों एवं स्थितियों का रूपांकन इसी के द्वारा होता है। इसकी सूक्ष्म पहचान ही नहीं, बल्कि गहरी समझ भी आत्मकथाकार में होनी चाहिए। हरिवंशराय जी को भी इस बात का बोध है। वस्तुतः उनकी आत्मकथा की भाषा अत्यंत सशक्त, आकर्षक, विषयानुरूप, प्रभावशाली एवं सटीक है जो पाठकों को प्रभावित किये बिना नहीं रहती।

बच्चन जी का मानना है कि “भाषा ऐसा बैल है जिस पर जितना बोझ लादा जाए, उतना ही मजबूत बनता है।”13 इसी बात को आत्मसात करते हुए उन्होंने भावाभिव्यक्ति अनुरूप शब्दों का चयन किया है। संस्कृत की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार है-महाजनो येन गतः सपंथः, ऊध्र्वमूलमधः शाखम्, भारतमद्भुतम्, काव्यशास्त्र विनोदेन कालो गच्छति धीमताम्, स्वांतः सुखाय, स्वांतस्तमः शांतयेः, एकाक्षर प्रदातांर योन गुरुमभि मन्यतेः, नान्यः पन्था विद्यते अयनाय इत्यादि।14

हरिवंश जी की भाषा समयानुसार है। तत्कालीन समाज में अधिकांश व्यक्ति अंग्रेजी सिर्फ पढ़-लिख ही नहीं रहे थे, बल्कि इसका बातचीत में भी अत्यधिक प्रयोग कर रहे थे। खुद बच्चन जी अंग्रेजी के विद्वान है। साथ ही इस आत्मकथा में कई पात्र विदेशी भी है। इसी वजह से उनकी आत्मकथा में अनेक अंग्रेजी शब्दों-युनिवर्सिटी, वाटरप्रूफ, पाॅकिट, कोन्वोकेशन, कैम्पस, कोन्वोकेशन एडेªस, ऐनुअल डिनर, स्पोटर््स, इनविजिलेशन, पार्लियामेण्ट हाउस, लाउड स्पीकर, कोच, कार्निवल, पब्स, सोशल फ्रेंडशिप, रिमार्क15 एवं अंग्रेजी वाक्यों-ूपमि ींे तनपदमक उम (बीवी ने मुझे बर्बाद कर दिया), ज्व् लवनत ेनबबमेे पद लवनत तमेमंतबी ूवता (आपके शोध कार्य में सफलता के लिए हमारी शुभकामनाएँ), ल्वन ंतम वनत हनमेजण् ॅम ंतम ीवदवतमक इल लवनत अपेपजए दव बींतहमे (आप हमारे अतिथि है; हम आपके पधारने से गौरवान्वित हुए, आपको कुछ देना नहीं है), प् ादमू लवन ूवनसक सपाम जव ींअम ं सववा ंज लवनत बवससमहम इमवितम समंअपदह ब्ंउइतपकहम (मुझे मालूम था कि केम्ब्रिज छोड़ने से पहले तुम अपने काॅलेज को एक नजर देखना चाहोगे), ल्वन ूपसस इम तमबमपअमक वद इमींस िव िजीम हवअमतदउमदज व िपदकपं (बन्दरगाह पर भारत सरकार की ओर से आपका स्वागत किया जायेगा)16 का उपयोग हुआ है। लेखक ने पाठकों की सुविधा के लिए अंग्रेजी वाक्यों का साथ-ही-साथ, हिन्दी में अनुवाद भी दे दिया है।
हरिवंशराय ने संस्कृत और अंग्रेजी शब्दों के साथ ही उर्दू शब्दों का भी बेधड़क उपयोग किया है। जैसे-खादिम, तहजीब, तमद्दुन, तालीम, मुतकल्लिम (बोलते हुए), बवक्ते-रुखसत, मुलाहजे, वायदा (मौखिक परीक्षा), आमद-रफ्त, तसदीक17 आदि।
आत्मकथा होने की वजह से ‘बसेरे से दूर‘ में संवादों की संख्या अत्यंत कम है। उदाहरणस्वरूप हम एक वार्तालाप लेखक और नलिन विलोचन शर्मा का ले सकते हैं जिसमें लेखक की काव्य-लेखन शैली पर चर्चा हो रही है-
“मैंने कहा, ‘शर्माजी, न मैं छायावाद से बंधा हूँ, न ईट्स से, न कविता से, मैं तो अपने से बंधा हूँ‘।
शर्माजी बोले, ‘पूरे नहीं, आप अपने से उतना ही बंधते हैं जितने में आप देखते हैं कि आप दूसरों से टूटते नहीं। आप अपने से ही बंधते तो बहुत बड़े कवि होते, भले ही इतने लोकप्रिय नहीं। आपका लोक-मोह आपको अपने से पूरी तरह प्रतिबद्ध होने नहीं देता’।
मैंने उत्तर दिया, ‘मैं तो नहीं समझता कि मेरा सर्जक मेरे अतिरिक्त किसी दूसरी ओर देखता है, मैं सच्चाई से कहता हूँ कि यह मेरे सर्जक की सीमा नहीं, हाँ, यह मेरे व्यक्तित्व की ही सीमा हो तो मैं नहीं कर सकता। मैं अपने को अद्वितीय, असाधारण नहीं समझ पाता‘।
शर्माजी के पास उत्तर मौजूद था, ‘कवि तो असाधारण होने से ही कवि होता है‘।
मैंने विनम्रतापूर्वक कहा, ‘यदि मैं साधारण होकर असाधारण होने का ‘पोज‘ बनाऊँ तो यह और बड़ा झूठ होगा, जो मेरे लिए और बड़ी सीमा बनेगी‘।”18
इसके अतिरिक्त कई बार अधूरे संवाद बहुत कुछ कह जाते हैं। यह न सिर्फ भाषा में चार-चाँद लगा देते हैं, बल्कि भावों को भी सरलता से अभिव्यक्त कर देते हैं। निम्न पुस्तक में जब लेखक अपना शोध कार्य पूरा कर स्वदेश लौट रहे होते हंै, तो वे अपने शोध-निर्देशक ‘हेन‘ से आखिरी बार मिलने जाते हैं। वे उपहारस्वरूप उनके लिए सफेद एवं लाल गुलाब ले जाते हैं-
“मैंने कहा, ‘प्राचीन भारत में जब शिष्य गुरु से विदा होने जाता था तो उसे दक्षिणा प्रदान करता था। वही परम्परा निभाने के रूप में मैं दो पुष्प-गुच्छ लाया हूँ, सफेद आपके लिए हैं, लाल श्रीमती हेन के लिए। इस समय और कुछ के लिए मेरी असमर्थता तो आप………‘।”19
बच्चन जी का यह अधूरा वाक्य उनकी आर्थिक विपन्नता को उद्भाषित कर रहा है।
हरिवंशराय मूलतः एक कवि है। उन्होंने कहा है कि “जैसे मेरी कविता आत्मकथा-संस्कारी है, वैसे ही मेरी आत्मकथा कविता-संस्कारी है।”20 यह कथन उनकी आत्मकथा पर पूर्णतः सार्थक सिद्ध होता है। उनकी आत्मकथा में हमें जगह-जगह कविताएँ, उनके द्वारा अनुदित ईट्स की कविताएँ एवं उमर खयाम की रुबाइयाँ, रहिमदास, तुलसीदास एवं मलूकदास के दोहे और फिराक के शेर पढ़ने को मिलते हैं। इससे उनकी आत्मकथा और अधिक सजीव एवं प्राणवान हो गयी है। उनकी अपने-आप पर लिखी एक पैरोडी द्रष्टव्य है-

“मैं हूँ बच्चनजी मस्ताना,
लिखता हूँ मस्ती का गाना,
मैंने खोली है मधुशाला,
जिसमें रहती है मधुबाला,
जिसके हाथों में घट-प्याला,
मुझको निशा-निमन्त्रण आया,
मैंने गीत अकेले गाया………
सुनकर सबका दिल घबराया…….
मुझ पर क्या रंगीनी छाई,
मैंने सतरंगिनी सजाई……..
मैं हूँ बच्चनजी मस्ताना।”21

लेखक ने भाषा की सौन्दर्य वृद्धि के लिए कई प्रचलित मुहावरों और कहावतों या लोकोक्तियों का प्रयोग किया है जिसमें कई स्थानीय, अंग्रेजी एवं पंजाबी कहावतें भी सम्मिलित हो गयी है। यथा-आ बैल मुझे मार, ऊँट के मुँह में जीरा, खूँटे के बल बछड़ा कूदता है, पानी पीजे छान गुरु कीजे पहचान, फस्र्ट थिंग्स फस्र्ट, घर और कबर अकेली ही भली, अंधे से कुछ काम कराना तो उसे घर छोड़ने जाना22 आदि। वस्तुतः बच्चन जी का अपनी भाषा पर पूर्ण अधिकार है।

अंत में इस पूरे लेख का निष्कर्ष यह है कि हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा का यह खंड ‘बसेरे से दूर‘ उनके जीवन-संघर्ष के एक दौर को उद्घाटित करता है। उनके अध्यापक एवं शोधक रूप का जो दर्शन इस खंड में हुआ है, वह पाठकों के सक्षम उन्हें अविस्मरणीय रूप में प्रस्तुत करता है। इसमें उनके शिल्प एवं भाषा ने भी यथोचित् सहयोग प्रदान किया है, जिससे उनके विजन, शिल्प और भाषा में एक गहरा सम्बन्ध स्थापित हो गया है। कह सकते हैं कि “बसेरे से दूर के अनुशीलन से जहाँ व्यक्ति बच्चन का आत्म-साक्षात्कार होता है, वहीं बच्चन की अनुभूतियों की सूक्ष्म-तरल परत-दर-परतों की बारिकी से परख संभव हो पायी है।”23

संदर्भ-सूची:-

1. प्रसाद कालिका, सहाय राजवल्लभ, श्रीवास्तव मुकुन्दीलाल (सम्पादक), बृहत् हिन्दी कोश, ज्ञानमंडल लिमिटेड वाराणसी, सप्तम् संस्करण, पुनर्मुद्रण जुलाई 2013, पृष्ठ-123
2. टंडन बिशन, हरिवंश राय बच्चन, साहित्य अकादेमी नई दिल्ली, पुनर्मुद्रण 2012, पृष्ठ-179
3. बच्चन हरिवंशराय, बसेरे से दूर, राजपाल एण्ड सन्ज दिल्ली, संस्करण 2008, पृष्ठ-17
4. वही, पृष्ठ-24
5. वही, पृष्ठ-171
6. ढींगरा रुचिरा, गद्यकार बच्चन, वंदना बुक एजेंसी दिल्ली, प्रथम संस्करण 2004, पृष्ठ-54
7. बच्चन हरिवंशराय, बसेरे से दूर, राजपाल एण्ड सन्ज दिल्ली, संस्करण 2008, पृष्ठ-13
8. वही, पृष्ठ-11
9. वही, पृष्ठ-49
10. वही, पृष्ठ-12
11. वही, पृष्ठ-45
12. वही, पृष्ठ-96
13. ढींगरा रुचिरा, गद्यकार बच्चन, वंदना बुक एजेंसी दिल्ली, प्रथम संस्करण 2004, पृष्ठ-54
14. बच्चन हरिवंशराय, बसेरे से दूर, राजपाल एण्ड सन्ज दिल्ली, संस्करण 2008, पृष्ठ-36, 59, 65, 76, 78, 93, 97
15. वही, पृष्ठ-21, 31, 32, 33, 41, 48, 52, 95, 203
16. वही, पृष्ठ-56, 123, 149, 155
17. वही, पृष्ठ-20, 40, 44, 63, 74, 79
18. वही, पृष्ठ-199
19. वही, पृष्ठ-145
20. वही, पृष्ठ-7
21. वही, पृष्ठ-159
22. वही, पृष्ठ-76, 163, 195, 64, 37, 166, 178
23. घोष डाॅ. श्यामसुन्दर, बच्चन: एक अभिनव मूल्यांकन, यश पब्लिकेशन्स मुम्बई, प्रथम संस्करण 2003, पृष्ठ-45

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    By: नितिका गुप्ता

    जन्म – 1986, दिल्ली में ।
    शिक्षा – एम.ए., बी.एड., अनुवाद में स्नातकोत्तर डिप्लोमा, नेट, वर्तमान में अम्बेडकर
    विश्वविद्यालय दिल्ली में पीएच.डी. (हिन्दी) शोधार्थी।
    प्रकाशित कार्य – विभिन्न पत्रिकाओं एवं पुस्तकों में शोधालेख प्रकाशित, जैसे-समसामयिक
    सृजन, स्त्रीकाल, अनन्या, सामाजिक न्याय संदेश, संवेद आदि।
    ईमेल- nitika.gup85@gmail.com

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