कविता प्रेम है, प्रकृति है, सौन्दर्य है और सबसे ऊपर एक माध्यम है खुद के प्रतीक बिम्बों में समाज के धूसर यथार्थ को उकेरने का | जैसे खुद से बतियाते हुए मानस को सुनाना या मानस से बतियाते हुए खुद को सुनाना | कुछ ऐसे ही अनेक अंतर्द्वंदों से जूझते समाज में खुद को स्पेस खोजतीं ‘अंकिता पंवार’ की कुछ कविताएँ …… संपादक 

बस मैं हूं घूमती हुई पृथ्वी पर बिल्कुल अकेलीankita

हर रोज उठाती हूं रजाई का खोल
ताकती रह जाती हूं तुम्हें
एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक
कहीं कुछ भी तो नहीं है
एक दो तीन चार छवियां गडमडाती हुई
एक हो जाती हैं
मैं जानती हूं आफिस जाने और आफिस से आने के बीच का
एक लंबा समय अजीब होता है
एक लंबा पहाडी रास्ता कर रहा होता है
इंतजार
एक खुला आसमान और चांद
कर देते हैं और उदास
पता है पराल का पेड़ों और खेतों पर पड़े रहना
बुलाता है असूज के महीने
पर अब तो हर दिन लगने लगता है कि
असूज है कि नहीं
जब भी देखती हूं हथेलियां
खिजाने लगती है इनकी कोमलता
ताकती हूं क्या अब भी पड़े हैं छाले पांवों के तलवों में
ठीक असूज के महीने के मंडाई के वक्त का खाना याद आता है
चाचियों की के साथ खेंत की मेड़ पर
और आज बंद आफिस के एक कौंटीन में
तोड़ रहीं हूं रोटी के कौर
क्या सच में कुछ भी नहीं लौट सकता
झाडियों में घुसकर खाना
हिसर किनगोड़ खाना, बमोरों के लिए ताकना
डांडों से आई मां के पल्लू को,
कुछ ही दूरी पर तो है मिट्टी से भरे हुए खेत
और खेतों से गुजरता है एक बचपन
पसारती हूं हाथ
कहीं कुछ भी तो नहीं हैं
तुम भी नहीं
बस मैं हूं घूमती हुई पृथ्वी पर बिल्कुल अकेली

सौतेली मां

जितेन साहू

जितेन साहू

रात बिरात जब भी नींद खुलती है

मुझे याद आता है एक चेहरा
हारी हुई मां का
एक आवाज जो कहती रही हमेशा
रानी बिटिया ले जायेगी दूर कहीं घर से, पर कहां नहीं पता
उसने जाना है
एक मां, एक स्त्री हमेशा नहीं करती है प्रेम घर से
उसके लिये अक्सर निर्जन जंगल होते है अधिक सुरक्षित
जो मां पशु पक्षियों में भी ढ़ूंढ लेती है अपने साथी
उसके के लिये
छब्बीस साल पुराना वह खंडहर
आज भी जिंदा है
जिसमें वह आयी थी दुल्हन नहीं एक मां बनकर ध्एक सौतेली मां बनकर
अब भी डराता है उसे
प्रेत बनकर नहीं बल्कि एक इंसान बनकर
जो अक्सर घिरे रहे उसके चारों और
आज भी सिसक उठती हैं भूख और मार की कई दिन और रातें
उसकी अपनी वे रातें
जब पति के लिये उसी दिन से सौतेली ही हो गयी
जब वह आयी थी सौतेली मां बनकर
किस्सों कहानियों में बसने वाली सोतेली मां बनकर
और वह आज भी वह अभिशप्त है
सौतेली पत्नी, सौतेली बहू, सौतेली मां बनकर
अब थक हारकर
वह खोज रही है एक नया संसार

फ्यूंली

तेरे फूलने से कुछ पहले ही तो
तो आया था बसंत
और तूने इतनी जल्दी क्यों बिखेर दीं अपनी पत्तियां
जो वो बिखर गया तेरी हिम्मत को टूटते देख
तेरी उम्र इतनी छोटी क्यों है रे सखी
देखो ना वह लौट आया है
तुम्हारी खोज में
लोक कथाओं को झुठलाकर….|

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