निरंतर परिवर्तित होते समय और समाज के बीच बड़ी वर्गीय अवधारणायें जिनके तमाम मिथ और यथार्थ भी समय समय पर समाज के बीच स्पष्ट होते रहे हैं, बावजूद इसके क्या कारण हैं एक वर्ग विशेष के प्रति गढ़ित अवधारणाओं का किला अनेक सकारात्मक, सार्थक यथार्थ के बाद भी दिमागों से ढह नहीं पाया है | आज़ादी के इतने सालों के बाद भी हमारे समाज का एक अंश क्यों सहमा हुआ जीने को विवश है ….? एक सवाल के रूप में वर्तमान सामाजिक हालातों से जूझती , टकराती,  धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के सामने निरीह सी खड़ी ‘मज़कूर आलम’ की कहानी …|  – संपादक 

mazkoor

मजकूर आलम

बस, यहीं तक…

जब मैं मंडी हाऊस के कॉफी हाऊस से निकला था, तो काफी खुश था। मुझे अपने कंधे पर टंगे झोले का एहसास तक नहीं था। मैं हवा में उड़ता आईटीओ बस स्टॉप पर आ खड़ा हुआ था।
कॉफी हाऊस में कला पारखियों के एक दल ने मेरे कंधे पर टंगे टाट के झोले की तारीफ क्या की, शान में कसीदे ही काढ़ने शुरू कर दिये थे। जैसे वह झोला न होकर खूबसूरत आधुनिक पेंटिग्स का अद्भुत नमूना हो। उन्हें उस पर बनी मधुबनी पेंटिंग बहुत पसंद आयी थी।
कोई साढ़े छह बज चुके थे। शाम का धुंधलका पूरे वातावरण को बहुत तेजी से अपने आवरण में लपेटता जा रहा था। बत्तियों के रौशन होने से शहर में कृत्रिम चांदनी छिंटक आयी थी। तेज बहती हुई हवा भाले-बर्छियों की तरह बदन को छेदे जा रही थी, लेकिन मैं अपनी धुन में इतना मगन था कि मुझे इसका एहसास ही नहीं था।
दफ्तरों के बंद होने का संकेत बस स्टॉप की तरफ आती हुई भीड़ दे रही थी। लग रहा था कि पूरा शहर यहीं उमड़ा पड़ रहा हो। अलग-अलग रूटों की बसें लगातार आ-जा रही थी। लोग-बाग चढ़-उतर रहे थे, लेकिन भीड़ घटने की बजाय और… और होते अंधेरे की तरह बढ़ती ही जा रही थी।
मुझे वहां खड़े-खड़े लगभग एक घंटा होने को हो आए, लेकिन अब तक देवली-खानपुर जाने वाली किसी बस का पता नहीं था।
लोग बातें कर रहे थे। उनकी बातों में ताजगी थी। दिन भर के काम की थकन कहीं नहीं दिखती थी। अब घर पहुंच जायेंगे, सिर्फ इस सोच ने ही उनके अंदर ताजगी भर दी थी। हिमाचल में आज सुबह ही जमकर बर्फबारी हुई है। तभी तो इतनी ठंड बढ़ गयी है। नहीं तो, कल तक तो सबकुछ ढर्रे पर था। भीड़ में से किसी ने कहा- अरे यार इतनी तेज ठंड रही तो 26 जनवरी की सुबह तो घर से निकलना भी मुहाल हो जायेगा।
उसी में से किसी ने हांक लगायी- सरकारी नौकरी करनी है, न… दफ्तर तो आना ही पड़ेगा।
जैसे ही 26 जनवरी का जिक्र आया, मेरे शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गयी। ओह… शायद… फिर कई तरह की अनजान आशंकाओं ने मेरे उत्फुलित के मन के ऊपर अपना फन काढ़ लिया… और मैं अंदर तक सिहरता चला गया।
कुछ ही दिन पहले तो दिल्ली में आतंकी वारदात हुई थी। और मुझे याद है कि उसके बाद क्या-क्या हुआ था। मुझे अपने बेगुनाही के कितने सबूत देने पड़े थे। मेरे मकान मालिक ने एक बारगी तो मुझे ही घर खाली करने को कह दिया था। और जब मैंने अपने बॉस को ये बातें बतलायी थी तो… मुझे ठीक से याद है कि उन्होंने दिलासा दिलाने की बजाय मुझ ही से पूछ लिया था- तुम्हें नहीं लगता कि इन घटनाओं की वजह से पूरे देश में जबरदस्त अविश्वास का माहौल बनता जा रहा है। जब मैंने टटोलने वाली सर्द निगाहों से उनकी तरफ देखा तो जल्दी से उन्होंने बात को हल्का करने की गर्ज से कहा था- मुझे पता है, बहुत सारे निर्दाेष लोग इसमें पिस रहे हैं। उनकी इस बात ने तो मुझे अदंर तक छील कर रख दिया था। कई रात घूमते पंखे को देखते हुए गुजारी थी… एक बार फिर वही डर मेरे ऊपर तारी होने लगी थी।
अचानक मेरे ख्यालों को ब्रेक लगा। अच्छा ही हुआ कि तभी ब्लू लाइन की 423 नंबर की बस चर्रर्रर्र… की आवाज के साथ मेरे ख्यालों को चीरती हुई मेरे सामने खड़ी थी। मेरी आंखें चमक उठी। मैं नहीं समझ सका कि घंटे-पचपन मिनट की तपस्या के सफल होने की चमक थी या उस भयावह सोच से बाहर निकलने की, जिसे इन दिनों हर कदम पर भोग रहा था।
वैसे भी दिल्ली के परिवहन और मौसम का कोई भरोसा तो है नहीं, इसलिए बस आने की खुशी होनी स्वभाविक ही थी।
ठसाठस भरी बस। तिल रखने की भी जगह नहीं। खुदा-खुदा करते किसी तरह मैं उतरने के लिए इस्तेमाल में आने वाले आगे के दरवाजे से बस में दाखिल हुआ। अंदर आने के बाद स्वाभाविक रूप से पॉकेटों पर हाथ मारा- मोबाइल समेत सबकुछ सुरक्षित था। अभी राहत की सांस भी नहीं ले पाया था कि कंडक्टर की आवाज सुनाई पड़ी- टिकट, टिकट लेना भाई… आपने ले लिया…
मैं कुछ सोचता इससे पहले ही बस तेज धचक्के के साथ रुक गयी। किसी तरह भीड़ में से सिर निकालता, सशंकित निगाहों से आगे की तरफ निगाह मारी। सामने आईटीओ चौराहे पर तमतमाई सुर्ख चेेहरे की तरह रौशन बत्ती सख्ती से सभी गाडि़यों को रुकने का आदेश दे रही थी। मैंने चैन की सांस ली। बस के आगे-पीछे छोटी-बड़ी गाडि़यों की लंबी कतार लगी हुई थी।
उफ… कहां से आ जाती हैं दिल्ली में इतनी सारी गाडि़यां… पूरे शहर की गाड़ी आज यहीं आकर लग गयी है क्या? असहाय आम आदमी की तरह मैंने सोचना शुरू कर दिया था- सरकार कुछ करती क्यों नहीं? क्यों नहीं वह ऐसे लोगों पर गाडि़यां रखने से रोक लगाती है, जिनके घर में पार्किंग नहीं है। लावारिस की तरह घर के आगे गाडिय़ों को लगा कर पड़ोसियों का भी जीना हराम कर देते हैं। संकरी-पतली गलियों को भी जाम करने से नहीं चूकते। एक आदमी के पास क्यों दस-दस गाडि़यां है… फिर… फिर… फिर…
इस तरह के न जाने और कितने-कितने सवाल अभी मुझे परेशान करने वाले थे, पता नहीं, कि तभी कंडक्टर की आवाज फिर गूंजी- टिकट… मैंने खामोशी से एक दस का नोट उसकी तरफ बढ़ा दिया- देवली मोड़।
बस आगे बढ़ी। हरियराये चेहरे की तरह जलती बत्ती ने आगे बढ़ने की इजाजत दे दी थी। चौराहे पर से भी कुछ और सवारियां बस में उठी थीं। उनमें कुछ महिला सवारियां भी थी। उनके आ जाने से कुछ पुरुषों को महिला आरक्षित सीटें छोड़नी पड़ी थी, हालांकि उसके बाद भी वहां से चढ़ी अधिकतर महिलाओं को खड़ी ही रह जाना पड़ा था, क्योंकि चढ़ी सवारियों के अनुपात में आरक्षित सीट नहीं थी। कुछ पर पहले से ही महिलाएं बैठी थीं। बहुत कम पर ही पुरुषों का कब्जा था। उन्हें जगह खाली करनी पड़ी थी।
भीड़ बढ़ जाने से बस का तापमान भी बढ़ गया था। ठंड का एहसास जाता रहा था।
महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें खाली करने वालों में से कुछ लोग कुनमुना रहे थे। एक नेता टाइप कुर्ता-पायजामा, दाढ़ी वाले बुजुर्ग ने तो अनमने ढंग से सीट छोड़ते हुए अनिच्छा भी जाहिर कर दी थी- सबको बराबरी चाहिए और आरक्षण भी… ये कहां का न्याय है… कौन सी सोशल इंजीनियरिंग है… दलित और आदिवासियों की बात तो बात छोडि़ए जनाब… अब तो बौद्ध, सिख, मुस्लिम, ईसाई समेत इन महिलाओं ने भी आरक्षण का झंडा उठा लिया है… और इन्हें बराबरी भी चाहिए… कलयुग है! घोर कलयुग है! अरे बराबरी के लिए जरूरी है कि समान आचार संहिता बने, लेकिन जब आचार संहिता की बात उठती है, तो सब अपनी-अपनी ढफली, अपना-अपना राग लेकर बैठ जाते हैं… ये कैसी बराबरी भाई… आरक्षण भी और बराबरी का हक भी… वाह! वाह! इसे कहते हैं चित्त भी मेरी, पट भी मेरी।
कुछ ही देर पहले विकलांगों के लिए आरक्षित सीट पर जा धंसा नीली जींस वाला लगभग 30 के पेटे के एक युवक ने बिना किसी की तरफ निगाह उठाये ज्ञान की गगरी उड़ेली- शराफत से तो लोग रहें उन्हें बराबरी का दर्जा देने से, इसीलिए तो उन्हें कानूनन सुविधा दी जा रही है। अगर सामाजिक स्तर पर ये क्रांति हो ही जाती… धर्म, जाति और औरत-मर्द के नाम पर गैरबराबरी खत्म हो जाती, तो इसकी जरूरत ही नहीं पड़ती… छोटी सी बस में सिर्फ कुछ सीट आरक्षित होने पर ही जब मिर्ची लग रही है, तो भला क्या ऐसे में ये उम्मीद की जा सकती है कि इस देश में वंचित और कमजोर तबकों को न्याय मिलेगा। ये कहते हुए वह अपने बगल में बैठे 20-21 साल के युवक की ओर मुड़ गया, जो कोई नृप होय, हमें का हानि वाले अंदाज में कान में ईयरफोन लगाए एफएम पर कोई गाना सुन रहा था और मस्ती में हौले-हौले गरदन हिला रहा था।
उसने अपनी तरफ ताकते हुए उन महोदय को देखा तो जल्दी-जल्दी सिर हिलाकर कहा- हां… हां… रेडियो मिर्ची ही है… उसे लगा था शायद उससे ये पूछा जा रहा है कि कौन से एफएम से इतना बढिय़ा गाना आ रहा है।
सच ही तो है, इस देश का अधिकतर आदमी ऐसा ही तो है, जिसने अपने कानों में अपने-अपने पसंद का एफएम लगा रखा है, जो हमेशा नीरो की बंशी की तरह बजता रहता है। चाहे किसी को मिर्ची लगे।
इस अटपटे जवाब को सुनकर अगल-बगल वाले लोगों के चेहरे पर मुस्कुराहट की हल्की सी रेखा खींच गयी थी, जो ठसाठस भरी भीड़ में शरीर को टेढ़ा-मेढ़ा किये किसी तरह सफर किये जा रहे थे। थोड़ी देर के लिए ही सही, लेकिन वह अपनी परेशानी भूल गये थे, ठीक वैसे ही जैसे तमाम तरह की समस्याओं से जूझती जनता सरकार के किसी लॉलीपाप टाइप घोषणा से खुश हो जाती है। समर्थन की उम्मीद में उसकी तरफ देखने वाला नीली जींस वाला युवक झेंप गया था, जबकि कुर्ता-पायजामा, दाढ़ी वाले बुजुर्ग आग्नेय नेत्रों से नीली जींस वाले को घूरने लगे थे। मुझे उस युवक की बातों से बड़ी राहत पहुंची थी। मैं भी उस बातचीत में साझीदार हो गया- लोग समझते नहीं इस बात को कि देश में ज्यादातर समस्याओं की वजह ये गैर-बराबरी ही है… इसी वजह से लोगों में असुरक्षा बोध फैला हुआ है… और उसी का फायदा असामाजिक लोग उठा रहे हैं। इस पर तपाक से कुर्ता-पायजामा वाले बुजुर्ग बोल उठे- हां… हां… क्यों नहीं, क्यों नहीं। तुम जैसे क्रांतिकारियों की वजह से ही तो इस देश का सर्वनाश हो रहा है… महिलाओं को सिर पर चढ़ा दिया है… मानवाधिकार का झंडा लेकर वह सडक़ों पर नंगी खड़ी हो गयी हैं… मणिपुर में क्या हुआ देखा नहीं। आदिवासियों को सर पर चढ़ा दिया, दिकू-दिकू बोलकर और थोड़ी दारू चढ़ा कर शरीफों को घर से खींच-खींच कर मारना शुरू कर दिया… दलितों की मनमानी नहीं दिखती क्या, जरा-सा कुछ हुआ नहीं कि दलित एक्ट में फंसा दिया… मंडल ने कितनों की जान ली ये तो याद होगा ही… और हां, इन मुसलमानों को इस देश में क्या कमी है… क्यों पूरे देश में मार-काट मचा रखा है… इन्हें क्या कमी है, जो पूरे देश का सर्वनाश करने पर तुले हैं… ये सब आजादी के नाम पर हो रहा है… कर दो इन सबके लिए इस देश के टुकड़े-टुकड़े एक बार फिर… एक टुकड़े से तो मन भरा नहीं… जिन्हें-जिन्हें इस देश में अपने साथ अन्याय होता नजर आ रहा है, क्यों नहीं चले गये उसी वक्त अपने देश के साथ। लेकिन नहीं, चले जाते तो यहां बखरा-झंझट कौन लगाता… सो रह गये।
नीली जींस वाले ने कुछ कमजोर आवाज में आपत्ति जताई, जो बस की शोर में गुम हो गयी। मैंने भी चुप रहना ही बेहतर समझा, क्योंकि होश संभालने के बाद से ही ऐसे मुद्दों पर जब-जब कुछ कहा- उसका फल मैं भोगता रहा हूं। मेरे दोस्त तो आज भी जब अपने गांव मुझे ले जाते हैं, तो मेरा नाम बदल देते हैं- मैं मिश्रा, सक्सेना, तिवारी, त्रिपाठी हो जाता रहा हूं।
बस चिडिय़ाघर आ पहुंची थी, पूरी तरह ठसाठस भरी बस। खड़े-खड़े मेरी कमर दुखने लगी थी। मन में खिन्नता घर करती जा रही थी। यहां भी कुछ लोग उतरे थे, लेकिन पिछली बस स्टॉप की ही तरह यहां भी उतरने वाले से ज्यादा चढ़ने वाले थे। कुर्ता-पायजामा वाले बुजुर्ग ने सीट की आस में एक बार फिर चारों तरफ नजर दौड़ाई, लेकिन इस बार भी उन्हें कामयाबी हाथ नहीं लगी।
ये दिल्ली की ब्लू लाइन बसें भी कमाल की हैं। बाहर से देखने में चाहे जितनी भी भरी लगें, लेकिन दोजख की पेट की तरह कभी भरती नहीं। स्टॉप पर खड़ी कोई भी सवारी छूटती नहीं। सब उसमें समा जाती है। चिडि़याघर से चढ़ने वालों में एक नकाबनपोष औरत भी थी, जिसका पेट काफी फूला हुआ था। इस वजह से वह संतुलन बना कर चल नहीं पा रही थी। संभल-संभल कर उसे डग बढ़ाना पड़ रहा था।
बस चल दी थी। उस नकाबनपोष औरत को फूले पेट की वजह से चलती बस में पांव जमाने में काफी परेशानी हो रही थी। वह बार-बार भहरा जा रही थी। वह ठीक मेरे पीछे आ खड़ी हुई थी। उसे थोड़ी जगह मुहैया कराने के गर्ज से मैं, विकलांग आरक्षित सीट, जिस पर नीली जींस वाले महोदय कब्जा जमाए थे, के थोड़ा और करीब सरक गया था। दाढ़ी वाले बुजुर्ग कंडक्टर की सीट की तरफ जा दुबके थे। उस नकाबनपोष औरत को ज्यादा परेशानी न हो, इसलिए खुद को मैं बार-बार आगे की तरफ सरकाता जा रहा था। मेरे पीछे खड़ी वह बार-बार अगल-बगल के लोगों से टकरा जा रही थी, मुझसे भी। वह इतनी लंबी भी नहीं थी कि आसानी से उसके हाथ बस के छत से लगी रॉड आ जाए, इसलिए बस के हर धचक्के के साथ वह भरभरा कर किसी न किसी से जा टकराती थी। वैसे हम सब भी कम परेशानी में नहीं थे, लेकिन पता नहीं क्यों मुझे बार-बार ये लग रहा था कि वह कुछ ज्यादा परेशानी में है, लेकिन जब भी मुड़कर उसकी तरफ देखता तो उसके चेहरे की नकाब कोई निश्चित राय कायम करने में मेरे आड़े आ जाती। इस अंतर्द्वंद्व की वजह से मैं बार-बार खुद को और… और… और आगे की ओर सरकाता जा रहा था। वैसे तो मेरे लिए विकलांग आरक्षित सीट पर बैठे उस नीली जींस वाले की घूरती निगाहों का सामना करना भी इतना आसान नहीं था, जिससे कि मैं खुद को आगे सरकाने के फेर में बार-बार टकरा जा रहा था।
बस लगभग हर रेड लाइट पर रुकती तय रोड पर आगे बढ़ी चली जा रही थी। लगभग हर स्टॉप पर लोग उतर-चढ़ रहे थे, लेकिन भीड़ थी कि कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी। भीड़ की वजह से बस में घुटन होने लगी थी। मेरी सोच का रुख पूरी तरह से आतंकवाद की तरफ मुड़ गया था।
क्या लिट्टे वाले हिंदू नहीं हैं, कि उल्फा में हिंदू नहीं है… क्या 84 में इंदिरा गांधी को सिखों ने मारा था या आतंकवादियों ने… फिर इस देश के सारे सिखों का क्या कसूर था… क्या उन्हें मारने वाले आतंकवादी नहीं थे… गुजरात में मुसलमानों को मारने वाले आतंकवादी नहीं थे, कितना अच्छा तर्क गढ़ रखा है उनलोगों ने, ये देशद्रोही नहीं हैं… जनभावना का ज्वार है… प्रतिक्रिया है… उनके साथ अन्याय हुआ है और वो उसके खिलाफ खड़े हुए, लेकिन मुझे हर जगह एक ही बात दिख रही थी। हर जगह जुल्म के शिकार अल्पसंख्यक और कमजोर हुए। चाहे धर्म के नाम पर ये खेल हुआ, चाहे जाति के नाम पर।
मैं थक कर चूर-चूर हो चुका था। खड़ा रहने की हिम्मत नहीं बची थी। खड़े-खड़े दोनों पैर टटाने लगे थे, जिस वजह से खड़ा रह पाना भी मुश्किल होने लगा था। मेरे पांव थरथराने लगे थे।
जोरदार ब्रेक के साथ घंटे का सफर पौने दो घंटे में तय करती बस तारा अपार्टमेंट के स्टॉप से आ लगी थी। बस के सामने से रोड क्रॉस करते एक बच्चे को बचाने मेें बस को इतनी कवायद करनी पड़ी थी। मेरे पीछे खड़ी वह नकाबनपोश औरत बहुत जोर से मेरे से आ टकरायी थी। शायद उसका पेट मेरे से टकराया था। मुझे लगा कि उसके हलक से घुटी-सी चीख निकली… हाय रब्बाऽ…ऽ. लेकिन बस की भीड़ और भीड़ की कोलाहल में ये आवाज उसी की है, मैं तय नहीं कर पाया।
तारा अपार्टमेंट पर उतरने के लिए लोग धड़-फड़ी मचाए थे। यहां उतरने वालों की संख्या ज्यादा थी। इस धड़-फड़ी में लोग एक दूसरे को धंसोड़ते हुए निकले जा रहे थे और बुजुर्गवार आप-पास की सीटों की तरफ नजरें गड़ाए थे। इस क्रम में वह नकाबनपोष पूरी तरह दब ही गयी थी। वह मेरे ऊपर आ गिरी थी। मैंने उसकी तरफ देखा तो उसके चेहरे पर चढ़े नकाब का रंग मुझे ज्यादा चमकीला लगा, जैसा अक्सर भीगने पर होता है।
मैं भी खुद को संभाल नहीं पाया था और नीली जींस वाले युवक से जा टकराया था। इस बार उसे जरा जोर की टक्कर लगी थी, क्योंकि वह औरत अभी तक मुझ पर भहरायी हुई थी। मैंने जल्दी ही खुद को संभाल लिया था।
तारा अपार्टमेंट से बस खुली तो मुझे बहुत तसल्ली मिली। चलो और 10-15 मिनट… इसके बाद आने वाला चौथा स्टॉप मेरा था और अगला स्टॉप संगम विहार का। मुझे पता था कि रोज की तरह आधी से ज्यादा सवारियां आज भी संगम विहार में उतर जायेंगी यानी कि सीट मिले या न मिले कमर सीधी करने की सूरतेहाल तो हर-हाल में बन आयेगी। इसकी शुरुआत तारा अपार्टमेंट से ही हो चुकी थी। चढ़ने वालों से ज्यादा लोग यहां उतरे थे। दाढ़ी वाले बुजुर्ग फोन से उलझे थे। किसी को समझा रहे थे- कितनी बार मैंने तुम्हें समझाया है कि ऐसे काम नहीं चलेगा… हक के लिए लड़ना सीखो… उसके बाद तो मैं हूं ही।
नीली जींस वाला जिससे मैं जा टकराया था, वह मुझे धकिया कर थोड़ा और पसर गया था, फिर मुझे घूरता हुआ शब्द चबाता हुआ बोला- रीढ़विहीन है क्या रे तू?
मैंने नरमी से जवाब दिया- माफ कीजिएगा।
नकाबनपोष औरत की तरफ इशारा करता हुआ बोला- मुझ पर भहरा गयी थीं… इस वजह से टकरा गया… इनकी हालत तो आप देख ही रहे हैं… फिर भी अनजाने में हुई गुस्ताखी के लिए माफी चाहता हूं।
मेरी मुलायमियत की वजह से कि उस नकाबनपोष औरत की हालत की वजह से पता नहीं, लेकिन इतना जरूर हुआ कि उस नीली जींस वाले का गुस्सा काफूर हो गया और पसरे-पसरे ही कहा- कोई बात नहीं, कोई बात नहीं… बातों का सिलसिला जारी रखते हुए वह नरमी से बोला- इस भीड़ में भी आप लोगों का इतना ख्याल रखते हैं, ये देखना सुखद लगा, इसीलिए तो आज भी भारत की पहचान एक सहिष्णु देश के रूप में बनी हुई है… दूसरे देशों को देखिए अपनी कट्टरता आ सनक का शिकार पूरी दुनिया को बना लेते हैं… ट्विन टॉवर को उड़ाने का मामला छोड़ भी दीजिए तो मुंबई का तो ताजा उदाहरण हमारे सामने हैं, है कि नहीं- अपनी आदतानुसार उसने एक बार फिर मुझसे हामी भरवानी चाही।
ऐसा नहीं है भाई… दुनिया इतनी भी खराब नहीं… मुझे तो हर कदम पर अच्छे लोग मिल जाते हैं- बस में… ट्रेन में… हर जगह… जैसे इसी को लीजिए न, मैं इतनी जोर से आपसे टकराया और आप हैं कि गुस्सा करने की बजाय मेरी तारीफ कर रहे हैं… सच में तो इस तारीफ के हकदार आप हैं… कहना तो और भी मैं बहुत कुछ चाहता था… गांधी और बुद्ध के इस अहिंसा! के देश के बारे में। यहां की सहिष्णुता के बारे में। लेकिन मैं चुप ही रहा। एक बार फिर मेरा डर मेरे ऊपर हॉवी हो गया था, क्योंकि मुझे पता था कि उसके बाद क्या होगा…
मेरी यह बात सुनकर उसका चेहरा हजार वॉट के बल्ब जितना रौशन हो गया- ठीक है, लेकिन…
अभी वह कुछ कहता कि इसके पहले दाढ़ी वाले बुजुर्ग की तेज आवाज सुनकर हम सबका ध्यान उनकी ओर आकर्षित हो गया था। वह कंडक्टर पर बरस रहे थे।
मामला यूं था कि तारा अपार्टमेंट से चढ़ने वालों में एक अधेड़ आदमी भी था, जिसके हाथ में छड़ी और आंख पर काला चश्मा था। कंडक्टर ने उसे देखते ही अपनी बगल वाली सीट पर बैठी सवारी को खड़ा करा कर उन्हें अपनी बगल में बिठा लिया। सीट पर बैठने से पहले वह आदमी फोल्डिंग छड़ी मोड़ चुका था और आंखों पर से चश्मा उतार कर पॉकेट के हवाले कर चुका था।
उधर फोन से फारिग होने के बाद आईटीओ चौराहे के पास सीट से उठा दिये जाने के बाद से ही उनका जमा गुस्सा लावा बनकर फूट पड़ा था- वह कंडक्टर पर बरस पड़े- बिफर कर कहा- कैसे बिठा दिया इसे। मैं घंटे-डेढ़ घंटे से यहां खड़ा क्या झक मार रहा हूं?
कंडक्टर जो अब तक की पूरी यात्रा में सिर्फ घटनाओं का साक्षी बना पड़ा था। इससे पहले उसकी आवाज जब भी बस में गूंजी थी तो सिर्फ टिकट के लिए। इस बार ताव खा बैठा- चचाऽऽ जी ये हैंडिकैप्ड हयंऽ। नजर नहीं आता क्या?
कंडक्टर के इस तीखे बाण के लिए बुजुर्गवार तैयार नहीं थे। कुछ देर तो वह सकते में रहे। कुछ सूझा नहीं तो हकलाते हुए बोले- अच्छा-अच्छा त… त… तो ये विकलांग हैं… फिर खुद को संयत कर थोड़ी ऊंची आवाज में बोले- अगर ये हैंडिकैप्ड हैं, तो यहां क्या कर रहे हैं… इन्हें विकलांग आरक्षित सीट पर बैठना चाहिए… इन्हें विकलांगों की आरक्षित सीट पर बैठाओ… चलिए… चलिए… आप उठिए यहां से… उठिए… उठिए…
विकलांग की सीट पर बैठा नीली जींस वाला आदमी मौके की नजाकत को खूब समझता था। वह सहज बोल उठा- अरे क्या कर रहे हैं भाई साहब… उन्हें क्यों परेशान करते हैं… उन्हें बैठे रहने दीजिए… किसे बैठना है यहां विकलांगऽऽ वालीऽऽ सीट पर, वह विकलांग वाली सीट को रबर की तरह खींचता हुआ बोला- आइए मैं उठ जाता हूं… इस भीड़ भरी बस में सीट के लिए कहां-कहां धक्का खाते फिरेंगे वे!
यह बात सुनकर चश्मा-छड़ी वाले महोदय को संबल मिल गया था और उन्होंने कोसना शुरू कर दिया- अब तो आदमियत नाम की जरा-सी भी कोई चीज बची ही नहीं… लोग यह भी नहीं सोचते कि इस भीड़ भरी बस में मैं भला अंधा कहां-कहां मारा फिरुंगा…
इधर बोलते-बोलते उसी झोंक में अपनी सीट पर पसरा नीली जींस वाला युवक उठ गया था। दाढ़ी वाले बुजुर्ग उस सीट से काफी आगे थे। मैं थोड़ा-सा टेढ़ा हुआ तो वह फूले पेट वाली नकाबनपोष औरत धम्म… से उस सीट पर जा बैठी। पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगा कि वह बैठी नहीं खुद-ब-खुद उस सीट पर जा गिरी है, अगर थोड़ी देर और खड़ी रहती तो जहां थी, वहीं गश खाकर गिर गयी होती। मैंने फिर टटोलने वाली निगाहों से उसकी तरफ देखा, लेकिन उसके नकाब को पार न पा सकीं मेरी निगाहें. मैं अनिर्णय की स्थिति में अपनी जगह खड़ा रहा।
बस को दो मिनट भी नहीं लगे होंगे संगम बिहार पहुंचने में। नीली जींस वाले के साथ संगम बिहार में आधी से ज्यादा भीड़ उतरने की आपाधापी मचाए थी।
थोड़ी देर में सवारियों को उतार कर बस चली तो मैंने बड़ी सुकून महसूस की। मुझे कमर सीधी करने की जगह मिल गयी थी। दाढ़ी वाले बुजुर्ग को ड्राइवर की तरफ वाली अगली सीट मिल गयी थी। पहले से बैठे एक आदमी के साथ उन्होंने सीट शेयर कर ली थी। उन्हें अब जाकर इस बात का एहसास हुआ था कि मैं भी परेशानी में हूं। उन्होंने मेरी तरफ बड़ी आत्मीयता से देख कर कहा- आओ बेटा तुम भी इसी पर बैठ जाओ। हम दोनों थोड़ी-थोड़ी में बैठ जायेंगे!
जी! शुक्रिया!
अरे! आ भी जाओ… उन्होंने आग्रह किया। वैसे जाना कहां है?
जी बस दो स्टॉप और देवली मोड़ तक।
अच्छा! अच्छा! क्या नाम है तुम्हारा?
जी, हुसैन! हुसैन अली।
मुसलमान हो? बुजुर्ग ने अचानक चौंककर मेरी ओर देखा।
मुझे यकायक लगा यात्रा अब समाप्त हुई है मेरी। इस यात्रा में था ही क्या? एक आदमियों से भरी हुई बस। गर्मी, गर्मी से पैदा हुई राजनीति। उसके बीच मेरा मुसलमान होना। लगा बस में बैठे आदमियों की आंखें यकायक मेरी पीठ पर चुभने लगी है… तो मुसलमान हो तुम? शायद इस एक वाक्य में ओसामा से तालिबान तक कितना कुछ घूम गया होगा। या फिर देश में होने वाला चुनाव, जिसका ऊंट करवट लेते-लेते यकायक मुस्लिम वोटों की ओर मुड़ जाता था। लगा, जैसे भीतर तक सरसराहटें हों। अनगिनत लाल च्यूंटियां… जो मेरे ‘उधेड़े’ मांस से होकर गुजर रही थीं…
कहां जाना है… कंडक्टर पूछ रहा था।
बस यहीं तक… कहते हुए शून्यविहीन था। सडक पर पांव धरते हुए जैसे एक निःशब्द सन्नाटा मुझे भीतर तक लील गया था…
न जाने क्यों?

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