“देर रात एक नाव आती। नाव पर हथियार लिये कुछ लोग सवार रहते। बांध के चारो ओर नाव घूमती और जैसे ही कोई लड़की नजर आती हथियारबंद लोग उसे खींच कर नाव पर चढ़ा लेते। इसके बाद उस लड़की का पता नहीं चलता। जगदीश राय ने जहां शरण ले रखी थी उसके आसपास से तीन लड़कियां गायब हो चुकी थीं। उनके मां-बाप इस टापू के बाहर कहां खोजते। रो-पीटकर रह गये। मान लिया कि सब कुछ की तरह गंडक मइया ने बेटी को भी छीन लिया। लेकिन जगदीश राय जानते थे कि जब गंडक का पानी उतरेगा तो इन लड़कियों की लाश भी दिखाई पड़ेगी। लिहाजा जगदीश राय रात तो रात दिन में भी बेटी उर्मिला को अपनी आंखों के आगे से ओझल नहीं होने देते। साये की तरह उसके साथ लगे रहते। पूरी रात जगते और बेटी का चेहरा देखते रहते। रोज मन को दिलासा देते कि चलो आज का दिन कट गया, कल से शायद गंडक का पानी उतरेगा।”  हिन्दुस्तान, पटना में डिप्टी एडीटर, ‘कमलेश’ की बेहद मार्मिक कहानी …….

बांध 

कमलेश, हिन्दुस्तान में डिप्टी एडीटर, पटना

कमलेश, हिन्दुस्तान में डिप्टी एडीटर, पटना

अंधेरी रात। दूर-दूर तक रोशनी का निशान नहीं। तेज हवा। ऐसे में गंडक का पानी हलफा मारता तो कलेजा दहल जाता। अजीब सी भयानक आवाज होती। ऐसा लगता कोई दानव अपनी विजय पर अट्टहास कर रहा हो। बीस साल की उर्मिला तो बार-बार जग जाती और अचकचा के देखने लगती। सामने दोनों पांव फैलाये पिता को देखकर आश्वस्त होती और फिर धीरे से कहती- ‘थोड़ी देर सो लो बाबू। पूरे दिन बांध पर दौड़ते रहते हो। थक जाते होगे।’
 जगदीश सूनी आंखों से उर्मिला की ओर देखते फिर जैसे अपने आप से कहते- ‘नींद तो करमजली गंडक ने छीन ली बेटा।’ फिर बांध के नीचे पूरी ताकत से टकरा रही गंडक की धाराओं को देखते और सिर पटक देते- ‘का ए गंडक माई, घर छीन लिया, खेत छीन लिया। ढ़ोर-डांगर सबको मार दिया। अब का जान लेकर मानोगी?’
पिछले पांच दिनों से आधा बसही गांव इस बांध पर शरण लिये हुए था। अचानक गांव में घुसी थी गंडक। देर रात और चुपके से। किसी शातिर चोर की तरह। पूरा गांव गहरी नींद में था। रात के कोई दो बज रहे होंगे। देखते-देखते पूरा गांव वीरान हो गया। नदी का हमला इतना जोरदार था कि कई पक्के घर धराशायी हो गये, झोपड़ियों को कौन पूछता। कई लोग बह गये थे। पूरा का पूरा परिवार ही गायब। जिन खेतों में तैयार फसल खड़ी थी वहां पोरसा भर पानी था। हाथी के ऊपर हाथी खड़ा कर दो तो वो भी डूब जाए। गांव में ऊंची जगह पर रहने वाले लोगों को मौका मिल गया और वे भागकर बांध पर चले आये थे। कहते थे कि यह बांध ही बसही गांव को गंडक की बाढ़ से बचाता था। लेकिन इस बार बांध ने भी गंडक से पनाह मांग ली थी। गंडक ने बांध के ठीक मर्म पर वार किया था। ठीक वहां जहां बड़े कांटे वाले साही के टोले ने अपने रहने के लिए बांध में छेद किया था। एक बार उस छेद में गंडक घुसी तो उस दीवार को ही तोड़ कर रख दिया। अब बांध दो हिस्सों में बंटा था और बीच से झूमती -नाचती और अपनी ताकत पर इतराती गंडक बह रही थी। गांव के बचे लोग रोज भोर में बांध के किनारे आते और गंडक के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो जाते। महिलाएं किनारे मिट्टी का गोला बनाती, उसे सिन्दूर लगाती और हाथ जोड़कर कहती- ‘लहर सिकोड़िये गंडक माई। शांत हो जाइये। गांव-जवार से कोई गलती हुई हो तो माफ कीजिए।’
जगदीश राय का तो सब कुछ छीन लिया गंडक ने। इस बार मक्के की शानदार फसल खड़ी थी खेत में। व्यापारी भी तैयार था हाथोंहाथ फसल खरीदने के लिए। सोचा था कि इस बार पैसे आयेंगे तो उर्मिला की शादी का झंझट खत्म। घर में और कोई नहीं था। पति-पत्नी के लिए कुछ सोचना ही नहीं था। लेकिन गंडक से देखा न गया। केवल जान बख्श दिया और सब कुछ ले लिया।
किसी तरह चार डंडों के सहारे एक पॉलीथिन की चादर ऊपर तान दी थी। उसके नीचे एक पॉलीथिन की ही चादर और उस पर किसी तरह गुजारा। दिन में जब तीखी धूप पड़ती तो लगता कि चमड़ी सूख जाएगी। उर्मिला की मां ने किसी तरह बाकी तीन ओर से घेरने की भी व्यवस्था कर दी थी। जवान लड़की चारो ओर से उघार जगह में कैसे रहेगी। इसके बावजूद दिन की गर्मी से इतनी बेचैनी होती कि मन करता कि सीधे नदी में कूद कर अंदर गोता लगाये रहे आदमी। यह तो गनीमत थी कि बांध पर कुछ पेड़ थे जिनके नीचे बैठकर दिन का समय काटते और शहर के दानवीरों का इंतजार करते। दानवीर नाव से आते। साथ में चूड़ा और गुड़ के पैकेट। कभी-कभी पाव रोटी के पैकेट भी। वे लोग नाव से इन पैकेटों को बांध की तरफ उछालते। लोग इन्हें लेने के लिए दौड़ते। कई बार आपस में लड़ पड़ते। लोग हंसते, उनकी तस्वीरें लेते और चले जाते। चार दिनों से चूड़ा-गुड़ को पानी के साथ घोंट रहे थे जगदीश। गंडक का पानी ले आते, लकड़ी की आंच पर खौलाते और फिर छानकर पी लेते। सामने पानी में लाशें तैरती। आदमी की भी और जानवरों की भी। तीखी दुर्गंध उठती लेकिन जिंदा रहने के लिए कुछ तो करना जरूरी था। सुमेर अपने साथ अपना रेडियो बचाकर लाया था। बांध पर रहने वाले सभी लोग उसे यह जानने के लिए घेरे रहते कि गंडक की बाढ़ के बारे में रेडियो क्या कहता है। कुछ लोगों के पास मोबाइल फोन भी था लेकिन चार्ज कहां करते। नतीजा वह खिलौना बन कर रह गया था।
google से साभार

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शाम के बाद बांध पर मच्छरों का हमला शुरू होता। इसके कारण सोना तो दूर एक जगह बैठना भी मुश्किल हो जाता। इधर यूनिसेफ वाले आये थे और एक-एक परिवार को एक-एक मच्छरदानी दे गये थे। लेकिन खुले बांध पर मच्छरदानी कहां काम करती। यूनिसेफ वालों ने ही मोमबत्ती भी दी थी। उसको जलाया जाता और लोग चूड़ा गुड़ खाकर सोने की कोशिश करते । इधर अब एक नया संकट शुरू हो गया था। देर रात एक नाव आती। नाव पर हथियार लिये कुछ लोग सवार रहते। बांध के चारो ओर नाव घूमती और जैसे ही कोई लड़की नजर आती हथियारबंद लोग उसे खींच कर नाव पर चढ़ा लेते। इसके बाद उस लड़की का पता नहीं चलता। जगदीश राय ने जहां शरण ले रखी थी उसके आसपास से तीन लड़कियां गायब हो चुकी थीं। उनके मां-बाप इस टापू के बाहर कहां खोजते। रो-पीटकर रह गये। मान लिया कि सब कुछ की तरह गंडक मइया ने बेटी को भी छीन लिया। लेकिन जगदीश राय जानते थे कि जब गंडक का पानी उतरेगा तो इन लड़कियों की लाश भी दिखाई पड़ेगी। लिहाजा जगदीश राय रात तो रात दिन में भी बेटी उर्मिला को अपनी आंखों के आगे से ओझल नहीं होने देते। साये की तरह उसके साथ लगे रहते। पूरी रात जगते और बेटी का चेहरा देखते रहते। रोज मन को दिलासा देते कि चलो आज का दिन कट गया, कल से शायद गंडक का पानी उतरेगा।

आज की रात हल्की-हल्की ठंडी हवा चल रही थी। लेकिन गंडक की लहरें इस धीमी हवा में भी उन्मत्त थी। जगदीश राय चुपचाप पालथी मारे बैठे थे और रात के कटने का इंतजार कर रहे थे। सामने गंडक मानो बांध की दीवार से जोर आजमाइश कर रही थी। उसकी लहरें जब बांध से टकराती तो ऐसी आवाज आती जैसे कोई नदी में कूद गया हो। कई बार तो वे घबराकर बाहर निकल गये कि कहीं बांध के इस भयानक जीवन से त्रस्त होकर किसी ने नदी में छलांग तो नहीं लगा दी। फिर चुपचाप आकर बैठ जाते। अचानक अंधेरे में चांद से मिल रही हल्की रोशनी में उन्हें लगा कि सामने कोई खड़ा होकर दोनों हाथ फैलाये हुए है। कलेजा धक से हुआ। उन्होंने आंखें मसल कर फिर देखा। इस बार तो लगा कि वह धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ रहा है। डर से उनकी घिग्घी बंध गई। उन्होंने अपने हाथ सरकाये और पॉलीथिन के  बिस्तर के आसपास टटोला। सलाई ऐसी जगह रखी हुई हुई थी कि ज्यादा देर तक खोजने की नौबत नहीं आये। उन्होंने सलाई की तीली जलाई और सामने देखा। फिर जोर से हंस पड़े। सामने दो डंडों के सहारे उर्मिला की मां ने एक रस्सी बांध दी थी। इसपर उसने कोई कपड़ा टांग रखा था जो हवा के कारण उड़ रहा था और जगदीश राय को लगा कि कोई आदमी उनकी तरफ आ रहा है। उन्होंने धीरे से कहा- ‘औरतें भी अजीब होती हैं। इन्हें जंगल में भी रख दो तो ये घर बना ही लेती हैं।’ उन्होंने उर्मिला की मां की तरफ देखा जो गहरी नींद में थी और उर्मिला उससे चिपकी हुई थी।
अचानक उन्हें फिर हल्की सी आहट सुनाई पड़ी। उन्हें लगा कि जैसे पॉलीथिन की दीवार के पीछे कोई धीरे-धीरे सरक रहा है। उन्होंने सिर को झटका दिया- उनके मन का वहम होगा। जैसे उनकी आंखों ने आदमी देख लिया उसी तरह उनके कान आहट सुन रहे हैं। उन्होंने सुना था कि डर जब मन पर हावी हो रहा हो तो आदमी को भजन गाना चाहिए। जोर-जोर से। वे पॉलीथिन की इस झोपड़ी से बाहर निकल आये और जरा जोर की आवाज में गाना शुरू किया- ‘कखन हरब दुख मोर ए भोलानाथ, कखन हरब दुख मोर…….।’
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उन्होंने पहली लाइन ही गाई थी कि उन्हें फिर से आहट सुनाई पड़ी। ऐसा लगा जैसे पीछे लगी पॉलीथिन की चादर को उठाकर कोई घुसने की कोशिश कर रहा हो। इस बार जगदीश सावधान हुए। उन्होंने ऐसे मौकों के लिए पेड़ की एक डाल को हथियार की शक्ल देकर अपने पास रख लिया था। इस डाल के एक सिरे को छीलकर उन्होंने इतना नुकीला कर लिया था कि किसी के पेट में भाला की तरह घुस जाए। उन्होंने अपने इस हथियार को हाथ में उठाया और जोर से गरजे- ‘कौन है रे?’

उधर से कोई आवाज नहीं आई लेकिन उर्मिला और उसकी मां जग गई। उर्मिला की मां ने जल्दी से सलाई निकाली, उसकी तीली जलाई और किनारे रखी मोमबत्ती को जला लिया। हवा से इसकी लौ को बचाने के लिए उसने हाथों की ओट दे रखी थी। उर्मिला तो जैसे डर के मारे एकदम सिमट गई थी। जगदीश फिर चिल्लाये- ‘सामने आओ साले नहीं तो इ भाला पेट में घुसा देंगे।’
‘मारियेगा मत रायजी। हम हैं रामप्रीत। रामप्रीत मांझी।’ देखते-देखते सामने एक नौजवान खड़ा हो गया था। उम्र करीब 22 साल। एकदम काला रंग। बाल घुंघराले। बड़ी-बड़ी आंखें और लम्बा-चौड़ा शरीर। शरीर पर केवल एक गमछा जो नीचे के हिस्से को ढंके हुए था।
‘अरे, इ तो भूसन मुसहर का बेटा है?’ जगदीश राय ने मोमबत्ती को उसके चेहरे के करीब किया था। रामप्रीत मांझी ने अपना सिर नीचे झुका लिया था।
‘तू लोग सुधरेगा नहीं रे? बांधो पर चोरी करने लगा? हियां का रखा है रे हमलोगों के पास जो चोरी करने पहुंच गया।’
‘ना रायजी , चोरी नहीं करते हैं हम। बड़ी जोर की भूख लगी थी। चूड़ा-गुड़ से पेट नहीं भरता मेरा। फिर तुरत्ते भूख लग जाती है। जब सब सो जाता है तो खाने का सामान खोजते हैं। कुछ मिल जाता है तो खा लेते हैं।’ इतनी मासूमियत से कहा रामप्रीत ने कि जगदीश राय को हंसी आ गई। उर्मिला और उसकी मां भी जोर-जोर से हंसने लगी। रामप्रीत बेवकूफों की तरह सबको देख रहा था। तभी उर्मिला की मां ने कहा- ‘बेचारा। जब सब कुछ ठीक होगा तो मां दस-बारह गो रोटी खिलाती होगी। अब भूखे जहां-तहां घूम रहा है। बैठ तुझको चूड़ा-गुड़ देती हूं। मेरी उर्मिला तो खाती ही नहीं है। सब बचा रह जाता है।’
रामप्रीत पालथी मारकर बैठ गया। उर्मिला की मां ने पॉलीथीन के एक टुकड़े में चूड़ा और गुड़ लाकर उसके हाथ में दिया और जगदीश के बगल में बैठ गई। फिर माथे पर हाथ रखते हुए कहा- ‘पता नहींं, गंडक माई कब ले दुख देंगी।’
जगदीश कुछ बोलना ही चाहते थे कि अचानक उन्हें कुछ चमका। एकदम उर्मिला के बिछावन के बगल में। उन्होंने मोमबत्ती की रोशनी में गौर से देखा। उनका पूरा देह सन-सन करने लगा। उन्होंने धीरे से कहा- ‘उर्मिला, हिलना भी मत। बगल में करइत है। काट लेगा तो कोई इलाज नहीं।’
उन्होंने बगल में पड़ा अपना भाला उठाया तभी रामप्रीत बिजली की तेजी से लपका, उनका हाथ पकड़ा और एकदम कान के पास जाकर कहा- ‘मारियेगा मत। अगर पहले वार में नहीं मरा तो आपकी बेटी के लिए खतरा कर देगा।’
जगदीश की देह थर-थर कांप रही थी। उर्मिला की तो जैसे सांस ही रुक गई थी। और सांप तो जैसे वहीं ठहरा हुआ था। न हिल रहा था न आगे बढ़ रहा था। रामप्रीत ने थोड़ी देर उसको देखा और फिर दबे पांव उसकी तरफ बढ़ा।  जगदीश की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर ये लड़का करना क्या चाहता है। तभी जैसे बिजली की गति से रामप्रीत ने चील की तरह झपट्टा मारा। जब तक जगदीश कुछ समझ पाते तबतक रामप्रीत ने सांप को उठाया और गंडक की तरफ उछाल दिया। और फिर हाथ झारते हुए कहा- ‘जहां से आया था वहीं चल गया बेचारा। लगता है अभी तुरत्ते नदी में से निकला था। थाक के एकदम पटुआइल था।’
उर्मिला ने ऐसे पलकें झपकाई थी जैसे सामने भूत देख लिया हो। पलकें झपकाते हुए रामप्रीत से पूछा था- ‘काट लेता तो?’
‘कैसे काट लेता? हमलोग रात-दिन सांप से खेलते हैं। इ तो बेचारा थाक के चूर था।’ फिर उसने पॉलीथिन के टुकड़े पर बचे चूड़े को एक बार में ही मुंह में डाल लिया और उर्मिला की मां की तरफ  देखा। उसने दोनों हाथों को एक दूसरे से जोड़ा और अपने मुंह से सटा लिया। उर्मिला की मां हंसी। वह समझ गई कि इसे पानी चाहिए। वह अंदर से प्लास्टिक के एक गिलास में पानी लेती आई और कहा- ‘बस इतना ही पानी है। और चाहिए तो किसी जगह जाकर पानी चुरा ले।’
रामप्रीत ने पानी पीकर एक लम्बी सी डकार मारी और उर्मिला की मां की तरफ मुस्कुरा कर देखा। फिर झुक कर प्रणाम किया और एक तरफ निकल गया। उर्मिला की मां उसे देर तक देखती रही। फिर धीरे से कहा- ‘मुसहर  है बाकिर कितना सुघर है।’
जगदीश राय ने तीरछी नजर से अपनी पत्नी को देखा और हिकारत से कहा- ‘ज्यादा लौ मत लगाओ। कोई देखेगा तो कहेगा कि रायजी होकर दरवाजे पर मुसहर को बैठाकर बात करता है।’
‘दरवाजा? ये दरवाजा है?’ कहती हुई उर्मिला ने अपने पिता की ओर देखा। जगदीश राय उसके सवाल को कोई जवाब नहीं दे पाये थे और चुपचाप ऊपर देखने लगे थे।
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सुबह में पता चला कि एक बड़ी नाव पर सामान लेकर चेरियाबरियारपुर के बीडीओ साहेब आये हैं। बोरा के बोरा अनाज है नाव में। राहत बांटेंगे। जगदीश राय अपने पूरे परिवार के साथ उधर चले जहां खूब शोर हो रहा था। बांध पर एक पेड़ के नीचे एक कुर्सी लगा दी गई थी जिसपर एक नौजवान बैठा था। कुर्सी भी शायद वह नाव पर ही लेकर आया था। उसके पीछे तीन-चार सिपाही खड़े थे। रायफल के साथ। लोगों से डर था कि कहीं वे लूटपाट न करने लगे। बीडीओ लम्बा-चौड़ा और गोरा था। उम्र यही कोई 34-35 साल। गर्मी और पसीने से बेहाल। सुदर्शन यादव अपने गमछे से हवा करने की कोशिश कर रहा था लेकिन उसकी बेचैनी पर कोई असर नहीं था। बीडीओ ने सामने खड़ी भीड़ को गौर से देखा। फिर पीछे घूमकर कर्मचारी से कहा- ‘सबको लाईन में खड़ा कर दो और जल्दी से राहत बांट कर वापस चलो। यहां दो-तीन घंटा से ज्यादा रहेंगे तो मर जाएंगे।’

महिलाओं की लाइन एक तरफ लगा दी गई और मर्दों की एक तरफ। उर्मिला अपनी मां के पीछे खड़ी थी। उसने देखा रामप्रीत भी मर्दों की लाइन में खड़ा है। ठीक उसके बगल में। उसी तरह उघारे। पूरी देह पसीने में भींगी थी। ऐसा लगता था जैसे दौड़ता हुआ आया हो। उसकी बड़ी-बड़ी आंखें राहत के बोरे पर टिकी थी। ऐसा लग रहा था कि तुरत झपट्टा मारेगा और अनाज ले उड़ेगा। उर्मिला को हंसी आ गई। अचानक रामप्रीत ने भी उसे देखा। दोनों की हंसी छूट गई। रामप्रीत ने आंखें नचाई गोया हाल-चाल पूछ रहा हो। उर्मिला ने भी अपनी गरदन हिला दी। रामप्रीत मुस्कुराया और फिर अपनी नजरें फिर से राहत के बोरे पर गड़ा दी। तभी कर्मचारी ने बोरे का मुंह खोला। बीडीओ ने उसे टोका- ‘एक आदमी को आधा किलो से ज्यादा नहीं।’
‘लेकिन यहां तराजू कहां है सर?’ कर्मचारी ने हैरत से बीडीओ की ओर देखा।
‘अरे तराजू की क्या जरूरत है? हाथ से ही अंदाज से तौलकर देते जाओ। एक-एक आदमी को चार-चार मुठ्ठी बस।’
‘लेकिन हुजूर, चार मुठ्ठी तो पाव भर भी नहीं होगा।’ जगदीश ने आगे आकर कहा।
कर्मचारी हंसा। उसने धीरे से कहा- ‘सर, एक-एक आदमी को दो-दो अंजुरी भर कर अनाज दे देते हैं। बांध पर हुज्जत करना ठीक नहीं है। इलोग अनाज तो लूटते ही हैं, बंधक भी बना लेते हैं।’
बीडीओ ने सिर हिलाया- ‘ठीक है जो करना है करो। लेकिन जल्दी करो। मैं ज्यादा देर तक नहीं रुक सकता। शाम को पटना में बाढ़पीड़ितों की स्थिति को लेकर रिपोर्ट भी भेजनी है।’
सबसे पहले सुदर्शन की पत्नी आई। कर्मचारी ने बोरे में दोनों हाथ डाले। सभी दम साधे कर्मचारी की ओर देख रहे थे। मानो कर्मचारी कोई जादूगर हो और वह बस बोरे से कोई ऐसी चीज निकालने वाला हो कि सबके होश उड़ जाए। कर्मचारी ने बोरे के अंदर हाथ धंसाये और ताकत लगाकर उन्हें बाहर निकाला। अरे यह क्या? यह क्या है? मजाक हो रहा है क्या? सभी लोग चौंक पड़े। कर्मचारी के हाथ पीले लेकिन मटमैले गेहूं के दानों से भरे हुए थे। सुदर्शन की पत्नी कुछ समझ पाती तब तक कर्मचारी ने हाथों में भरे गेंहूं को सामने फैले कपड़े पर रख दिया था। वह अगली खेप निकालने के लिए झुका ही था कि जगदीश राय चिल्लाये- ‘अरे आप क्या दे रहे हैं हुजूर? गेहूं?’
‘हां, क्या परेशानी है?’ बीडीओ ने हैरत से जगदीश की ओर देखा।
‘अरे, गेहूं हम खायेंगे कैसे? बांध पर कौनो चक्की है क्या जहां हम इसको पिसायेंगे?’ जगदीश की आंखें हैरत और गुस्से से भरी थी।
‘देखो भाई, अब तुमलोग कैसे खाओगे यह मेरी परेशानी नहीं है। सरकार ने राहत बांटने के लिए यही अनाज भेजा है। अब हम घर से तो अनाज लाकर देंगे नहीं। अब लेना है तो जल्दी-जल्दी ले लो। हमलोगों को जल्दी वापस भी जाना है।’ बीडीओ ने कहते हुए सिपाहियों की तरफ देखा था। सिपाही बीडीओ का इशारा समझ गये थे। एक भारी-भरकम सिपाही आकर जगदीश राय के सामने आकर खड़ा हो गया। जगदीश सिपाही के तेवर से समझ गये। वे दो कदम पीछे हट गये और एक घंटे में राहत वितरण काम संपन्न हो गया था। बीडीओ वापस बड़ी सी नाव पर चढ़ गया। पीछे से सिपाहियों ने कुर्सी भी नाव पर चढ़ा दी। बीडीओ कुर्सी पर बैठ गया। फिर उसने अपना मोबाइल फोन निकाला और कर्मचारी के हाथ में पकड़ाया- ‘जरा मेरी एक फोटो तो खींच दो। ऐसे मौके बार-बार थोड़े आते हैं।’
अगले दिन दोपहर में उर्मिला अपनी मां के साथ बांध पर निकली थी। जब गर्मी से बहुत परेशान होती तो मां-बेटी ऐसे ही टहलने लगती। बांध के बीचोबीच एक पीपल का पेड़ था। वहां पहुंचते ही मां ने उर्मिला से कहा- ‘तू यहीं बैठ मैं जरा नदी के किनारे से खाली होकर आती हूं।’
उर्मिला वहीं बैठ गई। तभी उसे लगा कि पेड़ के पीछे कोई है। वह अचकचा कर खड़ी हो गई। उसने थोड़े डर और थोड़ी जिज्ञासा से पेड़ के पीछे देखा। पीछे से निकला रामप्रीत- उसी तरह उघारे बदन। गमछा लपेटे हुए। उर्मिला को देखकर मुस्कुराया। उर्मिला ने भी हंसकर कहा- ‘आजकल नहीं आता घर पर? पेट भरा रहता है क्या तुम्हारा?’
उसके सवाल से जैसे अचकचा गया रामप्रीत। उसने गौर से उर्मिला का चेहरा देखा। हंसते हुए कितनी अच्छी लगी थी। इसका चेहरा कितना गोल है और रंग? एकदम उजला। चेहरे पर पसीने की बूंदे तो और भी प्यारी थी। बांध पर बिना सिंगार के इतनी सुंदर है तो……..?  तभी उर्मिला जोर से बोली- ‘अरे सुनता नहीं है का रे? घर काहे नहीं आता?’
रामप्रीत ने जैसे उर्मिला की बात नहीं सुनी थी। वह दो कदम और आगे बढ़ा। एकदम उर्मिला के करीब। उर्मिला घबरा गई। वह थोड़ा पीछे हटी। पीछे पेड़ था। वह पेड़ से सटकर खड़ी हो गई। रामप्रीत उर्मिला की तरफ झुका। इतना करीब कि उर्मिला की नाक उसके पसीने की गंध से भर गई। उर्मिला की पूरी देह थर-थर कांप रही थी। अचानक रामप्रीत ने धीरे से कहा- ‘एक ठो बात कहें?’
उर्मिला ने गौर से उसकी ओर देखा। क्या बात है? रामप्रीत की आंखें इस कदर भरी-भरी क्यों लग रही हैं? वह कुछ बोलती तभी रामप्रीत ने धीरे से कहा- ‘तुम बहुते सुंदर हो। एकदम इनरासन की परी जइसन।’
 तभी ठंडी हवा का एक झोंका आया। उर्मिला के शरीर से बहता पसीना जैसे इस ठंडी हवा के झोंके से सूखा और पूरी देह गनगना गई। उसे लग रहा था कि रामप्रीत की नजर उसकी देह में अंदर तक उतर रही है। सांस तेज हो गई थी और इसपर नियंत्रण पाने के लिए वह पांव के नाखुन से मिट्टी कुरेदनी लगी थी। इधर रामप्रीत अपलक उसे देखे जा रहा था। उर्मिला ने धीरे से कहा- ‘तुम कभी कुरता क्यों नहीं पहनते?’
‘क्यों?’ रामप्रीत ने धीरे से पूछा
‘मुझे अच्छा नहीं लगता तुम्हारा उघारे रहना।’
रामप्रीत पागलों की तरह पलकें झपका कर उसे देखने लगा। शायद वह उर्मिला की बात समझने की कोशिश कर रहा था। तभी उर्मिला को मां आती हुई दिखी। रामप्रीत कुछ बोलता तभी उर्मिला दौड़कर मां के पास चली गई। वह मां के साथ तेज कदमों से घर की ओर चल पड़ी। अचानक वह पीछे मुड़ी और रामप्रीत को देखा। फिर हंस दी। रामप्रीत की कुछ समझ में नहीं आया। वह उसे देर तक जाते हुए देखता रहा। फिर अचानक उसे याद आया कि कल गेहूं मिला था। मां ने आज जरूर कोई चीज बनाई होगी। और वह दौड़ता हुआ उस ओर चला गया था जिधर मुसहर लोगों ने अपना आसरा बनाया था।
शाम में जगदीश राय पॉलीथिन वाली अपनी झोपड़ी के आगे बैठकर पानी के सहारे चूड़ा निगलने की कोशिश कर रहे थे। थोड़ी देर पहले एक नाव से कुछ लोग आये थे। उनलोगों ने कुछ गोलियां दी थी और कहा था कि पानी को खौलाने के बाद उसमें एक गोली डाल देना तभी पीना। इधर रेडियो ने भी कहा था कि गंडक का पानी नीचे उतरने लगा है। इससे थोड़ी उम्मीद बंधी थी। लेकिन असली संकट तो गांव में वापस लौटने पर शुरू होने वाला था। गांव में भी गंडक ने न रहने को घर छोड़ा था और ना खाने को अनाज। सबकुछ नये सिरे से शुरू करना था। वह कुछ सोच ही रहे थे कि सामने से रामप्रीत आता दिखा। इ साला मुसहर परिक गया है। रोज खाने के लिए चला आता है- उन्होंने मन में सोचा। रामप्रीत ने करीब आकर उन्हें प्रणाम किया तो वे चौंके- ‘अरे, ये क्या पहना है रे तू? एतना ढीला?’
‘कुरता है रायजी। दो साल पहले बाबू ने अपने लिए सिलवाया था। कभी-कभी हम भी पहन लेते हैं।’ रामप्रीत ठीक जगदीश राय के सामने बैठ गया था। उसकी आवाज सुनकर उर्मिला ने उसकी तरफ देखा। उसका कुरता देखकर वह जोर-जोर से हंसी। मां ने भी हंसते हुए कहा- ‘पगला है का रे? अइसन कुरता काहे पहन लिया तुम?’
‘उघारे रहना अच्छा नहीं लगता था चाची।’ कहकर रामप्रीत ने उर्मिला की ओर देखा। उर्मिला उसे एकटक देखे जा रही थी। पता नहीं क्यों रामप्रीत ने नजरें झुका ली। उसे याद आया पिछले साल नाच में सुना हुआ गीत- अइसे मत देख ए सजनी हमरा लाज लागेला….।
अचानक मां ने पूछा- ‘भूख लगी है? चूडा़ गुड़ खाएगा?’
रामप्रीत ने ना में सिर हिला दिया था। फिर धीरे से कहा- ‘आज खूब खाये हैं।’
‘का खाया है रे?’ अब जगदीश ने हंसकर पूछा था।
‘कल गेहूं दिया था न। उसको मां ने रात भर पानी में फूलने के लिए छोड़ दिया था। आज उसको पत्थर पर पीस लिया। फिर गोला बनाकर आग में पका लिया।’
‘साला, पेट इतना झरेगा कि मर जाएगा। तो फिर इधर काहे आया है? जगदीश राय ने हिकारत से कहा था।
रामप्रीत ने उर्मिला की ओर चुपके से देखा और धीरे-धीरे एक तरफ निकल गया। उर्मिला को लग रहा था कि वह उसे बुलाये। लेकिन कैसे? मन तो ये भी कर रहा था कि दुनिया का सबसे अच्छा पकवान बनाकर रामप्रीत को खिला दे। लेकिन वह करे क्या? गंडक मइया ने इतना बेबस कर रखा है।
‘अइसे काहे बोल दिये उसको। बेचारा चला गया।’ उर्मिला की मां जगदीश राय के सामने आकर बैठ गई थी।
‘त का करते? इ सब से जादा माया ठीक नहीं। अरे बांध पर बसना पड़ा है तो इ आकर बैठ जाता है। गांव में तो इ सब टोला में भी नहीं घुसता है।’ कहते हुए जगदीश राय ने पांव पसार दिये और अपना प्यारा भजन गुनगुनाने लगे- कखन हरब दुख मोर ए भोलानाथ…..। फिर जैसे कुछ याद आया। उन्होंने उर्मिला की मां की तरफ देखते हुए कहा- ‘सुमेर बता रहा था कि रेडियो में बोला है कि गंडक का पानी उतर रहा है। बस दो दिन और धीरज रख लो।’
पूरी रात उर्मिला के सपने में रामप्रीत आता रहा- कभी उघारे तो कभी कुरता पहने हुए। कभी सांप पकड़ते हुए तो कभी पत्थर पर गेंहू पीसते हुए। सपने में भी वह उसे देखकर लजा जा रहा था। सपने में ही उसने देखा कि वह रामप्रीत का हाथ पकड़ कर उसके साथ चली जा रही है और पीछे से लोग चिल्ला रहे हैं। अचानक नींद खुल गई थी उसकी। सचमुच लोग जोर-जोर से चिल्ला रहे थे। आज भी नाव से आये कुछ लोगों ने बांध से एक लड़की को उठाने की कोशिश की थी लेकिन उसके चिल्लाने की आवाज से लोग जगे थे और नाव वालों को भागना पड़ा था। उर्मिला की मां और बाबू भी उसी तरफ गये थे। वह अपनी झोपड़ी से बाहर निकली और मुंह पर पानी के छींटे मारे। फिर चेहरा को पोछने ही वाली थी कि लगा कि पीछे कोई खड़ा है। उसका दिल धक से किया। ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की सांस नीचे। वह धीरे-धीरे पीछे मुड़ी। पीछे रामप्रीत खड़ा था। एकदम पास। लगभग सटा हुआ। इतना करीब कि उसकी गरम सांसे उर्मिला के चेहरे से टकरा रही थी। उर्मिला का कलेजा इतनी जोर से उछला कि जैसे गरदन में आकर फंस गया हो। उसने थूक घोंटे और झटके से थोड़ा पीछे हो गई। रामप्रीत चुपचाप उसे देखे जा रहा था- ‘मैंने देखा कि तुम अकेली हो तो आ गया। सब लोग पीपल के पेड़ पर गये हैं। वहीं सुमेर की बेटी को उठाने की कोशिश किया था चोर सब।’
उर्मिला चुप। क्या बोले। उसे डर लग रहा था कि अभी अगर बाबू आ गये और रामप्रीत को उसके साथ अकेले देख लिया तो गजब हो जाएगा। उसने धीरे से कहा- ‘ठीक है, अब तुम जाओ।’
रामप्रीत जाने के लिए दो कदम चला लेकिन फिर पीछे मुड़ गया- ‘सब लोग कह रहा है कि दो दिन में गांव से पानी निकल जाएगा। फिर सब लोग गांव में चले जाएंगे।’
कहने के बाद कुछ देर रुका, उर्मिला का चेहरा देखा फिर सिर नीचे कर लिया। उर्मिला की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे।

रामप्रीत ने फिर सिर उठाया। उसकी आंखे डबाडब भरी थी- ‘गांव में तो हम तुम्हारे टोला में नहीं आ पाएंगे। तुमको देखते हैं तो बहुते अच्छा लगता है। बाकिर अभी ठीक से देखे कहां है।’ कहते-कहते लगा कि रो देगा रामप्रीत। वह तेजी से पीछे घूमा था और दौड़ता हुआ एक तरफ चला गया। उर्मिला का दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि उसकी आवाज उसके कानों तक पहुंच रही थी। गला सूखने लगा था। वह धम से वहीं बैठ गई थी। उसने भी अभी ठीक से कहां देखा है रामप्रीत को। उसने दोनों पांव को घुटने से मोड़ा और उसपर अपने हाथों के सहारे सिर रख दिया और चुपचाप रोती रही। ना जाने कितनी देर तक। उसे होश तो तब आया जब मां ने आकर उठाया। उसका चेहरा देखकर मां चौंकी- ‘रो रही थी का उर्मिला? घबरा मत बेटी, बस दो दिन में अपने घर चले जाएंगे। गांव का आधा से अधिक पानी निकल गया है।’

उर्मिला क्या कहती। वह मां के गले लगकर फूट-फूट कर रोने लगी। मां ने उसे छोटी बच्ची की तरह अपने से चिपका लिया था। तो क्या गांव में जाने के बाद वह रामप्रीत को नहीं देख पाएगी? उससे मिल नहीं पाएगी? तो क्या हुआ? बांध की इस जलालत भरी जिंदगी से तो छुटकारा मिलेगा। कितनी मुश्किल है यहां पर। यह भी कोई जीवन है?
लेकिन रामप्रीत? उससे कैसे मिलेगी? जैसे अंदर से किसी ने कहा था।
रामप्रीत से मेरा क्या लेना-देना? वह कौन है? अरे संकट के समय अगर दो लोग अपनी जरूरत के लिए कुछ देर के लिए साथ रह जाएं तो संबंध थोड़े बन जाता है? तो फिर वह रात में सपने में रामप्रीत को क्यों देखती है? सुबह से ही उसके आने का इंतजार क्यों करती है? क्या गांव में जाने पर रामप्रीत को देखने के लिए उसका मन दुखी नहीं होगा? उर्मिला को लगा कि उसका सिर फट जाएगा। उसने अपना सर झटका और मां से अलग हटकर नीचे बैठ गई थी। एकदम चुपचाप और उदास।
 कुछ ही देर में महिलाओं का जत्था रोज की तरह गंडक के किनारे था। आज रोज वाली उदासी नहीं थी। आज किनारे महिलाओं की हंसी गूंज रही थी। वापस अपने घर लौटने का उल्लास जैसे सब ओर दिखाई पड़ रहा था। जब से गंडक का पानी उतरने लगा है महिलाएं तो बस अपने गांव वापस लौटने की बातें कर रही हैं। सबके पास नये तरीके से जिन्दगी शुरू करने की योजना है। आज भी रोज की तरह महिलाओं ने मिट्टी का गोला बनाया, उसपर सिन्दूर लगाया और उसके पास दीया जला दिया। इसके बाद महिलाओं ने हाथ जोड़े। एक महिला ने जोर से आवाज लगाकर कहा- ‘जल्दी अपना लहर सिकोड़कर जाइये मइया।  आशीष देकर जाइये कि जइसे गांव पहिले था वइसा ही हो जाए। आपके आने से हमारे मन में कोई संताप नहीं है मइया। गांव-जवार को धन-जन से पूरन कीजिए।’
इसके बाद एक महिला ताली बजाकर जोर-जोर से भजन गाने लगी- ‘जय बोली माता जय बोली, सउसे गंउवा जवरवा मइया जय बोली।’ दूसरी महिलाएं भी ताली बजा-बजा कर इस भजन में उसका साथ दे रही थी।
उर्मिला ने गौर से देखा। सचमुच गंडक का पानी एकदम नीचे आ गया था। ऐसे तो दो दिन में ही पानी गांव से निकल जाएगा। तो क्या बांध से इतनी जल्दी जाना होगा? तो फिर रामप्रीत? उसने घबरा कर हाथ जोड़ दिये। अपनी अपनी बड़ी-बड़ी आंखों को बंद किया और मन में कहा- ‘अभी मत जाना मइया। चार दिन और रुक जाओ मइया। बस चार दिन और। जब इतने दिन कष्ट सहा तो चार दिन और सह लूंगी। अभी अपना लहर पसारो मइया। एक बार फिर से अपना पुराना वाला क्रोध दिखाओ। नहीं दिखा सकती तो इसी रूप में चार दिन रुक जाओ मइया। अभी तो मैंने रामप्रीत को ठीक से देखा भी नहीं है।’
गंडक लगातार बह रही थी। चुपचाप। अब उसकी लहरों में ना तो पहले की तरह तेजी थी और ना आवाज में ही पहले वाला जोर।
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    By: कमलेश

    बक्सर में जन्म और वहीं पढ़ाई-लिखाई। शुरूआती दौर में छात्र आन्दोलन और फिर भोजपुर के किसान आन्दोलनों से जुड़ाव। बाद में पत्रकारिता से जुड़ाव और अब तक जारी। कहानियां हाल में लिखनी शुरू की। हंस, कथादेश, परिकथा और पाखी समेत कई पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित

    शिक्षा: एमए (दर्शनशास्त्र)
    रंगमंच पर भी सक्रिय. एक आलेख ‘भगत सिंह फांसी की कालकोठरी से’ की कई जगहों पर नाट्य प्रस्तुति.
    हिन्दुस्तान, पटना में डिप्टी एडीटर के पद पर कार्यरत

    संपर्क: फ्लैट नं. 301
    निरंजन अपार्टमेंट
    आकाशवाणी मार्ग, खाजपुरा
    बेली रोड, पटना, बिहार।

    मो.: 09934994603

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    मउगा: कहानी (कमलेश)

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5 Responses

  1. अरुण साथी

    बेहतरीन कहानी…अभावों के बीच भी प्रेम का अंकुरण…

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  2. सुभाष कुमार

    सजीव चित्रण …अभावों के बिच उपजे प्रेम का ….ये आप ही कर सकते है सर …..बसही चेरियाबरियारपुर ….गंडक …बूढी गंडक ….नौकरी भी की …और दिल की भी सुनी ….

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  3. nishant

    एकदम बांध देने वाली कहानी है बांध। बधाई कमलेश भाई।
    निशांत

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  4. आकाश

    अत्यन्त सरल परंतु सजीव चित्रण। पढ़ कर पात्रों से एक जुड़ाव महसूस होता है। आशा है आगे भी ऐसी कहानियाँ पढ़ने को मिले।

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