“नरोत्तम- मुसीबत के माहौल में पले-बढ़े। मेरी भी नौकरी का कोई भरोसा नही था, मैं जातीय अयोग्यता की वजह से उत्पीड़न का शिकार हो चुका था । अपने तो खैर कोई शहर में थे नही । ये कामप्रसाद दूर गांव के सजातीय मिल गये थे। उन्हें और उनके परिवार को अपना मानने लगा था पर वे भी दगा दे गये। ऐसी कुनीति चलने लगे थे कि किराये का मकान मिलना मुष्किल हो गया था । ये कामप्रसाद स्वजातीय, वही दूसरी ओर थे कफननाथ उच्चवर्णिक, पर मेरे चूल्हे की रसोई उन्हे बहुत भाती थी। उनके बच्चे मेरे बच्चों के साथ ऐसे रहते थे जैसे कोई सगे हो। परिस्थितियां बदलते ही कफननाथ गोहुवन सांप हो गये। मैं और मेरा परिवार उन्हें अछूत लगने लगे। वो कहावत सही लगने लगी जिसमें कहा जाता है कि उच्चवर्णिक लोग निम्नवर्णिकों का खून चूसते ही है, दुख में हो तो गिड़गिड़ाकर और सुख में हो तो दबंगता दिखाकर। वही हाल कफननाथ ने भी किया था । जब ट्रास्फर होकर आये थे तो दफतर के लोग यूनियन बना लिये थे और उन्हें अपने आसपास किराये का मकान न दिलाने की कसम खा लिये थे क्योंकि कफननाथ तत्कालीन बा्रंचहेड के ग्रुप के न होकर विरोधी ग्रुप के थे। महीनों बाद मैने कफननाथ को मकान दिलाया था। परिस्थितियां बदलते हीं उसी कफननाथ के लिये मैं और मेरा परिवार छोटे लोग हो गये। दोस्त दैवीय पीड़ा के साथ मानवजनित पीड़ा का जहर पीना पड़ा खैर आज भी बदस्तूर जारी है।”

बिटिया बड़ी हो गयी 

नंदलाल भारती

नंदलाल भारती

सूूरज पूरब की ओर से मनमोहक लालिमा लिये गांव की चौखट पर दस्तक देकर,शहर अपने अभ्युदय का अद्भुद सुख देने को लालायित थे। इसी बीच पूरबी हवा ने मौसम शहद की मिठास घोल दी थी।इसी बीच नागेष्वर के दरवाजे पर किसी के आने की आहट हुई। आहट सच में तब बदल गयी जब कालबेल बज उठी।दरवाजा खोलते ही पुरूशोत्तम प्रगट हो गये और जोर से चिल्लाया अरे यार कहां छिपा बैठा है।अरे बाहर निकल कर देखता सूरज पूरब की ओर से क्या अद्भुद सौन्दर्य लेकर तुम्हारे चैखट की ओर बढ़ रहे है।
बढ़ नही रहे है आ गये है। गले लगाते हुए नरोत्तम बोला।
घर में सब कुषल तो है ना। बिटियारानी,चमन और गगन कहां है। भाभी बेचारी को तो किचन से फुर्सत नही क्यों भाभी साहिबा ?
कामना-गृहस्त नारी के लिये तो घर मंदिर है। पति परमेशवर परिवार के सदस्यगण देवी देवता। इनकी तीमारदारी हमारे लिये पूजाकर्म है।
नरोत्तम-घर की दुर्गा,सरस्वती और लक्ष्मी यही है इनके हवाले ये घर है साथी। खैर बताओ इतनी सुबह कैसे आना हुआ।
पुरूशोत्तम-देर से आता तो तू मिलता क्या ? तू ही तो इकलौता नौकरी करता है। घड़ी की सुई दस पर खड़ी नी हुई तू दफतर के अन्दर बाकी लोग बारह बजे आये एक बजे आये कोई पूछने वाला नही ।मेरा दोस्त पांच मिनट देर से पहुंचा तो पहाड़ टूट पड़ा।
नरोत्तम-कहां था था जैसे सालों बाद मिला हो। छोड़ यार क्या खास है कोई खुषखबरी लेकर आया है। बिटिया की शादी पक्की हो गयी क्या ? हाँ तो बोल न जल्दी ।
पुरूशोत्तम-जर्बदस्ती हां बोलूं ।ऐसी कोई बात नही है। बिटिया के ब्याह की चिन्ता अभी से क्यों करूं। बिटिया पढ़-लिखकर अपने पांव पर खड़ी हो जायेगी तो ब्याह देगे। अभी तो ग्रेजुएट भी नहीं हुई।बेटी जज बनना चाहती है और हम भी उसके साथ है।कुछ महीने पहले तो घण्टों बतियाये थे औत तुम कह रहे हो सालों हो गये। खैर ये सब छोड़ कलावती बिटिया कहां है?
सालों बाद घण्टे भर के लिये मिला था फिर ऐसे गायब हो गया जैसे गदहे के सिरे सींग। बिटिया दिल्ली रहती है।
ब्याह कर दिया मुझे बुलाया भी नहीं ।
कैसी बात करता है यार नरोत्तम बोला। दिल्ली में पढ़ाई कर रही है। योग्य वर मिलते ही ब्याह भी कर दूंगा और तुझे न्यौता भी दूंगा।
मैं बिटिया को बधाई देने आया था। कल उसकी तस्वीर अखबार में छपी थी बेटी इतनी बड़ी हो गयी मैं तो कल जान पाया ।
नरोत्तम-बिटिया 20 साल पहले इतनी बड़ी हो गया थी। इतना कहते ही नरोत्तम की आंखे छलछला उठी।
पुरूशोत्तम-बीते को भूल क्यो नही जाता।
भूलता नही कुछ । बीते हुए दुखद पल समय-बेसमय मानस पटल पर छा जाते है। दहकते दर्द पर सान्तवना की रेत जमाने के प्रयास विफल हो जाते है। बताओं कैसे भूल सकता हूं उन नन्हें हाथों की चांद जैसी रोटी। कलावती उम्र में उतनी बड़ी तो नही थी पर मुसीबत सब कुछ सीखा देती है। डाक्टर की लापरवाही से कामना का गलत आपरेशन हो जाने से जीवन नरक बन गया था। वह कई महीनों तक अस्पताल में मृत्यु से संघर्ष करती रही । बिटिया को देखकर हौसला बढ़ गया था। मुसीबत के समय बिटिया इतनी बड़ी हो गयी कि घर की जिम्मेदारी नन्हीं सी उम्र में उठा ली थी।
पुरूशोत्तम- यार ये सब तो कभी बताया नहीं।
नरोत्तम- हमारी जान-पहचान को अभी साल भर नही हुए हांेगे।
पुरूशोत्तम- बात तो सही हैं।
नरोत्तम- कामना अस्पताल में थी मैं घर से जल्दी निकलता था अस्पताल जाता था। अस्पताल से दफतर,दफतर से अस्पताल फिर घर आता था। खाना बनाता, बच्चों खिलाता नन्हें-न्न्हें बच्चों को घर में छोड़कर अस्पताल जाता। बच्चे सोये ही रहते तब तक अस्पताल से आ जाता।
पुरूशोत्तम- इतनी मुसीबत तुमने उठाया अकेले ।
नरोत्तम- मुसीबत का दर्द तो अकेले झेलना पड़ता है। गगन दो साल का रहा होगा, मेरे गर्दन में हाथ डालकर सोता था।
पुरूशोत्तम- क्यों …….?
नरोत्तम- रात में मैं अस्पताल चला जाता था, कामना की देखरेख के लिये। जब चमन की नींद खुलती थी तो रोने लगता था। बेचारी चम्मच से दूध पिलाती जब-जब चमन रोता। कलावती,चमन में ज्यादा से ज्यादा आठ साल का और कलावती ग्यारह के आसपास की थी। सबसे छोटा गगन था। कभी कभी तो गगन को अस्पताल लेकर जाना पड़ता था।
पुरूशोत्तम- बाप रे इतनी मुसीबत। तुम्हारी दास्तान सुनकर मुझे चक्कर आने लगा।
नरोत्तम- मुसीबत का तूफान था निकल गया।
पुरूशोत्तम- दोस्त तुम संभल गये बड़ी बात है।

साभार google से

साभार google से

नरोत्तम- ठीक कह रहे हो। मुझे सम्भालने में मेरी बेटी कलावती, चमन और गगन का बड़ा योगदान है। चमन तो सबसे छोटा था पर सब समझता था। जब अस्पताल जाता तो मां का सिर खुजलाता जैसे कहता हो हौसला रखो मम्मी ठीक हो जाओगी। एक दिन मुझे आने में देर हो गयी। अस्पताल में कामना की तबियत बहुत बिगड़ गयी थी। डाक्टरों ने इतना कह दिया था कि आज की रात पार कर गयी तो बच जायेगी। ऐसी स्थिति थी मैंएक नेपाली नर्स के उपर छोडकर घर आया तो देखा कि……
पुरूशोत्तम- क्या देखा ?
नरारेत्तम- बात पूरी नही हुई दोस्त। कलावती पीढ़ा पर खड़ी होकर रोटी बेल रही थी गगन लोई बना रहा था, अबोध चमन गैस पाइप पकड़ कर हंस रहा था। संयोग से मैं आ गया था। दृष्य देखकर आंसू निकल पड़े चमन को गोद में उठाया तो गैस की बदबू नाक को छू गयी थी। सोच कर मेरे रोंगटे खड़े हो गये थे। कलावती और गगन रोटी बनाने में इतने मशगूल थे कि चमन गैस का पाइप हिला रहा, इससे गैसे भी लीकेज होने लगी थी। बच्चों को दूर हटाया गैसे बन्द किया फिर कसकर लगाकर रोटी बनाने के लिये बेलन थामा तो बेटी कलावती ने हाथ पकड़कर बोली पापा पानी। मेरी नन्हीं सी बिटिया मुसीबत में तपकर कितनी बड़ी होगी थी ।मैं आष्चर्य से कलावती को निहारे जा रहा था। इतने में गगन बोला पापा बैठ जाओ ना। चमन गोद से उतरकर पैण्ट पकड़ जैसे वह भी दीदी-भईया की बातों पर अपनी भी मुहर लगा रहा हो। इतने में पड़ोस वाली चितौले भाभी आ गयी थी। वे आते ही बोली क्यों बाप-बेटी मौन खड़े हो। मै बोला था देखो ना भाभी नन्हकी कितनी बडी हो गयी।
पुरूशोत्तम- मुसीबत के वक्त में नन्हकी बड़ी हो गयी थी।
नरोत्तम- खैर मुसीबत तो अपना पता नही भूली।
पुरूशोत्तम- मतलब ।
नरोत्तम- कामना सालों तक बिस्तर से नही उठ पायी थी। किलो दो किलो का सामान उठाना कामना के लिये कष्टकर था। यही बच्चे कामना की देखभाल करते,स्कूल जाते,होमवर्क करते मिलजुलकर चूल्ह-चैका भी सम्भालते। बिटिया मम्मी जैसे टिफिन देती थी उसी तरह उसी स्वाद का लंच बिटिया देने लगी थी। सच पुरूशोत्तम मेरी बिटिया बचपन में बड़ी हो गयी। अब तो सचमुच बड़ी हो गयी है। मेरा नाम दुनिया के कैनवास पर लिख रही है।
पुरूशोत्तम- कलावती ने तुम्हारे कुल का जहां रोशन कर दिया है।
नरोत्तम- बिल्कुल सही। बिटिया हमारे स्वाभिमान की अभिवृद्धि है। खैर बच्चो ने तकलीफ भी बहुत उठाई है।
पुरूशोत्तम- जब मां-बाप मुसीबत के समन्दर में फंसे होगे तो औलादों को तो तकलीफ होगी है। ऐसे मुसीबत की काली परछाई तुमने बच्चों पर पड़ने नही दी बहुत बड़ी उपलब्धि है।
नरोत्तम- मुसीबत के माहौल में पले-बढ़े। मेरी भी नौकरी का कोई भरोसा नही था, मैं जातीय अयोग्यता की वजह से उत्पीड़न का शिकार हो चुका था । अपने तो खैर कोई शहर में थे नही । ये कामप्रसाद दूर गांव के सजातीय मिल गये थे। उन्हंे और उनके परिवार को अपना मानने लगा था पर वे भी दगा दे गये। ऐसी कुनीति चलने लगे थे कि किराये का मकान मिलना मुष्किल हो गया था । ये कामप्रसाद स्वजातीय, वही दूसरी ओर थे कफननाथ उच्चवर्णिक, पर मेरे चूल्हे की रसोई उन्हे बहुत भाती थी। उनके बच्चे मेरे बच्चों के साथ ऐसे रहते थे जैसे कोई सगे हो। परिस्थितियां बदलते ही कफननाथ गोहुवन सांप हो गये। मैं और मेरा परिवार उन्हें अछूत लगने लगे। वो कहावत सही लगने लगी जिसमें कहा जाता है कि उच्चवर्णिक लोग निम्नवर्णिकों का खून चूसते ही है, दुख में हो तो गिड़गिड़ाकर और सुख में हो तो दबंगता दिखाकर। वही हाल कफननाथ ने भी किया था । जब ट्रास्फर होकर आये थे तो दफतर के लोग यूनियन बना लिये थे और उन्हें अपने आसपास किराये का मकान न दिलाने की कसम खा लिये थे क्योंकि कफननाथ तत्कालीन बा्रंचहेड के ग्रुप के न होकर विरोधी ग्रुप के थे। महीनों बाद मैने कफननाथ को मकान दिलाया था। परिस्थितियां बदलते हीं उसी कफननाथ के लिये मैं और मेरा परिवार छोटे लोग हो गये। दोस्त दैवीय पीड़ा के साथ मानवजनित पीड़ा का जहर पीना पड़ा खैर आज भी बदस्तूर जारी है।
पुरूशोत्तम- कफननाथ दोस्त नही शिकारी था ।
नरोत्तम- विभाग के लोगों को मैं फूटी आंख नही भाता था, नतीजन किसी से कोई उम्मीद करना खुद को धोखा देना था। विभाग के लोगों ने वही किया जैसे प्रतिद्वन्दी करता है। मैं निरापद दैवीय दुख के साथ दफतर के लोगों का उत्पीड़न झेलने को बेवस था क्योकि उन्हें लगता था कि छोटी जाति के लोग तड़ना के अधिकारी होते है। कामना की दयनीय दशा दफतर के लोागें के मुंहतोड़ जबाब देने की इजाजत नही देती थी क्योकि नौकरी जाने का खतरा था। इसी दर्द की दरिया में डूबता उतराता देखकर बेटी समय के बहुत पहले बड़ी हो गयी।
पुरूशोत्तम- वाकई बिटिया बड़ी हो गयी।
नरोत्तम- बेटी की पढ़ाई को लेकर आंधी-तूफान चलते रहे। दसवी पास करने के बाद मेरे पिताजी को पोती का ब्याह देखकर स्वर्ग जाने की इच्छा तीब्र हो गयी थी। मेरे उपर से चारो तरफ से दबाव था। आर्थिक स्थिति दयनीय थी धर्मपत्नी खटिया पर थी। तनिक सयानी कलावती थी चमन तनिक समझदार हो गया था पर गगन ठीक से चलना भी नही सीखा था। गांव मनिआर्डर भेजना जरूरी था। पैसा नही भेज पाने की स्थिति में पिताश्री कुपित हो जाते और दरवाजे के सामने नीम के चबूतरे पर बैठकर गाली देते। हर आने जाने वाले को बुलाकर मेरी नालायकी की दास्तान का जैसे सस्वर पाठ करते थे। दुख की दरिया में गले भर डूबे होने के बावजूद भी कोई हौसला अफजाई करने वाला नही था। खटिया पर पड़ी धर्मपत्नी,बेटी कलावती, चमन और गगन यही मेरे दुख के साथी और सहारे भी। मुसीबत के मारे बच्चे पेट में भूख लिये कालोनी के आसपास के मंदिरो की चैखटों पर कामना के जल्दी ठीक होने के लिये मन्नते मांगते फिरा करते थे। नन्हीं कलावती एक हाथ में पूजा की थाली,एक हाथ से गोद में गगन को थामती और गगन दीदी के पीछे गिरते संभलते तीनों भाई-बहन मंदिर जाते। इन्ही बच्चों की आराधना ने कामना को मौत के मुंह से खींचकर लायी। जब मैं ज्यादा उदास होता तो कलावती पूछती पापा सिर दुख रहा है। सिर पर तेल रखने के लिये हाथ पकड़कर खटिया पर बैठा देती थी।वही दूसरी ओर कामना खटिया पर लेटे-लेटे पीठ पर हाथ फेरने लगती थी। चमन था तो नन्हा सा पर उसे भी भी मेरी तकलीफों को एहसास था। बच्चों से क्या दुख बतियाता बेचारे समझ जाते थे चमन पांव पकड़ दबाने लगता था। गगन और चमन सामने खड़े हो जाते थे इनको देखकर फिर नये जोश से घरमंदिर को संभालने में जुट जाता था आज भी वही कर रहा है। मुसीबत के समय में नन्हीं कलावती अधिक समझदार हो गयी थी। बिटिया कलावती मेरा सहारा भी बनी रही।
पुरूशोत्त्म-दोस्त दुख के दिन बीत गये। कलावती सचमुच बड़ी हो गयी है। कामना भाभी जमीन पर लात मार चुकी है। परिस्थितियां बदल चुकी है।
नरोत्तम- ठीक कह रह हो पर विभाग में आज भी दोयम दर्जे का आदमी हूं। मेरी तरक्की के सारे रास्ते बन्द हो चुके है सिर्फ जातीय अयोग्यता के कारण। मित्र जो है उसी में सन्तोष है किसी ने कहा है धर्मपत्नी, भोजन और सम्पति जो हो उसी में सन्तोष करना चाहिये वही कर रहा है। सन्तोष का ही तो प्रतिफल है बेटी बड़ी हो गयी है। दुनिया के कैनवास को अपने मनोचित्रो से अलंकृत कर ही है।
पुरूशोत्त्म- दोस्त सोना तपकर ही यौवन पाता है।
नरोत्तम- ठीक कह रहे हो पर दैविक ताप के समय इंसान कांटे बोने लगे तो संघर्षरत कमजोर आदमी जीते जी मर जाता है। धर्मपत्नी मौत के मुंह से बाहर आयी तो बच्चों की तपस्या की वजह से। कोई आदमी साथ नही खड़ा हुआ। विभाग के एस.एस.शेखववाल, मैनेजर प्रषासन ने तो हमारे खिलाफ जांच बिठा दिये थे ।
पुरूशोत्त्म- क्यों……..?
नरोत्तम- चिकित्सा सहायता के नाम से मिलने वाली सरकारी मदद वे बन्द करवाना चाहते थे ताकि मेरी पत्नी मर जाये मैं पागल होकर नौकरी छोडं दू। मेरे बच्चे बेसहारा हो जाये शायद इसीलिये मेरी पत्नी की बीमारी झूठी लगती थी।उसकी बीमारी पर हो रहा खर्चा फर्जी।
पुरूशोत्त्म- एस.एस.शेखववाल आदमी था कि राक्षस ?
नरोत्तम- मेरा दुर्भाग्य ही रहा कि ऐसे राक्षसों के बीच मेरे जीवन का मधुमास तबाह हो गया-चाहे डां.वी.पी.शेर रहे,चाहे डां.ए.पी.शेर,डी.पी.शेर चाहे दूसरे शोषक समाज के खून पीकर साशन करने वाले अधिकारी। दोस्त फर्क हैं मेरी नन्ही इतनी बड़ा हो गयी थी कि मैं संभलता चला गया।
पुरूशोत्त्म- सच यार तुम्हें तो दैविक ताप से पीड़ा तो इंसान के रूप राक्षसों ने दिया है। रहीमदास ने लिखा है-रहिमन विपदा हूं भली जो थोडे़ दिन होय…………..तुम्हारी विपदा तो आदमी ने खत्म नही होने दिया। मित्र ईश्वर ने तुम्हें वो ईनाम बख्शा है जो बड़े-बडे़ धनासेठो, बड़े-बडे शोषक समाज के ओहदेदारों को कभी नसीब नहीं हो सकता।
नरोत्तम- इसी भरोसे जिन्दा हूं दोस्त वरना ये शोषक समाज के लोग जीने कहा देते । खैर अपनी ओर से प्रयास भी बहुत किये। कहते है ना खुदा मेहरबान तो गदहा पहलवान। खुदा की मेहरबानी है वरना हम तो राख हो गये होते।
पुरूशोत्त्म- एक पुरानी कहावत याद आ रही है।
कामना- भाई साहब कहानी कहते सुनते रहोगे कि जलपान भी करोगे ?
पुरूशोत्त्म- जलपान भी करूंगा पर पहले कहावत सुनाकर ।
गगन- चलो सुना दो अंकल ।
पुरूशोत्त्म- कहावत ही नही हकीकत भी है हाथी चलता है तो कुत्ते भौंकते है। मित्र तुम अपने पथ से विचलित नही हुए आज लोग तुम्हारी बिटिया की नजीर देते नही थक रहे है चाहे तुम्हारे विरोधी ही क्यों न हो।
कामना- नाष्ता के प्लेट की ओर इशारा करते हुए बोली भाई साहब ठण्डा हो गया।
पुरूशोत्तम- इस घर-मंदिर का ठण्डा क्या बासी भी उत्तम रहेगा जिस घर में कलावती जैसी बिटिया हो चमन,गगन जैसे पुत्र और जैसे मां-बाप।
कामना- हाँ भाई साहब बच्चों के पढ़ाने के लिये और मेरे जीवन के लिये कलावती के पापा ने सर्वस्व स्वाहा कर दिया। इनके तपस्या का ही तो प्रतिफल है कि आज बिटिया दुनियां के कैनवास पर अपनी चिन्तन की कंूची चला रही है और चमन इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर दुनिया की दूरी कम करने में जुट गया है। भगवान ने चाहा तो गगन पढ़ाई पूरी कर मानवसेवा में लग जायेगा। यही कलावती के पापा की आस रह गयी है।
पुरूशोत्तम- आस भगवान जी जरूरी पूरी करेगें। भाभी नरोत्तम ने स्वाहा नहीं गृहस्ती के यज्ञ को सफल बनाने के लिये त्याग जरूरी होता है, वही नरोत्तम ने किया। ऐसा त्याग हर इंसान के बूते की बात नही। इसी त्याग का प्रतिफल है कि मुष्किलें खड़ी करने वाले लोग धूल चाटते रह गये। बिटिया इतनी बड़ी हो गयी कि हमारा सीना गर्व से चैड़ा हो जाता है।
नरोत्तम-बिटिया को बचपन में मुसीबतों का सामना करना,हमारी आर्थिक कमजोरी दर्द -दुख की पीड़ा में तपकर बिटिया बड़ी हुई इस दुख से मैं नही उबर सकूंगा पर बिटिया बड़ी होकर इतनी बड़ी हो गयी कि मेरे सारे दुख बौने हो चुके है।
पुरूशोत्तम- सचमुच बेटियां बहुत बड़ी होती है बस उन्हें उनके हिस्से का आसमान मिल जाये तो वे आसामान से उपर जा सकती है जैसे कलावती बिटिया बड़ी हो गयी।

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