“मित्र ने बताया कि हिंदुस्तान के विदेशी मित्रों ने देश को लबालब आर्थिक सहायता इस शर्त पर दी थी कि देश से गरीबी हटा दी जाएगी। मित्र राष्ट्रों से पर्यटक आते तो उन्हें गरीबी और भुखमरी को देखकर अच्छा नहीं लगता था। देश के हुक्मरानों ने सोचा कि गरीबों की बस्ती अलग कर दी जाय और इसी पर झगड़ा शुरू हो गया। अब तो इन गरीब बदमाशों ने लगभग देश के आधे हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया है। ये सब पुराने तरह के लोग हैं। इनकी हर चीज पुरानी है। इनकी शक्ल, सूरत, लिबास, इनकी पढ़ाई-लिखाई, इनके घर, मोटरें… वगैरह-वगैरह सब अलग तरीके के हैं। इस इलाके के लोग बहुत खतरनाक हैं। जब मौका लगे तो इन नए हिंदुस्तानियों पर हमला करते हैं।”

वैचारिक सकारात्मक नज़रिए के आधार पर निर्मित अनुभवों से भरे किसी लेखक की कल्पनाशीलता यथार्थ के कितने करीब सामयिक विश्लेषण कर सकने की क्षमता रखती है इसकी मज़बूत मिशाल है ‘नमिता सिंह’ की लगभग दो दशक पहले लिखी यह कहानी॰॰॰॰॰

बीस सौ इक्यावन का एक दिन

डॉ० नमिता सिंह

वह बीसवीं सदी का अंतिम दिन था।

रिपवान रात भर टेलीविजन पर नए साल के प्रोग्राम देखता रहा। टेलीविजन में कुछ गड़बड़ी थी। प्रोग्राम साफ नज़र नहीं आ रहा था और वह धुँधला रहा था। वह कब से नया टी.वी. लेना चाहता था लेकिन झंझटों के चलते नहीं ले पाया।  हालांकि पिछले दिनों अगर किसी चीज के दाम घटे थे तो वह टी.वी. ही था। उसने सोचा-और चीजों में लगातार महँगाई बढ़ रही है। रामजी कि कृपा से आटा, दाल, सब्जियाँ अन्तर्धान हो गई हैं। ‘दाल रोटी खाओ-प्रभु के गुन गाओ’ या ‘भूखे भजन न होई गोपाला’ जैसे मुहावरों की जगत बुद्धिजीवी और लेखक दूसरे नए मुहावरे गढ़ रहे थे। लेकिन टी.वी. के विज्ञापनों में एक से बढ़कर एक सुदरियाँ तरह-तरह के व्यंजन परोसती हैं। किस्म-किस्म के तेल, मसाले। पकवानों से भरे थाल। देख के दिल खुश हो जाता है। उसके सामने बैठकर नमक-प्याज, (ओह, प्याज कहाँ! पच्चीस रुपए किलो की प्याज-कब से नहीं खरीदी) नहीं… नमक-चटनी से भी रोटी खा लो तो अखरता नहीं। आखिर खिलाने वाली कौन है?

‘स्पाइसी गर्ल’ की अधनंगी… गोरी… मसालेदार लड़कियों के चीखते गानों और गरमाने वाली उछलकूद के बाद गुदगुदे गद्दों पर मुलायम तकियों से खेलते सुंदर स्वस्थ गदबदे बच्चों के साथ फूलदार खूबसूरत कंबलों का विज्ञापन था। विशाल पलंग। उस पर सोता हुआ चिंतारहित, सुखी नौजवान। साथ में पारदर्शी नाइटी पहने सुंदर, पूरे मेकअप से चेहरा सजाए खूबसूरत महिला। दोनों फूलदार कंबल को ओढ़े। दोनों के चेहरे पर स्वप्निल मुस्कुराहट।

वह हर्षित हो उठा। उसने सोती हुई लड़की को देखकर आँख मारी। फिर अपने लोहे के पाइप वाले फोल्डर को और गाँधी आश्रम की अपनी रजाई को देखा। खादी के लिहाफ वाली रजाई, मार्किन की खोल चढ़ी। तकिए, रजाई और गद्दे, कभी-कभी गमछे भी, वह गाँधी आश्रम से ही लेता है। देश भक्ति की भावना संतुष्ट होती है उसकी! उसे अचानक अपनी बुढ़िया होती बीवी बेसाख्ता याद आने लगी। वह कल ही दिल्ली जाएगा और उसे लिवा कर आएगा। बहुत रह ली मायके। कल नया साल है। वह अकेला कैसे रहेगा! और क्यों रहेगा!

वह बहुत थक गया था। दफ्तर की दिनभर की थकान। रात एक बजे तक टेलीविजन दर्शन। सवेरे उठकर दिल्ली जाने की सोचते-सोचते वह गहरी नींद में डूब गया। कैसी होगी नई सदी… कैसा होगा नई सदी का पहला दिन… यह सोचता हुआ वह सोता रहा… सपने देखता रहा… और सोता रहा।

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अचानक ऐसा लगा कि उसकी आँखों पर किसी ने सूरज के अनगिनत गोले दाग दिए हों। इतनी रोशनी। इतना ताप। उसने घबराकर आँखें खोलनी चाहीं। आँखें चैंधिया रही थीं। उसे लगा वह कोई बुरा सपना देख रहा था शायद।

कितना दिन चढ़ आया। उसे तो दिल्ली जाना था। हाथ-पैर क्यों नहीं उठ रहे? इतनी कमजोरी क्यों ? उसने गर्दन हिलाने का प्रयास किया और हाथ-पैर झटके। रोशनी धीमी हुई। उसने आँखें खोलीं। चेहरे पर मास्क बाँधे एक आदमी खड़ा था और एक आदमीनुमा रोबोट उसके ऊपर झुका हुआ था। उसकी आँखें खुलते ही वह यंत्रवत एक ओर हो गया। उसके सिर, पैर और पेट के ऊपर कुछ यंत्र भी छत से लटके हुए थे।

धीरे-धीरे आँखें खोलकर उसने अपने चारों ओर देखने की कोशिश की। वह हालनुमा कमरा था। बीच में एक मेज पर वह लेटा हुआ था। कमरा किसी प्रयोगशाला का आभास दे रहा था। उसके हाथ-पैर मेज के साथ बँधे थे, बिल्कुल उस मेढक की तरह जिसका डिसेक्शन किया जा रहा हो। तो क्या वह गिनीपिग बन गया है? उस पर प्रयोग किए जा रहे हैं? जिंदा आदमी पर प्रयोग… जैसे किसी दैवी ताकत के वशीभूत होकर उसने जोर-जोर से झटके देकर अपने हाथ-पैर मुक्त किए और उतरकर भागने की कोशिश की। उसके पदचापों से दरवाजे स्वतः ही खुल जाते थे और दीवार पर लगा अलार्म बजने लगता था।

वह अब सड़क पर था। यह रातोंरात क्या हो गया? वह एक अजनबी शहर था जहाँ कुछ भी जाना-पहचाना नहीं था। साफ-चैड़ी सड़कें थीं। न गड्ढे, न गंदगी से अटी हुई नालियाँ थीं, न सड़कों पर फैलता गटर का काला-बदबूदार पानी था। न सड़कों का पानी से कटाव, न फुटपाथ को घेरे हुए दुकानदार और न ही चिथड़े लटकाए, हाथ फैलाते काले-कलूटे भिखारी! ताज्जुब? यह उसका कस्वाई शहर तो कतई नहीं था। क्या विलायत का शहर है? लोग तो हिंदुस्तानी ही थे। पैदल चलने वालों की संख्या कम थी लेकिन थे सभी स्वस्थ और सुंदर। कोई बूढ़ी महिला सड़क पर दिखाई नहीं दे रही थी। सभी प्रफुल्लित थीं, जवान थीं। मोटरों पर चलने वाले लोग अधिक थे। सबसे सुखद था कि यातायात नियंत्रित था। उसके अपने नगर में तो ट्रैफिक पुलिस जैसी कोई चीज ही नहीं होती थी। ऊबड़खाबड़, गड्ढों से भरी सड़कों पर छोटी मोटर से लेकर लंबी लक्जरी मोटर गाड़ियों के साथ स्कूटर, साइकिल, रिक्शा, हाथ ठेला, ऊँटगाड़ी, बैलगाड़ी और घोड़ागाड़ी के साथ-साथ ट्रैक्टर तक रेलपेल में एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में रहते थे। ऐसी कोई जानवर-गाड़ी या रिक्शा, साइकिल नहीं दिख रहे थे। यहाँ तक कि दूध दुहने के बाद सड़कों पर छोड़ देने के कारण जहाँ-तहाँ पसरी गाएँ और छुट्टे घूमते साँड़ भी नहीं दिख रहे थे। रातोंरात क्या स्वर्ग उतर आया धरती पर… वह सोच रहा था।

वह फुटपाथ पर धीरे-धीरे चलने लगा। दोनों ओर ऊँची-ऊँची कई मंजिला इमारतें थीं। तभी उसे एक गेरुए रंग की मंदिरनुमा इमारत दिखाई दी। बाहर से अहाता और खूबसूरत लॉन दिखाई दे रहा था। इमारत पर एक साइनबोर्ड लगा था जिस पर बड़ा-बड़ा अंग्रेजी में लिखा था-राम मंदिर। अक्षर नियाॅन लाइट में चमक रहे थे। नीचे छोटे अक्षरों में उस क्षेत्र और वार्ड का नाम तथा मंदिर संख्या लिखी थी जो वह दूर से पढ़ नहीं पा रहा था। उसे याद आया, कुछ साल पहले ही तो… उसके नगर के चौक में भी एक राम मंदिर बनाया गया था। उसने भी सौ रुपए चंदे में दिए थे। दिये क्या थे, उस के चक्कर में मुहल्ले के छोकरे सौ का नोट छीन ले गए थे। उसका दिल बल्लियों उछलने लगा खुशी के मारे!

वह भीतर गया। लॉन के एक ओर पहाड़ बनाया हुआ था। पत्थरों के बीच पड़े पाइप से गिरता पानी झरने की शक्ल में था। उसने ठंडा पानी पिया। फिर घूमता हुआ मंदिर की ओर गया। शीशे के दरवाजे से झाँका। मंदिर सबेरे-शाम दो-दो घंटे के लिए खुलता था, इसलिए इस समय वहाँ कोई नहीं था। भीतर राम-सीता की आदमकद मूर्ति थी। कीर्तन की आवाज़ तो आ रही थी लेकिन कोई भी नहीं दिख रहा था। वह घूमता रहा, कमरों में ताक-झाँक करता रहा, आखिर कीर्तन कहाँ से हो रहा था। एक कमरे में दो प्रौढ़ व्यक्ति बैठे थे। पीले सिल्क का गाउन पहने वे कुछ पी रहे थे। गाउन के भीतर पहना कोट-पैंट साफ झलक रहा था। खिड़की से उसे झाँकते देख एक ने उठकर दरवाजा खोल दिया।

पूरा मंदिर एयर कंडीशंड था। वे लोग कम्प्यूटर पर कुछ काम कर रहे थे। कीर्तन वहीं से प्रसारित हो रहा था। सारा काम यंत्रचालित बटनों के जरिए होता था। थोड़ी देर बाद उन्होंने समय देखा। रिमोट कंट्रोल से पूरे मंदिर के दरवाजे बंद किए और अब वे चलने की तैयारी में थे।

रिपवान को उनसे मदद की जरूरत थी। एक नई दुनिया में वह अजनबी था। रिपवान उन पुजारियों को अपने बारे में बताना चाहता था। वे लोग फर्राटेदार अंग्रेजी बोल रहे थे। रिपवान अपने दफ़्तर में जूनियर क्लर्क था। वो अंग्रेजी समझ तो लेता था लेकिन अमरीकन लहजे में बढ़िया अंग्रेजी बोल नहीं सकता था। पहले तो उन्होंने उसे पागल समझा। फिर कहा कि गुरिल्ला नेशनलिस्ट पार्टी का जासूस है जो बाबा आदम का रूप बनाकर भेद लेने आया है। रिपवान बड़ी मुश्किल से उन्हें अपने बारे में समझा सका। उनमें से एक ने अंग्रेजी की एक लोक कथा रिपवान विंकल के बारे में पढ़ी थी। तब उन्हें उस पर यकीन आया।

हमारे इस रिपवान ने जब उन्हें बताया कि वह दिल्ली जाना चाहता है तो वह बहुत हँसे! कौन-सी दिल्ली? जहाँ वह खड़ा है वह भी तो दिल्ली है। पिछले पचास सौ सालों से दिल्ली रबड़ की तरह खिंच रही है। पचास साल पुरानी दिल्ली सिर्फ इतिहास की किताबों में है। पूरा कंट्री भी सौ हिस्सों में बँट गया है। हर हिस्सा एक प्रदेश है। हर प्रदेश की एक भाषा है, संस्कृति है, सभ्यता है। यहाँ हर संस्कृति की रक्षा की जाती है।

रिपवान अपनी पचास साला दाढ़ी पर हाथ फेरता सोचने लगा कि उसे कहाँ, कौन से हिस्से में रहना है! कहाँ जाना है! वह पचास साल तक सोता रहा! जागा तो जैसे किसी ग्रह, नक्षत्र में पहुँच गया है! उसका अपना शहर कहाँ हैं!

रिपवान ने उन अंग्रेजीदां पुजारियों से कहा कि वह उनके साथ सत्संग करना चाहता है। सत्संग से बड़ी-बड़ी समस्याएँ हल हो जाती हैं। पहले तो वह खूब हँसे। सत्संग! सुना है ऐसा कभी होता था। फिर वह गंभीर हो गए। उन्होंने तय किया, कल वे प्रेस कान्फ्रेंस करके उस बीसवीं सदी के रिपवान विंकल को सबके सामने पेश करेंगे और उसे अपनी खोज बताएँगे। एक इंटलेक्च्युअल पेटेंट उनके नाम होगा।

उस रात रिपवान की बहुत पढ़ाई हुई। देश की बड़ी हस्तियों के बारे में जानकारी हुई। अब जनता को पता ही नहीं था कि देश की प्रमुख हस्तियों में कौन वास्तविक है और कौन क्लोनिंग है। ऐसे कई नेता जो सौ की उम्र पार कर चुके थे लेकिन पूर्व की भाँति जवान और स्वस्थ बने हुए हैं। इसी महत्त्वपूर्ण नेता की हारी-बीमारी या उसकी गैर मौजूदगी से पार्टी नेतृत्व में उठने वाली समस्याओं का हल इससे निकल आया है। एक और जरूरी बात उसे बताई गई कि रिपवान को तुरंत अपना रजिस्टेªशन करा लेना चाहिए। गवर्नर के आफिस में सभी नागरिकों की फाइल कम्प्यूटर में दर्ज है। रजिस्टेªशन नंबर की जरूरत उसे कदम-कदम पर पड़ेगी। बिना नंबर उसे किसी दुकान से भोजन भी नहीं मिलेगा।

ऐसा…! वह ताज्जुब में पड़ गया। पुजारियों ने बताया कि मुक्ति सेना से बचने के लिए यह इंतजाम किया गया है। मुक्ति सेना के गुरिल्ले अक्सर हमला कर देते हैं। देश के एक हिस्से पर इन लोगों ने कब्जा कर रखा है। यह मुक्ति सेना बहुत बदमाश है। हमारी सरकार को देशद्रोही, जनविरोधी सरकार कहती है। उसे पश्चिम का दासानुदास कहती है। हमारे इलाके में हर चीज विदेश से आती है…. बढ़िया, फस्र्ट क्लास। हमारी फैक्ट्रियों को, हमारे सभी संस्थानों को, यहाँ तक कि सरकार भी यही विदेशी, मल्टीनेशनल चलाते हैं। आराम के साथ! हम लोग निश्चिन्त हैं… सुखी  हैं! लेकिन यह गुरिल्ला… सब मरभुक्खे हैं। इनके इलाकों में ऐसा ऐशोआराम नहीं मिलेगा। पता नहीं क्यों, हमारी सरकार और ये विदेशी भी डरते हैं उनसे। एक बार बमबारी कर दो, कीटाणु बम फेंक दो… सब खत्म हो जाए! लेकिन दोस्त… हवा पर बस नहीं है हमारा। असर हम पर भी हो जाएगा। इधर के लोग भी मरेंगे… इसलिए मजबूर हैं… दोनों पुजारी तैश में आ गए थे।

रिपवान सोच में पड़ गया। कहाँ जाय! उसका दिल नहीं लग रहा था। उसने तय किया कि वह एक बार दिल्ली के उस इलाके में जरूर जाएगा जहाँ कभी उसका परिवार रहता था।

वह स्टेशन पहुँचा। स्टेशन अद्भुत था। घूमता हुआ-रिवाॅल्विंग स्टेशन। स्टेशन दो दिशाओं में फैला था। एक ओर भूतल रेल सेवा और दूसरी ओर भूमिगत यातायात था। जिस रेलगाड़ी से उसे जाना था वह फूलों से सजी थी क्योंकि उस रेल कंपनी के मालिक का लड़का भी उसी रेलगाड़ी से पहली बार जा रहा था। ‘अरे वाह… अपनी रेलगाड़ी…’ वह बहुत आनंदित हुआ। उसके सहयात्रियों को उसे इतना खुश देखकर बड़ा कौतुक हुआ। उन्होंने उसका आनंद यह कहकर और बढ़ा दिया कि रेलगाड़ी क्या? लोगों के पास तो अपने हवाई जहाज हैं… हैलीकौप्टर  हैं… ‘यह सब अद्भुत हैं… एकदम विलायत जैसा’, उसने सोचा।

वह घूमता… भटकता रहा। परिवार का पता ठिकाना तो क्या मिलना था। सब इस हिंदुस्तान में मर खप गये होंगे । हो सकता है वे भी इन्हीं में से एक हों… रेलगाड़ी के मालिक-हवाई जहाज के मालिक। रातोंरात आदमी रंक से राजा हो जाता है। जैसे स्मगलर, चोर-लुटेरे हो जाया करते थे… छि… छि…. चोर-लुटेरा… उसे अपनी सोच पर शर्म आई।

लेकिन वह ढूँढता भी तो कहाँ ? पिछले पचास-साल से पूरे देश में भीषण घमासान हो रहा था। कई सेनाएँ काम कर रही थीं । केसरिया सेना, दलित सेना, वाम सेना, वानर सेना, मुस्लिम सेना, ईसाई सेना वगैरह-वगैरह। अलग-अलग सेनाओं का जोर था।

रात हो चली थी। उसे रास्ते में सफेद कपड़ा पहने एक आदमी दिखाई दिया। उसे देख अचानक उसे अपने गाँव के मास्टरजी याद आ गए।

‘पंडित राधेश्याम जी…’ उसके मुँह से निकल पड़ा। फिर ध्यान आया कि पचास साल पहले के पंडित जी क्या अब भी वैसे ही होंगे। लेकिन वह आदमी हाथ जोड़ने लगा….

‘गाली मत दो मेरे भाई। किसी ने सुन लिया तो अनर्थ हो जाएगा।’ वह ताज्जुब में भर गया। क्या सचमुच यह पंडित राधेश्याम ही हैं ?

‘नहीं! मैं उनकी आत्माहूँ । कोई दलित शरीर ढूँढ रहा हूँ प्रवेश के लिए,  भाई मेरे। पूरी जिंदगी बीत गई पितरों का पाप ढोते-ढोते… जूते घिसते-घिसते। कोई दलित शरीर… मिले तो मुक्ति हो मेरे भाई….’ और कहता हुआ वह तेज-तेज कदमों से हवा हो गया।

आगे बढ़ने पर एक इमारत सजी हुई थी। वहाँ से आती संगीत की स्वर लहरी सुन कर वह भीतर चला गया। भीतर विवाह स्थल था। पंडित जी के आसन पर एक रिकार्ड प्लेयर रखा था जिसमें रिकार्ड की गई विवाह की विधि चालू थी। दुल्हन की चुनरी के साथ तीन दूल्हे बँधे थे। वह सोच में पड़ गया। महाभारत में तो एक द्रौपदी और पाँच पांडवों का प्रसंग था। लेकिन अब ऐसा क्यों ? उसके जमाने में तो अक्सर कोई-कोई आदमी एक से ज्यादा औरतों से विवाह कर लेते थे, कभी जाहिरा तौर पर तो कभी छिप कर। दहेज में धन अलग प्राप्त करते थे। उस पर भी कभी पत्नियों चूल्हे से तो कभी स्टोव से, और कभी-कभी दिए से ही जल कर मर जाती थीं।

उसकी मित्रता वहाँ शादी में आए एक मेहमान से हो गई। मेहमान उस पुराने हिंदुस्तानी में कुछ अधिक ही दिलचस्पी ले रहा था। उसके बार-बार सवाल पूछने पर मेहमान ने खीजते हुए कहा, ‘क्या तुम्हें मालूम नहीं कि अब लड़कियों की संख्या कितनी कम रह गई है। कहाँ से मिलेगी हर लड़के को एक दुल्हन। अब तो किराए की कोख का चलन भी हो गया है। प्रयोगशाला में तैयार किए गए भ्रूण के लिए अब कोई औरत अपनी कोख किराए पर दे सकती है। अच्छा-खासा बिजनेस है यह। खूब तगड़ा किराया मिल जाता है।’

रिपबान शरमा गया। उसे एक बात बहुत अच्छी लग रही थी। सारी महिलाएँ सुंदर थीं। कोई बूढ़ी नज़र आ रही थी। उसके मित्र ने उसे अपनी एक परिचिता से और उसकी पुत्री से मिलाया। दोनों ही स्वस्थ, जवान थीं। मित्र ने बताया कि उस परिचिता की माँ भी ऐसी ही है। बड़ी बहन जैसी लगती है। रिपवान बहुत खुश हुआ। उसके जमाने में तो यह सब टेलीविजन के विज्ञापनों में ही होता था।

बहुत झिझकते हुए रिपवान ने अपने मित्र को बताया कि वह बेसहारा है और उसे ठिकाना चाहिए। उसका मित्र सचमुच दयालु था। वह उसे अपने यहाँ रख लेता। अरे… क्या है… वह उस पुराने हिंदुस्तान के जीते-जागते नमूने को देखने के लिए टिकट लगा देता। उसी में उसका खर्च निकल आता। रिपवान को मालूम पड़ा कि उसका मित्र जल्दी ही मंगल ग्रह की यात्रा पर जाने वाला है। इसलिए उसके यहाँ ठिकाना संभव नहीं। बहुत पैसा खर्च करके उसने अंतरिक्षयान में अपने लिए सीट रिजर्व कराई है। हाँ, अगर वह चाहे तो उसे पुराने हिंदुस्तानियों वाली बस्ती में पहुँचा सकता है।

वह उसकी टू-सीटर कार में बैठ गया। बहुत जोरदार कार थी वह। जरूरत पड़ने पर जमीन के ऊपर उड़ भी सकती थी और कुछ विशेष यंत्र लगाकर स्टीमर की तरह पानी में भी चलाई जा सकती थी।

चलने से पहले रिपवान के दयालु मित्र ने अपने मोबाइल फोन से विदेश में बस गए अपने बेटे से बात की। बेटे का चेहरा फोन पर लगे दो इंची स्क्रीन पर आ गया था। अंतरिक्ष यात्रा पर जाने से पहले मित्र को अपना दिल बदलवाना था क्योंकि डाॅक्टरों को उसका दिल उस यात्रा को झेल सकने लायक मजबूत नहीं लगा था। रिपवान बहुत खुश हुआ। वह भी अपना दिल बदलवा लेगा और नए जमाने का जवान हो जाएगा। उसका साथी हँसा। सब लोग ऐसा नहीं कर सकते। उसके लिए बहुत सारे पैसों की जरूरत होती है। ‘कितने रुपए…?’ उसने कहा। अफसोस। उसे पता चला कि मामला अब विदेशी पूँजी का था। अपने हिन्दुस्तानी रुपए की कोई वकत नहीं थी। विदेशी पूँजी… जिससे सब काम हो सकते थे… आसानी से। इलाज हो सकता था… पढ़ाई हो सकती थी-दिल का बदलना, अंतरिक्ष में जाना… और हमेशा सुंदर जवान बने रहना सबकुछ हो सकता था।

रिपवान का कमजोर-बूढ़ा दिल और डूबने लगा। उसके मित्र ने बताया कि अभी भी कुछ इलाकों में जड़ी-बूटियाँ उगाई जाती हैं और लोग उससे इलाज करते हैं। बाकी तो सबकुछ, जड़ी-बूटियाँ, घास-छाल, पेटेंट हो चुके हैं इसलिए दवा बना कर सीधे-सीधे उनको इस्तेमाल कर इलाज हो जाता है।

मित्र रिपवान को उसके गंतव्य तक ले जा रहा था। रास्ते में सुरक्षित मिलिट्री क्षेत्र पड़ा। उसका साथी बहुत पहुँचा हुआ व्यक्ति था इसलिए पूरे शरीर के साथ दिमाग और विचारों की भी स्क्रीनिंग के बाद उन्हें वहाँ से गुजरने की इजाजत मिल गई। वहाँ कई बड़ी इमारतें थीं। मिलिट्री की उच्च स्तरीय प्रयोगशालाएँ भी थीं। एक ओर सैनिकों की एक टुकड़ी परेड कर रही थी। यूँ तो परेड करते सैनिक दूर से हमेशा एक जैसे ही लगा करते हैं लेकिन यहाँ सभी वास्तव में एक जैसे शक्ल-सूरत, कद-काठी के थे। क्या प्लास्टिक सर्जरी से सब को एक जैसी सूरत का बना दिया गया है… उसने पूछा। उसके मित्र ने उसकी मूर्खता पर उसे घूरा। फिर उसके पचास साला लंबी दाढ़ी और सौ साला जर्जर शरीर को देखकर समझाया कि हिन्दुस्तान में भी बायो टेक्नोलाॅजी के जरिए वांछित गुण वाले जीन्स को मिलाकर साहसी, कठोर तथा एक सी शक्लों के भ्रूण प्रयोगशाला में तैयार किए जाते हैं। विकसित कर उन्हें जन्म दिया जाता है। फिर सरकारी बालगृहों में उन्हें पाला-पोसा जाता है और सेना के लिए तैयार किया जाता है। पिछली शताब्दी के खत्म होने के बाद देखा गया कि लोग फौज की नौकरी पसंद नहीं करते। अक्सर फौजी लोग घर, परिवार के लिए संवेदनशील हो जाते हैं। ये फौजी संवेदनारहित हैं और बगैर घर-परिवार के हैं। इन फौजियों के राजनीति से प्रभावित होने का खतरा भी नहीं है। प्रयोगशाला निर्मित ये फौजी मानव बहुत कारगर सिद्ध हुए हैं।

रिपवान सोच में पड़ गया। वह इन्हें आदमी कहे या मशीन… फौजी रोबोट-हाड़मांस वाला।

रिपवान परेशान हो उठा। वह जल्दी से जल्दी अपने जैसे लोगों के बीच जाना चाहता था। अपने मित्र से उसने जल्दी पहुँचाने के लिए कहा। शहर की ऊँची-ऊँची बहुमंजिला इमारतों, उनमें बसे हुए ठसाठस बाजारों से गुजरते हुए वह अब शहर के बाहर था। मित्र ने कहा कि वह अब और आगे नहीं जाएगा। यह उसे यहीं उतार देगा। रिपवान को लगा कि उसका साथी घबराया हुआ है। वह आगे जाने से डर रहा है।

मित्र ने बताया कि हिंदुस्तान के विदेशी मित्रों ने देश को लबालब आर्थिक सहायता इस शर्त पर दी थी कि देश से गरीबी हटा दी जाएगी। मित्र राष्ट्रों से पर्यटक आते तो उन्हें गरीबी और भुखमरी को देखकर अच्छा नहीं लगता था। देश के हुक्मरानों ने सोचा कि गरीबों की बस्ती अलग कर दी जाय और इसी पर झगड़ा शुरू हो गया। अब तो इन गरीब बदमाशों ने लगभग देश के आधे हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया है। ये सब पुराने तरह के लोग हैं। इनकी हर चीज पुरानी है। इनकी शक्ल, सूरत, लिबास, इनकी पढ़ाई-लिखाई, इनके घर, मोटरें… वगैरह-वगैरह सब अलग तरीके के हैं। इस इलाके के लोग बहुत खतरनाक हैं। जब मौका लगे तो इन नए हिंदुस्तानियों पर हमला करते हैं। ये गोरिल्ला छापामार पूरे देश को अपने कब्जे में कर अपना एक देश बना लेना चाहते हैं। हाँ… हाँ, ठीक वैसे ही जैसे इस सदी से पहले जर्मनी में हुआ था। लेकिन यहाँ तो उल्टा हो रहा था। वे हमें अपने में मिलाना चाहते हैं। हांलाकि एक पड़ोसी देश को मिलाकर अपना इलाका बड़ा करने की योजना हमारी ओर भी चल रही है। बहरहाल… मित्र वापस लौटने की जल्दी में था। उसने कहा कि वह अब देर तक नहीं रुकेगा। उसे लूट लेंगे वे लोग या फिर उसे बंधक बना लेंगे। घबराहट के मारे मित्र हाँफने लगा था।

रिपवान उस जंगल के रास्ते पर चलता हुआ फिर जैसे भीड़ में खोने लगा। उसका सिर चकराने लगा। पचास साल बाद का सच कौन-सा है। पीछे छूट गया वह या जो आगे आने वाला है। वह फिर उनींदा होकर गिरने लगा।

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