सौरभ शेखर की कवितायें समाज के वह प्रतिबिम्ब हैं जो समय के साथ चलते हुए अक्सर ही छोटी-बड़ी घटना, विचार और व्यक्तित्व के रूप में सामने आते हैं इन विभिन्न सामाजिक पहलुओं को शब्द और अभिव्यक्ति में पिरोने का कौशल आपकी रचनाओं को आत्मिक पठनीयता प्रदान करता है | सौरभ शेखर की  ऐसी ही चार कवितायें आज हमरंग पर …..| – संपादक 

बे-सिर-पैर की बातें

सौरभ शेखर

सौरभ शेखर

मैं कहूँगा कि हवा का एक चेहरा है
तो आपको ताज्ज़ुब होगा
और कहूँगा कि
हवा के चेहरे पर छींटे हैं खून के
तब तो आप ऐतराज़ ही करने लगेंगे |
मगर हवा का एक चेहरा भी है
और वह खून के छींटों से बदरंग भी हुआ पड़ा है
खून के छींटे इसलिए
कि ये हवा रौशन चरागों को चबाती हुई आई है
इससे क्या फर्क पड़ता है
कि आप चरागों को चराग तक नहीं मानते
मैं भी कौन सा आपकी बात मान लेता हूँ
जब आप कहते हैं
कि किसी ख़ास नेता की हवा है
दरअसल, मुझे तो हवा को किसी की बपौती मानने के ख़याल से
ही चिढ़ है
तो जैसे मेरी चिढ़ से आप बेपरवाह हैं |
मैं भी अपने राग अलापता ही रहूँगा
मैं कहता रहूँगा
कि बरसात में लाल रंग का पानी बरसता है
इस लाल धूप को सहते-सहते
पेड़ों के हरे पत्ते सूर्ख लाल हो गए हैं
रोज़ एक लाल रंग की काली रात
लाल आसमान से उतरती है
लाल-लाल तारे लाल आसमान में टिमटिमाते हैं |
मैं तो बे-सिर-पैर की बातें करता रहूँगा
लाल-लाल कवितायें लिखूंगा
और सड़क पर पड़े
हर लाल धब्बे को
एक सफ़ेद गोले से घेर आऊंगा
बिगाड़ लीजिये आप, मेरा जो बिगाड़ सकते हैं.
कोई भी लाल धब्बा मिटने नहीं दूंगा मैं |

आत्म-मुग्धता

लोग अपनी नौकरी की चर्चा करते थे
मातहत अपने हाकिमों की बखिया उधेड़ते थे
अपने आलिशान घरों में पार्टियाँ देते थे
अपने सजावटी कमरों पे रीझ उठते थे लोग
अपने पतियों, पत्नियों, बेटे, बेटियों, पोते-पोतियों, नाती-नातिनों
की रमणीक स्थलों पर मुस्कुराती तस्वीरें खींच रहे थे
लोग
तस्वीरें अनाथालय के बच्चों, बेसहारा और बेघर लोगों के साथ
भी ली जा रही थीं |
लोग अपने सोच की आधुनिकता पर सोचते पाए जाते थे
पुरस्कार, सम्मान, दुशाले और ट्राफियों की खबर खुद नहीं दी जाती थी
उनमे खुद को टैग कराया जाता था
लोगों को या तो अपने बोलने पर गर्व था
या अपनी सटीक चुप्पी का अभिमान
लोग स्वयं को कामुक घोषित करने की प्रगतिशीलता पर मुदित थे
अपनी ईर्ष्या को स्वीकार करने के साहस से उपजे दंभ
को वे उचित ठहराते थे
चालाकी छुपाई नहीं जाती थी
मगर लोग इस हद तक आत्मालोचन में रत थे
कि दोस्तों से अपनी त्रुटियाँ गिनाने का आग्रह करते थे |
बस एक बात थी!
लोगों के भीतर जाने का कोई रास्ता नहीं था
लोग खुद अपने भीतर यूँ फ़ैल कर बैठे थे
कि उन्होंने आने-जाने की सारी जगह छेक ली थी |

तस्वीरें   

कैमरे में कोई हज़ार से ज्यादा
तस्वीरें होंगी
उन्हें इकठ्ठे देख पाना तो मुश्किल है हीं
अगर याद करना पड़े कि
कौन सी तस्वीर कहाँ हो सकती है
तो और मुसीबत
लैपटॉप तस्वीरों से भरा है
उनमे खुद की उतारी
तस्वीरों के अलावा
दूसरों के द्वारा उतारी गई
तस्वीरों का भी जखीरा है
तस्वीरें फेसबुक, ट्वीटर पर भी हैं
कुछ यादगार तस्वीरों को
फ्रेम में जड़ कर
घर की दीवारों पर टांगा गया है
कुछ शेल्फ में करीने से
सजाई गईं हैं
एल्बम में पड़ीं तस्वीरों की भी
कतई कमी नहीं है
बीते हुए समय की गवाह
नई और पुरानी कई तस्वीरें
यूँ हीं बेतरतीब
आलमारी में पड़ी हैं
उनमे से कुछ एक दूसरे से चिपक रही हैं
कुछ पीली पड़ रही हैं
कुछ पर सफ़ेद धब्बे सा
कुछ चस्पां होने लगा है
लेकिन
कुछ तस्वीरें कहीं नहीं हैं
न कैमरे में
न लैपटॉप में
न फ्रेम में
न एल्बम में
न तस्वीरों के मलबे में
वे गुम नहीं हुई हैं
वे धुंधली पड़ने का नाम नहीं लेतीं
वे आँखों में टंगी हुई है
शायद.

बच्चे:जवान:बूढ़े

बच्चे लगभग सारे ऐसे थे
जो समय से पहले बड़े हो चुके थे
कुछ ऐसे भी थे
जो बुढा गए से लगते थे
और उन्हें ‘प्रोजेरिया’ भी नहीं हुआ था
जवान
बहुधा अपने बचकानेपन से बाज नहीं आ रहे थे
कुछ जवान, जवानों की तरह
तन कर भी खड़े थे
तो बूढों की तरह झुक चुके
जवानों के नज़ारे भी आम थे
अधिकांश बूढ़े या तो मंदिर में बैठे थे
या खांस रहे थे
कुछ जरूर बच्चों की तरह ललचा रहे थे
जबकि कुछ बूढों के भीतर
बेपनाह जवानी जोर मार रही थी
वे वर्जिश कर रहे थे.

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    By: सौरभ शेखर

    जन्म: 7 जनवरी, 1977, मुज़फ्फ़रपुर,बिहार
    शिक्षा: एमए (अंग्रेजी साहित्य)
    युवा ग़ज़लकार, कवि, आलोचक.
    • उर्दू की कई पत्रिकाओं में ग़ज़लें और नज्में प्रकाशित.
    • विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, अखबारों के लिए नियमित अनुवाद और लेखन.
    • राष्ट्र-स्तरीय मुशायरों में शिरकत, रेडियो और टीवी पर ग़ज़ल पाठ.
    राज्य सभा सचिवालय में उप निदेशक के तौर पर कार्यरत.
    पता: एफएफ-13, वरदान अपार्टमेन्ट, अभय खंड-III, इंदिरापुरम, गाज़ियाबाद
    मोबाइल: 9873866653
    ईमेल: [email protected]

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