‘सूर की कविता  का समाज’ और ‘मीरा के काव्य में सामाजिक पहलू’ दो ऐसे महत्वपूर्ण कवियों के विषय में लिखा गया लेख है जो प्रायः हिन्दी साहित्य के आलोचकों के उतने प्रिय विषय नहीं रहें है एवम् इनकी काव्यों में सामाजिक सरोकारों को लेकर विचार बहुत कम हुआ है परन्तु यहाँ ये कमी कुछ हद तक पूरी होती नजर आती है !…. ‘आशीष जायसवाल’ का आलेख 

भक्ति आन्दोलन और काव्य: 

आशीष जयसवाल

भक्ति आन्दोलन और उसकी आलोचना वैसे तो हिन्दी साहित्य के विद्वानों एवम् पाठकों के लिए कोई नया विषय नहीं है ! समय-समय पर बहुत से आलोचकों एवम् विद्वानों  ने इस पर कलम चलाई है जिनमे रामचन्द्र शुक्ल ,हजारी प्रसाद से लेकर रामविलाश शर्मा एवम् शिवकुमार मिश्र जैसे लोग शामिल हैं !परन्तु ये किताब कई संदर्भों में बिलकुल नई है ! ये भक्ति को एक ख़ास बाइनरी में देखने की प्रवृत्ति को तोड़ती नजर आती है ! ये किताब शुक्ल जी एवम् द्विवेदी जी जैसे विद्वानों के अवधारणाओं पर आँख बंद करके विश्वास नहीं करती वरन जगह-जगह  बहुत सी नई स्थापनाओं को उद्घाटित करती है !

इस किताब में पाठकों को एक और दिलचस्प चीज देखने को मिलेगी वो है कि यहाँ  (सगुण या निर्गुण के प्रति सामान श्रद्धा ) या यूँ कहें तो तुलसी और कबीर को यहाँ एक साथ लेकर चलने का प्रयास किया गया है जो अपने आप में बिलकुल नई और अनूठी अवधारणा है !

इस किताब में कुल १२ लेख है जो भक्ति काल के भिन्न –भिन्न महत्वपूर्ण  कवियों  एवम  उस दौर के विवादित चिन्तनों पर आधारित है ! इनमे से कुछ लेख पहले भी किताबों अथवा पत्रिकाओं में छप चुके है परन्तु भक्ति काव्य पर इतने  विवादित एवम् महत्त्वपूर्ण लेखों का एक साथ होना हिन्दी साहित्य में रूचि रखने वाले पाठकों के लिए बहुत ख़ुशी  की बात है ! इन लेखों की एक ख़ास बात ये भी है कि ये लेख सम्बंधित विषयों पर विस्तार से चर्चा कर उचित तर्कों के साथ बहुत सी नई स्थापनाएं देते हैं !

इस किताब का पहला लेख – ‘भक्ति आन्दोलन के सामाजिक आधार’ भुत ही महत्वपूर्ण लेख है जो भक्ति आन्दोलन के मूल कारणों की छानबीन करता है !इसके केंद्र में केवल हिन्दी साहित्य के आलोचकों के विचार ही नहीं है वरन ये लेख इरफ़ान हबीब, हरबंस मुखिया, सतीश चन्द्र जैसे शुद्ध इतिहासकारों के  नजरिये से भी आन्दोलन को देखता है एवम् इसके सामाजिक ,आर्थिक, सांस्कृतिक एवम् अन्य पहलुओं पर उचित तर्कों के साथ  विचार करता है  एवम् अपना एक मौलिक निष्कर्ष देता है !

दूसरा लेख – ‘भक्ति काव्य :लोक बनाम शास्त्र’ इस लेख में लोक बनाम शास्त्र के आधार पर भक्ति काव्य का अध्ययन ,एवम् उनके आधार पर निकाले गये निष्कर्ष पर विचार करता है जो बहुत से प्रासंगिक प्रश्नों को हमारे समक्ष रखता है इसलिए ये लेख बहुत ही महत्वपूर्ण है !

इसी कर्म में तीसरा लेख भक्ति काव्य : ‘वैकल्पिक समाज का सौन्दर्य’ है जो सगुण-निर्गुण संतों के वैकल्पिक धर्म एवम समाज के स्वप्न की विकास यात्रा को दिखाता है ! एवम् इसके साथ किस प्रकार इस आन्दोलन ने भारतीय जीवन को सम्पूर्णता में प्रभावित किया इस लेख में दिखाया गया है !

लेखक- गोपेश्वेर सिंह
प्रकाशन- वाणी प्रकाशन ,
मूल्य 200

इस किताब में भक्ति आन्दोलन के कुछ महत्वपूर्ण कवियों पर खुलकर विचार किया गया है एवम् इनमे कुछ ऐसे कवियों भी हैं  जिनपर हिन्दी साहित्य में बहुत ही कम विचार किया गया है , जैसे – (शंकरदेव ) यहाँ सिर्फ इनका जिक्र ही नहीं किया गया है बल्कि इनके सामाजिक सरोकारों का भी विस्तार  पूर्वक उल्लेख किया गया है !

इस किताब में कबीर पर 3 बहुत ही सुंदर लेख लिखे गये हैं

 – कबीर और उनका रहस्यवाद

 –  कबीर : कल ,आज और कल

 –  कबीर के बारे में एवेलिन अंडरहिल

इन तीनों लेखों में से पहला लेख कबीर के रहस्य भावना पर आधारित है जो बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि आमतौर पर कबीर को सामाजिक संदर्भों में ही याद किया जाता है जिससे उनके रहस्यवाद वाला पहलू अनछुआ रह जाता है पर यहाँ इसी महत्वपूर्ण बिंदु को पाठक के समक्ष लेन का प्रयास किया  गया है ! इसके अलावा दूसरे लेख  में मूलतः कबीर की भूत,भविष्य,एवम् वर्तमान को लेकर उनका  महत्वपूर्ण विचार है ! तीसरा लेख मूलतः एक अनुवाद है जो ‘पोएम्स  ऑफ़ कबीर’

का भूमिका ‘इंट्रोडक्शन’  है जिसका बहुत ही सुंदर भावानुवाद यहाँ देखने को मिलता है !

‘सूर की कविता  का समाज’ और ‘मीरा के काव्य में सामाजिक पहलू’ दो ऐसे महत्वपूर्ण कवियों के विषय में लिखा गया लेख है जो प्रायः हिन्दी साहित्य के आलोचकों के उतने प्रिय विषय नहीं रहें है एवम् इनकी काव्यों में सामाजिक सरोकारों को लेकर विचार बहुत कम हुआ है परन्तु यहाँ ये कमी कुछ हद तक पूरी होती नजर आती है !

इस लेख के बाद इस किताब का एक और महत्वपूर्ण लेख से हमारा परिचय होता है ! ये लेख है – ‘तुलसीदास अझेल हमलों के बीच’ दरअसल अक्सर तुलसीदास के ऊपर आक्षेप लगाया जाता  है रहा है कि वे ब्राह्मणवादी एवम् वर्ण व्यवस्था  के समर्थक थे और उनके साहित्य में भी ये परिलक्षित होता है ,और  इसकेचपेटे में  केवल यही नहीं आते बल्कि उनको अपना प्रिय कवि मानने वाले महान आलोचक रामचन्द्र शुक्ल  को भी ब्राह्मणवादी होने का आक्षेप झेलना पड़ता है परन्तु  इस लेख में उचित तर्कों के साथ इसका खंडन किया गया है एवम् एक बहुत ही सुन्दर संस्मरण द्वारा तुलसीदास की लोकमंगल की धारणा को स्थापित किया गया है  !

इस लेख के बाद हमारा परिचय  इस किताब के सबसे महत्वपूर्ण लेखों में से एक  से परिचय  होता है जो – ‘शंकरदेव’ को केंद्र में रखकर लिखा गया है ! ये बहुत ही सुन्दर बात है कि शंकर देव जैसे कवि जिनपर हिन्दी  में बहुत लम लिखा गया है उनके काव्यों एवम् सरोकारों को सबके समक्ष लाना ! इस लेख में कई मौलिक संदर्भों को प्रस्तुत किया गया है इसलिए  ये लेख हिन्दी साहित्य में एक विशिष्ट स्थान रखना है !

शंकरदेव के बाद लेखक का ध्यान मुक्तिबोध पर गया गया है , यहाँ मुक्तिबोध  के भक्ति काव्य के सन्दर्भ में लिखे एक  लेख को केंद्र में रखकर उनकी आलोचना की गयी है एवम् उचित तर्कों के साथ उनसे असहमति दिखाई गयी है ! इसके बाद  इस किताब  का अंतिम लेख आता है जो मध्यकालीन कविता के अध्ययन अध्यापन की समस्याओं  पर लिखा गया है, दरसल ये लेख मूलतः एक संगोष्ठी में दिया गया उनका वक्तव्य है ! इस लेख में भक्ति काव्य को केवल ‘काशी सेंट्रिक’ दृष्टि से देखने का विरोध किया गया है और भक्ति काव्य को सिंगुल के बजाय यहाँ प्ल्यूरल में देखने का आग्रह किया गया है ! इसके अलावा हिन्दी के पाठ्यक्रम पर पुनर्विचार ,आदिकाल और मध्यकालीन साहित्य को रुचिकर तरीके से पढ़ाने पर विचार किया गया है जिससे शिक्षकों एवम् छात्रों के बीच रागात्मक सम्बन्ध स्थापित हो !

इस प्रकार हम देख सकते हैं इस किताब के सभी लेखों में भक्तिकाल एवम् उनके महत्वपूर्ण कवियों के संदर्भ में बहुत सी नई स्थापनाओं को उद्घाटित किया गया है जो आजतक हिन्दी से अछूते थे एवम् बहुत सी ऐसी विवादित विषयों को तर्कपूर्ण ढंग से यहाँ सुलझाया गया है जो  आज तक अनसुलझे थे ! इसलिए ये किताब हिन्दी साहित्य एवम् इनके पाठकों के लिए मील  का पत्थर साबित होगी !

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