हमारी वर्तमान सांकृतिकता की विरासतीय थाती लोक भाषा, बतकही, किस्से-कहानियाँ, मानवीय चेतना की विकास प्रक्रिया का पहला और महत्वपूर्ण पायदान रही है | लोक या दन्त कथाओं, किस्सों में उच्चरित वर्गीय चरित्र और संघर्ष आज भी न केवल साहित्यिक वातावरण के लिए संजीवनी है बल्कि वर्तमान राजनैतिक साजिशों, और सामंती या पूंजीपतियों दवारा आमजन के खिलाफ रचे जा रहे कुचक्रों को अपनी भाषा  एवं भौगोलिक परिस्थितियों के माध्यम से समझ पाने का आसान और रचनात्मक विकल्प भी है |  यही सामाजिक और साहित्यिक सरोकार ‘सुभाष चन्द्र कुशवाह’ की कहानी दृष्टि को विशेष बनाते हैं | वर्तमान और तात्कालिक चुनौतियों का पुनर्मूल्यांकन करती आपकी कहानी में लोकभाषा और किस्से और पात्र कुछ इस तरह शामिल होते हैं कि लगे यह कल की नहीं आज की ही बात है | हमरंग पर प्रकाशित आपकी इस कहानी को पढ़ते हुए निश्चित ही आप इसी अनुभव से गुजरेंगे |..– संपादक 

सुभाष चन्द्र कुशवाह

        सुभाष चन्द्र कुशवाह

भटकुंइयां इनार का खजाना

वैसे तो यह कहानी बिसुनपुर गांव के भटकुंइयां इनार के बहाने लिखी जा रही है पर पढ़ाकू लोग चाहें तो किसी न किसी बहाने, इस कहानी के सिर-पूंछ का नाता अपने गांव से भी जोड़ सकते हैं । ऐसा करने में न कोई रोक है, न टोक । न मेरे जैसे घुरहू-कतवारू ने इस कहानी को पेटेंट करा रखा है । आप समझदार हैं और जानते हैं कि इस देश के घुरहू-कतवारू की औकात कितनी है ? भूल गए भोपाल गैस त्रासदी और एंडरसन के पलायन को ? इस कहानी के माध्यम से आप चाहें तो विकास की रीति-नीति का विश्लेषण भी कर सकते हैं और घुरहू-कतवारू की जिनगी में लबालब भरे देशी दारू-वारू का निचोड़ भी । वैसे आप हमारे गांव के बाबू साहब को एंडरसन समझने की गलती न करें । बाबू साहब एंडरसन की तरह भगेड़ू नहीं हैं । वह जानते हैं कि गांव में मीडि़या-वीडिया का डर-भय नहीं रहता।
खैर ! बताना यह है कि सांसद, विधायक निधि और प्रधान मंत्री ग्रामीण सड़क निर्माण योजना जैसे तमाम विकास परक अभियानों के बावजूद राष्ट्रीय राजमार्ग से दक्षिण, सात किलोमीटर दूर स्थित बिसुनपुर गांव तक गाड़ी-घोड़े से पंहुचना आसान नहींं है । बरसात के तीन-चार महीनों में तो कतई नहीं । एक बार इस गांव को जोड़ने वाली सड़क के निर्माण का ठेका बाबू साहब ने अपने हाथों में लिया था । विधायक जी वोट दिलाने के बदले उन्हें उपकृत करना चाहते थे । उन्होंने विधायक निधि से न केवल सड़क निर्माण की स्वीकृति दी अपितु ठेका भी बाबू साहब को ही दिया । काम वैसा ही हुआ जैसा दूर-देहातों में ठेकेदार कराते हैं । सात किलोमीटर मिट्टी-गिट्टी की भराई हुई, रोलर चला और काम पूरा हो गया । अगले बरसात में न मिट्टी रही न गिट्टी । बरसाती बहाव का रुख कुछ ऐसा रहा कि बाबू साहब के घर-आंगन, द्वार सब पक्के हो गए । ट्रैक्टर उनके पास था ही, मोटरसाइकिल की जगह नई जीप आ गई जो वैसी सड़क के लिए उपयुक्त थी । गांव वालों के पास अपने पांव, साइकिलें या मोटरसाइकिलें थीं जिनसे वे लीक पकड़ कर धीरे-धीरे चल लेते थे । बाबू साहबों से ज्यादा तेज चलना भी तो ठीक नहीं होता । कींच-कांच या पांक हाबते चलेंगे तो मजबूत रहेंगे । मजबूत रहेंगे तो मजदूरी करेंगे ।
तो कहानी यह है कि किसी जमाने में बिसुनपुर गांव के आसपास के जंगली इलाके में बंजारों का राज था । अपने कुल-खानदान के साथ जगह-जगह बंजारे रहते थे । इधर-उधर दबे, बचेे भटकुंइयां इनार उन्हीं लोगों ने खुदवाया था । बिसुनपुर गांव के दक्खिन जंगल के किनारे स्थित भटकुंइयां इनार को बंजारों ने ही खुदवाया था, ऐसा गांव के बुजुर्ग बताते हैं । उस अजूबे इनार की तमाम दिलचस्प कहानियां गांव वालों के जेहन में जिंदा थीं । हर कोई सांसों को तानते हुए, हाथों को फैलाते हुए उन कहानियंों को नमक-मिर्च मिलाकर चटकदार बनाता और बताता-‘बाप रे बाप ! ऐसा इनार कि मनई समा जाये तो डर के मारे प्राण निकल जाये । पतला इतना कि दो आदमी एक साथ समायेें तो अड़स जाएं । गहरा इतना कि पाताल छू जाये । ऊपर से नीचे तक पतली-पतली र्इंटों से जड़ा वह इनार भुतभुवाइन लगता था । उसमें पानी इतना था कि बांस की लग्गी डालने पर पाताल का पता न चलता और ठंडा इतना कि जेठ-बैसाख में कंपकंपी छुड़ा देता ।
यह बात तब की है जब ढेंकुल से सिंचाई होती थी । ढेंकुल, बरहा, छीप के जमाने में भटकुंइयां इनार की पुछार ही पुछार थी । दक्खिन टोला वाले तो उसी भटकुंइयां के पानी से सिंचाई करते, अपने माल-मवेशियों को नहलाते और प्यास बुझाते । कुल मिलाकर भटकुंइयां दक्खिन टोले का प्राण था । लोगबाग शादी-ब्याह के अवसर पर काली माई, बरम बाबा और डीहवार बाबा की पूजा के साथ-साथ भटकुंइयां की भी परिक्रमा कर लेते । दीपावली के दिन घर-घर से एक दीया भटकुंइयां पर जलाया जाता । गांव वालों का विश्वास था कि ऐसा करने से इनार में वास करने वाला बुडुवा शांत रहता है। गांव को नुकसान नहीं पहुंचाता । भोर-भिनसारे पानी भरने जाने वाली जवान औरतों पर बुरी नजर नहीं डालता । भटकुंइयां इनार दक्खिन टोले से ऐसा घुला-मिला था कि बूढ़े-जवान, औरतें, लड़के-बच्चे सब दिन में एकाध बार इनार पर ताक-झांक कर आते । शैतान बच्चे तो इनार में पटा कर झांकते और तरह-तरह की आवाज निकाल कर खेलते । पानी में रहने वाले मेंढकों और पनिहवा सांपों को ढेला मार पदाते और डुबकी लगाने को मजबूर करते ।
भटकुंइयां इनार में चाहे सौ गुण हो, चाहें दक्खिन टोले का उसके बिना काम न चलता हो, बबुआन के लिए तो वह बेकार ही था । बंजारों के खुदवाये इनार की न तो वे पूजा कर सकते थे, न दक्खिन टोले के उस पतले इनार की परिक्रमा करने बबुआइनें आतीं । वैसे भी दक्खिन टोला यानी कि कोइरी-कोंहार, अहीर, धोबी, तेली, जुलाहा, हजाम, लोहार, डोम-चमार बिरादरी के टोले में बाबू साहब लोग मजदूरों को हांकने के अलावा जाते ही कब ? उन्होंने अपने खेत-बगीचे की सिंचाई के लिए चौड़े आकार वाले कुएं खुदवा लिए थे । चौड़े आकार वाले कुंओं में एक साथ दो-दो ढेंकुले ओहरी पर चला करतीं । बाबू साहबों के बड़े-बड़े खेतों के लिए बड़े कूंडें़, बड़ेे बरहे और बड़ी छीपों से ही सिंचाई संभव थी । भटकुंइयां जैसे इनार में न तो एक साथ दो ढेकुलें चल सकती थीं और न बड़े खेत सींचे जा सकते थे । सौ बात की एक बात यह कि भटकुंइयां रेंगन-बुद्धन का इनार था ।
एक दिन दक्खिन टोला, टोला न रहा, गांव में तब्दील हो गया । फैलते-फैलते, सरकते-सरकते वह दक्खिन से और दक्खिन निकल गया । कभी टोले के किनारे स्थित भटकुंइयां इनार, देखते ही देखते टोले में समा गया । इनार से सटेे जंगल का आकार घटते-घटते खरहुल में तब्दील हो गया । विकास और आबादी का फैलाव सिर्फ जमीन-जायदाद को ही नहीं लीलता, पेड़-पौधों और प्रकृति को भी भकोसता चलता है । सो भटकुंइयां इनार के पास का जंगल, आबादी बढ़ने और कुछ बाबू साहबों के साफ-सफाई की नीति से सिकुड़ता चला गया था । चीं-चीं, चांव-चांव, टिह-टिह, कांव-कांव के स्वर दबते चले गये थे । कुछ बबुआनों की बंदूकों की ठांय-ठांय के कारण तो कुछ बसेरा उजड़ जाने के कारण ।
पहले तो संझवत की बेरा सारी बंसवारी चिरई-चुरुंग से खचाखच भर जाती थी । आजकल के युवकों की तरह उनमें विदेशी मोह या ब्रेन-ड्रेन का जमाना तो था नहीं, सो हवा संग दूर देश विचर आये परिंदे, अपने ठौर-ठिकाने पर लौट आते थे । खानदान का बटोर होते ही कलरव शुरू हो जाता था। वे बाहर से खा-पीकर आते और बंसवारी में हगते-मूतते । हरे-भरे पत्तेे हगने से सफेद या चितकाबर नजर आते । अंधेरा होते ही पोखरा-पोखरी से लौट आये बगुले यहां आलिंगनबद्ध होते, अपनी प्रेमिकाओं से आंख लड़ाते या असफल होनेे पर चोंच-युद्ध पर उतारू हो जाते । हो सकता है उस बंसवारी में परिंदों के हीर-रांझा की कहानियां लिखी गई हों जो हमारे ज्ञान क्षेत्र की परिधि से बाहर होने के कारण समझ में न आ सकींं हों ।
जंगल के उजड़ने के बावजूद भटकुंइयां इनार पर गांव के बच्चों का बटोर होता रहा । कुछ लोग ढेंकुल चलाते समय बिरहा टेरते या निर्गुन के करुण स्वरों से सरेह के सन्नाटे में सेंध लगाते गाते – ‘काहेंे ना सुधारे आपन काजा ये साधो, काहें ना ….. ।’
बूढ़े, बुजुर्गों का कहना है कि सुख की सत्ता छोटी होती है और दुख का महाजाल घना । एक दिन भटकुंइयां इनार पर किसी की नजर लग गई या बंजारों का श्राप, गरीब-गुरबों का स्नेह, आदर और पूजा-पाठ की प्रतिबद्धता उसकी रक्षा न कर पाया । उसके हरे-भरे दिनों को वक्त के सुखार ने सुखा दिया और आस-पास का चुहल, बटोर और बच्चों की हंसी, अठखेलियों को निवाला बना लिया ।
गांव के बूढ़े, पुरनिया बताते हैं कि एक दिन बड़का बाबू खिसिया गये । बीख के मारे फुफकारने लगे । लगा जैसे दक्खिन टोले को डंस कर मुआ देंगे । टोले में घूम-घूम कर गरिआने लगे-‘इ साले इनार की जगत बनवा दिये होते तो हमार बछरू कुएं में गिर कर नहीं मरता न ! झाड़-झंखाड़ और खरहुल के बीच भटकुंइयां इनार का अता-पता आदमी को चार हाथ दूर से नहीं लग पाता है, वह तो जनावर ठहरा ।’
भटकुंइयां इनार के भरवाने के पीछे कारण मात्र इतना ही था कि एक दिन रात में बड़का बाबू का बछरू पगहा तुड़ा कर भाग गया और दक्खिन टोले के कोइरी लोगों के कोड़ार में जाकर चरने लगा । हरे-भरे कोड़ार को चरने का सुख बटोरते-बटोरते उसके पांव बंसवारी की ओर बढ़ चले । घास-फूस से घिरे, बिना जगत के भटकुंइयां इनार का उसे आभास न हुआ और वह धड़ाम से इनार में जा गिरा । एक तो पतला इनार, दूसरे रात-बिरात का वक्त, बछरू के डेकरने की आवाज गांव तक न पहुंच सकी । गदबेर के समय बछरू की खोज शुरू हुई । बाबू साहब के आदमी तनिक मुन्हरके में बारी-बगीचा, खरहुल, बंसवारी सब धांग दिये पर बछरू का पता न चला । चोर-उचक्कों की क्या मजाल जो बाबू साहब के बछरू खोल ले जायें । हर कोई आंख खोलते ही बछरू के लिए बेचैन दिखने लगा । उधर भोर-भिनसारे दक्खिन टोले की औरतें जब भटकुंइयां में पानी भरने गईं तो बाल्टी कुएं के पानी तक जाने के बजाय बीच में अटक गया । औरतें बउरा गईं । हाय दईया । ई का हुआ ? इनार के बीच में का फंसा है ? जब तनिक फरछीन हुआ तो पता चला कि बछरू तो भटकुंइयां के बीच में मरा फंसा है । जीभ बाहर और गरदन मुड़ी हुई थी । क्षण भर में बात पूरे गांव में फैल गई । बरहा बांधा गया । रस्सा नीचे डाला गया । गांव के सबसे अनुभवी बद्री पहलवान नीचे उतरे । बछरू को रस्से में बांध कर बाहर खींचने का काम शुरू हुआ । महिलायें उस दृश्य को देख आंचल से मुंह ढंक आह भरने लगी थीं ।
बस उसी खीसी में बड़का बाबू ने अपने कारिंदों को बुलाकर भटकुंइयां इनार भरने का हुक्म सुना दिया । …ना रहे बांस ना बाजे बांसुरी ।
भटकुंइयां इनार क्या भरा, दक्खिन टोला भरा गया हो जैसे । लोग उदास हो गये । लड़के अनाथ, बेसहारा दिखने लगे । टोले में दूसरा इनार न था और बबुआन लोग अपने इनार पर छोट जाति वालों को जाने न देते । सो टोले वाले और उनके मवेशियों के लिए पास के सतुरहिया तालाब का पानी पीने के अलावा अन्य विकल्प न था ।
अब बिसुनपुर गांव के दक्खिन टोले में न जंगल का विस्तार बचा था न भटकुंइयां इनार । भर दिये गये भटकुंइयां इनार के उचास पर तब भी बूढ़े-बुजुर्गं का बटोर होता । बटोर होता तो पुराने किस्से-कहानियां स्वतः जुबान पर आ जातीं । उन किस्से-कहानियों में भटकुंइयां इनार के महातम का बखान होता । गंवई जन मानस में भरा इतिहास किस्से-कहानियों में बचा रहता है। तभी तो दक्खिन टोले के मरद-मेहरारू जियरा के हूक मिटाने के लिए बंसवारी को जंगल कहते और भटकुंइयां के उचास पर पहले की भांति दिया-बाती जला आते । शादी-ब्याह के बाद इनार की परिक्रमा के नाम पर भटकुंइयां के उचास की परिक्रमा होती ।
भटकुंइयां इनार से मोह आजकल के लोगों के लिए बेमतलब की बात हो सकती है पर बिसुनपुर के लिए मरा हाथी भी सवा लाख के बराबर था । बबुआन के दुआर की शोभा जिस तरह हाथी से होती थी उसी तरह दक्खिन टोले की शोभा भटकुंइयां से थी । तभी तो बतकही में इनार और जंगल जिंदा रहे । बंसवारी के बड़का बांस और कटबांसी के झुरमुट आपस में गदरा कर गसागस समा गये थे जो जंगल का मजा देते । जामुन, बहुआरि, सेमर, गूलर, सिहोर के गाछ आपस में अंकवार दे कर ऐसे गंथा गये थे कि दिन में ही अंधेरा लगता । मेहरारू तो सिहोर के पेड़ की चुड़इल और पास के सतुरहिया पोखर के बुड़ुवा के डर के मारे अकेले बंसवारी में जाने की हिम्मत न करतीं । दिशा-फरागी के खातिर जब उन्हें जाना पड़ता तो गिरोह बना कर जातीं । बंसवारी के भूत-प्रेत और चुड़ैलों का डर मन में ऐसा समाया हुआ था कि कौआ की बोली और सियारिन का फेंकरना, हाड़ कंंपा देता ।
बूढ़ों ने गांव में यह बात फैला दी थी कि भटकुंइयां इनार में बुड़ुवा रहता था। बड़का बाबू के बछरू को उसी ने दबा कर मारा । जब बड़का बाबू ने भटकुंइयां इनार भरवाया तो बुड़ुवा इनार से बंसवारी में बस गया । आज भी वह अपने इनार, अपने पानी का हिसाब मांगता है । भटकुंइयां इनार में गड़े खजाने की वह बंसवारी में बैठे-बैठे रखवाली करता रहता है ।
‘जो भी इनार में समायेगा, बुड़ुवा उसकी जान ले लेगा । उसे तो खजाने की हिफाजत करनी है ।’ तपेसर दादा अपने तपे-तपाये ज्ञानकोश को लोगों के बीच बिखेरते । उनकी स्वरचित कहानियों के भाव डरावने होते । बच्चे सुनते तो भटकुंइयां के उचास पर खेलने से परहेज करते ।
‘ बुड़ुवा ना हमार पाेंछ ! पातर इनार में जो गिरेगा वह मरेगा ! बंगाली, तपेसर दादा की बात सुन बिदक जाते । ‘दादा एक नम्बर के लबजा हैं ।’ बंगाली बताते ।
भटकुंइयां इनार के बहाने कुछ जरूरी बातें पढ़ाकू लोगों को बतानी जरूरी है । वैसे तो बिना झूठ-सांच के आजकल जरूरी बातें भी गैर जरूरी लगती हैं, सो वे बातें भी बतानी जरूरी हैं जो दक्खिन टोले के मरद-मेहरारू बताते-सुनाते रहते ।
‘भटकुंइयां में किसी राजा का खजाना छिपा कर रखा गया है ।’ तपेसर दादा इस बात को पूरे विश्वास के साथ बार-बार दुहराते ।
‘खजाना होता तो बाबू लोग चुप बैठे रहते, निकाल ना लेते ?’ बंगाली, तपेसर दादा की बात पर विश्वास न करते ।
‘ जब भटकुंइयां भरा नहीं गया था तब रात में इनार से खनन-खनन की आवाज आती थी । जैसे सोना-चांदी के सिक्कों से भरा बटुला इधर-उधर डगरने से खनकता हो ।’ नेऊर चाचा, तपेसर दादा की बात से सहमति जताते हुए अपनी राय देते ।
‘ धत् नेऊर ! डफोर जैसी बात मत सुनाइये ।’ बंगाली ने नेऊर को घुड़का था ।
‘ ऐ बंगाली ! तुम अपने आगे किसी को चलने नहीं देते हो ? अरे अपना बाप से ही पूछ लेते ? एक बार दुपहरिया में खजाना से भरा बटुला जंगल में डगर रहा था । तोहार बाप और मैं भैंस चरा रहे थे । जब वह बटुला पकड़ने के लिए लपके तो बटुला हाथ नहीं आया । तेजी से लुढकते हुए इनार में जा गिरा ।’ तपेसर दादा के पास इससे अधिक प्रमाणिक बात और क्या हो सकती थी । वह खड़े होकर तनिक ऊंची आवाज में बोले थे । दादा की बात सुन बंगाली चुपा गये थे।
नेऊर चाचा की बात को बंगाली भले बतंगड़ समझें, चाचा दावे से कहते-‘एक बार कूंड़ इनार में गिर गई थी । मैंने कूंड़ निकालने के लिए जब कांटा डाला तो कांटा किसी बरतन में अटक गया । खींचते-खींचते हाथ पिरा गया । शरीर थक गया पर बरतन न ख्िंाचा पाया । बरतन के हिलने-डुलने से खन-खन की आवाज आ रही थी । लग रहा था बरतन में सोने के सिक्के भरे हाें । ’
‘मैंने सपने में देखा है कि भटकुंइयां इनार के पांच तरकुल नीचे, पांच गाड़ी सोने के सिक्के गड़े हैं । जिस दिन ऊ सोना निकलेगा, दक्खिन टोला सरग बन जायेगा ।’ संपत बढ़ई ताल ठोंक कर बात बताते ।
‘ ऐ संपत ! कौन भटकुंइयां इनार का खजाना निकाल पायेगा ? एक तो पांच तरकुल नीचे, दूजे बुड़ुवा । है किसी में बूता ? बुड़ुवा निकालने देगा भला ?’ तपेसर दादा अपनी लाठी की मूठ दबाते सुनाते ।
तो इस तरह दक्खिन टोले में तरह-तरह की बतकही बिना सींग-पूंछ के सुनाई देती । नौजवान लड़के बुड्ढों की बात सुन मजाक उड़ाते पर सुनी-सुनाई कहानियों पर उनका भी विश्वास बना रहता ।
‘बात चाहे गप हो या झूठ, पहले के राजा-महाराजा अपना खजाना कहीं न कहीं गाड़ कर रखते थे ।’ यह नौजवानों में से दिनेश की राय थी ।
‘दादा बताते हैं कि राजा-महाराजा ही नहीं, छोटे-मोटे जमींदार भी अपना खजाना अंग्रेजों से छिपाने के लिए जमीन में गाड़ देते या किसी इनार में फेंक देते थे।’ टोले का दूसरा नौजवान रमेश, दिनेश की राय से इत्तफाक रखता ।
‘ हो सकता है कि भटकुंइयां में भी किसी राजा का खजाना …..।’ दिनेश तन कर अपनी बात ऊपर रखता ।
बातों का ओर-छोर समझ में न आता और न सब एक बात पर एकमत होते । फिर भी दिमाग से खजाने का भूत उतरता नहीं । ऐसा चाहे बेकारी के कारण हो या मेहनत-मजदूरी से जीविका न चला पाने की विकल्पहीनता के कारण । उधर टी0वी0 और सिनेमा ने रातों-रात करोड़पति बनाने के जो सपने दिखाने शुरू कर किये थे उससे टोले के युवक सोचते कि अगर भटकुंइयां का खजाना निकल जाये तो बेकारी तो दूर होगी ही, वे रातों-रात करोड़पति न सही, लखपति बन जायेंगे ।

समय बीतता गया । बूढ़े, जवान, लड़कों की लालसा, लालसा ही रह गई । न खजाना निकला, न निकलने की कोई उम्मीद दिखी । हां, खजाने की कहानी जरूर जिंदा रही और कुछ जोड़-घटा कर निरंतर बढ़ती-फैलती रही ।
नवका बाबू बताते हैं-‘बाबूजी के मरने के दस-बारह वर्ष पूर्व भटकुंइयां भरा गया था । अब जब बड़का बाबू के मरे बीस-बाइस वर्ष हो चुका हैं तो निश्चय ही भटकुंइयां इनार को भरे तीस-बत्तीस वर्ष हो चुके होंगे ।’ नवका बाबू जब भी भटकुंइयां इनार को भरने वाले घाव को कुरेदते तो इतना जरूर जोड़ देते -‘अगर बाबूजी जंगल-झाड़ में स्थित बिना जगत के भटकुंइयां इनार को न भरवाये होते तो न जाने कितने लोग, कितने मवेशी अब तक गिर कर मर गये होते । अरे वह इनार था कि मौत का द्वार ।’
इनार बिना जो तकलीफ दक्खिन टोले वालों ने सहा था, वे नवका बाबू की बात सुन सामने भले कुछ न कहें, पीठ-पीछे मन की भड़ास निकलने से न चूकते । बंगाली तो छनछनाते हुए सुनाते -‘बड़कवों के बछरू की जान कीमती होती है, गरीब आदमी के जान की कीमत नहीं होती भाई ! पता नहींं भटकुंइयां में कौन गिरता-मरता, पर तीस-बत्तीस बर्ष तक पोखरा-पोखरी के पानी पी-पी कर पेचिस-हैजा से कई मनई मर गये ।’
बंगाली के मुख से निकली बात उत्तर टोले तक जाती ।
‘बंगाली तो ठीक ही कह रहे हैं । भटकुंइयां के बिना तो दक्खिन टोला मुसमाति हो गया । अरे बड़का बाबू को तनिक विचार तो करना ही चाहिए कि इनार भरवा देने से गरीब पानी कैसे पियेंगे ? …और जब बड़का बाबू ना सोचे तो नवका बाबू का सोचते ? बड़का बाबू तो कभी-कभार भूल-भटक कर दक्खिन टोले की सुध लेने आ भी जाते थे । जिआरी-मुआरी में पुछार कर जाते थे । पर नवका बाबू तो अंगरेज की औलाद लगते हैं । कोई हुक्म सुनाना होता है तो दुआर पर बुला कर सुनाते हैं । दक्खिन टोले के मजदूरों को नौकर-चाकर ही हांक ले जाते हैं।’ संपत बढ़ई अपने बुढ़ार हाथों से मिरजई बांधते सुनाते ।
‘अरे अब इनका दिमाग भी धीरे-धीरे जमीन पर आ रहा है । दू-चार साल में और आ जायेगा । कब तक फूं-फां कर के ईंट-भट्ठा चलेगा ? आबादी बढ़ती जा रही है । जमीन घटती जा रही है । ढेर पइसा पर भी लोग माटी बेचने को तैयार नहीं हो रहे हैं । कब तक मुफ्त की माटी से ईंट पाथा जायेगा ?’ बंगाली देह टांठ करके अपनी बात सुनाने लगते ।
‘ पहले तो डांट-डंपट कर जमीन मांग लेते थे पर अब ? अब छोट जाति का राज आ गया है । लोग ढींठ होते जा रहे हैं । मोट दाम लेकर माटी खोनने दे रहे हैं । तब भी दस तरह के नखरे कर रहे हैं ।’ संपत बढ़ई बंसुला की छेव की तरह घाव करते सुनाते ।
‘ हां काका ! तभी तो नवका बाबू मन की बीख निकालते कह रहे हैं कि दक्खिन टोला के छोटकों का दिमाग खराब हो गया है । जमीन के दाम पर माटी बेच रहे हैं ।’ दिनेस का मन अपनी बात सुनाने के लिए कसमसा रहा था ।
‘वही काहें ? उनके चाचा भी सुनाते फिर रहे हैं-‘चमार-सियार का राज आ गया है । अब दक्खिन टोले वाले हम लोगों के दबाव में नहीं रहेंगे ।’ यह जानकारी रमेश के पिटारे से बाहर निकलती और बुड्ढों के साथ-साथ नौजवानों के बीच, चटकारे लेकर सुनाई जाती ।
‘ अरे कोई काहें दबाव में रहेगा भाई ! सरकार का तो पसीना छूट रहा है किसान की जमीन लेने में । इ कौन खेत की मूली हैं ?’ बंगाली की बोली झरार मूली की तरह तल्ख होती जा रही थी।
एक ओर ईंट-भट्ठे का काम मंदा पड़ता जा रहा था तो दूसरी ओर दक्खिन टोले वालों का दिमाग बऊराने लगा था । मिट्टी सोना के भाव मिलेगी तो भट्ठे का काम कैसे चलेगा ? बंजर जमीनें भी नहीं बचीं जिसे जब चाहे खोदवा लें । सरकार ने ऐसा कानून बना दिया कि बंजर जमीनें भूमिहीनों को पट्टे में बांट दी गर्इं । आबादी बढ़ी तो खेत छोटे होते गये । खेती-बारी के लिए जमीनें कम पड़ने लगीं । भला ऐसे में कोई मिट्टी कैसे बेचे ? रात-दिन इस चिंता में नवका बाबू परेशान रहने लगे थे। ले-देकर यह ईंट-भट्ठा ही शानो-शौकत की निशानी बचा रह गया था । जमींदारी की हनक और पदचापों की धमक के लिए ईंट-भट्ठे के अलावा था क्या ? लड़के लोफर हो गये थे । रात-दिन दारू, ताड़ी और सुर्ती में डूबे रहते । न दूसरा कोई काम, न नौकरी की उम्मीद । इस पीड़ा को तराशने के लिए नवका बाबू आरक्षण व्यवस्था को जी भर गरियाते।
ऐसे बुरे दिनों के बीच नवका बाबू के दिमाग में एक विचार सूझा, दक्खिन टोले की सुधि लेने का । सुधि यानी उसके बिगड़े भूतकाल को सुधार कर वर्तमान को संवारने का । सबसे पहले उन्होंने मन के विचारों को हवा दी ।
इधर-उधर बात उड़ाई । कुछ खुद से और कुछ अपने पोसुआ कारिंदों के द्वारा । खुद हाट-बाजार में सुनाते रहते-‘बाबूजी ने सपने में कहा है कि जब दक्खिन टोला खुशहाल होगा तभी बाबू टोले में खुशहाली आयेगी । तरक्की के लिए इस सीख को उन्होंने गांठ बांध लेने की नसीहत दी है । उन्होंने साफ-साफ कहा है कि मजदूर दुखी होंगे तो पूंजीपति सुखी न होंगे ।’ जब नवका बाबू दक्खिन टोले के बीच से गुजरते तो अपने पीछे चलने वाले कारिंदों को जोर-जोर से सुनाते-‘अब जमाना बदल गया भाई ! जमींदारी की हनक बनाये रखने के लिए कब तक गरीबों का हक मारा जायेगा ? खुद कमाने के लिए गरीबों को कमाने का मौका देना होगा ।’
दक्खिन टोले वाले नवका बाबू में आये बदलाव पर अचरज करते । वे इस बात पर भी अचरज करते कि कभी दक्खिन टोले में न आने वाले बाबू साहब एकाएक क्यों तपेसर दादा, नेऊर चाचा, संपत बढ़ई और भगेलू के द्वार का चक्कर लगाने लगे हैं । ‘अरे सूरज क्यों पश्चिम से निकलने लगा ?’ लोग आपस में सवाल करते ।
‘होगा कोई स्वारथ !’ भगेलू मन में सोचते ।
उधर नवका बाबू लोगों की बात सुन सफाई देते-‘लोग चाहें जो अर्थ निकालें, चाहें उन्हें प्रधान के इलेक्शन में हरायें पर दक्खिन टोले को खुशहाल बनाने के लिए वह हर प्रयास करेंगे ।’ नवका बाबू अपने जनोद्धार योजना की ओर-छोर का खुलासा करते-‘दक्खिन टोले का उद्धार भटकुंइयां इनार से हो सकता है ।’
‘भटकुंइयां इनार से ?’ बंगाली सुनते तो चिहुक जाते । ‘अरे इनार को तोपने-पाटने वाले बाबू साहब इ बात कह रहे हैं ?’ संपत बढ़ई को विश्वास न होता ।
‘सूद-बियाज वसूलने वाले बाबू साहब कोई प्रायश्चित करने जा रहे हैं का ?’ संपत फिर व्यंग्य करते ।
‘सियार रंग बदलने जा रहा है का ?’ बंगाली अपने कपार के दबाव को कम करने के लिए संपत की भाषा में सवाल करते।
जैसा कि पढ़ाकू लोगों को पहले ही बता दिया गया है कि भटकुंइयां इनार का महत्व इतिहास की बात बनकर रह गई थी । नई पीढ़ी के लड़कों ने भटकुंइयां के पानी का दीदार नहीं किया था । खाली उचास के बहाने बरसों पूर्व भटकुंइयां पर लगे छीप, ढेंकुल और बंधे बरहे के खिंचाव से निकलते चरर-मरर की आवाज के बीच गुलजार होते दक्खिन टोले की कहानी को उन्होंने सुन रखा था । उन्होंने न तो इनार के सहजीवी मेंढक, कछुओं, पनिहवा सांप को देखा था, न ढेला मारकर पदाया था । अब तीस वर्ष बाद फिर एक बार मिट्टी में गड़े भटकुंइयां की कहानी हिलोर मारने लगी थी ।
बात यह है कि एक दिन नवका बाबा ने अपने दुआर के बजाय पहली बार दक्खिन टोले मेें तपेसर दादा के दुआर पर स्थित नीम गाछ के नीचे एक सभा बुलाई । बात की शुरुआत उन्होंने तपेसर दादा से मुखातिब होते हुए की- ‘तपेसर ! बाबूजी सपना में बार-बार आ रहें हैं ।’ बात के ओर-छोर को बीच में अटका कर नवका बाबू ने सभा बीच भकुआये चेहरों को टटोलने के उपक्रम में गरदन घुमाई और फिर कुछ सोच कर चुप रह गये ।
‘बड़का बाबू ! कवनोेंं हुकुम मलिकार के ?’ तपेसर में मूड़ी खुजलाते हुए अपनी आंखें मिचमिचाते हुए पूछा ।
‘बाबूजी कह रहे थे कि हमने नाराज होकर भटकुंइयां इनार को भरवा तो दिया, पर पांच गाड़ी सोना से हाथ धो बैठा । ’
‘ पांच गाड़ी सोना ?’ तपेसर का मुंह पथरा गया ।
‘ और का ? बाबूजी कह रहे थे कि भटकुंइयां के नीचे गड़ा खजाना निकल जाता तो सारा गांव स्वर्ग बन जाता । बाबूजी यह भी कह रहे थे कि जीते जी मैंने दक्खिन टोले के गरीब-गुरबों का भला नहीं किया, इसका मलाल हमें आज भी है । स्वर्ग में मेरी आत्मा कलपती रहती है ।’ नवका बाबू ने बात पूरी करते हुए बंगाली पर निगाह गड़ाई ।
‘बड़का बाबू को मरे कई साल हो गये, सपना दिखाने में उन्होंने इतनी देर काहें की ?’ दिनेस की बेचैनी बढ़ी तो पूछ बैठा ।
‘अरे बकलोल कहीं का ! होगा कोई राज ? हो सकता है बुडु़वा के कारण बड़का बाबू ने इस राज को छिपाये रखा हो ।’ बाबू साहब के खास मनई बुद्धन ने सफाई दी ।
‘ अब बुडु़वा कहां है ? खरहुल से निकल कर परदेश भाग गया है ।’ बाबू साहब के दूसरे आदमी, नथुनी ने बुद्धन की बात को पुख्ता किया ।
‘असल बात यही है । अब बुड़ुवा का डर नहीं है । बाबूजी ने सपने में दिखाया है कि इनार के चारों ओर बीघा भर जमीन के नीचे खजाना छितराया गड़ा है । छोटे, बड़े बटुले-बटुली, लोटे-मेटिया में सोना-चांदी का रुपया गड़ा पड़ा है । बाबूजी ने कहा है कि अब देर करने की जरूरत नहीं । खुदाई करने के लिए भट्ठे पर जे0सी0बी0 मशीनें हैं हीं । बाबूजी ने यह भी कहा है कि जो सोना निकले, उसे दक्खिन टोले में बांट दिया जाये । जिनकी जमीनें भटकुंइयां के आसपास हैं, उन्हें दूना हिस्सा दिया जाये । दक्खिन टोला में एक भव्य मंदिर बने । बाबूजी ने यह भी कहा है कि जिस दिन मंदिर में घंटा बजेगा, उसी दिन उनकी आत्मा को शांति मिलेगी । अब आप पंचों को फैसला करना है कि बाबूजी की आत्मा को शांति दी जाये या उनकी आत्मा को तड़पता छोड़ दिया जाये ?’ नवका बाबू अपनी बात सभा बीच उछालने के बाद लोगों का मुंह निहारने लगे थे ।
‘राम! राम ! मलिकार की आत्मा को शांति मिले । मलिकार मर कर भी गांव की फिकर कर रहे हैं …..खजाने के बारे में मलिकार झूठ तो बोलेंगे नहीं । बड़े आदमी की बड़ी सोच होती है ?’ तपेसर दादा बहुत जल्दी ढुरक गये थे । फिर भी उन्होंने आशंकित मन, गांव वालों के मनोभावों को परखने के लिए नजर घुमाई थी ।
‘ भटकुंइयां के आसपास जिनके खेत हैं, उनसे पूछा जाना चाहिए ।’ संपत ने तपेसर की आशंका को बढ़ाने की कोशिश की ।
‘पूछना का है ? जिसके खेत से खजाना निकलेगा, उसको दूना हिस्सा दिया जायेगा । एक खेत का हिस्सा, दूसरा परिवार का ।’ बाबू साहब के खास आदमी बुद्धन ने खड़े होकर आशंका का समाधान किया । बाबू साहब के दूसरे कारिन्दे बुद्धन की बात का प्रभाव जांचने की कोशिश करते दिखे ।
‘ संपत अपनी बात बतायें । उनका खेत वहीं है । नेऊर, पुकारी, दुखी महतो के खेत भी भटकुंइयां के पास हैं । ये लोग अपनी बात रखें ।’ नवका बाबू ने बात को नरमी की चासनी में घुलातेे हुए कहा था।
‘अरे जो सबकी राय होगी वही हमारी होगी ।’ नेऊर में गला दबा कर अस्पष्ट शब्दों में उत्तर दिया था
‘हम मलिकार की बात काटेंगे नहीं । हम गांव से बाहर तो हैं नहीं ?’ दुखी ने गोलमोल जवाब दिया था ।
‘ संपत ! आप ने कुछ नहीं बताया ?’ बाबू साहब ने घूरते हुए फिर पूछा ।
‘ मलिकार ! डर रहा हूं कि अगर खजाना न निकला तब का होगा ? लडि़का का खायेंगे ? गाेंयड़ा का खेत है । इसी जमीन में साग-सब्जी उपजती है ।’ संपत तनिक सहमते हुए बोले ।
‘काहें ना निकलेगा ? बाबूजी स्वर्ग से झूठ बोलेंगे ? और पूरा गांव जानता नहीं है कि भटकुंइयां इनार में खजाना गड़ा है ?’ बाबू साहब तनिक आवाज ऊंचा कर घुड़कने के अंदाज में बोले थे । फिर आवाज की आवृत्ति और तीव्रता में मिठास मिलाते हुए बोले- कोई दबाव नहीं है संपत! अगर आप को सोना की जगह साग-भाजी खानी है तो खाइये ।’
‘ बात इ ना है मलिकार ! मन में बात उठी तो हमने पंचों के बीच बता दी । बाकी जो सबकी राय होगी, वही हमारी भी होगी ।’ आखिर संपत ने अपनी विवशता और हैसियत के डर से नवका बाबू से पंगा लेना उचित न समझा ।
‘ पुकारी, आपको आपत्ति तो नहीं है ?’ बाबू साहब ने फिर निगाह को सख्त किया ।
‘ जो सबकी राय होगी वही हमारी भी होगी ।’ पुकारी ने जमीन में सिर गड़ाये अपने हथियार डाल दिये थे ।
बस इतना सुनते ही बाबू साहब ने अपने कारिंदों को इशारा किया और सभा खत्म कर दी गई थी ।

एक हफ्ते के भीतर नवका बाबू के दैत्याकार जे0सी0बी0 मशीनें भटकुंइयां इनार के आसपास रेंगने लगीं थीं । फरवरी का अंतिम महीना था और गरमियों की सब्जियों के ओधे तैयार हो रहे थे ।ज्यादातर खेत खाली थे । कुछ में गोभी के फूल तैयार थे जिन्हें जल्दी काट कर बेच दिया गया । माटी खोदने का काम शुरू हुआ तो मिट्टी का पहाड़ बनता गया । तय हुआ कि पहाड़ को बहुत ऊंचा करना ठीक न होगा । आखिर चारों ओर मिट्टी खोदी जानी है । बेहतर होगा कि खुदी मिट्टी ट्रैक्टर-ट्राली से ढो-ढोकर ईंटभट्ठे पर गिरा दी जाये । वहां तो चारों ओर गड्ढा ही गड्ढा है । गड्ढों की भराई करने का यह उपयुक्त सुझाव था । सो वही हुआ और बाबू साहब की ट्रैक्टर-ट्रालियों द्वारा मिट्टी ढो-ढोकर भट्ठे पर गिराये जाने लगा ।
एक ओर खजाना निकालने के लिए भटकुंइयां के चारों ओर खुदाई का काम तेजी से जारी था तो दूसरी ओर गांव में तरह-तरह की योजनायें बनने लगींं थीं ।
‘खजाना के पइसा से सबसे पहले दक्खिन टोले में शिव मंदिर बनवाया जायेगा।’ तपेसर दादा बोले ।
मंदिर ही काहें , मस्जिद काहें ना ? टोले में मुसलमान भी तो रहते हैं ।’ बंगाली ने तपेसर दादा की बात पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की । वैसे बंगाली कभी सांप्रदायिक ख्याल के नहीं रहे पर न जाने क्यों हफ्ते भर से तपेसर दादा की ढुलमुल नीति से कुछ खफा नजर आ रहे थे और उसी चिढ़ के कारण उन्होंने मस्जिद की बात उठा दी ।
‘बड़का बाबू ने सपने में मंदिर बनवाने की बात कही है ।’ तपेसर का तर्क पुख्ता था ।
‘ पता नहीं बड़का बाबू ने का कहा है ? सपना तो हमने देखा नहीं ।’ बंगाली तनिक खिसिया गये ।
‘अरे गांव में मुसलमान भाई दो-चार घर ही हैं । दो-चार परिवार के लिए मस्जिद बनाना, खजाना लुटाने जैसी बात होगी ।’ नेऊर ने तपेसर दादा की राय को पुख्ता किया ।
मंदिर-मस्जिद की बात जिस तरह अनायास गांव में फैला दी गई थी उससे हिन्दू और मुसलमान आपस में बंट गये थे । कुछ लोगों ने इस बंटवारे को पाटने के लिए सुझाव दिया -‘खजाना से सबसे पहले एक अस्पताल बनेगा । अस्पताल से सबका भला होगा ।’ यह राय गांव के लंपट कहे जाने वाले नौजवान दिनेश की थी ।
‘ बकलोल कहीं का ? अस्पताल से पहले गांव के सभी फूस के घर पक्के बनाये जायेंगे । उसके बाद कोई दूसरा काम होगा ।’ संपत चिढ़ते हुए बोले ।
‘हम लोगों को बड़का बाबू की एक मूरत लगवानी चाहिए । आखिर उन्हीं की किरपा से खजाना निकलने जा रहा है ।’ तपेसर ने फिर अपनी राय दी ।
‘ ए बंगाली ! नाराज मत होइये, पहले यह बताइयेे कि खजाना में सोना के सिक्के निकलेंगे की चांदी के ?’ नेऊर ने अपनी जिज्ञासा शांत करनी चाही ।
‘बाछे कटहल, होंठे तेल ! जब निकलेगा तक देखा जायेगा । निकलेगा तो बांंटा जायेगा कि नहीं, अभी इस सवाल पर सोचिये आप लोग ?’ बंगाली ने हमेशा की तरह अपनी आशंकित मन की पीड़ा जाहिर की ।
‘बंटायेगा काहें ना? सबके सामने बात तय हुई है । जिनके खेत खराब हो रहे हैं, पैदावार मारी जा रही है, उसकी भरपाई होगी की नहीं ?’ संपत ने अपनी आशंका जाहिर किया ।
‘मैंने तो कोंहड़े और लौकी के बेहन तैयार कर लिये थे ।’ दुखी ने दुखी मन कहा था ।

युवकों के बीच दूसरे मुद्दे जन्म ले चुके थे-
‘गांव के लड़कों के लिए बैट-बल्ला खरीदा जायेगा कि नहीं ।’ यह सवाल रमेश का था ।
‘खजाना निकलते ही सबसे पहले जश्न मनाने की खातिर आरकेस्ट्रा मंगवाया जायेगा।’ दिनेश ने मचलते हुए अपनी राय रखी थी ।
‘आजाद आरकेस्ट्रा ?’धनेश ने अपनी पसंद जाहिर की ।
‘और का ? पांच लवंडियां हैं उसमें ।’ दिनेश ने बायींं आंख दबाते हुए उसकी बात का समर्थन किया था।
‘दारू भी ?’ रमेश ने बात की दिशा बदली ।
‘और का ? …पर बाबू साहब के भट्ठे वाला नहीं । अंग्रेजी …।’ धनेश ने मुस्कुराते हुए समर्थन में सिर हिलाया ।
‘तब तो खूब मजा आयेगा ।’ बेरोजगार युवकों के चेहरे खिल उठे थे ।

मिट्टी की खुदाई जारी थी । बाबू साहब के भट्ठे के आसपास के सारे गड्ढे पट चुके थे । खजाना निकलने के आस में गांव वालों ने काम-धंधे से किनारा कर लिया था । सुनने में आ रहा था कि खजाना मिलने में कुछ ही देरी है । हो सकता है बुड़ुवा को शांत रखने के लिए बाबू साहब को हवन-पूजन करानी पड़े ।
‘थोड़ी देरी होगी पर इतना खजाना निकलेगा कि दक्खिन टोला स्वर्ग बन जायेगा ।’ बाबू साहब को पक्का विश्वास था। कुछ लोग खजाना के हिस्से पर सवाल उठाते और आपस में झगड़ जाते। जिनके खेत खोदे जा रहे थे वे आधे से ज्यादा की मांग करते ।
खजाना खोदते-खोदते महीनों बीत गये । बाबू साहब के लोग इस बात को प्रचारित करने में लगे थे कि ‘बस अब खजाना निकलने ही वाला है ।’ नवका बाबू लोगों को सुनाते-‘बाबूजी ने सपने में बताया है कि किधर खुदाई करनी है, किधर नहींं । खजाना किधर लुढ़क रहा है । किधर से घेराबंदी करनी है ।’
अब पढ़ाकू लोगों को यह बात समझ लेनी चाहिए कि जिस भटकुंइयां इनार के बहाने यह सब हो रहा था उसका इतिहास खत्म होने वाला था । और यह बात तो पढ़ाकू लोग जानते ही हैं कि इतिहास खत्म तो विचार खत्म । वैसे भी बाबू साहबों के पास विचार नाम की चीज तो कभी रही नहीं । इसलिए इस कहानी को यहीं रोक देना उचित होगा । जब दक्खिन टोला स्वर्ग बनेगा तब आगे की कहानी लिखी जायेगी । अभी तो इतना ही बता कर कहानी खत्म कर दी जा रही है कि उस साल नवका बाबू के ईंट-भट्ठे पर ईंट पथाई का काम तेज हो गया था । चिमनियों के धुएं से आसपास के बाग-बगीचे करिया गये थे । नये बैट-बल्ले, विकेट और पैड की आस में लड़कों ने पटरे और ईंटों के विकेट से खेलना बंद कर दिया था । दक्खिन टोले के हिन्दू-मुसलमान, बारी-बारी से नवका बाबू का दुआर घुरिया रहे थे । बाबू साहब रोज रजिस्टर पर खजाने का बखरा लगाने में व्यस्त दिखते । कभी किसी का हिस्सा घटा देते तो कभी किसी का बढ़ा देते । कुछ से पूछते-‘किसी को अपने हिस्से पर विरोध तो नहीं है ?’
दक्खिन टोले में चुप्पी पसरी हुई थी । आपसी विश्वास और बोल-चाल के संकट का दौर था वह ।

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    By: सुभाष चन्द्र कुशवाहा

    जन्म- उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में 1961 में,
    कविता-संग्रह ‘आशा’, ‘कैद में है जिंदगी’ और ‘गाँव हुए बेगाने अब’ और तीन कहानी-संग्रह ‘हाकिम सराय का आखिरी आदमी’, ‘बूचड़खाना’ और ‘होशियारी खटक रही है’ प्रकाशित हुए हैं। इसके अलावा उन्होंने ‘कथा में गाँव’ (कहानी-संग्रह), ‘जातिदंश की कहानियाँ’, ‘लोकरंग’ (1 और 2) आदि पुस्तकें संपादित की हैं।
    ‘लाला हरपाल के जूते’ कहानी संग्रह हाल ही में बैस्ट सेलर में शामिल हुआ है |
    1998 से ‘लोकरंग’ पत्रिका का संपादन कर रहे हैं।
    संपर्क – बी 4/140 विशालखंड
    गोमतीनगर,लखनऊ 226010
    mail- sckushwaha@gmail.com

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