जहाँ वर्तमान जब मौजूदा प्रतीकों के साथ असल रूप में संवेदनाओं के धरातल पर रचनात्मक दस्तक देता है तब कोई कविता महज़ एक रचना या लेखकीय कृति भर नहीं रह जाती बल्कि वह एक स्वस्थ संवाद की ताजगी के साथ उतरती है समाज की संवेदनात्मक विद्रूपताओं के खिलाफ मानवीय सवाल की तरह | कुछ इसी अंदाज़ में यह कवितायें कल्पनात्मक अभिव्यक्ति से कहीं ज्यादा लेखकीय संवेदनात्मक वेचैनी से उत्पन्न इंसानी आंतरिक मुठभेड़ का नतीज़ा हैं | इस मुठभेड़ के तीव्र स्वर ‘दामिनी यादव’ की इन कविताओं से गुज़रते हुए बखूबी सुनाई देते हैं…….| – संपादक 

भविष्य की मौत  

दामिनी यादव

ये जो दहक रही हैं चिताएं
यहां से वहां तक, वहां से यहां तक
देखते हैं ये वक्त
ले जाएगा हमको कहां तक
मांस का लोथड़ा भर है
अभी मुंह में जबान
कुछ ना कहने का जारी किया है
आका ने फरमान
कटी जबानों से भी
कुछ लोग बड़बड़ा रहे हैं
लहू से रंगी हत्यारी कटारों की
खिल्ली उड़ा रहे हैं,
आका के हाथी के पांव तले
ये सब के सब कुचल दिए जाएंगे
पर जिद ऐसी कि सर
फिर भी नहीं झुकाएंगे
उधेड़ दो खाल इनकी हंटरों से
चाहे उखाड़ दो इनके नाखून
सड़ा दो यूं इनकी लाशों को
कि उनसे आए बदबू,
अजीब है ये नौजवां कौम
अजीब हैं ये नस्लें
कटे हाथों से भी उगा रहे हैं
खेतों में उम्मीद की फसलें
लाशों पे रखके कुर्सी
बैठा है जो आका
डाल रहा है जो मुल्क के
हर घर में डाका
कितने घर, कितनी बस्तियां
वो अभी और जलाएंगे
आखिर तो जाके उनके पांव
खुद बहाए लहू की कीचड़ में धंस लाएंगे
कांपेगी इनकी भी रूह,
मौत का डर इनके सर पर भी मंडराएगा
तब इनके लहू से सूरज धोकर ही
ये कुचला वर्ग नया सवेरा लाएगा
तब तक सर्द पड़ा है जिनका लहू
उसे पिघलने दो
जलने दो ये चिताएं अभी
यहां से वहां तक, वहां से यहां तक
जलने दो।

जंगली 

गूगल से साभार

सिर्फ जिंदगियां ही जंगलों में रह गई हैं

जानवर सब शहरों में बस गए हैं,
खुद ही गढ़े थे इंसानों ने
इंसानी तहजीब और सभ्यता के पैमाने जो
उसी की कीचड़
उसी की दलदल में सब धंस गए हैं,
जानवर लूट-मार नहीं करते
अपनी जेब भरने के नाम पर
वो किसी दूसरे को कंगाल नहीं करते
बलात्कार के नाम पर शरीरों की
दरिंदगी से चीर-फाड़ नहीं करते,
उनमें हवस नहीं
सिर्फ एक भूख होती है
जो जेहन से ‘जिस्म’ तक आती है
और जिस्म से गुजरकर फिर
वापस जिस्म में ही कहीं खामोशी से सो जाती है
शहरों में जो सांस
हर सांस पर घुट जाती-सी लगती है,
जंगलों की सरहद में दाखिल होते ही
वो हर सांस ताजगी से लौट आती-सी लगती है
जंगल में सिर्फ पेट की
भूख का कानून चलता है,
पर एक की भूख से
दूसरे का निवाला नहीं छिनता है,
जंगल में आसमान ही होता है आशियाना सबका
नहीं मारता कोई, किसी और के घोंसले पर झपट्टा,
जंगली होना गाली नहीं होता है
ये वर्ग तो, शहरी गलतियों का बोझ ढोता है
इनकी जड़ें जमीन में गहरे उतर जाती हैं
शहरों की हर बारिश में, रंगत बदल जाती है
यहां जिंदगी, जिंदगी का नाम है
शहरों में चलते-फिरते जिस्म, कितने बेजान हैं
क्या मिला इंसानों को इंसान होने में
हर कांधा लगा है खुद अपना सलीब ढोने में
काश कि तोड़ दें हम झूठे मुखौटे सब
काश कि देख सकें हम इंसान, इंसानों में ही रब
काश कि हर सरहद से सरहद मिटा दें
काश कि हम एक दूजे के हक लौटा दें
काश कि फाड़ दें हम सभ्यता पर लिखी हर किताब
काश कि हम शहरों में लागू होने दें जंगलराज सा हिसाब
काश कि हम इन जंगली हवाओं को शहरों में आने दें
काश कि हम इंसान खुद को जंगली
और शहर को जंगल बन जाने दें।

नीरो की बंसरी

देख मैंने ताल ठोकी है
तेरी सत्ता के खिलाफ
दे क्या दे सकता है तू
मेरी चुनौती का जवाब
तूने मेरी हस्ती को
मिट्टी में मिला डाला
पर तेरी कुर्सी के पाये
अब हैं मेरा निवाला
देख कि मैं मिट्टी से गुबार बन
तेरी आंखों में गड़ रही हूं
निश्कंटक दौड़ते तेरे विजय रथ के
रास्ते में अड़ रही हूं
जंगली गुलाब हूं मैं
शहरी कैक्टस से नहीं घबराती हूं
कंटीली झाड़ियों में उगकर भी मैं
खिलखिलाती-लहलहाती हूं
तू ऐड़ी-चोटी का जोर लगाएगा
मैं तो जमीन से जुड़ी हूं
जमीन से ही उगी हूं
जमीन में ही समा जाऊंगी
तू अपने गुरूर को
कब तक बचाएगा
मेरी उड़ती राख के मटमैलेपन में
तेरा चमकता विकास का सूरज छिप जाएगा
देख मेरी चिता से
उठ रही हैं लपटें इतनी
कि जल्दी ही, जलती अपनी सत्ता में तू
अकेला नीरो सा बंसरी बजाएगा

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    By: दामिनी यादव

    जन्म – 24 अक्टूबर 1981, नई दिल्ली
    ‘‘मादा ही नहीं मनुष्य भी’’ स्त्री विमर्श पर आधारित ‘‘समय से परे सरोकार’’ समसामयिक विषयों पर केन्द्रित ‘‘ताल ठोक के’’ कविता संग्रह है। प्रकाशित
    सातवीं कक्षा की पाठ्यपुस्तक ‘वितान’ में भी इनका लेख सम्मिलित ।
    कार्य- ‘हिन्द पाॅकेट बुक्स’, ‘मेरी संगिनी’ तथा डायमंड प्रकाशन की पत्रिका ‘गृहलक्ष्मी’ में क्रमशः सहायक संपादक व वरिष्ठ सहायक संपादक के रूप में अपनी सेवाएं दे चुकी हैं।
    कुछ वर्षों तक आकाशवाणी दिल्ली से भी जुड़ी रहीं।
    नवभारत टाइम्स, राष्ट्रीय सहारा, जनसत्ता, हिंदुस्तान, आउटलुक, नया ज्ञानोदय, हंस, अलाव और संवदिया आदि समाचार पत्र व पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं।
    डी.डी. नेशनल, जी.सलाम पर प्रसारित कई काव्यपाठ
    स्वतंत्र रूप से लेखन, संपादन व अनुवाद
    09891362926

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    गद्दार कुत्ते: एवं अन्य कविताएँ (दामिनी यादव)

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