सिनेमा सबसे नयी, उन्नत और आकर्षक कला है | जिसका असर जादू की तरह होता है | तब ये कैसे हो सकता है कि कोई भाषा अपने को इस जादू से दूर रखे | भोजपुरी  के साथ भी यही हुआ सरकार की उपेक्षा और वितरकों के नैक्सस का शिकार भोजपुरी सिनेमा को इंतजार है नजीर हुसैनजैसे सच्चे, ईमानदार और प्रतिभाशाली फ़िल्मकार का जो भोजपुरी सिनेमा को फ़िर से भोजपुरी इलाके की सच्चाईयों, उसके दुख, तकलीफ़, हर्ष-उल्लास और माटी की सोंधी खुश्बू से जोड़ सके |”

भोजपुरी फिल्मों का सफरनामा 

सिनेमा सबसे नयी, उन्नत और आकर्षक कला है | जिसका असर जादू की तरह होता है | तब ये कैसे हो सकता है कि कोई भाषा अपने को इस जादू से दूर रखे | भोजपुरी  के साथ भी यही हुआ | १९३२ में बनी दूसरी बोलती फ़िल्म “इन्दरसभा” में दो भोजपुरी गानों से रजत पर्दे पर भोजपुरी भाषा का जो सफ़र शुरु होता है वो १९४३ में महबूब खान की फ़िल्म “तकदीर” में गायी गई एक ठुमरी- बाबू दारोगा जी कौने कसूर पर धर लियो सैंया मोर .., से भोजपुरी फ़िल्म को ज़मीन पर उतारने का ख्वाब, जद्दनबाई (नरगिस की मां) की आंखों में जगा जाता है | मगर कसक अधूरी रह जाती है | १९५० में मुम्बई की एक सभा में देश के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद फ़िर से वही ख्वाब अभिनेता नजीर हुसैन की पलकों पर सजा जाते हैं | नजीर हुसैन भोजपुरी  फ़िल्म की पटकथा हाथ में लिए सालों दर-दर भटकते हैं मगर बात नहीं बनती | फ़िर एक दिन उनसे मिलने आते हैं मुंगेर निवासी बच्चालाल  पटेल उन्हें फ़िल्म की कहानी पसंद आती है मगर बहुत कोशिश के बाद भी पूंजी जुटाने में सफ़ल नहीं हो पाते | फ़िर १९६१ में आती है दिलीप कुमार एवं बैजंती माला अभिनीत फ़िल्म “गंगा-जमना”, अपने संवादों में क्षेत्रीय भाषा अवधी की खुश्बू लिए | गंगा-जमना की सफ़लता क्षेत्रीय भाषा के प्रति विश्वास जगा जाती है और विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी मसीहा बनकर सामने आते हैं और पहली भोजपुरी फ़िल्म का ख्वाब पूरा होता है | इस तरह तरह १९६३ में “ गंगा मइया तोहे पियरी चढईबो” को भोजपुरी की पहली  सिनेमा का गौरव प्राप्त होता है और शुरु होता है भोजपुरी फ़िल्मों का सुहाना सफ़र  | एक के बाद एक अच्छी फ़िल्म लागी नाहीं छूटे राम, बिदेसिया आदि |  ये सारी बातें युवा लेखक रविराज पटेल द्वारा लिखित “भोजपुरी फ़िल्मों का सफ़रनामा” किताब हमें बताती है | उस किताब को पढते हुये ऐसा प्रतीत होता है जैसे हम एक ऐसी ट्रेन पर बैठ कर  सफ़र कर रहे हैं जो भोजपुरी फ़िल्मों के इतिहास के करीब से ले जा रही हो और हर स्टेशन पर रुककर विस्तार से उसके बारे में बता रही हो | ये एक ऐसी किताब है जो भोजपुरी फ़िल्मों की शुरूआत, उत्थान-पतन पर बहुत ही प्रमाणिक जानकारी उपलब्ध कराती है |

१९७० के आते –आते ये सफ़र धीमी पड़ जाती है | जैसे थोड़ा रुक कर आगे के सफ़र की तैयारी हो रही हो और कुछ साल बाद फ़िल्म “दंगल” से भोजपुरी सिनेमा रंगीन हो कर हमारे सामने आता है | और इस दौर में  भी बड़ी हिट फ़िल्म “गंगा किनारे मोरा गांव” आती है और पूरे भारत में धुम मचा जाती है | मगर अफ़सोस कि “ गंगा मइया तोहे पियरी चढईबो, “हंसी –हंसी पनवा खिऔले बेईमनवा” जैसे मन को छू जाने वाले गानों के साथ शुरू होने वाला भोजपुरी सिनेमा आज कैसे नारी तन के एक एक हिस्से को परिभाषित कर रहा है |  इसकी पूरी कहानी इस किताब में मिल जाती है | सरकार की उपेक्षा और वितरकों के नैक्सस का शिकार भोजपुरी सिनेमा को इंतजार है नजीर हुसैन जैसे सच्चे, ईमानदार और प्रतिभाशाली फ़िल्मकार का जो भोजपुरी सिनेमा को फ़िर से भोजपुरी इलाके की सच्चाईयों, उसके दुख, तकलीफ़, हर्ष-उल्लास और माटी की सोंधी खुश्बू से जोड़ सके |

भोजपुरी सिनेमा पर इतनी प्रमाणिकता के साथ सूचनापरक किताब हिन्दी में अब तक नहीं आई है | इस किताब को लिखने के पहले लेखक ने भोजपुरी सिनेमा पर गहन शोध के साथ साथ संबधित महान हस्तियों से बातचीत  की है | कहा जा सकता है कि लेखक के एक लम्बे शोध, सच्ची लगन और प्रेम का परिणाम है ये किताब |  इस किताब को पढते हुये बहुत सारी और जानकारियां मिलती हैं- जैसे अन्य क्षेत्रीय भाषा के सिनेमा का जन्म कब हुआ ? इसके अलावा भोजपुरी सिनेमा से संबंधित और भी कई रोचक जानकारियां प्रयुक्त है |  वे जो सिनेमा के प्रेमी हैं और भोजपुरी सिनेमा के इतिहास और वर्तमान को जानना-समझना चाहते हैं | उन्हें “प्रभात प्रकाशन” की ये किताब जरूर पढनी चाहिए |

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    By: रविशंकर

    युवा रंगकर्मी एवं पटकथा लेखक
    दर्जन भर नाटकों में अभिनय
    “डी.डी-१” के लिए “क्यों अपने हुए पराये”, “पूर्वा सुहानी आई रे”, “तुलसी मोरे अंगना”, धारावाहिक के संवाद लेखन
    ज़ी टीवी पर प्रसारित हो चुके “दो सहेलियां किस्मत की कठपुतलियां” का विषय-वस्तु और महुआ पर प्रसारित हो चुके “सेनूर-मांग-टिकुली” धारावाहिक का पटकथा लेखन |
    09431204359

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    ‘किताबों के प्रति दीवानगी’ पटना पुस्तक मेला 2015: (रविशंकर)

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