अपने समय के यथार्थ घटनाक्रमों की जटिलताओं को तोड़कर सहज रचनात्मकता के साथ उतरना किसी भी रचना की पहली प्राथमिकता है | शक्ति प्रकाश की कहानियाँ, जीवन में साँसों की मानिंद महत्त्व रखती सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक घटनाओं को अनदेखा नहीं करतीं बल्कि मानवीय संवेदनाओं और उनकी जटिल विवशताओं के बीच से किसी धागे की तरह गुजरती हैं, जो न केवल नित नये स्वरूपों में घटित होते राजनैतिक चाल-चलन को स्पष्ट करती हैं ,अपितु इनसे प्रभावित बदलते सामाजिक  ताने-बाने की बेचैन छटपटाहट  से भी साक्षात्कार करातीं हैं | कुछ इसी कलेवर में राजनैतिक छद्म लालसाओं के बीच घिरे इंसानी जज्बातों, घुटन और संघर्षों से बतियाती कहानी है ‘मंगू का हिस्सा’……. संपादक

मंगू का हिस्सा 

शक्ति प्रकाश

हालॉंकि ये कहानी मैंने किसी से प्रेरित होकर नहीं लिखी, लेकिन चूं कि इससे मामूली मिलती जुलती कहानी मैं खुद पढ़ चुका हूँ इसलिये मैं किसी भी आलोचना के लिये तैयार हूँ । सत्य यही है कि मेरी कहानी मुझे इस समय की आवश्यकता लगी और ऐसा ही सत्तर साल पहले मन्टो ने ‘नया कानून’ लिखते वक्त सोचा होगा । सवाल ये कि वक्त की जरूरत आज भी वही क्यों है जो सत्तर साल पहले थी, जवाब ये कि ऐसी कहानियॉं सात सौ साल बाद भी लिखी जाती रहेंगी यदि दो अलग धर्म के जुआरियों का झगड़ा साम्प्रदायिक दंगा बनता रहे, दंगों में औरत को मारने से पहले बलात्कार आवश्यक धार्मिक अनुष्ठान माना जाता रहे, गणेश जी दूध पीते रहें, ससुर द्वारा बलत्कृत महिला को पति की मॉं बनाने फतवा जारी होता रहे, वोट डालने वाले दिन विशेष की परिस्थितियॉं अगले पॉंच साल का फैसला करती रहें । बहरहाल उनका नायक मंगू कोचवान था, मैं मंगू को नायक तो बना सकता हूँ लेकिन समय का इतना बदलाव तो करना होगा कि मेरा नायक कोचवान न हो क्योंकि अब कोचवान प्रजाति लुप्तप्रायः है, मैं खुद गुजिश्ता दस सालों में किसी कोचवान से नहीं मिला तब उस पर कहानी कैसे लिख सकता हूँ ? तो चलिये मेरा मंगू ऑटो ड्राइवर है । मंटो ने मंगू की जाति या धर्म नहीं खोला लेकिन मेरा मंगू मुसलमान तेली है, वह उनके मंगू की तरह गरीब तो है लेकिन अपने आस पास का सबसे अक्लमंद या प्रभावशाली इंसान नहीं, लेकिन उतना मासूम भी नहीं, अपने तबके में उसकी फैन फॉलोइंग भी नहीं है बल्कि कई बार मुहल्ले के कुछ अक्लमंद इंसानों को वह खुद फॉलो करता है, उसके मुहल्ले नई बस्ती में हिन्दुओं की बड़ी जातियॉं तो नहीं, छोटी जातियों के लगभग चौथाई लोग हैं, बाकी मुसलमान हैं । मन में कुछ भी हो पर प्रकट में आपस में कोई झगड़ा टंटा नहीं है और मंगू को वाकई किसी की जाति या धर्म से मतलब भी नहीं ।
तो मंगू की कहानी उस दिन से शुरू होती है जिस दिन शहर में ‘विजय अभियान रैली’ होना थी, एक दिन पहले अपने ऑटो के मालिक सचदेवा को जब उसने ऑटो लौटाया तो चाभी लेते हुए सचदेवा ने पूछा –
‘ धन्धा कैसा है मंगू?’
‘ धन्धा कॉं बचा चचे अब तौ भैन का…डंडा बचा ऐ, हर चौराहे पै ठुल्ले बैठे ऐं, कम्टीसन अलग, तमनै भी किराया घटाया ना, पैलै एम.जी.रोड खुला था तौ इधर कैन्ट से सवारी बिठाओ, बिधर भगवान टाकीज से, बस दो जगै हफ्ता देना था, भैन के…कानून ले आये एम.जी. रोड पै ऐटो नईं चलैगा, इसकूँ कैवैं आजादी?’
‘ बात ठीक है तेरी, ये गौरमेन्ट तो हटानी पड़ेगी’ सचदेवा पंजाबी निर्णायक स्वर में बोला
‘ चक्कर पाल्टी की? दोई साल तौ हुए’ वह मायूस हो बोला क्योंकि उसने मुहल्ले के मुअज्जिज लोगों के कहने पर ‘चक्कर’ वाला बटन दबाया था
‘ उसके तो अभी तीन साल हैं, अभी तो सेन्टर का इलैक्षन है’
‘ एम.जी.रोड सैन्टर नै बंद किया?’
‘ फिर? शहर को टूरिस्ट प्लेस किसने डिक्लेयर किया? किले और ताजमहल पर अंग्रेज टूरिस्टों से टैक्स कौन लेता है? चल छोड़ किसे देगा वोट?’
‘ अपनी बोट की क्या बैलू चचे?’ वह अपने वोट की कामयाबी पर आश्वस्त होकर बोला
‘ कैसी बात करता है? तूने चक्कर को वोट दिया तो ही उनका मुख्यमंत्री है’
‘ तौ बिसकूँ ई दे दूंगा’
‘ अरे पागल सेन्टर में उसकी कोई वैल्यू नहीं, सेन्टर में तो साफ है या तो ये सरकार या हमारी पार्टी ’
‘ देख लेंग्गे बिस टैम’ उसने टाला
‘ ले चाय पी, कल क्या करेगा?’ सचदेवा ने चाय बढ़ाई
‘ मेरी कौन मील चल रई ऐ चचे, ऐटो वाला ऐटो ई चलावैगा’ उसने गिलास पकड़ा
‘ अबे कल ऑटो बंद रहेंगे, अपनी विजय अभियान रैली है, भावी प्रधानमंत्री आ रहे हैं’
‘ भाबी? पिरधान मंतरी? पिरधान मंतरी आ रिया बिसमें क्या, पर जे संग में भाभी को क्यूं ला रिया? लुगाई ना बिसकी?’ मंगू हॅंसा
‘ हद है यार, भावी माने होने वाले प्रधानमंत्री’
‘ अरे तेरी भैन… फिर क्या…. तास पत्ते ई खेलेंगे बस्ती में’
‘ आज कितना कमाया?’
‘ ढाई सौ तौ हो गये होंग्गे’
‘ कल कमायेगा ढाई सौ?’
‘ ऐटो नईं चलैगा तौ खत्ती गढ़ी कईं? कै पेड़ लगा चचे?’
‘ मैं दूंगा’
‘ किस बात के?’
‘ कल मेरे साथ रहना है बस, नहा धो के आ जाना गोल टोपी लगा के’
‘ गोल टोपी?’
‘ वही जो जुम्मे को पहनता है’
‘ कल जुम्मा कहॉं है?’
‘ जुम्मे को टोपी पहनने के मुल्ला जी देते हैं ढाई सौ?’
‘ मुल्ला क्यों देगा? बिस कमबखत कूँ तौ सौ पचास दे और दो’
‘ तो देख ले, ढाई सौ मिलेंगे’
‘ पर समझ में ना आ रिया, गोल टोपी लगाने के तम क्यूं दे रये?’
‘ साफ कहूँ तो अपनी पार्टी के बारे में दुष्मनों ने फैला के रखा है कि वो मुसलमानों के खिलाफ है, इसलिये रैली में कुछ मुसलमान दिखने भी चाहिये’
‘ तौ गोल टोपी तम लगा लो, भॉं कौन तमारा पैजामा खोल कै देख रिया’ मंगू ने ठहाका लगाया
‘ अच्छा? मुझे जैसे शहर में जानता नहीं कोई? वीडियो बनेगी, चैनल पर चलेगी, शाम को ही दुश्मन चिल्लायेंगे – ये देखो गोली टोपी सचदेवा ऑटो वाला’
‘ जे तो ऐ, पर पैचान में तौ मैं भी आ सकूँ’
‘ ये तो और बढि़या है, साबित हो जायेगा कि मुसलमान भी हमसे जुड़े हैं’
‘ वो चैनल मैहजत का मुल्ला ना देख सकै?’
‘ तो देख ले’
‘ फिर ढाई सौ से क्या हो? एक पिलाट दिला दो अपनी कालौनी में’ वह हॅंसा
‘ क्यों?’
‘ इतनी बदनामी करैगा कमबखत, रहना मुश्किल कर देगा बस्ती में’
‘ अरे उसके बाप का राज है?’
‘ मियों में रहके देखो चचे तब पता चलैगा किस किस के बाप का राज ऐ, तम तौ बढि़या कालौनी में रहौ, घर में ए.सी. लग रिया, कार में चल रये, बैंक में भी तमाम रखा, तमें तौ पड़ोसी की जरूरत पड़नी ना, पर महल्ले बस्ती में किसे किसकी जरूरत पड़ जाय भरोसा ना’
‘ खुद पर भरोसा रख मंगू, अच्छा तू बता तुझे किस हिन्दू से परेशानी है?’
‘ मुझे तौ किसी से भी ना, मेरा तौ नाम भी हिन्दवानी नै रखा’
‘ तेरा नाम हिन्दुआनी ने रखा?’
‘ हॉं, सन्तो बुआ थी, बेटी थी महल्ले की, जवानी में रॉंड होली, महल्ले में सबके यहॉं उठै बैठै थी, सब बुआ कहै थे बिससे’
‘ पर तेरा नाम उसने क्यों रखा?
‘ मेरी मॉं के आठ बच्चे मर गये थे, जब मैं पेट में था तौ बिसनै मॉं से कही लौन्डा हो तो बिसका नाम मंगू रख दियो’
‘ मंगू नाम रखने से बच्चा बच जाता है?’ सचदेवा हॅंसा
‘ क्या पता? पर मंगू मतलब अल्ला से, भगवान से मॉंगा हुआ’
‘ और तू बच गया?’
‘ हॉं, मैं तौ बच गया पर ऊपर वाले ने हिसाब बराबर कर दिया’
‘ बराबर ?’
‘ हॉं, चार साल का हुआ मॉं मर गई’
‘ ये कहानी तुझे किसने बताई’
‘ संतो बुआ नै’
‘ तेरे ताल्लुकात इतने अच्छे है हिन्दुओं से, फिर भी भरोसा नहीं?’
‘ भरोसा तौ सबका ऐ पर जिसकी बात तम कर रये बिसके बारे में अच्छा ना सुना’
‘ तू सुनी बात मानेगा कि आंखों देखी?’
‘ देखने कूँ मैं ऐमदाबाद, बंबई, कलकत्ता जाके तौ देखने से रिया चचे, पर जब अपने मजब के कुछ आदमी देखके आये तौ मानना भी पड़ै’
‘ तेरे मजहब के आदमी झूठ नहीं बोलते’
‘ खूब बड़े बड़े बोलते, पर बिना मतलब क्यूं बोलेंगे’
‘ जैसे मैं तुझे ढाई सौ दे रहा हूँ वैसे उन्हें किसी ने कुछ दिया हो तब?’
‘ मतलब तम मुझसे झूठा काम करवा रये?’ वह हॅंसा
‘ तू नहीं जायेगा तब भी टोपी वाले असली मुसलमान जायेंगे ही, ढाई सौ छोड़ सौ रूपये और पूरी सब्जी में, पर मुझे तुझसे हमदर्दी है, तेरे होते हुए दूसरे को क्यों दूं’
‘ चलो तमारा नंबर है मेरे पास, जुगाड़ बनैगी तौ बता दूंगा’
‘ दस बीस और दिलवा दूंगा, तीन सौ तक तैयार हो तो बता देना पर आज रात आठ बजे तक’
‘ ठीक ऐ’ कहकर वह घर चला आया
घर आते ही मंगू का सामना अपनी बीवी रईसन से हो गया जो अक्सर ही होता था, रईसन रिश्ते में मंगू के दूर के मामा की लड़की थी। रईसन उसे पानी देकर गई और आंगन के उस हिस्से की ओर बढ़ी जिसे वे लोग रसोई मानते थे ।
‘ चाय मत बना, पीके आया हूँ’ वह बोला
‘ फुफ्फा कूँ तो बनानी ऐ, भौत देर से कै रये, तमारा इंतजार कर रई, इकट्ठी बन जावैगी’ रईसन ने कहा
‘ दवा दिला के लाई अब्बा कूँ?’
‘ कॉं से दिलाती?’
‘ सुबेरे देके गया दो सौ, कैह कै गया कै राजू डाक्टर कूँ दिखा लियो?’
‘ तमारे जाते ई फातिमा आगी, पॉंच सौ लिये बिससे पिछले महीने, दो सौ दे कै जैसै तैसै बिसे टाला, कल फिर आवैगी’
‘ चाहे बाप मर जाय हमारा? हम क्या भागे जा रये, सबर ना बिसे इत्ता भी’
‘ बिसे भी जरूरत होगी जी, नईं इत्ती तोताचसम वो भी ना’
‘ कल क्या देगी बिसे?’
‘ तम पै ना कुछ?’
‘ हैं पौने तीन सौ, पर पैले बुड्ढे की दवाई आनी, बिना इलाज के तौ मरने ना दूं बाप कूँ ’
‘ कल साम कूँ दे देंगे बिसे’
‘ कहॉं से देगी, कल ऐटो बंद’
‘ क्यूं? कलफू लगा?’
‘ ना, एक कमबखत नेता आ रिया फूल पाल्टी का’
उसके बाद दोनों चुप हो गये, पिता को चाय पिलाकर वह उसे झोलाछाप राजू डाक्टर के पास ले गया, जहॉं चार दिन की दवा का एक सौ बीस का बिल बना, अब उसके पास डेढ़ सौ रूपये थे । रास्ते में उसने अपनी बारह साल की बेटी को गोलगप्पे की रेहड़ी की ओर मन मारकर देखते हुए पाया । इतना अनुभव उसके पास था कि जान सके कि ये कमबख्त चाट पकौड़ी वाले गरीब लड़कियों की इन मामूली इच्छाओं का किस प्रकार दोहन करते हैं, उसने प्यार से बेटी को पास बुलाकर बीस का नोट देते हुए कहा –
‘ जा लेके घर आ जाना, अम्मी और भाई के साथ खाना’
बेटी ने खुशी से नोट सॅंभाला और गर्व से रेहड़ी की ओर दौड़ गई, घर पहुंच कर मंगू ने पिता को चारपाई पर लिटाया और पैरों की ओर बैठकर पॉंव दबाने लगा, तब तक बेटी चहकती हुई गोलगप्पे लेकर आ गई, रईसन ने पहला सवाल यही किया –
‘ पैसे कॉं से आये?’
‘ पापा ने दिये’
‘ क्यों जी? ये चट्ट मलीदे कूँ ऐं पैसे?’
‘ क्या हो गया, बच्चे जेे भी नहीं खायेंगे क्या?’
रईसन कुछ न बोली, बहुत हद पॉंच मिनट में गोलगप्पे साफ हो गये, पिता को कुछ आराम हुआ तो मंगू भी उठ गया । बच्चे भी इधर उधर हो गये, रईसन बोली –
‘ क्या जरूरत थी, पैसे वैसे ही कम थे, सवा डेढ़ सौ की दवाई आई होगी?’
‘ हॉं, पर बच्चा इतनी छोटी चीज कूँ ताकै तौ भी अच्छा ना लगै, जे भैन के ….चाटवाले भौत बदमास होवें, लौंडियों पै उधार चढ़ावें फिर धमकाया करें’
‘ छोड़ो, कल क्या करना, फातिमा तौ कल फिर मॉंगै’
‘ एक जुगाड़ तौ है तीन सौ की’
‘ तौ वो ई कर लो, बिसके पैसे भी देने ई ऐं’
‘ मगर मजब के खिलाफ ऐ’
‘ क्या?’
उसने बताया, रईसन कलपी –
‘ इसमें मजब की क्या बात ऐ? कल कूँ खाने कूँ ना हो तौ हमारे घर में रासन रखैगा मुल्ला?’
‘ रासन तौ ना रखै पर भासन जरूर रख जावैगा, जे हराम ऐ, वो हलाल ऐ’ वह हॅंसा
‘ बिसे कौन बतावैगा?’
‘ फिलम बनै मीटिंगों में, दिन भर चलै टी.वी. में, मियॉं भाइयों की सकल तो बार बार दिखावेंगे’
‘ तम ऐसा करना जी घर से टोपी पैन के मत निकलना, एक गमछा ले जाना, वॉं मूं पै गमछा लपेटे रखना, फोटू खिंचैगा तौ सकल छुप जावैगी’
उसके बाद निष्चय कर मंगू ने सचदेवा को फोन लगा दिया और अगली दोपहर वह ‘विजय यात्रा अभियान’ का हिस्सा था । हालॉंकि ये रईसन का ही सोचना था कि टोपी जेब में रखने से और गमछा लपेटने से वह बच जायेगा लेकिन सफेद कुर्ते पायजामे ने घर से निकलते ही उसकी पकड़ करवा दी ।
‘ कॉं जा रिया मंगू, ईद के कपड़े पैन के?’ घर से निकलते ही सामने के घर के आगे निकले पत्थर पर बैठे सत्तार मियॉं ने जुमला उछाला
मंगू को पसीना आ गया, भला हो रईसन का कि उसने बात सॅंभाल ली-
‘ ढोली खार जा रये, आज ऐटो बंद ऐ, कोई कमबखत नेता आ रिया, मैंने कही बिधर ई होइ आऔ, रईस की बऊ के लौन्डा हुआ’
मंगू ने चैन की सॉंस ली, पर इस बस्ती में सवाल खत्म कहॉं होते हैं? कमबख्तों के पास एक ही काम है, सवाल खड़े करना, सत्तार मियॉं ने फिर कहा –
‘ अये हये, सुसराल जा रिया मंगू, पर रईसन, तेरी भाभी के लौन्डा हुआ तू ना जावै अपने मायके?’
‘ मैं तो होइ आई, इनके पास टैम ना, आज काम की छुट्टी ऐ तौ ये होइ आवें’
सत्तार मियॉं इतनी जल्दी चुप कहॉं होते हैं, उसमें भी मंगू के सवाल का जवाब वे मंगू से ही सुनना चाहते हैं –
‘ ऐटो बंद ऐं तौ तू काहे से जावैगा मंगू?’
‘ अड्डे पै देखूंगा जुगाड़, किसी की बाइक मिल जावैगी, नईं कोई तौ बिधर जावैगा’
अब सत्तार मियॉं के पास अनुमति देने के अलावा विकल्प नहीं था –
‘ जा भाई होइ आ सुसराल, अब हमें तौ कोई पूछै ना’
पूछने को मंगू को कौन तंदूरी मुर्गा खिला देगा ससुराल में? पूछ के लिये, पुछाने और पूछने वालों में से एक की जेब में तो कुछ हो । खैर उसने चैन की सॉंस ली और रईसन की ओर मुस्कराते हुए गली से बाहर निकल गया ।
रैली रामलीला मैदान में थी, जिसके सारे रास्ते भरे थे, मंगू ने रास्ते में एक गली में घुसकर आंखों पर काला चष्मा लगा लिया था, सर पर टोपी भी लगा ली थी, चेहरे पर गमछा भी लपेट लिया था, मैदान के कुछ दूर पहले ही सचदेवा का फोन आ गया था और वहीं आस पास ही सचदेवा मिल भी गया
‘ अबे तू तो पहचान में भी नहीं आ रहा मंगू, भेस क्यों बदल लिया?’ सचदेवा बोला
‘ भेस कॉं बदला चचे, धूप ऐ, गरमी ऐ, इस खातिर लगाया चश्मा और गमछा’
‘ डर तो नहीं गया कि शाम को टी.वी. पर आ जायेगा’ सचदेवा हॅंसा
‘ डरा, ना डरा, वो छोड़ो चचे, तमारा काम हुआ कै ना जे देखौ, अभी भी कुछ ना बिगड़ा, ना तमारा, ना मेरा’ वह भी हॅंसा
‘ तू तो अपना बच्चा है मंगू, चल पहुँच, सबसे आगे वाली लाइन में बैठ जाना’
‘ कोई रोकै तौ ना आगे बैठने से?’
‘ अबे पासपोर्ट लगा रखा है तूने सिर पर, हॉं पुलिस वाले मैटल डिटेक्टर घुमायेंगे ऊपर नीचे’
‘ कैसा कलैक्टर?’
‘ अबे कुछ नहीं बड़ा मोबाइल फोन जैसा होता है’
‘ तम ना चलौ?’
‘ अब तो शाम को दूकान पर मिलूंगा, इधर तेरे जैसे कुछ और भाई भी हैं’
मंगू मैदान में पहुँच गया, चारों ओर नरमुंड ही नरमुंड दिख रहे थे, भीड़ देखकर वह आश्वस्त हुआ कि लाख सवा लाख की भीड़ में एक मंगू को अब कोई नहीं खोज सकता । वह आगे बढ़ा, इतनी भीड़ में भी लोग उसके लिये रास्ता छोड़ रहे थे, बड़े आराम से वह अगली पंक्ति के पास तक पहूँच गया, जहॉं एक पुलिस वाले ने उसे रोका तो वह डर गया ।
‘ दीवान जी राम राम’ वह बोला
‘ चश्मा हटा, गमछा हटा’ पुलिस वाले ने डिटेक्टर नीचे ऊपर कर अभिवादन का जवाब दिया
उसका हाथ गमछे तक पहूँचा ही था, केसरिया कुर्ते में एक नेता जी प्रकट हुए –
‘ क्या बात है? क्यों हटाये गमछा? डिटेक्टर है ना तुम्हारे पास, उससे देखो बस’
‘ मगर नेताजी…’
‘ क्या मगर? ये अॅखियों से गोली मारेगा क्या? तुम्हारी तो सरकार ही नहीं चाहती कि ये हमसे जुड़ें, चलो भाई साब’
कहते हुए नेताजी ने बॉंह पकड़ कर मंगू को खींचा, थोड़ा आगे उसे पानी की एक बोतल और पूरी का एक पैकेट देकर अगली पंक्ति में पहूँचा दिया गया । मंगू ने देखा उस भीड़ में वह अकेला टोपी वाला नहीं था, कम से कम हजार तो रहे होंगे, एकाध तो ऐसी गर्मी में शेरवानी भी पहने था, कुछ उसकी तरह चशमा और गमछा लपेटे थे । मंगू ने इधर उधर देखा, दूसरे कोने पर उसे जमील दिखा, अच्छन चच्चा का लौंडा जमील, आदतन जुआरी, उसके साथ झंगीरा… नंबरी शराबी, फिर नन्ने । मंगू घबरा गया वह धीरे धीरे उस भीड़ में बीच में आ गया। वहॉं से भी उसकी निगाहें बराबर पहचान वालों की तलाष कर रही थीं, एक चेहरे से अचानक गमछा हटा और उतनी तेजी से वापस गया, एक झलक में ही उसने पहचाना उसका सगा साला रईस….बाप रे! जिसका नाम लेकर वह वहॉं आया था, वो भी यहीं? क्यों नहीं हो सकता? जरूरत तो उसकी भी हैं, मजदूर आदमी, प्रसूता पत्नी, एक दिन की बेरोजगारी को उससे बेहतर कौन समझ सकता है? मंगू ने अपने गमछे को कस लिया । मंगू नेताजी के आने और भाषण खत्म होने के इंतजार में था, दो घंटे तो नेताजी ही न आये, इधर उधर के लोगों के भाषण और सम्मान होते रहे, दो घंटे बाद हंगामा हुआ, जय जयकार के बाद नेताजी मंच पर थे और उसके दो मिनट बाद माइक पर । भाइयों बहनों से उनकी शुरूआत हुई, मंगू को उनके भाषण में कोई रूचि नहीं थी, वह तो भाषण खत्म होने का इंतजार कर रहा था । अचानक जोरों से ताली बजी तो उसे उत्सुकता हुई उसने पड़ोसी से पूछा-
‘ भाई जान क्या कै रिया ऐ ये?’
‘ ये कह रहा है कि अपने मुल्क का इतना पैसा गैरमुल्कों में जमा है अगर वापस आ जाय तो हर आदमी के हिस्से में लाखों रूपये आ जायेंगे’ पड़ोसी ने जवाब दिया
‘ ये वापस लावैगा?’
‘ कह तो रहा है’
‘ बॉंटेगा भी’
‘ सुनो यार, बोलता तो अच्छा है’ पड़ोसी कसमसाया
अब मंगू ने सुनना शुरू किया, नेताजी कह रहे थे –
‘ मितरों…..ये काला धन हम सौ दिन में वापस लायेंगे, ये जनता का पैसा है, आपका पैसा है, आपका…आपका…आपका….
कहते हुए नेताजी ने जनता की ओर उॅंगली से इषारे किये तो मंगू को एक उॅंगली अपनी ओर भी आती दिखी, नेताजी की आवाज फिर आई –
‘ मितरों हम इस पैसे में से उन लोगों को भी हिस्सा देंगे जिन्होंने एक नंबर की कमाई की है, मितरों ये काले धन वाले लोग अपनी कमियॉं छुपाने के लिये मुझ पर दंगों के आरोप लगाते रहे, इन्होंने चौरासी में क्या किया सब जानते हैं । इसके लिये इन्होंने कभी माफी नहीं मॉंगी हमेषा मुझसे माफी की मॉंग करते रहे । भाइयों बहनों….अपराध की सजा माफी नहीं होती, यदि मैं अपराधी हूँ तो चौराहे पर फॉंसी दे दो, पर जो अपराध किया नहीं उसके लिये माफी क्यों मॉंगूं ….
तालियॉं बजने लगीं, उसके बाद भी मंगू ने ध्यान से सुना, गंगा जमुना साफ करने की बात भी हुई, इतिहास भूगोल की भी, लेकिन याद करने लायक दो ही बातें थीं, एक तो दंगों पर सफाई दूसरा काले धन में मंगू का हिस्सा । भाषण खत्म हुआ, भीड़ छॅंटने लगी, मंगू भी वहॉं से निकला, एक गली में घुसकर उसने चश्मा, टोपी और गमछा हटाये और तय किया कि वह ससुराल जरूर जायेगा ताकि उसे कोई गलत साबित न कर सके । वह गलियों में होता हुआ साले से बीस मिनट पहले ससुराल पहुंच गया, सास ने बड़े आदर से उसे बैठाया, सलहज और उसके बच्चे से भेंट के बाद चाय पानी हुई ही थी कि साला आ गया ।
‘ सलाम बालेकम दूले भाई’ रईस बोला
‘ बालेकम सलाम रईस मियॉं, कॉं घूम आये?’
‘ काम धंधा था ना आज, सोचा कईं घूम ई लें’
‘ भाई कपड़े तौ ईद वाले पहने’ वह हॅंसा
‘ पहने तौ तमनै भी’ वह भी हॅंसा
‘ हॉं जी, हम तौ सुसराल आये, तम क्या सकूराबाद से आ रये’
‘ यार ऐ अपना, बिसकी भैन के भॉं गये’
‘ या रैली में से आ रये?’ वह हॅंसा
‘ रैली? कैसी रैली?’ वह सकपकाया
‘ मंदिर पाल्टी की’
‘ ह…हमसे क्या मतलब बिस पाल्टी का?’
‘ सुना था टोपी लगाने के पैसे दे रये’ वह हॅंसा
‘ दे रये होंग्गे पर हराम हलाल भी तौ देखना दूले भाई’
‘ इतना क्यूं सोचै रईस, गरीब आदमी कूँ सब हलाल होवै, पैसे वालों कूँ तौ गरीब का हर काम हराम दीखै, पेट की खातिर कोई चला भी जाय तौ क्या गलत? क्यों मुमानी?’ उसने सास से पूछा ।
‘ फुफ्फा की तबीयत खराब बताई परसों रईसन नै, अब ठीक हैं?’ बजाय सास के साले ने बहस बदली
‘ चलती का नाम गाड़ी ऐ, दवाई दिलाई चार दिन की, कुछ फरक तौ दीखै’
‘ तमें क्या लगै? मंदिर पाल्टी की सरकार बन सकै?’
‘ भाई सिआसत मेरी समझ तौ आती ना, बनै बन जा, कोई निहाल ना करै’
‘ पर जे तौ मारने की जुगाड़ करैं’
‘ झटके में मार दे तौ ऐसान ई हो गरीब पै, पर ऐसा कोई कमबखत ना करने वाला, एम.जी.रोड इननै तौ बंद ना की? किसी भी दिन चार सौ से कम ना लावै था, किसी दिन तौ छै सौ तक हो जावै थे अब दो सौ, ढाई सौ…’
‘ तम दे दो मंदिर पाल्टी कूँ बोट?’
‘ अभी तौ ना सोचा पर घर में गिरस्थी की बात कर रईस, क्यूं पालटिक्स करै’ वह हॅंसा
थोड़ी देर बातें करके वह निकला तो आॅटो चालू हो चुके थे, एक आॅटो में सवारियॉं भरवाने की मदद की ऐवज वह लटक कर सचदेवा की दूकान तक पहूँच गया, वहॉं चार पॉंच लोग मौजूद थे जिनमें जमील, झॅंगीरा और नन्ने शामिल थे, वह दूर रहकर भीड़ छॅंटने का इंतजार करने लगा । भीड़ खत्म होने पर वह सचदेवा के पास पहूँचा ।
‘ आ भाई मंगू, मजा आ गया, बढि़या रही रैली, ये ले’ कहते हुए उसने तीन सौ रूपये बढ़ाये
‘ ये जमील, झंगीरा, नन्ने, ये भी तमारे ई आदमी थे?’ वह पैसा लेते हुए हॅंसा
‘ थे तो, पर तेरी बात अलग है, ये साले तो डेढ़ डेढ़ सौ वाले थे’
‘ मुझे ना पता और ना जानने की तलब, पर चचे अपने मुलक का इतना पैसा है गैर मुलक में?’
‘ कितना?’
‘ तमारा नेता तौ एक इंसान के खाते में लाखों डाल रिया’
‘ हॉं ठीक कह रहे थे’
‘ मानै भॉं से निकल आवैगा पैसा?’
‘ क्यों नहीं निकलेगा? मुल्क का पैसा था, चोरी चकारी से वहॉं पहूँचा, सरकार में दम होना चाहिये, अभी तो जितने मंत्री संत्री हैं इनका खुद जमा है’
‘ जब पैले से हल्ला मचा दोगे तो निकाल ना लेवेंगे?’
‘ निकाल के कहॉं ले जायेंगे?’
‘ इसमें क्या बड़ी बात ऐ, झॉं से निकालेंगे, भॉं रख देवेंगे, लाओ मुझे दो मैं गैर मुलक ना जाऊॅं, झईं पता कर लैना, जब तक डंडे ना मारौ तब तक तौ बताने का ना, जमील और झंगीरा पै तौ जब तक बेलन ना चढै़ तब तक बिनका ई नाम ना पूछ सकौ’
‘ तू बावला है मंगू, सारे देष ये काम नहीं करते अधिकतर तो एक नंबर का पैसा ही रखते हैं’
‘ फिर भी दस बीस तौ होंग्गे, झॉं से भॉं, भॉं से भॉं करते रऔ’
‘ इतना आसान नहीं है मंगू’
‘ चलौ मान ली, पर ले आवैगा तौ बॉंटैगा भी, इसकी क्या गारंटी ऐ?’
‘ गारन्टी ये है कि इसके आगे पीछे कोई नहीं, जो कहेगा सो करेगा, नहीं तो अगली बार कौन जितायेगा? ये लंबी रेस का घोड़ा है मंगू, एक बार प्रधानमंत्री बना तो बीस साल से पहले नहीं हटने वाला, उसके लिये पब्लिक का भला तो करना ही होगा’
‘ अच्छा तो मेरे हिस्से में कितना आवैगा?’
‘ बताया तो था और जरूरी नहीं कि तेरे खाते में जाय, मुल्क की तरक्की में लगेगा’
‘ तरक्की का मतलब जेे ई तौ ऐ कि गरीबी खतम हो?’
‘ सो तो है’
‘ तौ सीधा हाथ में दो’
‘ जमील जुए में हार जायेगा, झॅंगीरा दारू पी लेगा, नन्ने लुगाईबाजी करेगा’
‘ तो गरीब कूँ मकान दिलाऔ, गरीब कूँ ऐटो दिलाऔ’
‘ सारे गरीब आॅटो चलायेंगे क्या?’ सचदेवा हॅंसा
‘ सब नईं, पर जो भी जो काम करता हो, सो दिलाओ’
‘ सो तो होगा ही’
‘ मुझे ज्यादा नईं बस एक पुराना ऐटो ई मिल जाय’
‘ उससे बीस गुना आयेगा तेरे हिस्से में’
‘ अच्छा, दंगे फसाद तौ ना हों इसकी सरकार में?’
‘ तूने सुना नहीं क्या बोला उसने? दोशी हूँ तो चौराहे पर फॉंसी दे दो, इससे ज्यादा क्या बोले? एक बार के बाद तो वहॉं भी नहीं हुए दंगे और वो भी तीन दिन में बंद करा दिये थे, अब देख शुरू तो वो भी मियॉं भाइयों ने किये थे उसके बाद हिन्दू भड़क गये, रोकने में कुछ तो वक्त लगता । अरे मंगू, ये इंसान तो मुल्क के लिये ही जीता है, उसी पर मरता है, सब जानते हैं कि हिन्दू मुसलमानों को साथ रहना है, तब मिलकर ही चलना होगा, ऐसे में अपने वोट क्यों कम करेगा वो?’
मंगू को बात जमी और सही यही था कि उसे अपना आॅटो दिख रख रहा था, वह सोचकर बोला –
‘ बात तो ठीक ऐ’
‘ एक बार इसे भी वोट देकर देख मंगू’ सचदेवा बोला
‘ सोचता हूँ चचे’
कहकर वह घर आ गया, रईसन उसी का इंतजार कर रही थी
‘ होइ आये?’ वह बोली
‘ कॉं?’ बदले में मंगू ने सवाल किया
‘ भईं’
‘ मुझे लगा अपने घर की पूछैगी’
‘ गये भॉं?’
‘ बड़ी हराम चीज ऐ जे सत्तार, सक कर रिया सुबैरै, इसलिये तेरे घर भी गया’
‘ सब ठीक ऐं? लौन्डा कैसा ऐ बिसका?’
‘ बढि़या, ठीक ऐ बिसका लौन्डा’
‘ किस पै गया?’
‘ मुझे क्या पता? मैं क्या कीटानू मिलाने गया भॉं, जान बचा रिया सत्तार से, ऐसै भी सब बच्चे एक जैसे दीखें, ये ले, दे आ फातिमा कूँ’ उसने तीन सौ रूपये बढ़ाये
‘ ले जावैगी खुद, चहियेंगे तौ, भॉं सब ठीक रिया?’ उसने पैसे ले लिये
‘ भॉं करना क्या था’
‘ गमछा सरका तौ ना?’ वह हॅंसी
‘ मेरा तौ ना पर तेरे भाई का सरक गया’ वह भी हॅंसा
‘ रईस? वो क्या कर रिया था भॉं?’ उसे अचरज हुआ
‘ जो मैं कर रिया सो वो कर रिया, वो कौन नवाब छतारी ऐ’
‘ हॉं जी, मजदूर तौ एक दिन की दिहाड़ी ना तोड़ सकै, बीवी जापे में पड़ी, गया होगा, पर बिसका फोटू तौ ना आवै कहीं टी.वी. पै’
‘ आ जाय तौ आ जाय, चोरी की किसी की?’
‘ पर बिस नेता की मैजल्टी में जाना तौ गलत मानै बिरादरी वाले’
‘ नेता अच्छा कौन ऐ? जे कम से कम गरीबों कूँ पैसा बॉटने की तौ कै रिया’
‘ क्या कै रिया?’ पैसा बॉटने के जिक्र से उसे उत्सुकता हुई
‘ जे कै रिया अपने झॉं के चोर नेता अफसरों और बिजनिसमैनों ने दो नंबर का जो पैसा गैर मुल्कों में जमा किया, बिसे मुलक में लावैगा और गरीबों में बॉंटैगा’
‘ अकीन कर सकौ नेता की बात पै?’
‘ अकीन करा जा सकै, मुलक से कमा कै बॉंटना मुश्किल काम ऐ, पर बाहर से आ जाय तौ बॉंटने में क्या दिक्कत? रॅंडवा ऐ तौ खाने वाला भी ना, फिर लोग बाग बतावें इसके सूबे में दंगा भले हुआ पर तरक्की भी हुई, मुलक में सबसे पैसे वाले मुसलमान इसके ई झॉं ऐं’
तभी बाहर गली में हंगामे की आवाज आने लगी, दोनों बाहर निकले, गली में जमघट लगा था, अच्छन मियॉं अपने लड़के जमील को जूतों से पीट रहे थे
‘ भैन के…….जे दिन दिखाने कूँ रै गिया, अरे जब हमारी मैहजत तोड़ी तबी तै हो गिया मंदिर पाल्टी वालों से कोई मतलब ना रखना, तू गया कैसे भॉं?’
‘ कसम ले लो अब्बू झॅंगीरा और नन्ने ले गये मुझे’ जमील बचाव कर रहा था
‘ तू तो दूध पीता बच्चा है जैसे? रोजाना टोपी पहनता है क्यों?’ मुल्ला जी ने हड़काया
‘ टोपी भईं दी उननै’
‘ तो घर चला आता’
‘ मुल्ला जी इसे तौ मैं देख लूं, इस बार माफ कर दो’ अच्छन मियॉं घिघियाये
‘ ये तो कुफर है अच्छन, जिन काफिरों ने मस्जिद तोड़ी, मुसलमान मारे उनकी मीटिंग में गया तेरा लौन्डा? और पैसे के लिये गया? टोपी लगाके ये बताया कि मुसलमान काफिरों के साथ हैं? फैसला बिरादरी करेगी, इसे मस्जिद के बाहर तक लाओ और उन दोनों को भी’
‘ वो दोनों तौ भग गये, भॉं बबलू की दुकान पै टी.वी. पै फोटू देख कै’ कई बच्चे एक साथ बोले
‘ उनके घर वालों को लाओ’ मुल्ला जी ने आदेष दिया और मस्जिद की ओर बढ़ गये
मंगू सारा माजरा समझ चुका था पर निर्दोष दिखने के लिये नासमझ बनना जरूरी था
‘ क्या माजरा ऐ सत्तार चच्चा?’ वह बोला
‘ अरे भैन के…. टोपी लगाके भॉं गये मंदिर पाल्टी की मीटिंग में, जेे तो बिरादरी की नाक कटाना ऐ, बीस साल पैलै तै हो गिया कुत्ते कूँ मूं लगा लो पर मंदिर पाल्टी के काफिरों कूँ मूं ना लगाना, जन बच्चा जानै इस बात कूँ, तौ गये क्यों?’
‘ जाने दो चच्चा, गरीब आदमी कूँ लालच आ गया होगा’
‘ ना भाई मजब से बड़ी जिन्दगी भी ना और जे तीनों रॅंडवे, जुआरी, शराबी अपने कुकरमों के लिये लिये पैसे, चल जरा मैहजत तक देख के आवें’
मंगू को सत्तार मियॉं के साथ जाना पड़ा, वहॉं जब बाकी दो दोषियों के परिवार पर दबाव पड़ा तो वे भी आ गये और अंत में सर्व सम्मति से फैसला हुआ कि तीनों को पच्चीस पच्चीस जूते लगेगें और पॉंच पॉंच सौ का जुर्माना देना होगा।
‘ अरे भाई पंचो जूते पच्चीस और मार लो पर डेढ़ डेढ़ सौ तौ मिले पॉंच सौ कहॉं से देंगे’ अच्छन मियॉं कुलबुलाये
‘ नरमी बरती है अच्छन, गुनाह बड़ा किया है पर गरीबी की वजह से छोड़ा है, जूते बढ़ाना है तो तुम्हारी मर्जी, नीलामी करा लो, बस्ती के लोग एक जूते के बीस रूपये इनकी जेब में रखते जायें, जूते मारते जायें, पंच फैसला मंजूर नहीं तो अभी बस्ती छोड़ दो, तुम्हारे मकान की कीमत यहीं मिल जायेगी’ बस्ती के गिनती लायक अमीरों में से एक सलाम भाई बोले
ठहाका लगा, पर समस्या भी हल हो गई । उफ…..मंगू कॉंप गया, अगर वह पकड़ा जाता तो? वो न जमील है, न झॅंगीरा और न नन्ने, क्या करता वो? पचास जूते खाता? बस्ती छोड़ता? या खुदकषी? उसे उबकाई आने लगी, वह तेजी से घर आ गया ।
‘ क्या हुआ जी?’ रईसन ने पूछा
‘ बुरा हुआ, गरीबी की जे कीमत? सरेआम जूतों से पीटेंगे गरीबों को’ वह उदासी से बोला
‘ अच्छन चच्चा तौ झईं मार रये’
‘ अच्छन तौ बाप ऐ बिसका, पंच भी मार लो, पर रस्ता चलते मारेंगे, जेब में बीस डालो और जूता मार लो’
‘ हाय अल्ला…’ कहती हुई वह बाहर भागी
‘ कॉं जा रई?’
‘ फातिमा के झॉं, अपनी डिस काट गया डिस वाला’
‘ क्या देखैगी भॅां?’
‘ अरे मेरा रईस भी तौ गया’ वह रुआंसी हुई और तेजी से निकल गई
आधे घंटे में वापस लौटी तो खुश थी
‘ मेरा रईस ना दिखा, तम भी ना, पर जे कमबखत तौ नाच रये, पकड़े कैसै ना जाते?’
‘ फिर भी गलत तौ हुआ बिनके साथ’
‘ सब मुकद्दर ऐ जी, बस चलता तौ सब सलाम मियॉं के घर में पैदा होते’
अगले दिन उसका मन उदास था, सुबह न सचदेवा को फुर्सत होती न उसे, शाम को जब लौटा तो भी कुछ अनमना था, उसने सचदेवा को चाभी दी, तो सचदेवा बोला –
‘ कुछ उदास है मंगू?’
‘ हॉं, बस्ती का मसला तो पता चल गया होगा?’
‘ हॉं, तू चिन्ता मत कर, तेरा न किसी को नाम पता न तस्वीर आई टी.वी. पर’
‘ बिससे क्या? बिन गरीबों के साथ तौ बुरा हुआ’
‘ इसमें मैं क्या कर सकता हूँ ? तुम्हारी बस्ती का मामला है, इस पर भी अगर वो मेरे पास आयें तो मैं मदद कर सकता हूँ , रिपोर्ट करवा दूंगा, घर पर पुलिस भी लग जायेगी, पर लिखकर देना होगा कि कल वो मर्जी से रैली में गये थे’
‘ अब इतना दम ना बिनमें, अब तौ तमारी तरफ पैर करके ना सोने के’
‘ तू मुझे जिम्मेदार मान रहा है?’
‘ ना चचे जें तौ सौदा था, नफा नुकसान का हिसाब तौ सौदे की बखत सोचा जावै, गलती तौ बिनकी गरीबी की ऐ’
‘ बैठ, चाय पी’ उसने चाय का गिलास बढ़ाया फिर बोला –
‘ गरीबी हिन्दुओं में भी कम नहीं मंगू पर ये बकवासें वहॉं नहीं होतीं, इक्का दुक्का दूर दराज गॉंवों में भले हो जाय, पर अपने शहर में इतनी आजादी तो है कि अपनी मर्जी में बस्ती का दखल नहीं, उसकी वजह है पढ़ाई लिखाई’
‘ हिन्दुओं में गरीब छोटी जात वाले थे, बिन्हें रिजरबेसन दे दिया, पढ़ने कूँ बजीफा दिया, नौकरी मिली, आगे बढ़ गये, मुसलमानों कूँ किसनै दिया?’
‘ वही तो, सबने मुसलमानों का फायदा ही उठाया, जिसने नहीं उठाया….’
‘ बिसे भी एक बार उठाने दें…’ मंगू हॅंसा
‘ जब दोस्तों ने बुरा किया हो तो जिसे दोस्तों ने दुश्मन बताया उससे दोस्ती में भी क्या हर्ज?’
‘ और जो ना दोस्त हो ना दुसमन?’
‘ कौन?’
‘ अरे वोई दिल्ली वाला जो ज्यादा खॉंसै क्या ऐ’
‘ वो? अपनी खॉंसी तो ठीक नहीं हुई उससे’
‘ डाक्टर थोड़ी ऐ खॉंसी कूँ, पब्लिक का तौ भला किया, बिजली दी, पानी दिया, ऐटो के लासेन्स बॉंटे, जाड़ों में रजाई गद्दे दिये’
‘ कितने दिन? क्यों भागा डेढ़ महीने में?’
‘ बोट ना डालें बिसमें भी क्या हर्ज?’
‘ कर पायेगा ऐसा? तूने अगर पहले बता दिया तो तेरा वोट बस्ती वाले डलवा देंगे, अभी महीना भर है, ध्यान से सोच तू वोट नहीं भी देगा तो भी मैं तेरा चचा हूँ’ सचदेवा हॅंसा
इस तरह सचदेवा और मंगू की मीटिंग्स होती रहीं पंद्रह दिन में मंगू बुरी तरह परेशान हो गया था, जिसे रईसन ने समझा । एक दिन वह उसे उधेड़बुन में देख बोली –
‘ कुछ परेशान रैहने लगे जी, जब से बिस कमबखत की रैली हुई’
‘ हॉं, अगर तूने फातिमा का कर्जा ना किया होता तौ कुछ ना होता’
‘ बिससे क्या हुआ?’
‘ बिससे मैं रैली में गया, इधर पंचात भी लगी, जंगलराज देखने कूँ मिला, सिरफ मुल्ला, सलाम और सत्तार ना पूरी बस्ती, दॉंत फाड़ रिये गरीबों की बेज्जती पै, जे बस्ती छोड़नी’
‘ फिर कॉं रहौ?’
‘ कहीं भी, इंसानों में, वो हिन्दू हों, मुसलमान हों, ईसाई हों, सरदार हों’
‘ मजब बिरादरी के बाहर दब कै ना रैहना पड़ै?’
‘ झॉं कौन उछल कै रैह रिया? गैर बिरादरी वाले मारेंगे? मार दें, किस्सा तौ खतम हो’
‘ पर झॉं से बेचकै कहीं सस्ता मिलना भी ना’
‘ हॉं, अपना ऐटो हो जाय तौ कुछ बचै, तब तौ छोड़ी जा सकै बस्ती’
‘ ऐटो कहॉं से हो?’
‘ पंजाबी कैह रिया कै बिसका नेता गैर मुलक से लावै पैसा, पंदरै लाख कै रिया पचास हजार तौ दे’
‘ ना दे तौ’
‘ जिनै अब तक बोट दी बिननै क्या दे दिया? सलाम हम जैसा तौ कभी ना था, पर पिछले बीस साल में कड़ोरपती हो लिया, जो मिला बिसे मिला, अब बिसके कैहने पै तौ ना दूं’
‘ मंदिर पाल्टी कूँ दो?
‘ सोच लिया, मंदिर पाल्टी कूँ दूं, खॉंसी वाले नेता कूँ दूं पर जिसे सलाम और मुल्ला कहें बिसे तौ कतई ना दूं ’
‘ जिसे देना बिसे देना पर अब खुस रहौ’
मंगू ने तय कर लिया कि इस बार वह वोट उन्हें नहीं देगा जिन्हें देता आया था । बीच में एक दिन उसे अपने निश्चय पर डोलने का अवसर भी आया, जब कैन्ट से शाहगंज की दो सवारियॉं उसने बैठाईं, दोनों डी.आर.एम. दफ्तर के बाबू रहे होंगे, उनकी बहस शायद पहले से चल रही थी जो आॅटो में बैठने तक जारी थी-
‘ सब बकवास है, कालाधन अब कभी वापस नहीं आना, दम है तो दाऊद को ले आओ, छोटा राजन को ले आओ, सईद को ले आओ’ पहले ने कहा
‘ लायेंगे, उन्हें भी लायेंगे’ दूसरा बोला
‘ सत्ता में पहली बार आओगे क्या? छह साल तुम्हारी ही सरकार थी’
‘ गठबंधन की मजबूरी थी’
‘ मंदिर, कश्मीर, यूनिफार्म सिविल कोड, दाऊद, हर काम में गठबंधन की मजबूरी बताते हो तो गठबंधन की सरकार क्यों बनाते हो? ताकि खा सको?’
‘ हमारे किसी आदमी ने नहीं खाया’
‘ यही वे कहते हैं, तब ब्लैक मनी क्या इस आॅटो वाले का है?’ वह हॅंसा, मंगू चुप रहा
‘ इस सरकार के मंत्री और इनके बिजनिस मैनों का है’
‘ तुम्हारा तो अध्यक्ष तक पकड़ा गया, ताबूतों में तुमने खाया’
‘ लिस्ट तो इनके पास आ चुकी, क्यों नहीं बताते नाम?’
‘ मुझे क्या पता? मैं इनके पक्ष में नहीं पर तुम दूसरों के पक्ष में हो जो छै साल सत्ता में रहे, ब्लैक मनी तब भी ला सकते थे’
‘ बताया ना गठबंधन…’
‘ घंटाबंधन यार…..इस स्टेप का यदि विरोध होता तो सरकार गिरती, गिरती तो मजबूती से खड़ी भी होती, सही ये है कि ब्लैक मनी सारी पार्टियों का है, उनके समर्थकों का है, इसलिये इसे भूल ही जाना चाहिये’
भूल जाना चाहिये…..कमबख्त मंगू के सपने पर बिजली गिरा रहा था, उसे बोलना पड़ा –
‘ भाई साब क्यों भूल जायें? पब्लिक का पैसा ऐ, पब्लिक को मिलना चाहिये’
बाबू चौंका लेकिन जब बहस में मंगू शामिल हो चुका था तब जवाब मिलना ही था –
‘ ओह…तुम्हें भी चाहिये पंद्रह लाख? बेटा अपने अधिकारों के लिये इतने जागरूक हो तो हर चौराहे पर सिपाहियों को हफ्ता क्यों देते हो? आलू प्याज खरीदते वक्त ये क्यों नहीं पूछते कि कल दस रूपये वाली जिन्स आज चालीस क्यों हो गई? घर के सामने गुंडे शराब पीकर मॉं बहन की गालियॉं बकते हुए निकलते हैं तब डंडा लेकर क्यों नहीं निकलते? चौराहे पर लड़की छेड़ी जाती है तब आंख चुराकर क्यों निकल जाते हो, न हम जागरूक है, न हमारे बाप दादे थे, ऐसा होता तो ब्लैक मनी पैदा ही नहीं होता, पैदा नहीं होता तो बाहर कैसे जाता?’
‘ तम तौ गुस्सा हो गये बड़े बाबू’
‘ ना बेटा, सच्चाई बता रहा हूँ, गरीबों को सपना दिखा दिया कि एक एक को लाखों मिलेंगे पर सवाल ये है कि लाने का तरीका क्या है? ऐसे गा बजा के आता है पैसा? नाम तीन साल से आपके पास रखे हैं, इन तीन साल में कोई चूतिया ही होगा जो खाते में पैसा रखेगा, पैसा जब हर पार्टी के लोगों का है तो किसी तरह नहीं आना। अरे जितना मुल्क के बाहर है उससे ज्यादा अंदर है, रोज खबरें आती हैं कि बाबू के यहॉं दस करोड़ मिले, चपरासी के यहॉं पॉंच करोड़, ये वो बदकिस्मत भ्रष्ट थे जिनके पीछे कोई पड़ गया, कौन नहीं जानता कि आर.टी.ओ. का चपरासी, कोर्ट का अर्दली, रजिस्ट्रार दफ्तर का अॅंगूठे वाला भी दो तीन हजार लेकर घर में घुसता है, बाबुओं, इंजीनियरों, डाक्टरों और अधिकारियों के जलवे ही अलग, कैन्ट के सामने कचौड़ी, पकौड़ी, पेठे की दूकान वाले रोज पॉंच से सात हजार कमाते हैं एक पैसा नहीं देते टैक्स का, सबसे निकाल लो तो कहीं जाने की जरूरत नहीं’
‘ बात तौ ठीक कै रये बड़े बाबू, हमसे तौ रोज ले लेवैं इनकम टैक्स’ मंगू हॅंसा
‘ तू क्या कमाता होगा यार, लेकिन तुझसे लेकर वो सरकार के पास नहीं पहूँचता, तेरा मेहनत का पैसा भी ब्लैक मनी ही बन रहा है’
शाहगंज आ गया, बड़े बाबू मुस्कराकर अलग अलग रास्तों पर चले गये, पर मंगू को शंका दे गये, उसने आॅटो लौटाते वक्त सचदेवा से चर्चा की और पूरा किस्सा बताया, यह भी कि उसे बड़े बाबू की बातों में दम लगा । सचदेवा शांति से बोला –
‘ विघ्न संतोषी जानता है?’
‘ क्या?’
‘ एक होता है अमन पसन्द, दूसरा खलल पसन्द, वो दूसरा वाला था, शर्तिया कम्युनिस्ट होगा’
‘ ये क्या होवै?’
‘ कुछ लोग जिन्दगी से परेशान होते हैं, ईश्वर अल्ला को मानते नहीं, धर्म को मानते नहीं, इनकी सोच उल्टी होती है, कुछ ना करो तो इन्हें परेशानी, कुछ करो तो और ज्यादा, ये पानी मॉंगे तुम दे दो, गिलास थोड़ा भी खाली हो तो बहस खाली पर करेंगे भरे पर नहीं ।’
‘ अगर इतने बुरे होते तो बिन्हें कोई मानता क्यों?’
‘ चूतिया बनाते हैं, कहते हैं सब चीजों का बराबरी का बॅंटवारा होना चाहिये’
‘ अल्ला कूँ ना मानै ये तौ गलत बात ऐ पर बॅंटवारे में क्या बुरा है? अच्छी बात है’ कहते हुए मंगू की निगाह सामने खड़े बारह आॅटो पर गई, इतने ही रोड पर भी रहे होंगे उस वक्त, उसने सोचा, सचदेवा कुढ़ा –
‘ तो करते ना बॅंटवारा, चालीस साल रहे बंगाल में, वहॉं का रिक्षा देखा है कभी?’
‘ नहीं’
‘ घोड़े की जगह आदमी जुतता है उसमें’
‘ अल्ला…’
‘ मुल्क का सबसे बड़ा रंडीखाना वहॉं, सिर्फ एक वक्त खाने की ऐवज औरत मिल जाती है वहॉं, पॉंच सौ रूपये के लिये कत्ल होते हैं वहॉं’
‘ अल्ला…’
‘ जहॉं सरकारें नहीं वहॉं अपने आतंकवादी छोड़ रखे हैं नक्सल वादी, माओ वादी, गरीबों को ही मार रहे हैं कमबख्त, गरीबों के हितैषी होते तो क्यों जाते बंगाल से?’
‘ पर जे बिस बाबू की बात का जवाब ना हुआ चचे’ मंगू इतना मूर्ख नहीं कि उसे विषय से हटाया जा सके
‘ उसकी बात का जवाब तो सरकार बनने के बाद ही दिया जा सकता है, डाक्टर ये सोचकर दवा देता है कि फायदा होगा, उससे कोई बहस करता है क्या? कई बार फायदा नहीं होता तो हम उस डाक्टर को चूतिया कहते हैं और दूसरे के पास चले जाते हैं ।’
मंगू के पास इसका जवाब नहीं था, लेकिन इतना तो कह ही दिया –
‘ चचे मुझे तौ तमारा भरोसा है’
‘ तो ठीक है मेरे कहने पर अपने और घर के वोट तो डलवा सकता है?’
‘ घर के तौ झॉं चाहूँ डलवा दूं, बाहर की बात मत करना चचे, मैं ना पैसे वाला, ना रसूख वाला’
‘ ठीक है’ कहते हुए सचदेवा ने उसकी पीठ पर हाथ मारा
कत्ल की रात थी, यानी अगले दिन वोटिंग होना थी, वह आॅटो लौटाकर लौटा तो रईसन ने बताया कि नौ बजे मस्जिद पर मीटिंग है जिसमें उसे हाजिर होना है, वह नहीं गया तो दस बजे लोगों का हुजूम उसके घर पर था, जिसका नेतृत्व मुल्ला जी और सलाम भाई कर रहे थे ।
‘ सलाम बालेकम सलाम भाई, मुल्ला जी, आओ बैठो’ वह सम्मान से बोला
‘ फिर बैठेंगे, तू आया नहीं मस्जिद पै’ सलाम भाई बोले
‘ देर से आया’
‘ अच्छा ठीक है कल क्या करना है पता है?’
‘ बिसमें क्या ऐ? चक्कर….’
‘ हॉं, ध्यान रखना, चच्चा की तबीयत कैसी है?’
‘ ठीक ई ऐ’
‘ वोट डाल पायेंगे?’
‘ ले जाऊॅंगा’
‘ ठीक है’ कहते हुए सलाम भाई ने उसके कंधे पर हाथ मारा और भीड़ अगले घर की ओर चली गई ।
उनके जाने के बाद रईसन बोली –
‘ फुफ्फा कॅूं ले जाना ऐ कल?’
‘ जा पावेंगे?’
‘ चल फिर तौ रये, गली में घूम लें बबलू की दुकान तक’
‘ सो गये?’
‘ पता ना, छत्त पै चले गये’
‘ अच्छा हॉं, कल फूल पै दबानी बटन’
‘ फूल पै? चक्कर पै ना?’
‘ हॉं, एक बार बिसकूँ भी देख लें, गरीबों के भले की बात कर रिया उनका नेता’
‘ क्या भला करैगा, गैर मुलक से पैसा लाकै बॉंटेगा?’
‘ कै तौ रिया’
‘ करैगा भी?’
‘ साठ साल से दोस्तों कूँ देख रये एक बार दुसमन कूँ देखने में क्या बुराई? इलाज ना हो तौ डाक्टर बदला जावै कै ना?’
‘ पर बस्ती बिरादरी?’
‘ देख ली बिरादरी, गुलामी ना करावै बिरादरी, उन तीनों के जूते अब तक ना भूला मैं, बात खुल जाती तौ वो जूते मुझमें भी पड़ सकै थे, पॉंच सौ तौ बिस दिन मेरी जेब में भी ना थे, फिर बंद कमरे में कौन देख रिया कै कॉं दबाया बटन?’
‘ तम जानौ जी, किसी से पैसे लिये हों तौ बता दो’
‘ आज तक कुछ छुपाया तुझसे? इस बार मैं भी चाहूँ कै मंदिर पाल्टी ई आवै, पंद्रह लाख कै रये लोग, पचास हजार तक तौ करैगा, पुराना ऐटो आ जावैगा इतने में’
‘ देख लो इसकूँ भी’
अगली सुबह मतदान केन्द्र यानी प्राइमरी स्कूल के बाहर खासी भीड़ थी, मंगू की पीठ पर नूरदीन लदा था, रईसन पीछे पीछे चल रही थी । सलाम मियॉं चुनाव ऐजेन्ट थे, उन्होंने रईसन को लाइन में जाने का इशारा किया –
‘ तू लाइन में लग जा रईसन, मंगू तू चच्चा कूँ लेके आगे चल’
मंगू और रईसन दोनों ने सिर हिलाया, सलाम मियॉं, मंगू और नूरदीन को लेकर पोलिंग अधिकारी के पास पहूँचे और निवेदन किया-
‘इनका वोट पहले डलवा दो बड़े बाबू बीमार हैं, ये इनका लौंडा है, दोनों को साथ भेज दो’
‘ठीक है, पर्ची लाओ’
मंगू ने पर्ची दी, अधिकारी ने इषारा किया, दोनों ई.वी.एम. पार्टीशन में चले गये, पहले मंगू ने फूल का बटन दबाया और ऊॅंची आवाज में बोला –
‘ किसपै दबाना अब्बा?’
‘ चक्कर ई तौ बताया सलाम नैं’
परदे के बाहर सलाम मियॉं मुस्कराये, पोलिंग अधिकारी ने हॅंसकर टोका –
‘ इतना जोर से मत बोलो चाचा’
‘ अनपढ़ आदमी हैं बड़े बाबू, जाने दो’ सलाम मियॉं बोले
परदे के पीछे मंगू ने फूल का बटन दबाया
‘ लो अब्बा दब गया’
‘ चक्कर ई था?’ नूरदीन धीमे से बोला
‘ हॉं’
दोनों बाहर निकल आये, रईसन लाइन में लगी थी, मंगू हाथ हिलाता निकल गया, थोड़ा आगे चलकर मंगू की पीठ पर बैठा नूरदीन बोला –
‘ मंगू…’
‘ हॉं अब्बा’
‘ चक्कर पै दबाया?’
‘ हॉं’
‘ पर मुझे फूल सा लगा’
‘ चक्कर भी तो गोल गोल होवै’
‘ पर बिसपै पत्ती ना होवें’
‘ तौ फूल पै ई दबाया’ मंगू थोड़ा गुस्से में बोला
‘ पर सलाम तौ चक्कर की…’ नूरदीन बोला
मंगू ने इधर उधर देखा, फिर नूरदीन को एक चबूतरे पर उतार दिया –
‘ इधर बैठे रहौ, सलाम आवैगा बिसकी पिद्दी पै बैठ कै बिसके ई घर चले जाना’
‘ क्या कैह रिया बे’ नूरदीन बोला
‘ पीठ पै मंगू बैठा रिया, दवा मंगू दिला रिया, पैर मंगू दबा रिया, बोट सलाम के कैहने पै डले?’
‘ मोज्जिज आदमी ऐ बस्ती का’
‘ मौज्जिज कै पैसे वाला?’
‘ कुछ भी कैह लो’
‘ तौ तम क्यूं ना बने मौज्जिज?’
‘ अबे हाथ की बात ऐ क्या, अल्ला की मर्जी ऐ’
‘ अल्ला भी समझ ना आता जे भी बिनके ई संग क्यूं रहै जो बिसपै कब्जा करैं, पर तम समझ लो फूल पै दिया, सोच समझ कै दिया’
‘ वो क्या करै?’
‘ वो काला पैसा वापस लावै ’
‘ काला? पैसा तौ हरा हरा होवै, क्या करैगा काला पैसा लाकै?’
‘ तमारी समझ ना आना, जान लो कै बिसके आने पै अपना ऐटो बन सकै’
‘ पैहलै ना बता सकै था, चल, घर चल’
‘ पर कैहना ना किसी से’
‘ ना कै रिया, चल’
मंगू नूरदीन को पीठ पर उठाकर घर आ गया, अब वह सोलह मई का इंतजार करने लगा । सोलह मई को जब वह आॅटो लेने गया तो सचदेवा बोला –
‘ आगे चल रही है अपनी पार्टी’
‘ अपनी बोट कामयाब हुई कै ना?’
‘ अभी पता नहीं चला, बैठ’
‘ चलूं चचे, रासन तौ रोज चहिये’
सवारियॉं हालॉंकि उस दिन कम मिलीं, पर सवारियों की चर्चाओं से उसे पता चल गया कि उसका वोट कामयाब हुआ बल्कि उन नेता जी को देश भर में जबर्दस्त सफलता मिली । मंगू की समझ में आ गया कि इस बार मंदिर पार्टी के परंपरागत विरोधी वोटर ने उसकी तरह ही वोट दिया था । कोई बड़ी बात नहीं कि उसकी बस्ती में उस जैसे और लोग भी हों, सामने आने की हिम्मत भले न हो । बहरहाल मंगू खुश था, जब आॅटो लौटाने वह पहुंचा तो सचदेवा की दूकान पर खासी भीड़ थी, सचदेवा और उसके बेटे लड्डू बॉंट रहे थे
‘ आ भाई मंगू, कमाल हो गया भाई’ सचदेवा ने उत्साह में उसे गले लगा लिया, मंगू ने घबराकर इधर उधर देखा, इक्का दुक्का मुसलमान तो वहॉं थे पर बस्ती का कोई नहीं था
‘ कमाल ई हो गया चचे, इतनी सीट तौ तमारे नेता नै भी ना सोची होगी’
‘ ले लड्डू ले’ कहते हुए सचदेवा ने तीन चार पैकेट उसे थमा दिये
मंगू हालॉंकि बात करना चाहता था लेकिन मुसलमानों की मौजूदगी में कुछ और बात करना उसे खतरे से खाली नहीं लगा, उसने औपचारिक मुबारक बाद दी और घर आ गया, घर में घुसने से पहले ही सत्तार मियॉं ने उसके हाथ में पैकेट देख लिये । बात मिठाई की भी नहीं थी दरअसल मॅंगू खुश दिख भी रहा था और अक्सर गली में चुपचाप घुसने वाला मंगू ‘हवन करेंगे, हवन करेंगे’ गा रहा था ।
‘ मंदिर पाल्टी की खुशी की जीत मना रिया मंगू’ उन्होंने जुमला उछाला
‘ खुशी तौ है चच्चा, आज कई महीने बाद पॉंच सौ कमाये’
‘ तू तौ हवन कर रिया? जानै कौन करै हवन?’
‘ जानूं पर मुझसे पैले फरान अख्तर नै किया हवन, निकालौ साले कूँ बिरादरी से’
‘ बिसे छोड़, अपनी बात कर, तू तो खुषी में मिठाई के डब्बे ला रिया काफिरों से’
‘ इसमें खुशी और गम क्या चच्चा? लोग बाग मना रये उननै मिठाई दी हमनै ले ली’
‘ मनै तौ कर ना सकै था?’
‘ सियायत के पीछै ताल्लुक खराब कर लूं ?’
‘ काफिरों से ताल्लुक का क्या मतलब?’
‘ इसी बस्ती में रैहना हो तौ कोई मतलब ना, रोटी कमाने बिनके पास भी जाना पड़ै’
वार्तालाप सुनकर रईसन भी बाहर आ गई
‘ क्या हुआ जी?’
‘ कुछ ना अंदर चल’ मंगू बोला
‘ अरे हमें तौ तभी शक हुआ जब वोट वाली रात मैहजत पै ना पहुंचा तू’ सत्तार मियॉं बोले
‘ देखो चच्चा फालतू की बातें मत करो, मेरा मालिक हिन्दू है, बिससे मिठाई कूँ मना ना कर पाया, कल कूँ वो ऐटो ना दे तौ तम कसवाऔ कै सलाम भाई? वायदा करौ तौ अभी चलूं तमारे साथ और जे मिठाई मारू बिसके मूं पै’
‘ तौ ऐटो में बिका तू?’
अब रईसन को गुस्सा आ गया –
‘ फूल पै दबाया बटन, मैंने भी, इननै भी और फुफ्फा नै भी, उखाड़ लो बाल’
‘ अरै बड़ी नालायक औरत है भाई, उमर का भी लिहाज ना, चच्चा कहै और बाल उखाड़ने की बात करै?’
भीड़ इकट्ठा होने लगी, मंगू ने रईसन को चुप कराने की कोषिष की पर वह बिफरी हुई थी –
‘ इज्जत कराने से हो, जब कै दिया मालिक हिन्दू ऐ, बिसनै मिठाई दी तौ फेंक देते? तमें अल्ला नै इत्ता दिया महीने दो महीने घर बैठ कै खा सकौ, हम मालिक से बिगाड़ लें तौ क्या खुद खायें क्या बच्चों कूँ खिलायें, घर में बीमार बुड्ढा….’
‘ जो मुझसे कही वो बिरादरी से कहियो’
‘ डर पड़ा बिरादरी का? चोरी की? छिनाला किया? जो कहैगा सो सुनैगा’
बमुश्किल मंगू रईसन को अंदर खींच पाया और दरवाजा बंद कर लिया
‘ अब चुप भी कर, कितनी तौ सुना दी बिसे’
‘ इस कमबखत में तौ जूतियॉं मारनी किसी दिन, भॉं पत्थर पै बैठ जाय और जासूसी सी करै दिन भर, कौन जा रिया, कौन आ रिया, बच्चे इसकूल जा रये तौ क्यों जा रये, मिठाई के चार डिब्बे दीखे हाथ में, मिरच मिड़ गईं कमबखत के चूतड़ों में, अब जे नंगे मिठाई खावेंगे…’
‘ अब जाने दे बेटा रईसन, ये तौ है ई ऐसा’ नूरदीन भी रईसन के पास आ गया
‘ तम क्यों आये फुफ्फा, लेट जाऔ’ वह वापस उसे बिस्तर तक ले गई
मंगू ने चाय पी ही थी कि मस्जिद से बुलावा आ गया, रईसन ने साथ चलने की जिद की पर मंगू ने मना कर दिया, वह मस्जिद के बाहर पहुंचा, चबूतरे पर मुअज्जिज लोग बैठे थे, नीचे भीड़ थी
‘ आइये जनाब मंगू साहिब, हमें भी लपेट रहे थे आप तो?’
‘ तमारा नाम लिया सलाम भाई, पर पैले सत्तार चच्चा से पूछौ इननै क्या कहा?’
‘ मैंने क्या कहा?’ सत्तार मियॉं अकड़े
‘ तमने कहा वोट वाली रात कूँ तमें मुझपै सक हुआ, तब मैंने कहा मेरा मालिक हिन्दू है, बिससे मिठाई कूँ मना ना कर पाया, कल कूँ वो ऐटो ना दे तौ तम कसवाऔ कै सलाम भाई? वायदा करौ तौ अभी चलूं तमारे साथ और ये मिठाई मारू बिसके मूं पै, बताऔ क्या गलत कहा?’
‘ मैंने तो शक नहीं किया तुझ पर’ सलाम भाई बोले
‘ बोट वाली रात तम आये तौ थे घर पै, मुल्ला जी भी थे, सत्तार चच्चा भी थे, मैं फिर कै रिया कसवा दो ऐटो, किसी भी हिन्दू से ताल्लुक रक्खू तौ जमील और झॅंगीरा जैसा हाल करना’
‘ हम क्यों कसवा दें? इस तरह तो पूरी बस्ती कुछ न कुछ मॉंगेगी’
‘ तौ बस्ती के ताल्लुकात का ठेका भी कोई ना ले, मैं किसकी मिठाई खा रिया, किसके घर जा रिया इससे मेरे पड़ोसी का क्या मतलब?’
‘ कोई मतलब ना, पर जिस चीज पै बस्ती को रंज हो उसपै पटाखे तो ना फोड़ने दें’
‘ कौन कमबखत पटाखे फोड़ै? रोटी की जुगाड़ में दिन बीत जावै किसके पास फुर्सत ऐ सियासत के लिये’
‘ गाना गा रिया हवन करेंगे, हवन करेंगे, हवन करैगा तू? कौन करै हवन जानै?’ सत्तार मियॉं बोले
‘ सब जानूं पर मुझसे पैहलै फरान अख्तर के गले में डंडा डालौ बिसनै ई किया हवन’
‘ ये कोई बात नहीं सत्तार भाई, गाना है तो है, तेरी बात ठीक है मंगू पर जो तेरी बीवी ने किया? बाप की उमर के आदमी से बाल उखड़वा रही थी ’
‘ इन्हें भी सोचना चहिये था, जे तेज ना बोलते तौ वो भी ना बोलती, फिर भी बाप दाखिल ऐं मैं माफी मॉंगता, पर इन्हें भी समझाऔ कै दिन भर मेरे घर की जासूसी बंद करैं’
‘ क्यों सत्तार मियॉं, जासूसी भी करते हो’ सलाम मियॉं हॅंसे
‘ अरे अपने पत्थर पै बैठूँ किसी के घर में तौ घुसूं ना’
‘ नहीं सत्तार भाई, अगर दिन भर बैठते हो तो गलत है’
‘ दिन भर कूँ किसके पास टैम ऐ?’
‘ काम भी क्या ऐ तमारे पास?’ मंगू बोला
‘ तो ठीक है, आगे से ये पत्थर पर कुल्ला दातून के लिये बैठेंगे बस और मंगू अपने दरवाजे पर परदा लगायेगा, फिर भी कोई बात है तो हमसे बात होगी, आपस में झगड़ा नहीं होगा, जहॉं तक ताल्लुक की बात है बिजनिस में ताल्लुक रखने पड़ते हैं, मिठाई भी लेनी पड़ती है, हॉं बिरादरी के रंज में कोई खुश न हो, वोट की बात है तो इस बार उनका जलजला था, मंगू के घर के तीन वोट से नहीं जीते वो, उन्हें भैन जी वाला वोट भी मिला है, हमें मंगू पर यकीन है वो बिरादरी के बाहर नहीं गया होगा, गया होगा तो ये उसका ईमान है’ कहते हुए सलाम मियॉं ने पंचायत बर्खास्त कर दी और भीड़ बिना मजेदार फैसले के चली गई, अब उनके साथ मुल्ला जी और सत्तार मियॉं बचे थे, सत्तार मियॉं बोले –
‘ सलाम तू मानै मत मानै बोट तौ इसनै फूल में दी’
‘ सबूत क्या है?’ सलाम मियॉं बोले
‘ कुरान मजीत की कसम खिला लो’
‘ दिमाग खराब है, इतनी मामूली बातों पर कसम ना खिलाई जाती वो भी पड़ोसी के कहने पै, कल को बस्ती का हर आदमी पड़ोसी पर इल्जाम लगायेगा और हम कसम खिलाते रहेंगे, लोग जान बचाने को झूठी कसम भी खायेंगे, मजाक बन जायेगा कुरान शरीफ का’ मुल्ला जी नाराज हुए
‘ फिर पकड़ में ना आवै ये नूरदीन का’
‘ तुम पकड़ना ही क्यों चाहते हो?’
‘ अरे हमारी छाती पै दुसमन की मिठाई लील रिया’
‘ तो सबूत लाओ’
‘ महीने भर से रोज घंटा भर लेट आवै, मीटिंग करै पंजाबी से’
‘ उसका बाप भी तो बीमार रहता है आजकल, हो सकता है ज्यादा काम करता हो’
‘ बिसका बाप तौ सदा का बीमार, एक लौन्डे के बाद चुहिया भी ना हुई बिससे, लुगाई कूँ टी.बी. और कर दी, बिचारी पैंतीस तक ई निकल ली’
‘ और तुम्हें उसका मलाल है’ सलाम मियॉं हॅंसे
‘ मलाल काहे का हमदर्दी ऐ’
‘ थोड़ी हमदर्दी उसके लौन्डे से भी रखो, तुम तो उसकी हजामत बनाने की जुगाड़ देखते हो’
‘ रंजिष ना बिससे पर वो गलत ऐ, बिरादरी के दुसमनों से मिला ऐ’
‘ सबूत लाओ, निगाह रखो’
‘ पत्थर पै बैठने पै तौ रोक लगा दी, अब क्या दूरबीन लाऊॅं?’
‘ बाजार से पता करो’
‘ पंजाबी बतावैगा क्या?’
‘ नहीं, इसकी शान बताऐगी, अगर इसने मंदिर पार्टी को वोट दिया है तो इसे पैसा मिलेगा’
‘ कौन देगा?’
‘ मंदिर पार्टी, गैर मुलक से पैसा ला के बॉंटने का वादा किया है’
‘ इसी कूँ देवै?’
‘ जिनने वोट दी उसे, उन्हीं कूँ मिलै’
‘ जे क्या बात हुई?’
‘ इसमें क्या गलत है? चक्कर वालों नै भी हमारी लौन्डियों कूँ पैसा बॉंटा’
‘ कितना मिलै?’ वे मायूस हुए
‘ पंद्रह लाख बताया’
‘ पंदरै…???’ वे गिरते गिरते बचे
‘ बताया तौ इतना ही’
‘ नगद?’
‘ चैक भी दे सकें पर उसे ही मिलना, तुम्हें ना’
‘ फिर तौ पंजाबी कालौनी में रहै, क्या उखाड़ लोगे बिसका?’
‘ जायैगा तौ यहीं से तब उतार देंगे भद्रा, निगाह रखो’
कहकर वे चले गये, मंगू अपने घर पहूँचा, रईसन दरवाजे पर ही खड़ी थी
‘ क्या हुआ जी?’
‘ कुछ ना’
‘ मेरा तौ कलेजा धड़क रिया जी’
‘ कहीं जमील और झॅंगीरा जैसा ना हो जाय?’ वह हॅंसा
‘ डर लगा जी, बोट तौ फूल पै ई दी हमनै, कहीं कसम उठवा लेते तौ?’
‘ बाप लगै मेरा सत्तार? जो बिसके अकीन के लिये कसम उठाता, पर तू भी काबू रखा कर जुबान पै, बाप दाखिल इंसान से बाल बूल उखाड़ने की बात ना की जावै’
‘ गलती हुई, पर इंसान भी तौ ठीक हो’
‘ उमर तौ है बिसकी, माफी मॉंगनी पड़ी मुझे’
‘ अरे? तमनै बताया ना कै जासूसी करै’
‘ बताया, अब वो भी ना बैठे पत्थर पै दिन भर, हमें भी परदा लगाना दरवाजे पै’
‘ चादर टॉंग दूं, पर जे बताऔ फूल वाले कब तक पूरा करैं वायदा?’
‘ सौ दिन की कही, महीना दो महीना और ले लो’
‘ पूरा दे दें, पंदरै लाख’
‘ बावली हुई? पुराना ऐटो बन जाय एक इतना ही भौत ऐ’
‘ बस? फिर क्या फायदा?’
‘ अच्छा?’ मंगू ने ठहाका लगाया फिर बोला –
‘ क्या करै पंदरै लाख का’
‘ पैलै तो इस कमबखत सत्तार का सामना छोड़ना और वो क्या बस्ती ई निकम्मी ऐ, बस्ती छोड़नी, फिर गले, नाक, कान का कुछ बन जाय बस…’
‘ पर पैसा मिलै तो सबकूँ मिलै’ मंगू हॅंसकर बोला
‘ सबकूँ ?’
‘ हॉं, सत्तार कूँ भी’
‘ बिसे किस बात का? बोट तौ हमनै दी फूल पै’
‘ पिरधान मंतरी तौ सबका ऐ’
‘ मानै अपने लिये अल्ला से दुआ मॉंगौ तौ इस हरामी के लिये भी मॉंगौ’
‘ करना ई पड़ै, पर सो जा अब’ वह हॅंसा
अगले दिन वह सचदेवा से मिला
‘ चचे कल तौ कलेस होते होते बची’
‘ क्या हुआ?’
उसने बताया
‘ अरे? इतना बुरा माहौल है उधर’ सचदेवा बोला
‘ चचे, मैं भी निकलना चाहूँ बिन हरामखोरों के बीच से, ना अपनी मर्जी से खाऔ, ना ताल्लुक रखौ, हमारा बाप जो कर पाया कर लिया पर बच्चों के लिये हमारा भी फरज ऐ, दो बच्चे किये एक लौन्डा, एक लौन्डिया, मैं तौ लौंडिया कूँ भी पढ़ा रिया’
‘ अच्छा कर रहा है, जहालत तरक्की की दुश्मन है’
‘ बस घर का ऐटो हो जाय, फिर तौ पढ़ा लूं बच्चों कूँ, पढ़ाई मॅंहगी ऐ’
‘ ऊपर वाले ने चाहा तो सब होगा’
‘ अब तौ सरकार भी बनगी तमारी, गैर मुलक से पैसा कब आ रिया?’
‘ सब्र कर, सब होगा, शपथ तो लेने दे’
‘ क्या?’
‘ हलफ, सरकार बनाने पर मंत्री, प्रधान मंत्री हलफ लेते हैं, उसके बाद सरकार बनेगी फिर दो तीन महीने में कुछ नतीजा दिखेगा’
‘ पर रैली में तौ सौ दिन की कै रये’
‘ अबे सौ दिन तीन महीने ही हुए’
‘ मतलब अब तीन महीने बाद बात करू ?’
‘ उससे पहले कुछ नहीं होना’
तीन महीने तक उसने काले धन वापसी पर सचदेवा से कोई बात न की, इस दौरान सचदेवा उसे सरकार की उपलब्धियॉं बताता रहा और रईसन मुश्किल होती जिन्दगी । सचदेवा उसे पेट्रोल डीजल के घटते दाम बताता और रईसन याद दिलाती कि सोलह मई को मूंग की दाल पैंसठ थी और दो महीने बाद एक सौ दस । मंगू किसी से कोई तर्क न करता, वह न सचदेवा का विरोध करता न रईसन का । इस बीच एक दिन वही डी.आर.एम. दफ्तर के बाबू उसके आॅटो में फिर बैठे, उनकी बहस हमेशा की तरह जारी थी-
‘ आपके माननीय वही कर रहे हैं जो मेरे बेटे ने किया, कमबख्त नौकरी खोजने मुंबई गया और अमिताभ, सलमान और शाहरूख के बॅंगलों के चक्कर लगाता रहा, वो भी इसे लाइजनिंग बता रहा था ’
‘ इसमें क्या है? विदेशों से संबंध सुधारने के लिये जरूरी है’
‘ तो विदेश मंत्री क्या राम मंदिर की घंटी हिलाने को रखा है?’
‘ देखो अंतरिक्ष मिशन कितने कम खर्च में हुआ?’
‘ वो यान किस नेता ने बनाया था? या कौन नेता ने उसमें बैठने की हिम्मत की?’
‘ बनाते तो साइंटिस्ट हैं, फंड तो दिया
‘ फंड अपनी फसल बेचकर दिया या यान का डिजाइन नेताजी ने बनाया? वैज्ञानिक अपनी मर्जी से काम करते हैं, उन्हें क्या करना है इसमें किसी सरकार का दखल नहीं’
‘ इससे क्या मतलब?’
‘ मतलब बिलकुल है, अभी अपने स्टेशन पर आर.ओ. वाटर पिलाया जा रहा है, ये योजना किसी सरकार ने नहीं बल्कि एक ईमानदार और मेहनती अधिकारी ने शुरू की, अब सभी स्टेशनों पर ये योजना लाई जा रही है, इसका सेहरा किसी के सर बॅंधे पर उसने ये अपने विवेक से शुरू की थी’
‘ पिछली सरकार के दौरान कितनी बार पेट्रोलियम के दाम गिरे?’ पहला बोला
‘ किसे बता रहे हो यार? इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल के दाम आज पिछले तीन साल में सबसे कम हैं, मतलब जो पेट्रोल दस रूपये कम करना चाहिये था, दो रूपया कम किया’
‘ वो तो कम होने पर भी कम नहीं करते थे, बढ़ने पर बढ़ाते जरूर थे’
‘ मैं उनका समर्थन कब कर रहा हॅूं अगर वो लुच्चे थे तो धर्मात्मा तुम भी नहीं, आलू प्याज वो कम नहीं कर पाये तुम्हारे वक्त में मूली भी बीस रूपये किलो, मैथी पालक चालीस । दाल साठ पैंसठ थी, एक सौ दस हो गई, दवाइयॉं दो गुना मॅंहगी हो गईं, ये ही हैं अच्छे दिन?’
‘ मॅंहगाई कम नहीं हो सकती’
‘ हॉं, व्यापारियों की पार्टी जो हो आप, पर जब कम नहीं कर सकते तो वादा क्यों करते हो? मॅंहगाई, सुशासन, कालाधन यही तो मुद्दे थे आपके’
‘ वक्त दो…’
‘ कितना वक्त लोगे?’
‘ पॉंच साल के लिये जनमत मिला है’
‘ जनमत पॉंच साल के लिये मिला है, पॉंचवें साल के लिये नहीं मिला, जानता हूँ , चार साल इंतजार कराके पॉंचवें साल में किसी कमजोर पड़ोसी मुल्क पर अटैक कर देना, पड़ोसी जीतना तो है नहीं, जंग भी जीतोगे और इलैक्षन भी’
‘ भविष्य वाणी क्यों करते हो?’
‘ तुम पब्लिक को चूतिया क्यों बनाते हो? ढाई महीने में क्या किया कालेधन पर, सौ दिन में बीस बचे हैं बस’
‘ ऐस.आई.टी. बना दी’
‘ बनानी ही थी, सुप्रीम कोर्ट की डैड लाइन खत्म हो चुकी थी, ये बताओ कि बचे बीस दिन में काला धन लाओगे या नहीं’
‘ वक्त तो लगेगा’
‘ ये मेरी या तुम्हारी जिन्दगी में नहीं आना’
कमबख्त कम्युनिस्ट इतना निराशावादी क्यों है वो भी मंगू के आॅटो की कीमत पर, मंगू को बोलना पड़ा-
‘ बड़े बाबू तम कमूनिस्ट ऐं तौ बताऔ बंगाल में क्या किया चालीस साल में’
बाबू चौंका-
‘ तुम्हें कैसे लगा कि मैं कम्युनिस्ट हूँ ? गरीबों का ठेका क्या कम्युनिस्टों के ही पास है, अरे तुम तो वही उस दिन वाले हो…. कम्युनिस्टों ने बंगाल में, केरल में, चीन में, रूस में क्या ऐसी तैसी कराई मुझसे क्या लेना देना? मैं भारत में और यू.पी. में रहता हूँ तो भारत सरकार और यू.पी. सरकार से ही बात करूंगा, अगर वो इन दोनों जगह होते और गलत करते तो मैं उनके खिलाफ होता । बात लॉजिक की होती है, लॉजिक कहता है कि जब तीन साल पहले लिस्ट मिल गई तो अब कहीं कुछ नहीं बचा होगा, लॉजिक कहता है कि भ्रष्टाचार हर सरकार में हुआ तो नाम सबके होंगे, तो भी कुछ नहीं आना, लॉजिक कहता है कि व्यापारी सबको चंदा देता है तब भी उनके नाम नहीं खुलने । तू भोला आदमी है बेटा, किसी हरामी ने तुझे सपना दिखाया कि पंद्रह लाख मिलेंगे, मैंने न तब माना न अब इसलिये कालाधन न आया तो मुझे फर्क नहीं पर जब भी कालेधन के न आने की बात चलती है तेरी दुनिया लुटती है । एक दिन तुझे भी यकीन होगा तब तुझे दुख होगा, लेकिन उस दिन दुखी मत होना जिस हरामी ने तुझे ये सपना दिखाया, उसे पंद्रह लाख नहीं तो पंद्रह हजार का नुकसान ठोक ही देना’ वह थोड़ा गुस्से में बोला
मंगू घबरा गया लेकिन बोला कुछ नहीं, उसने दस दिन के बजाय महीने भर और इंतजार किया और आॅटो लौटाते वक्त खुद ही सचदेवा से बोला क्योंकि अब सचदेवा पहले की तरह न ‘आ बैठ मंगू’ कहता था और न चाय आफर करता था ।
‘ चचे अब तौ सौ दिन भी पूरे हो लिये?’
‘ तू तो तगादा सा करता है मंगू?’ वह हॅंसा
‘ तगादे की बात कॉं ऐ चचे पर मैं क्या जानूं पिरधान मंतरी कूँ, तमनै कई तौ मान ली’
‘ ठीक है देर सवेर होना ही है, देख कितने बढि़या काम कर रहा है प्रधान मंत्री’
‘ मेरे लिये क्या कर दिया?’
‘ देख तेरे डीजल पेट्रोल की कीमत कम कर दी’
‘ भॉं अरब में कम होगी तौ कर दी, भॉं दस रूपे कम हुए झॉं दो रूपे कम कर दिया, दाल पैंसठ से नब्बे होगी, पालक बथुआ मूली गरीबों का खाजा था, वो भी मॅंहगा हो लिया’
‘ ये सब पैदावार पर होता है मंगू’
‘ दाल की पैदावार अबी हुई?’
‘ तू उस कम्युनिस्ट सवारी को बैठा कर तो नहीं ले गया आज?’
‘ बिससे क्या मतलब? मैं रोटी ना खाऊॅं क्या? दाल ना खरीदूं क्या?’
‘ देख कल दो अक्टूबर है कल से सफाई अभियान की शुरूआत हो रही है’
‘ बिससे क्या होगा’
‘ कल प्रधान मंत्री झाड़ू लगाकर जनता को संदेश देंगे कि हम सबको अपनी गली, मुहल्ला, घर, दूकान, दफ्तर साफ रखना चाहिये’
‘ नरकपालका का जमादार चुना हमनै? जो काम करने का सो तौ करै ना’ मंगू गुस्सा हुआ
‘ तुझे तो पहले आॅटो दिला दे’ बदले में सचदेवा भी गुस्सा हुआ
‘ कितई ना दिलावै पर पैसा वापस लावै, गरीबी कम करै, गरीब के पास टैम कॉं सफाई कूँ? बच्चों कूँ तौ साफ रख ना सकै, सुबै घर से निकलै तौ बच्चे सोते छोड़ै, रात कूँ लौटै तौ सोते मिलें, दिला दो तीस हजार रूपे महीने, घर भी साफ रखूँ गली भी साफ रख़ूँ ’
‘ जिन्हें तीस हजार मिलते हैं वो साफ रखते हैं?’
‘ हमसे जादा, जो एक लाख कमावें वो उनसे जादा, जो दस कमावें वो उनसे भी जादा’
‘ अच्छा जो जगह जगह थूकते और मूतते हैं वो?’
‘ रखवा दो हर दस गज पै थूकदान, सौ गज पै मूतघर, एक बार मुनादी करा दो कै हमनै ये इंतजाम किया, बिसके बाद कोई थूकै साले में डंडे पेलौ’
‘ सारे थूकदान उठ जायेंगे अगले दिन’
‘ जब हर आदमी तीस हजार महीने कमावैगा तौ तीस रूपे का थूकदान हरगिज ना उठै’
‘ तू भी बहस करने लगा है मंगू’
‘ जे ई बस्ती वाले कहें चचे, चलौ अब सफाई से भी निपट लो, बिसके बाद ले आना काला पैसा ’ वह हॅंसा
दो अक्टूबर को पूरे देश में झाड़ू आन्दोलन हुआ, मंगू के जीवन में इतना खास हुआ कि उस दिन उसका बाप मर गया । झोलाछाप ने जब हाथ खड़े किये तो मैडीकल कॉलेज ले गया, वहॉं इलाज कौन करता? डाक्टर और स्टाफ हाथ में झाड़ू लेकर सड़कों पर फोटो सैशन करा रहे थे, घंटे भर में रो झींककर एक दयावान जूनियर डाक्टर को पकड़ कर लाया भी पर बाप आॅटो में से ही न निकला, डाक्टर ने वहीं नब्ज देखकर कह दिया- ‘नो मोर’ और वह डाक्टर के हिलते हाथ से समझ गया कि सफाई आन्दोलन में उसका बाप साफ हो गया । दो दिन वह घर पर ही रहा, इससे ज्यादा मरे पिता से प्रेम प्रदर्शित करना वह बर्दाष्त भी नहीं कर सकता था, वह सचदेवा की दूकान पर पहुंचा।
‘ आ बैठ मंगू, अब्बा नहीं रहे?’
‘ हॉं, अपनी सी तौ की पर उमर भी थी, थोड़ा भौत और जी लेते अगर झाड़ू ना चलती तौ’
‘ झाड़ू से क्या मतलब?’
‘ मैडीकल ले गया, भॉं एक भी डाक्टर ना था, सब कमबखत झाड़ू लगा रिये, फोटू खिंचा रिये, फिलम बना रिये, घंटे भर में एक लौन्डा सा भला डाक्टर राजी हुआ, तब तक अब्बा निकल लिये, पर अच्छा ई हुआ, एक पेट कम हुआ, दवा दारू का खर्चा खतम हुआ, बच्चों की फीस निकल जायेगी टैम से, जें ऐडिया भी बुरा ना गरीबी खतम करने का’ वह हॅंसा
‘ तेरा चित्त सही नहीं है अभी, डाक्टरों से नाटक करने की थोड़ी कही प्रधानमंत्री ने’
‘ जब पिरधान मंतरी नाटक कर रिया तौ डाक्टर क्यों ना करेंगे’
‘ चल ठीक है, कुछ धंधा कर, ये ले ’ कहते हुए उसने चाभी सौंप दी
पिता के मरने से खर्चा कुछ कम हुआ तो रईसन ने कटी हुई डिश जुड़वा ली, मंगू पहले टी.वी. पर कभी कभार फिल्में देखता था लेकिन अब उसकी रूचि समाचारों में रहने लगी थी । समाचार दर्शन के दौरान उसे पता चला कि सुप्रीम कोर्ट ने काले धन के संबंध में विदेशी खाता धारकों की सूची सरकार से मॉंगी है जिसमें सरकार हीला हवाली कर रही है । दो दिन बाद पता चला कि सरकार ने तीन नाम बताये जिनमें एक ने सरकार वाली पार्टी को सवा करोड़ और पिछली सरकार वाली पार्टी को पैंसठ लाख चंदा दिया था । उसके दो दिन बाद सरकार को फटकार लगी कि वह अगले दिन सुप्रीम कोर्ट को नाम सौंपे, जहॉं आठ सौ नाम का कयास लग रहा था, वहॉं सवा छै सौ नाम दिये गये, अगले दिन पता चला कि सवा दो सौ खातों में एक भी पैसा नहीं । अब मंगू को कम्युनिस्ट बाबू की बातें सही होती लगीं, उसे गुस्सा आ गया, मंगू खुद आठवीं फेल था, चिट्ठी लिख सकता था, उस रात उसने बेटी की कॉपी में से कुछ पन्ने फाड़कर चिट्ठी लिखी –
जनाब मोतरम पिरधान मंतरी जी,
सलाम बालेकम,
मेरा नाम मंगू ऐ, बल्द नूरदीन, मुकाम नई बस्ती, आगरा खास, यू.पी. का रैहने वाला हूँ । मजब से मुसलमान जात से तेली, जात बता दी तौ जान लो कि मैं अरब से ना आया, मेरे पुरखे हिन्दू ई रहे होंगे, हिन्दू-मुसलमान तेलियों का बाप तौ एक ई रिया होगा, जो मुसलमान हुए, वो लठ से हुए, पैसे खा के हुए, मरजी से हुए मुझे ना पता, पर बिसमें मेरी गलती ना । हिन्दू मुसलमान वाली बात तौ खैर पुरानी हो ली, मसला वो भी ना, मसला जें ऐ कै मेरे घर और मेरी बस्ती में कभी किसी नै मंदिर पाल्टी कूँ बोट ना दी, पर मैंने दी, मेरे बाप और मेरी बीबी नै भी । टोपी लगा कै तमारी रैली में भी गया, बिसे छोड़ौ बिसके तौ तीन सौ रूपे लिये, पर बोट इसलिये दी कै तम गैरमुलक में जमा काला पैसा सौ दिन में वापस लाऔगे और बिसकूँ एक नंबर वालों में बॉंटोगे । मेरे पास बैंक का खाता भी ना, दो नंबर की बात ई ना, इनकम टैक्स पूरा दूं, दिन में तीन सौ कमाऊॅं, पचास पुलिस वाले ले लैं, छठवॉं हिस्सा तौ सरकारी अफसर भी ना दें, पर मैं दूं । बिस हिसाब से गैर मुलक में जमा पैसे में मेरा भी हिस्सा ऐ, मैं पंदरै लाख ना मॉंग रिया, डे़ढ़ लाख भी ना, एक पुराना ऐटो चालीस से पचास हजार में मिल जावै, एक दिला दो तौ दिन में छै सात सौ की कमाई हो जावै । डेढ़ सौ दिन हो लिये जब भी पब्लिक बिसकी बात करै कभी तम झाड़ू उठा लो, कभी दौड़ने लग जाऔ, कभी पाकिस्तान से लड़ौ, कभी चीन कूँ आँख दिखाऔ । कल टी.बी. देखी, पता चला, आठ सौ के तौ सवा छै सौ नाम रैह गये, बिनमें भी सवा दो सौ के खाते साफ हो लिये, बकाया चार सौ में क्या मिलैगा, अल्ला जानै । कुल मिला कै अब टी.बी. देख कै उम्मीद तौ ना रही, पर जिस जोस में तम बोले बिससे लगा कै एक बार तमसे भी बात कर लूं । हॉं, तमारा झाड़ू पिरोगराम जिस दिन था बिस दिन मेरा बाप चला गया, जिस बखत मैडीकल में ले गया, बिस बखत तमारे डाक्टर सड़क पै झाड़ू लगा रिये, घंटे भर तक कोई देखने ना आया । बिसका मरना बड़ी बात ना, उमर भी थी, अब ना जाता तौ साल भर बाद जाता, पर अब मैं सोच रिया जब बेआई मरना तौ झाड़ू से बेतर दंगे ई हो जाते, बिसमें मरता तौ एकाध लाख तौ मिलता, ऐटो आ जाता ।
खैर, थोड़ी लिखी भौत समझना, गैर मुलक से पैसा ना आ पावै तौ बड़ी बात ना पर बता जरूर देना, फिर अपने भरोसे ई कुछ करूं ।
खुदा हाफिज मंगू बल्द नूरदीन
मंगू ने चिट्ठी लिख ली तो अलसाई सी रईसन बोली –
‘ क्या हिसाब सा बना रये?’
‘ हिसाब ना कुछ और ऐ?’
‘ साइरी कर रये?’
‘ हॉं’
‘ किसपै?’
‘ पिरधान मंतरी पै, कभी झाड़ू लगावै, कभी दौड़ लगावै, पैसे की बात ई ना करै, चिट्ठी लिख रिया ’
‘ चिट्ठी क्यों लिख रये जी’ वह डरी
‘ बोट दी इसलिये लिख रये’
‘ हम तौ मुसलमान ऐं जी, कोई मानैगा भी ना, पर बोट तौ हिन्दुओं नै भी दी, बिन्हें समझ ना आता’
‘ सब आता’
‘ तौ बोलें क्यों ना?’
‘ अभी कोई लौन्डिया किसी धोखेबाज के जाल में रीझ कै बिसके साथ भग जाय, दो दिन बाद पता चल जाय कै जे तौ हरामी ऐ, तब भी लौन्डिया बिसे फौरन ना छोड़े, बिसके सुधरने की बाट साल दो साल तौ करै’
‘ क्यों?’
‘ क्योंकि जमाना थूकेगा बिसपै, मूरख बतावैगा बिसे, घरवाले मजाक बनावेंगे बिसकी’
‘ तौ तम भी देख लो, चिट्ठी क्यों लिखौ?’
‘ मैं मूरख ना, जिसे पॉंच साल इंतजार करकै छोड़ना बिसे तौ आज ई नीला थोथा चटा दो, तू भी सो जा अब’
पर सवाल ये कि उसके पास प्रधानमंत्री का पता नहीं था, वह सुबह सचदेवा की दूकान पर पहुंचा, चाभी लेने के बाद बोला –
‘ चचे, पिरधान मंतरी का पता मिलैगा?’
‘ लव लैटर लिखेगा क्या प्रधान मंत्री को?’
‘ लिख लिया’ कहते हुए उसने लिफाफा दिखाया
‘ डायरी में लिखा है कहीं, ला मुझे दे, मैं पोस्ट करा दूंगा’ सचदेवा की छठी इंद्री चेती
मंगू इतना शातिर भी नहीं था, उसने चिट्ठी सचदेवा को पकड़ा दी, सचदेवा भी जेब में रख काम में लग गया, दोपहर में जब दूकान पर कुछ छुटभैये नेता आये, बात चीत के दौरान उसकी जेब से लिफाफा निकल आया और उन्हीं के सामने खोलकर उसने बड़े मजे से बॉंचा ।
‘ है तो मजेदार, सचदेवा जी, पर इसे भिजवाओगे क्या?’ एक बोला
‘ मरना है क्या, भला हुआ जो पल्ले पड़ गया, अगर वो प्रधान मंत्री दिल्ली लिखकर भी भेज देता, तब भी पहुँच ही जाता और जो मजाक हम कर रहे हैं वो पी.एम.ओ. में चलता और पैसे लेकर टोपी लगाने वाली बात साबित हो जाती, फजीहत मेरी ही होती’
‘ ऐसे चेले पालते क्यों हो?’
‘ चेला तो ठीक था पर कोई कम्युनिस्ट बाबू इसका दिमाग चला गया, करना पड़ेगा इसका इलाज ’
‘ क्या करोगे?’
‘ एकाध हफ्ते में आॅटो छीनता हूँ इससे, ये मानेगा नहीं, दोबारा लिखेगा, तब मैं आराम से कह दूंगा कि आॅटो छीनने पर रंजिषन मेरा नाम ले रहा है’
शाम को मंगू लौटा, तो उसने पूछा –
‘ भेज दी चचे?’
‘ हॉं, तभी भेज दी, क्या लिखा था?’
‘ कुछ ना, एक ऐटो मॉंगा बस’
मंगू चला आया और चिट्ठी के तीसरे दिन प्रधानमंत्री का रेडियो वाला भाषण उसने टी.वी. पर सुना –
‘ भाइयों बहनों, जनता कालेधन के बारे में जानना चाहती है, किसी को नहीं पता कि वहॉं कितना पैसा है, न मुझे, न पिछली सरकार को । मैं उसे वापस लाऊॅंगा पर समय सीमा नहीं बता सकता, मेरा भरोसा कीजिये कालाधन वापस आयेगा…
मंगू ने चैनल बदल दिया, उसे अपनी चिट्ठी का जवाब मिल गया था, अगले दिन वह सचदेवा की दूकान पर पहुंचा –
‘ चचे कल भासन सुना?’
‘ हॉं, कितना अच्छा बोल रहे थे’
‘ मुझे लगै मेरी चिट्ठी पढ़ ली’
‘ कैसे?’
‘ मेरी बातों का ई जवाब दे रिये, मैंने भी अकीन कर लिया, एक दिन में तौ आवै ना पैसा, गैर मुलक का मामला ऐ’
‘ वही तो मैं कह रहा था’ सचदेवा आश्वस्त हो गया
हफ्ते भर तक मंगू सचदेवा से हॅंस हॅंस कर बात करता रहा, आठवें दिन आठ बजे लौटने वाला मंगू दस बजे तक न लौटा तो सचदेवा मन मारकर घर चला गया और अलस्सुबह वह मंगू के घर पर था, घर पर ताला लगा था । सचदेवा ने अनिष्ट की आशंका में सामने वाले घर को खटखटाया, सत्तार मियॉं बाहर निकले –
‘ क्या है?’ सत्तार मियॉं लाल लाल आँखें लिये बोले
‘ वो मंगू…’ सचदेवा सकपकाया
‘ बेच गया घर, सलाम कूँ’
‘ बेच गया? मगर कल तो….’
‘ कल दिन में था’
‘ सामान वगैरा?’
‘ सामान क्या था बिसपै? टी.वी. पंदरै सौ की लाया, हजार में बेच गया, पॉंच सौ में मोबाल मुझे दे गया, चारपाई नसीर कॅूं बेच गया, बरतन भॉंडे भी ऐसई निकाल गया, एक बड़ा टिरन्क था, बिसे ऐटो में धर लिया, चला गया’
‘ आॅ…टो…ले गया?’
‘ ले गया? घर बेच कै खरीदा बता रिया’
‘ आॅटो मेरा था’
‘ तू पंजाबी ऐटो वाला ऐ?’
‘ हॉं,
‘ कै गया पंजाबी आवै तौ ये पर्ची दे दियो’
कहकर सत्तार मियॉं ने जेब से पर्ची निकाली, सचदेवा ने कॉंपते हाथों से पर्ची पकड़ी और पढ़ने लगा –
‘ चचे गैर मुलक जा रिया हूँ दो नंबर का पैसा लाने, खोजना मत, कोई फायदा ना निकलना, जब दो नंबर का पैसा मिल जावैगा तौ सीधा तमारे पास आऊॅंगा और तमारी जिन्दगी में ना लौटूं तौ मरते बखत मान लेना मैंने मुलक के अंदर रखे दो नंबर के पैसे में से हिस्सा ले लिया’
सचदेवा ने लंबी सॉंस ली और पर्ची जेब में रख थाने की ओर चल दिया ।

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