कृशन चंदर जब  दिल्‍ली रेडियो में थे, तभी पहले मंटो और फिर अश्‍क भी रेडियो में आ गये थे। तीनों में गाढ़ी छनती थी। चुहलबाजी और छेड़छाड़ उनकी ज़िंदगी का ज़रूरी हिस्‍सा थे। रूठना मनाना चलता रहता था। कृशन चन्दर की एक किताब से एक बेहद रोचक प्रसंग जो मंटो के जर्बदस्‍त सेंस हॅाफ ह्यूमर का परिचय देता है।

‘मंटो का टाइपराइटर’

suraj-prakash

सूरज प्रकाश

– मंटो के पास टाइपराइटर था और मंटो अपने तमाम ड्रामे इसी तरह लिखता था कि काग़ज़ को टाइपराइटर पर चढ़ा कर बैठ जाता था और टाइप करना शुरू कर देता था। मंटो का ख्याल है कि टाइपराइटर से बढ़कर प्रेरणा देने वाली दूसरी कोई मशीन दुनिया में नहीं है। शब्द गढ़े-गढ़ाये, मोतियों की आब लिए हुए, साफ़-सुथरे मशीन से निकल जाते हैं। क़लम की तरह नहीं कि निब घिसी हुई है तो रोशनाई कम है या काग़ज़ इतना पतला है कि स्याही उसके आर-पार हो जाती है या खुरदरा है और स्याही फैल जाती है। एक लेखक के लिए टाइपराइटर उतना ही ज़रूरी है जितना पति के लिए पत्नी। और एक उपेन्द्र नाथ अश्क और किशन चन्दर हैं कि क़लम घिस-घिस किए जा रहे हैं।
“अरे मियाँ, कहीं अज़ीम अंदब की तखलीक़ (महान साहित्य का सृजन) आठ आने के होल्डर से भी हो सकता है। तुम गधे हो, निरे गधे।”
मैं तो ख़ैर चुप रहा, पर दो-तीन दिन के बाद हम लोग क्या देखते हैं कि अश्क साहब अपने बग़ल में उर्दू का टाइपराइटर दबाये चले आ रहे हैं और अपने मंटो की मेज़ के सामने अपना टाइपराइटर सजा दिया और खट-खट करने लगे।
“अरे, उर्दू के टाइपराइटर से क्या होता है? अँग्रेजी टाइपराइटर भी होना चाहिए। किशन, तुमने मेरा अँग्रेज़ी का टाइपराइटर देखा है? दिल्ली भर में ऐसा टाइपराइटर कहीं न होगा। एक दिन लाकर तुम्हें दिखाऊँगा।”
अश्‍क ने इस पर न केवल अँग्रेजी का, बल्कि हिन्दी का टाइपराइटर भी ख़रीद लिया। अब जब अश्‍क आता तो अक्‍सर चपरासी एक छोड़ तीन टाइपराइटर उठाये उसके पीछे दाखिल होता और अश्क मंटो के सामने से गुज़र जाता, क्योंकि मंटो के पास सिर्फ दो टाइपराइटर थे। आख़िर मंटो ने ग़ुस्से में आकर अपना अँग्रेजी टाइपराइटर बेच दिया और फिर उर्दू टाइपराइटर को भी वह नहीं रखना चाहता था, पर उससे काम में थोड़ी आसानी हो जाती थी, इसलिए उसे पहले पहल नहीं बेचा – पर तीन टाइपराइटर की मार वह कब तक खाता। आख़िर उसने उर्दू का टाइपराइटर भी बेच दिया।
कहने लगा, “लाख कहो, वह बात मशीन में नहीं आ सकती जो क़लम में है। काग़ज़, क़लम और दिमाग में जो रिश्ता है वह टाइपराइटर से क़ायम नहीं होता। एक तो कमबख़्त खटाख़ट शोर किए जाता है – मुसलसल, मुतवातिर- और क़लम किस रवानी से चलता है। मालूम होता है रोशनाई सीधी दिमाग़ से निकल कर काग़ज की सतह पर बह रही है। हाय, यह शेफ़र्स का क़लम किस क़दर ख़ूबसूरत है। इसका नुकीला स्ट्रीमलाइन हुस्न देखो, जैसे बान्द्रा की क्रिश्‍चियन छोकरी।”
और अश्क ने जल कर कहा, “तुम्हारा भी कोई दीन-ईमान है। कल तक टाइपराइटर की तारीफ़ करते थे। आज अपने पास टाइपराइटर है तो क़लम की तारीफ़ करने लगे। वाह। यह भी कोई बात है। हमारे एक हजार रुपये ख़र्च हो गये।”
मंटो ज़ोर से हँसने लगा।

  • author's avatar

    By: सूरज प्रकाश

    नाम – सूरज प्रकाश
    परिचय – जन्म : 14 मार्च 1952, देहरादून (उत्तरांचल)
    भाषा : हिंदी, गुजराती,
    विधाएँ : उपन्यास, कहानी, व्यंग्य, अनुवाद
    मुख्य कृतियाँ – कहानी संग्रह : अधूरी तस्वीर, छूटे हुए घर, साचा सर नामे (गुजराती), खो जाते हैं घर, मर्द नहीं रोते
    उपन्यास : हादसों के बीच, देस बिराना
    व्यंग्य संग्रह : जरा सँभल के चलो
    अनुवाद : (अंग्रेजी से) जॉर्ज आर्वेल का उपन्यास एनिमल फार्म, गैब्रियल गार्सिया मार्खेज के उपन्यास Chronicle of a death foretold, ऐन फैंक की डायरी का अनुवाद, चार्ली चैप्लिन की आत्म कथा का अनुवाद, मिलेना (जीवनी) का अनुवाद, चार्ल्स डार्विन की आत्म कथा का अनुवाद
    (गुजराती से) प्रकाशनो पडछायो (दिनकर जोशी का उपन्यास), व्यंग्यकार विनोद भट की तीन पुस्तकों का अनुवाद, गुजराती के महान शिक्षा शास्‍त्री गिजू भाई बधेका की दो पुस्तकों “दिवा स्वप्न” और “मां बाप से का” तथा दो सौ बाल कहानियों का अनुवाद, महात्‍मा गांधी की आत्‍मकथा (सत्‍य के प्रयोग) का अनुवाद
    संपादन : बंबई 1 (बंबई पर आधारित कहानियों का संग्रह), कथा लंदन (यूके में लिखी जा रही हिन्दी कहानियों का संग्रह), कथा दशक (कथा यूके से सम्मानित 10 रचनाकारों की कहानियों का संग्रह)
    सम्मान – प्रेमचंद कथा सम्मान, गुजरात साहित्य अकादमी का सम्मान, महाराष्ट्र अकादमी का सम्मान, सारस्वत सम्मान, आशीर्वाद सम्‍मान
    संपर्क – एच – 1/101 रिद्धि गार्डन, फिल्म 4 सिटी रोड, मालाड पूर्व, मुंबई
    फोन – 09930991424
    ई-मेल – mail@surajprakash.com, kathaakar@gmail.com

  • author's avatar

  • author's avatar

    मर्द नहीं रोते: कहानी (सूरज प्रकाश)
    और’मुंशी’ प्रेमचंद’ बन गए: किस्सा, (सूरज प्रकाश)
    एक कमज़ोर लड़की की कहानी: कहानी (सूरज प्रकाश)
    बाबा नागार्जुन’ सा कोई नहीं: आलेख (सूरज प्रकाश)
    खो जाते हैं घर : कहानी (सूरज प्रकाश)

    See all this author’s posts

Leave a Reply

Your email address will not be published.