मई दिवस एक ऑपचारिक चिंतन…!  

(हनीफ मदार)

हनीफ मदार

कॉल सेंटर, माल्स, प्राइवेट बैंक, प्रिंट या इलैक्ट्रोनिक मीडिया जैसी आदि अन्य निज़ी कम्पनियों, में नौकरी करने वाले लोगों के पास समय नहीं है | मित्रों, रिश्तेदारों, पत्नी और बच्चों के लिए परिणामतः न केवल दाम्पत्य में ही दरारें उत्पन्न हो रहीं हैं बल्कि व्यक्ति खुद भी असंतोष का शिकार हैं | यह तो उनकी बात रही जो कहीं न कहीं नौकरी शुदा हैं | इसके अलावा देश में चालीस करोड़ से ज्यादा असंगठित क्षेत्रों मसलन ईंट भट्टों पर काम करने वाले या चाय की दुकान पर, बंगलों के सामने खड़े रहने वाले गार्ड या फिर ठेकेदारों के नीचे काम करने वाले दिहाड़ी मज़दूर आदि की स्थितियां भी इससे बेहतर नहीं हैं | इन मजदूरों का समय की परवाह किये बिना दिन रात अपने काम में शारीरिक और मानसिक श्रम में जुटे रहने के बाद भी दो जून की रोटी जुटाना मुश्किल जान पड़ रहा है | अच्छे पैकेज पर प्लेसमेंट पाने की आत्ममुग्धता वाले युवा या फिर वर्षों से अच्छी सैलरी की आत्ममुग्धता में नौकरी करने वाले दम्पति, शहरी या इंग्लिश स्कूलों में अपने एक बच्चे को भी पढ़ा पाने की क्षमता में नहीं हैं | बारह से चौदह घंटे की मेहनत के बाद भी आर्थिक अभावों से जूझते मजदूर को देखकर क्या यह माना जा सकता है कि हम आधुनिक विकास के तकनीकी युग में जी रहे हैं ..? काम के असीमित घंटों और मानवीय क्षमताओं से बहुत ज्यादा काम के लक्ष्य निर्धारण पूर्ती के बाद आधा पेट भरने लायक मजदूरी….. तब यह लगने लगता है जैसे हम आधुनिक विकास के भ्रम की अवधारणा के साथ पुनः लगभग तीन सौ साल पीछे जा पहुंचे हैं या फिर यह कान को घुमा कर पकड़ लेने जैसा है| मजदूर की यह हालत अमेरिका, चीन, जापान, भारत या फिर पाकिस्तान आदि में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के मजदूर वित्तीय पूँजी के शोषण के शिकार हैं |

ऐसा भी नहीं कि मजदूर अपने इस शोषण से अनजान या अनभिज्ञ हो | बावजूद इसके मजदूर की खामोशी निश्चित ही सवाल खड़ा करती है | क्या मजदूर “दुनिया के मजदूरों एक हो” के नारे को भूल गया है | जिसे हेमार्केट शिकागो में जुटे असंख्य मजदूरों ने १८८६ में दिया था और मजदूरों ने काम के आठ घंटे तय करने तथा सप्ताह में एक छुट्टी की मांग रखी थी | इसी फ्रेंच क्रांति को याद करते हुए १८८९ में पैरिस में हुई अंतर्राष्ट्रीय दूसरी महासभा में मजदूरों की इस विश्व जीत को ‘अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस’ के रूप में मनाने का फैसला लिया | और यह सामाजिक, राजनैतिक रूप से एक बड़ा बदलाव था कि दुनिया के लगभग ८० देशों ने इस दिन को राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया और १९२३ में भारत में भी इसे राष्ट्रीय अवकाश घोषित कर दिया गया | वर्तमान तक आते आते मई दिवस महज़ कुछ मजदूर संगठनों के लिए रस्म अदाइगी एवं अन्य अवकाशों की तरह ही महज़ एक छुट्टी का दिन बनकर रह गया है |
यह सब कुछ एक दम से नहीं हुआ अपितु उदारीकरण के बाद विदेशी पूँजी निवेश के बाद सार्वजनिक संस्थाओं के बंदी और निज़ी कम्पनियों के पनपने के बाद से स्थिति ज्यादा भयावह होती गई है | प्राइवेट कम्पनियों में वाइट कालर जाब भी असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के पर्याय के रूप में ही उपस्थित हुआ जहाँ घंटों के रूप में काम की अवधि तय नहीं होती बल्कि अपनी नौकरी बचाए रखने को कम्पनी द्वारा तय की गई लक्ष्य की पूर्ती ही आवश्यक है और इसी शर्त पर प्राप्त हो पाती है न्यूनतम मजदूरी | ठीक वैसे ही अनौपचारिक क्षेत्रों में काम करने वाले लोग मूल रूप से मालिक की दया दृष्टि पर ही निर्भर करते हैं। इस क्षेत्र के मालिकों और कामगार के बीच कोई लिखित समझौता या अन्य प्रपत्र भी नहीं होता है। सभी आश्वासन और जिम्मेदारियां मौखिक ही होती हैं। इन का पालन करना या नहीं करना मालिकों पर निर्भर है। तब देखने में आता है कि जिम्मेदारियां या काम अगर मालिक की मर्जी के मुताबिक नहीं हो तो पूरी वचनबद्धता समाप्त हो जाती है और कभी-कभी तो मजदूरी भी नहीं मिल पाती । राष्ट्रीय सैम्पल सर्वेक्षण कार्यालय के एक सर्वेक्षण के अनुसार अनौपचारिक क्षेत्र में काम कर रहे 80 प्रतिशत लोगों का अपने नियोक्ता के साथ कोई लिखित समझौता नहीं है और 72 प्रतिशत को किसी प्रकार की कोई सामाजिक सुरक्षा लाभ प्राप्त नहीं हो पाता है। और ऐसा न केवल निज़ी कंपनियों के साथ है बल्कि सरकारी क्षेत्र में भी बडी संख्या में ऐसे कर्मचारी हैं जो अस्थायी हैं और इनकी गिनती भी असंगठित या अनौपचारिक क्षेत्र में होती है। सरकारी क्षेत्र में लगभग सवा करोड़ कर्मचारी अस्थायी हैं जो कि कुल सरकारी श्रम बल का अच्छा-खासा प्रतिशत है। देश में स्टाफिंग की प्रमुख संस्था इंडियन स्टाफिंग फेडरेशन के एक अध्ययन के मुताबिक कम से कम 69 लाख लोग सरकारी योजनाओं से जुड़ें हैं और इनको न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा जैसी कोई सुविधा नहीं दी जाती है। सरकार में लगभग 43 प्रतिशत कर्मचारी अस्थायी है और इनमें से क़रीब एक करोड़ पांच लाख के पास कोई अधिकारिक अनुबंध नहीं है।

जहाँ एक तरफ भारतीय संविधान प्रदत्त मूल अधिकार यह कहते हैं कि देश में सबको समानता और मजदूरी पाने के अधिकार हैं | वहीँ १९४८ में पारित हुआ ‘नयूनतम मजदूरी अधिनियम’ सामान मजदूरी की बात करता है परन्तु हर राज्य के लिये अलग-अलग मजदूरी तय होना भारत में मजदूरों के न्यूनतम मजदूरी और समानता के अधिकारों पर चर्चा करने को विवश करता है । हालांकि भारतीय न्यायिक व्यवस्था ने संविधान की जन कल्याणकारी राज्य की भावना को मूर्त रूप देने के लिये कई महत्वपूर्ण कदम उठाये, परन्तु अब भी मजदूरों को दिन भर के श्रम के बदले न्यूनतम मजदूरी नहीं मिलती है, बल्कि न्यूनतम मजदूरी उन्हें तभी मिलती है जब वे सरकार के तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा तय किये गये काम के लक्ष्य को पूर्ण करें। मानवीय क्षमताओं के अनुसार लगभग दो गुने काम के लक्ष्य पूर्ती के बाद न्यूनतम मजदूरी पाने वाला मजदूर अपनी छोटी छोटी आर्थिक जरूरतों के लिए विवश होकर अग्रिम राशि ठेकेदारों या मालिकों से लेता है और कई दफा इसके बदले लम्बे समय तक उनके पास बंधक की तरह काम करने तक को मजबूर होता है। इनमें ज्यादा बड़ा तबका ग्रामीण भूमिहीन किसान परिवारों या प्रवासी मजदूरों का होता है | भले ही देश में भूमि सुधारों की बातें तो अक्सर होती रही हैं, किन्तु भूमि सुधार, भूमि वितरण के कार्यक्रम के क्रियान्वयन को राज्यों ने कितनी गंभीरता दिखाई है यह व्यावहारिक रूप से ऐसे मजदूरों की हालातों से सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है ।
ऐसे घोर पूंजीवादी समय में मई दिवस के बहाने इस बात पर भी आत्म चिंतन के साथ चर्चा की जानी चाहिये कि वर्तमान वैश्विक पूंजीवाद किस तरह न केवल मजदूरों बल्कि आम जन मानस को रोजगार, विकास या बेहतर जिंदगी प्रदान करने के अवसरों के बहाने उनसे उनकी रोजी-रोटी के बचे-खुचे विकल्प भी समाप्त करता जा रहा है। सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण या बंद कर कर्मियों को भले ही तात्कालिक तौर पर आर्थिक क्षतिपूर्ति कर दी जाए, लेकिन किसी कौशल के अभाव में वे बाद से बदतर जिंदगी जीने को ही विवश होते हैं । इन आर्थिक नीतियों के कारण युवा बेरोजगारों की संख्या कम होती नहीं दिखती | इतिहास साक्षी है कि विदेशी पूँजी निवेश ने दुनिया के कई देशों की अर्थव्यवस्था को ध्वस्त किया है जहाँ हज़ारों मजदूरों को फिर से बेरोजगारी का सामना करना पडा है ।

मई दिवस पर बात करते हुए जरूरत है इन बदलावों को जानने समझने की भी है कि गत 31 जुलाई को तमाम श्रम कानूनों को ढीला और कमजोर करने के लिए जो प्रस्ताव पेश किया गया जिसमें फ़ैक्ट्री एक्ट 1948, ट्रेड यूनियन एक्ट 1926, औद्योगिक विवाद अधिनियम 1948, ठेका मज़दूरी कानून 1971, एपरेंटिस एक्ट1961 शामिल हैं। जहाँ पहले फ़ैक्ट्री एक्ट 10 या ज़्यादा मज़दूरों (जहाँ बिजली का इस्तेमाल होता हो) तथा 20 या ज़्यादा मज़दूरों (जहाँ बिजली का इस्तेमाल न होता हो) वाली फ़ैक्ट्रियों पर लागू होता था, अब इसे क्रमशः 20 और 40 मज़दूर प्रस्तावित किया गया है। इस तरह अब मज़दूरों की बहुसंख्या को कानूनी तौर पर मालिक हर अधिकार से वंचित कर सकता है। इसके अलावा सरकार एक माह में ओवरटाइम की सीमा को 50 घण्टे से बढ़ाकर 100 घण्टे करने की तैयारी में हैं वहीं दूसरी तरफ़ मज़दूरों के लिए यूनियन बनाना और भी मुश्किल कर दिया गया है। पहले किसी भी कारखाने या कम्पनी के 10 प्रतिशत मज़दूर मिलकर यूनियन पंजीकृत करवा सकते थे लेकिन अब यह संख्या 30 प्रतिशत प्रस्तावित है। ठेका मज़दूरी कानून-1971 अब सिर्फ़ 50 या इससे ज़्यादा मज़दूरों वाली फ़ैक्ट्री पर लागू करने की बात कही गयी है। औद्योगिक विवाद एक्ट में बदलाव किया गया जिससे अब 300 से कम मज़दूरों वाली फ़ैक्टरी को मालिक कभी भी बन्द कर सकता है और इस मनमानी बन्दी के लिए मालिक को सरकार या कोर्ट से पूछने की कोई ज़रूरत नहीं है। साथ ही फ़ैक्ट्री से जुड़े किसी विवाद को श्रम अदालत में ले जाने के लिए पहले कोई समय-सीमा नहीं थी, अब इसके लिए भी तीन साल की सीमा का प्रस्ताव लाया गया है। एपरेन्टिस एक्ट में संशोधन कर सरकार ने बड़ी संख्या में स्थायी मज़दूरों की जगह ट्रेनी मज़दूरों को भर्ती करने का कदम उठाया गया है। साथ ही किसी भी विवाद में अब मालिकों के ऊपर से किसी भी किस्म की कानूनी कार्रवाई का प्रावधान हटाने की बात कही गयी है। (म. बि. से)
ऐसे वैश्वीकरण और उदारीकरण के समक्ष आत्मसमर्पण के बजाय आवश्यकता है श्रमिकों के एक सक्षम अंतरराष्ट्रीय सामाजिक, आर्थिक आंदोलन की, जो विश्व जनमानस पर वित्तीय पूँजी के उत्पाद के प्रति ध्यान आकर्षित कर १८८६ की तरह ही “दुनिया के मजदूरों एक हो” का नारा बुलंद करा सके ।

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