हमारी परम्पराएं जाती धर्म ताकत सभी एक साथ प्यार पर पैहरा बैठाने के या प्यार का गला घोंट देने की कोशिश में इंसानों का ही खून बहाते रहे हैं | प्यार तो इंसानी रूह और आस्था के भगवान की तरह जाति, धर्म, परम्परा और तमाम ताकतों से ऊपर उठकर हर शय में हमेशा मौजूद रहा है | मानवीय जैविक विवशता को ही प्रेम को प्रतिबंधित करना मानने के भ्रम में हम आत्ममुग्ध भले ही हों लेकिन इंसानी संवेदनाओं में झांकें तो सच ऐसा है नहीं……..| कुछ यही समझाने का प्रयास करती ‘कमलेश’ की मार्मिक कहानी …….| – संपादक

मउगा 

कमलेश, हिन्दुस्तान में डिप्टी एडीटर, पटना

कमलेश, हिन्दुस्तान में डिप्टी एडीटर, पटना

नगाड़े पर छड़ीनुमा लकड़ी की चोट पड़ी और परदा धीरे-धीरे ऊपर उठने लगा।

परदा खुलने के साथ नगाड़ा बजाने वाला आदमी जैसे जोश में आ गया। वह जोर-जोर से नगाड़ा पीटने लगा- तिड़ी-तिड़ी, तड़ाक-तड़ाक तड़ाक….. तिड़ी-तिड़ी, तड़ाक-तड़ाक तड़ाक। आवाज के तेज होने के साथ ही उसका शरीर भारी तेजी से हिलने लगा। पहले पांव फिर कमर और इसके बाद गरदन से लेकर सिर तक। पहले धीरे-धीरे और फिर तेजी से। कमाल यह था कि शरीर के इतनी तेजी से हिलने के बावजूद नगाड़े पर उसके हाथ एकदम सही पड़ रहे थे। लय सधा हुआ और सटीक। लोग अभी नगाड़े की आवाज में डूबे ही थे कि मंच पर अवतरित हुआ था नकुल लवंडा। माने नकुल मुसहर उर्फ नकुल मांझी। उम्र लगभग 22-23 साल। बड़ी-बड़ी आंखें और उनमें काजल की पतली लकीर, पतले रंगे हुए होंठ, लम्बी ऊंची नाक और तीखी ठुड्डी। दरमियाना कद और नकली लम्बे बाल। पीले रंग के लहंगे में छोटे-छोटे सीसे के टुकड़े झिलमिल कर रहे थे तो हरे रंग की चोली में रंग-बिरंगे पट्टे सबकी नजर अपनी ओर खींच रहे थे। दोनों भौं के ऊपर छोटी-छोटी दर्जनों बिन्दियां। पांव में घुंघरू पहने वह दौड़ता हुआ मंच के एक तरफ से दूसरी तरफ गया और सामने के मैदान में जुटे लोगों ने जोर से ताली बजाई। उसने भीड़ का चेहरा देखा, सिर को तिरछा कर तीखी मुस्कान फेंकी और इसके बाद जब कमर लचका कर नगाड़े की धुन पर ठुमका मारा तो तो लोगों के मुंह से आह निकल गई। इसके बाद उसने सुरीली तान छेड़ी- ‘नजर मारेला हो नजर मारेला, अइसन चढ़ल बा जवनिया नजर मारेला…..।’

पहले से उसे न जानने वाला देखे तो मानने के लिए तैयार नहीं हो कि वह लड़की नहीं है। मंच के दोनों किनारे पर लगे पेट्रोमैक्स की रोशनी में उसके चेहरे पर लिपटे हुए पाउडर का रंग और उसपर गालों पर लगाई हुई लाली तो गजब चमक रही थी। दम-दम दमक रहे चेहरे पर पसीने की बूंदे तो कयामत थीं। उसने लहंगा और चोली पर टह-टह लाल रंग की ओढ़नी ले रखी थी। नाचते हुए जब वह ओढ़नी सरका कर छाती उचकाता और होंठों को दांतों से काटकर आंखों से इशारा करता तो मंच पर पैसे बरसने लगते। नई उमर के कई लड़के दांतों के बीच रुपये दबाकर उसे अपने पास बुलाते और अश्लील इशारे करते। नकुल पहले तो खूब नखरे करता। नाचते हुए इन लड़कों के पास जाता और फिर उछलकर वापस मंच पर चढ़ जाता। जब नोट मुंह में दबाये लड़के मंच पर चढ़ने को आतुर हो जाते तो वह नीचे उतर जाता और ज्यादा नोट दिखाने वाले की गोद में बैठ जाता।

उसके नाच के दीवाने इलाके के कई गांवों में थे। ये इलाके बिहार के बक्सर से लेकर छपरा तक तक तो उत्तर प्रदेश के बलिया से लेकर गाजीपुर तक फैले हुए थे। जिस भी गांव में एक बार उसका नाच हो गया वहां तो बस उसकी मांग हो जाती। कई गांवों में उसे नकुल मांझी के नाम से नहीं माधुरी दीक्षित के नाम से जाना जाता था। बारात पार्टी में जब नाच होता तो लाउडस्पीकर पर ऐलान होता- आज राजन की नाच मंडली की माधुरी दीक्षित का नाच होगा। लोग कहते एकदम डिट्टो माधुरी दीक्षित जैसा नाचता है नकुलवा। जब कोई उसे सामने से माधुरी दीक्षित कहता तो उसका मन करता कि वह उससे लिपट ही जाए।

भले मंडली का नाम हो राजन की नाच पार्टी लेकिन खेला तो जमाता था नकुल मांझी ही। कई लोग नकुल मांझी का नाच देखने के लिए ही आते थे। लगन के समय उसके नाच पार्टी की मांग बाईजी के नाच से कम नहीं होती थी। जब भी कहीं आयोजन होता तो आधा हिस्सा तो नकुल अपने नाच से खींच ले जाता था। और जब नाच-नाच कर बेदम हो जाता नकुल तो मंच पर आते थे राजन। गोरे-चिट्टे और गंभीर राजन। जादूगर राजन। 40-45 साल के राजन बहुत कम बोलते थे। उनकी अंगुलिया ज्यादा बोलती। मंच पर आते ही वह हाथों की अंगुलियों को गोल-गोल घुमाते और फिर उन्हें ऐसे लोगों के सामने करते जैसे उन अंगुलियों को लोगों की आंखों में डाल देंगे। इसके बाद उन अंगुलियों से वह अपनी आंखों के चारो तरफ घेरा बना देते थे। लोगों का कहना था कि वह ऐसा करके लोगों को नजरबंद करते हैं। नजरबंद माने लोग अब वही देखेंगे जो वह दिखाना चाहेंगे। यही तो जादू है।

राजन भी कम खेलाबाज नहीं थे। पत्थर से फूल बना देते और ईंट को पैसा। हवा से लड्डू निकाल लाते तो खाली झोले से कबूतर। लोगों को जैसे किसी और दुनिया में ले जाते। खूब सपने दिखाते। बस सपने और केवल सपने। राजन के सपने में लोग डूबने लगते। उन्हें लगता राजन का जादू तो उनकी दुनिया बदल देगा। और जब यह जादू टूटता तो उनकी जेब का सारा पैसा निकल चुका होता था। इसके बाद होता था नाटक- खेला लैला मजनू। इसमें राजन मजनू बनते और लैला नकुल।

वैसे भी राजन नाच कंपनी के मालिक थे इसलिए हीरो भी थे। जादू तो नकुल मांझी को भी आता था और भीड़ भी वही जुटाता था लेकिन उसे करना वही पड़ता था जो राजन महतो कहते थे। वैसे नकुल को इससे मतलब भी नहीं था। उसके नाच पर पैसे बरसते और लोग उसके नाम पर जुट जाते यही उसके लिए बहुत था। जब कोई उसे माधुरी दीक्षित कहकर पुकारता या फिर कोई उसे अंकवारी में भरने के लिए सौ के पत्ते दिखाता तो  वह निहाल हो जाता। कई लोग उसे नाच के बाद रात में अपने साथ ले जाने के लिए मुंहमांगा रुपया देने के लिए तैयार हो जाते लेकिन राजन महतो और नकुल दोनों इसके लिए कभी तैयार नहीं हुए। राजन कहते- ‘लवंडा तभी तक बढ़िया नाच सकता है जब तक वह केवल अपने नाच से मतलब रखे। पैसा का मोह किया तो नाच तो गया, साला जीवन भी बरबाद हो जाता है।’

 नकुल के मां-बाप का पता नहीं था और बीबी, बाल-बच्चा कोई था नहीं लिहाजा पैसों से उसे बहुत मतलब भी नहीं था। नाचकर जब थक जाता तो देसी दारू की पाउच फाड़ता और बगैर पानी- चखना के सीधे कंठ के नीचे। कई बार राजन महतो कहते- ‘साले, बिना पानी मिलाये और बिना चखना के दारू पीता है रे? मर जाएगा।’

 उनकी बात पर हंसता नकुल- ‘अरे महतोजी, नाच कंपनी का लवंडा जादे दिन जीके का करेगा? पांच साल के बाद कोई पूछेगा नहीं हमको। जिनगी नरक हो जाएगी साली। खत्तम हो जाए तो अच्छा।’

बिहार और उत्तर प्रदेश की सीमा पर बसा था गांव जासो। बक्सर शहर से करीब दस कोस पूरब। राजन महतो की नाच मंडली  ऐसे तो बिहार और उत्तर प्रदेश के कई गांवों में घूमती। लगन के दिन में आज इस गांव तो कल उस गांव। खूब पैसे बरसते। लेकिन जैसे ही लगन का दिन खत्म होता तो जासो गांव में पसर जाते राजन महतो। सारे कलाकार अपने-अपने गांव-घर। लेकिन नकुल कहां जाता। उसका अपना कोई घर नहीं था। वह राजन महतो के घर के ओसारे पर पड़ा रहता। कभी-कभी बक्सर चला जाता और सिनेमा देखकर नाच सीखने की कोशिश करता। कभी-कभी उसे लगता कि उसके अंदर पुरुष के साथ-साथ कोई न कोई स्त्री भी है। वह चलता तो कमर अपने आप लचक जाती। बात करता तो हाथ अपने आप घूमने लगते। जब वह लुंगी पहनता तो उसे आगे से उसी तरह चुनिया कर पकड़ता जैसे महिलाएं अपनी साड़ी को पकड़ती हैं। गांव के लड़के भी उसे उसी तरह छेड़ते मानो वह कोई लड़की हो। ऐसे मौकों पर वह चुपचाप मुस्कुरा कर निकल जाता था। वैसे भी राजन महतो अपने बीबी बच्चों में मगन रहते और वह कभी गांव के लड़कों की छींटाकशी के मजे लेता तो कभी मुंह पर चादर डालकर सोया रहता। शाम में पाउच वाली दारू, रोटी के साथ दाल और प्याज। हां, बीच-बीच में मेला-ठेला में नाच के लिए जाना होता था लेकिन उसमें कुछ खास फायदा नहीं होता था।

खरमास के दिन मतलब नाच मंडलियों के बेकारी के दिन। कोई काम नहीं। बस बैठिये और रोटियां तोड़िये। ऐसे ही निठल्लेपन के दिनों में एक दिन जब वह राजन महतो के ओसारे में बैठा चुपचाप दातुन कर रहा था तो उसने उसे देखा था। सोलह-सतरह साल की सांवली सी लड़की थी वह। सलवार-समीज पहने ओसारे के सामने से गुजरी तो उसे गौर से देखा। नकुल ने भी उसे देखा। फिर लड़की मुस्कुराई। नकुल भी हंसा। अचानक लड़की  जोर से हंसी और अंगुली उसकी ओर दिखाते हुए चिल्लाकर बोली- ‘माधुरी दीक्षित।’

 फिर इस तरह दौड़कर भागी गोया उसे अंदेशा हो कि ऐसा कहने के बाद नकुल उसका पीछा करेगा। लेकिन नकुल थोड़ा चौंका था। इस गांव में तो उसे इस नाम से कोई नहीं पुकारता। राजन महतो भूलकर भी अपने गांव में नाच का आयोजन नहीं करते थे। माधुरी दीक्षित के नाम से तो वह उन गांवों में  मशहूर है जहां अक्सर उसकी नाच मंडली गई है। वह देर तक लड़की को दौड़ते हुए देखता रह गया और फिर कुल्ला करने के लिए कुंए से पानी खींचने लगा था।

इस घटना के तीन दिनों के बाद दूसरी बार फिर वह दिखी थी। सुबह का समय था। तब वह राजन महतो के साथ बक्सर जाने के लिए निकला था। सुदर्शन यादव के घर के सामने पुराने पीपल की लगभग जमीन छू रही डाल पर बैठकर वह हिचकोले खा रही थी। दो लड़कियां डाल को पकड़ कर झुला रही थी। लड़कियों की हंसी से मानो आसपास का पूरा इलाका गूंज रहा था। अचानक लड़की ने नकुल की तरफ देखा, थोड़ा मुस्कुराई और फिर दोनों होंठ के बीच से जीभ निकाला और उसे चिढ़ाने लगी। जवाब में नकुल ने भी ऐसा ही कर दिया। इस बार वह जोर से हंसी और ताली बजाकर चिल्लाई- ‘माधुरी दीक्षित।’ उसकी आवाज से इसबार राजन महतो घूमे थे। उन्होंने लड़की को देखते ही नकुल का हाथ पकड़ कर खींच लिया- ‘चलो-चलो, जल्दी चलो। देर हो रही है। शाम तक सामान लेकर बक्सर से लौटना भी है।’

नकुल पीछे मुड़कर लड़की को देखता रहा और लगभग घसीटाने के अंदाज में राजन महतो के पीछे-पीछे चलता रहा। इधर वह लड़की लगातार ताली बजाकर चिल्लाये जा रही थी- ‘माधुरी दीक्षित….. माधुरी दीक्षित।’

कुछ दूर निकलते ही राजन महतो  रुके और नकुल का कंधा झकझोरते हुए पूछा- ‘पुष्पा को तुम कैसे जानते हो?’

‘कौन पुष्पा?’ नकुल ने अनजान बनते हुए पूछा।

‘वही जो तुम्हें माधुरी दीक्षित कह रही थी।’

‘अच्छा तो उसका नाम पुष्पा है।’ नकुल के चेहरे पर ऐसे भाव आये थे मानो उसने कोई बड़ा राज जान लिया हो।

‘उस लड़की से दूर ही रहना। प्रमोद मिसिर की साली है। प्रमोद मिसिर को जानते हो न तुम? मरडर तो उसके बांये हाथ का खेल है। एक पांव जेल में रहता है उसका।’ राजन महतो ने समझाने के अंदाज में कहा था।

‘तो क्या अपने बहिन-बहनोई के घर में रहती है पुष्पा?’ नकुल ने पूछा था।

‘अरे नहीं यार। शेरपुर से आई है। वहां मैट्रिक में फेल हो गई तो मां-बाप ने यहां भेज दिया। प्रमोद मिसिर अपने जोर से पास करा देगा उसको।’ राजन महतो और नकुल अब सड़क के किनारे पहुंचकर बस का इंतजार करने लगे थे।

‘अच्छा, शेरपुर से आई है तभी तो मुझे माधुरी दीक्षित कहती है। वहां तो साल भर में तीन-चार बार अपना नाच हो ही जाता है। यही मैं सोच रहा था कि इस गांव में तो कोई मुझे इस नाम से नहीं पुकारता है।’

बस पर चढ़ते ही राजन महतो ने ताकीद की थी- ‘आइंदा से उस लड़की से बात करने की जरूरत नहीं है। प्रमोद मिसिर को पता चला तो गुरिये-गुरिये काट कर मछली को खिला देगा।’

बस अपनी रफ्तार से चल पड़ी थी। राजन महतो सीट पर पड़े-पड़े सोने लगे। नकुल खिड़की के बाहर के पेड़ पौधों को देख रहा था। उसे लगा जैसे हर पेड़ से एक डाल निकल आई हो और हर डाल पर सैकड़ों पुष्पा बैठी हो। झूला झूलती। चहकती और उसे मुंह चिढ़ाती। पता नहीं क्यों वह अपने अंदर से कुछ फूटता हुआ महसूस कर रहा था। कुछ अच्छा सा। जैसे भीतर से खुशी बाहर निकल रही हो। उसने बस पर बैठे-बैठे आंख बंद की और गुनगुनाने लगा- पिया के पिरितिया में देह पियराइल…..।

दो दिन के बाद राजन महतो की नाच मंडली को निकलना था गाजीपुर। वहां के किसी गांव में नाच होना था। मंडली के बाकी कलाकार भी जासो पहुंच गये थे। नकुल ने इस बीच बक्सर में कई फिल्में देखी और कई गीतों पर नाचने का अभ्यास किया। इधर भोजपुरी सिनेमा के गीतों की खूब मांग रहती थी। लिहाजा कई भोजपुरी फिल्में देखी उसने। कई गीतों पर अभ्यास किया। राजन महतो टेप रिकॉर्डर पर बजाते- गोरकी पतरकी रे…। इस गीत पर जब नकुल कमर मचकाता तो राजन महतो भी मस्त हो जाते। कई बार कहते- ‘नकुल, भगवान को तुम्हें लड़की बनाना था। उनसे गलती हो गई। साले तुझको पता नहीं है कि जब तुम नाचता है तो दुनिया बदल जाती है।’

राजन महतो की ये बात सुनते ही नकुल उनके चरणों में गिर जाता और बड़े आदर से कहता- ‘ये सब तुम्हारे कारण हुआ महतोजी।’

उस दिन नकुल सुबह में खेत से निपटकर जल्दी-जल्दी राजन महतो के घर की ओर बढ़ा जा रहा था। आज ही बारह बजे निकल जाना था। पहले बक्सर जाना था और इसके बाद वहां से पुल टप कर गाजीपुर। सुबह की हवा जैसे उसके मन में उमंग भर रही थी। उसने गमछे से अपना माथा बांधा और तेज आवाज में गाना शुरू किया- ‘तोहरे प टिकुलिया के नाज ए सजनजी, जइह मत अब परदेस…।’ अभी गाने की पहली लाइन ही पूरी हुई थी कि वह थथमकर रुक गया। सामने पुष्पा खड़ी थी। एकदम अकेली। हवा में फर-फर उड़ती अपनी ओढ़नी को संभालते। पहले तो नकुल की समझ में नहीं आया कि वह क्या कहे। सामने खड़ी पुष्पा लगातार मुस्कुराए जा रही थी। जवाब में नकुल ने भी मुस्कुरा दिया।

पुष्पा ने धीरे से कहा- ‘ए माधुरी दीक्षित, तुमसे एक ठो बात पूछनी थी।’

‘क्या?’ नकुल ने पास में बैठी किसी चिड़िया की आवाज से पुष्पा की आवाज की तुलना करने की कोशिश की थी।

‘हमको भी नाचना सिखा दोगे? एकदम अपने जइसन? माने माधुरी दीक्षित जइसन?’

‘क्यों? क्या करोगी नाचकर?’ नकुल ने माथे पर बंधा गमछा खोला तो उसके बाल भी पुष्पा की ओढ़नी की तरह फर-फर करके उड़ने लगे। पुष्पा चकित भाव उसके बालों को देखने लगी।

‘तुम्हारे बाल बड़े सुन्दर हैं। एकदम काले, घुंघराले और बड़े-बड़े।’  पुष्पा ने गौर से उसे देखते हुए कहा।

‘हां, लेकिन नाचते समय तो नकली बाल लगाने पड़ते हैं। लड़कियों वाले। तुम्हारी तरह।’ कहकर नकुल जोर से हंसा।

‘तो तुम मुझे नाच सिखा दोगे। मुझे नाचना बहुत अच्छा लगता है। लेकिन आता ही नहीं। और घर में नाचती हूं तो जीजा कहते हैं कि इसी आदत के चलते मैट्रिक फेल कर गई।’

‘तो मैं तुम्हें नाच सिखाउंगा तो तुम्हारे जीजा तो मुझे गोली से ही उड़ा देंगे।’ नकुल ने हंसकर कहा।

‘ऐसा होगा तो हमलोग गांव से भाग जाएंगे।’ पुष्पा ने बड़ी सहजता से कह डाला। लेकिन नकुल को तो लगा मानो पूरे शरीर में बिजली दौड़ गई हो। अभी वह कुछ समझने की कोशिश कर ही रहा था कि पुष्पा ने फिर से जीभ निकाल कर चिढ़ाया और अपनी बांई आंख को दबाकर हंस दिया। इसके बाद वह दौड़ती हुई तालाब की तरफ चली गई थी। बेचारा नकुल, उसे तो जैसे काठ मार गया हो।

खेत से निकलकर चुपचाप पास के बगीचे में घंटों बैठा रहा। उसे लगा जैसे उसके भीतर कुछ बदल रहा हो। कुछ पिघल रहा हो। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था और वह चुपचाप आंख बंद किये इस दिल की धड़कन सुन रहा था। उसे याद आया खुद उसके ही द्वारा बनाया गया गीत- ‘मनवा में काहे बस गइल बलमुआ, बसल त काहे चल गइल बलमुआ…..।’

गाजीपुर में तीन दिन तक जमकर चला नाच। नकुल सबकुछ भुलाकर नाचा। भोजपुरी फिल्मों के गीतों से लेकर भिखारी ठाकुर के गीतों पर तक। अपने बनाये गीतों को जब उसने साध कर गाया तो लोग वाह-वाह कर उठे। लेकिन नाच के बाद जब वह थक कर टेंट में सोने जाता तो सामने पुष्पा खड़ी हो जाती- हंसती हुई, इठलाती हुई। अब उसका मन पाउच वाला दारू पीने का भी नहीं करता। डर लगता कि ज्यादा नशा होने पर कहीं मन की बात मुंह से न निकल जाए। और राजन महतो उसके मुंह से पुष्पा का नाम सुन लें तो बवाल ही हो जाएगा। कई बार राजन महतो ने खुद उसके सामने दारू का गिलास रखा लेकिन उसने तबीयत खराब होने का बहाना बनाकर टाल दिया।

गाजीपुर से लौटने के बाद फिर पन्द्रह दिनों के बाद गंगा पार भरौली घाट में नाच का आयोजन था। मतलब पन्द्रह दिनों तक फिर जासो में आराम। लेकिन यहां आराम कहां? नकुल दो दिनों तक ओसारे में बैठा-बैठा पुष्पा की राह तकता रहा। सुबह में इसी उम्मीद के साथ जगता कि आज पुष्पा जरूर आयेगी लेकिन शाम तक वह बैठा रहता और उम्मीद बेकार हो जाती। वह इस डर से कहीं बाहर नहीं जाता कि कहीं वह बाहर जाए और पुष्पा आ जाये तो? आखिरकार तीसरे दिन उसने हिम्मत जुटाई और खुद पुष्पा के घर की ओर निकल गया। प्रमोद मिसिर का घर राजन महतो के घर से थोड़ी दूर था। गांव के बगीचे के इस पार राजन महतो का घर तो उस पार प्रमोद मिसिर का। बड़ा सा घर। सामने हाता और हमेशा लोगों की भीड़। उसने देखा एक छह फुट का लम्बा-चौड़ा आदमी हाते में रखी चौकी पर बैठा था। दो-तीन लोग सामने बैठे थे। नकुल को लगा कि यही प्रमोद मिसिर होगा। देखने से ही खतरनाक लगता है। आगे जाने की उसकी हिम्मत नहीं हुई। उसने सोचा उसे वापस लौटना चाहिए। वह घूमा तभी वह लम्बा-चौड़ा आदमी चिल्लाया- ‘अरे कहां आया था रे? तू तो महतो की नाच पार्टी का लवंडा है ना रे?’

नकुल ने एकदम नाच वाली अदा के साथ झुक कर सलाम किया और दो कदम आगे आ गया- ‘गांव में टहल-घूम रहे थे हुजूर।’

‘अच्छा-अच्छा। साला तुम तो एकदम मस्त है रे। तुम्हारे आगे तो लड़कियो फेल है।’ प्रमोद मिसिर के इतना कहने के साथ उसके साथ बैठे लोग जोर से हंस पड़े। आम तौर पर नकुल की तुलना कोई लड़की से करता था तो उसे अच्छा लगता था लेकिन आज पता नहीं क्यों उसे खराब लगा। प्रमोद मिसिर ने आंख मारते हुए कहा- ‘कभी-कभी मेरे यहां भी आकर टहल-घूम लिया करो। किसी चीज की कमी नहीं होगी।’

नकुल फिर झुका था- ‘आपकी ही परजा हैं हुजूर।’ कहते हुए तेज कदमों से निकलने ही वाला था कि सामने से पुष्पा आती दिखाई पड़ी। उछलती-कूदती। नकुल को देखते ही रुकी और उसे ऐसे देखा जैसे पहली बार देख रही हो। वह नकुल के एकदम बगल से निकली और धीरे से कहा- ‘थोड़ी देर में बगीचे में।’

 इसके बाद सिर झुकाये घर में घुस गई थी।

अब इंतजार कौन करता। नकुल के पांव में तो जैसे पंख लग गये। वह तेज कदमों से वापस लौटा और सीधे बगीचे में। गर्मी की भरी दोपहर और घने पीपल के पेड़ की छांव। ठंडी हवा। लेकिन मन नहीं लग रहा था नकुल का। कभी बगीचे के इस कोने बैठता तो कभी दूसरे कोने में। कहीं चैन नहीं पड़ रहा था। समय काटना मुश्किल हो गया। अचानक दौड़ती हुई आई थी पुष्पा। आते ही धम्म से जमीन पर बैठ गई। नकुल ने हैरत से उसे नीचे बैठे देखा। फिर हंसी पुष्पा और उसका हाथ पकड़कर उसे झटके से नीचे बैठा लिया। नकुल की देह मानो सन-सन कर रही थी। पांव से लेकर सर तक थर-थर कांप रहा था। मुंह से आवाज नहीं निकल पा रही थी। कंठ सूख गया था मानो।

‘कहां चले गये थे इतने दिन? और जीजा के घर तरफ मुझको खोजने गये थे ना?’  पुष्पा ने उसकी आंखों में झांका।

‘नाच था। गाजीपुर में।’ नकुल ने थूक घोंटा।

‘तुमको फिर सब माधुरी दीक्षित कहा होगा न?’

‘हां, सब कहता है। तुम भी तो कहती हो।’ इस बार नकुल ने पालथी मार ली थी।

‘लेकिन मुझे अच्छा नहीं लगता। मुझे नाच अच्छा लगता है लेकिन तुम्हारा लड़की बनकर नाचना अच्छा नहीं लगता। गांव भर की लड़कियां तुमको क्या कहती हैं, पता है?’ पुष्पा एक लकड़ी उठाकर उससे जमीन खोदने लगी थी।

‘क्या कहती हैं?’ नकुल हंसा था

‘जाने दो, तुमको अच्छा नहीं लगेगा।’ पुष्पा ने धीरे से कहा था।

‘चलो बता भी दो। मुझे खराब नहीं लगता।’ नकुल ने फिर हंसते हुए कहा था।

‘मउगा। मउगा कहती हैं तुमको। सब कहती हैं कि लड़की बनते-बनते तुम्हारी चाल-ढाल और आदत सब औरतों वाली हो गई हैं।’

‘इसमें बुरा क्या हैं? शंकर भगवान का उ वाला फोटो देखी हो तुम जिसमें उ आधा मरद और आधी औरत होते हैं। मैं भी भगवान शंकर का वही रूप हूं। मुझमें भी आधी औरत और आधा मरद है।’

‘धत। लेकिन मुझको तुम्हारा इ वाला बाल अच्छा लगता है। घुंघराला और फर-फर उड़ता हुआ। तुम नचनिया का काम छोड़ दो।’ पुष्पा ने बच्चों की तरह जिद की थी।

नकुल ने कुछ नहीं कहा और बस उसका चेहरा देखता रहा। गोरे चेहरे पर झूलते बाल, बड़ी-बड़ी आंख और बच्चों सा भोलापन। अचानक झटके से उठी पुष्पा, उसके बाल सहलाये और कहा- ‘अब जाती हूं। देर होगी तो जीजा गुस्सा करेंगे।’

 फिर वह एक मिनट के लिए भी नहीं रुकी थी। जिधर से आई थी उधर ही दौड़ती चली गई। नकुल देर तक उसे जाते हुए देखता रहा। ओझल हो गई फिर भी उसे लगा कि वह उसे नजर आ रही है। इसके बाद बड़े अनमने ढंग से उसने अपना चेहरा नीचे कर लिया था।

धत साला। इ भी कोई काम है। औरत का कपड़ा पहनकर नाचना? जीवन में पहली बार नकुल को अपने काम से विरक्ति सी हुई थी। उसे लगा कि पुष्पा सच ही तो कह रही है। वह कुछ दूसरा काम भी तो कर सकता है। इस पर कुछ सोचना चाहिए। आखिर राजन महतो जैसे जादू के खेल दिखाते हैं वह भी तो उसी तरह का कुछ काम कर सकता है। सोचते हुए वह वापस लौटने के लिए उठा था। वह घूमा ही था कि उसे लगा जैसे दुनिया हिल गई हो। पीछे 20-22 साल के तीन लड़के खड़े थे। लम्बे-चौड़े और पहलवान जैसे। वह कुछ समझ पाता तभी तीनों उसपर टूट पड़े। लात-घूंसों से जब मन नहीं भरा तो बगल में गिरे पेड़ की डाल उठा ली और उससे जमकर पीटा।

‘साले, प्रमोद मिसिर की साली से  बतियाता है रे और उ भी बगीचा में? हमलोग गांव के लइका हैं लेकिन आजतक उसकी ओर से आंख उठाने की हिम्मत नहीं हुई। मादर..। .मिसिरजी को पता चल गया तो गुंरिये-गुरिये काट देंगे।’ एक लड़के ने हांफते हुए कहा था।

‘चल-चल इसको खींच के ले चल। रात भर में इसकी गरमी झार देंगे। ले चल साला के। लइकी से जादा मजा देगा।’ दूसरा लड़का बोलते हुए उसकी बांह पकड़कर खींचने लगा था। नकुल को लगा था कि आज उसका बचना असंभव है। उसके नाक और मुंह से खून बह रहा था। कुरता फट कर झूल गया था। उसने अपनी तरफ से ताकत लगाकर उन लड़कों के चंगुल से छूटने की कोशिश की लेकिन बेकार। देह में जान ही नहीं बची थी। उसने अपने आपको ढीला छोड़ दिया। चारो उसे घसीटते हुए एक तरफ ले जाने लगे। उसकी आंखें बंद होने लगी। तभी उसे कुछ जानी-पहचानी आवाज सुनाई पड़ी थी- ‘डरिहे मत नकुल। हम आ रहे हैं।’

 उसने आंखें खोल कर देखने की कोशिश की थी। उसे घसीट रहे लड़के उसे छोड़कर दौड़ते हुए एक तरफ निकल गये थे। उसके बाद वह घर कैसे पहुंचा उसे याद नहीं। सुबह में उठा तो मुंह सूज के डेढ़गुना हो गया था। आंखें इतनी सूज गई थी कि खोलना मुश्किल। आवाज नहीं निकल रही थी। कान में राजन महतो की आवाज सुनाई पड़ी थी- ‘हम बोले थे ना, कि पुष्पा से दूर रहना।’

तीन दिन तक कमरे में बंद रहा नकुल। राजन महतो पहरेदारी करते। वह जानते थे कि मामला अभी और बढ़ेगा। मिसिरजी को पता चल गया तो इसका जो होगा सो होगा उनके लिए भी गांव छोड़ने की नौबत आ जाएगी।

एक दिन पुष्पा आकर ओसारे में झांक रही थी तो राजन महतो ने उसे हड़काया- ‘गरीब नचनिया है बुचिया। मरा जाएगा बेचारा। तू भी अपने घर जा और इसको भी जीने दे।’

पुष्पा चुपचाप चली गई थी। नकुल को जब इसका पता चला तो वह खूब रोया। मार खाने के बाद उसे रुलाई नहीं आई थी लेकिन पुष्पा के लौटने की बात सुनकर उसे लगा जैसे किसी ने उसका कलेजा मुठ्ठी में लेकर दबा दिया हो। राजन महतो उसे चुपचाप रोते हुए देखते रहे। उन्होंने उसे चुप भी नहीं कराया।

इस घटना के लगभग सात दिन बीत गये थे और नकुल अब ठीक होकर धीरे-धीरे नाचने का रियाज भी करने लगा था। उस दिन वह ओसारे में बैठकर तान साध रहा था- पिया के पिरितिया में देह पियराइल…। आंखें बंद किये हुए पूरे सुर में अलाप लिया ही था कि फिर से उसकी देह में झिनझिनी दौड़ी थी। उसने आंख खोली तो सामने पुष्पा खड़ी होकर उसका माथा छू रही थी।

‘बहुत मारा था छौड़ा सब न तुमको। जीजा को भी किसी ने कह दिया है। मुझे भी बहुत मारे थे। बोल रहे थे कि अगली बार ऐसा सुन लिये तो दोनों को गोली मार देंगे।’ पुष्पा ने धीरे से कहा था।

‘तुमको काहे मारेंगे। हमी को मार दें। सब खेले खत्तम हो जाएगा।’ नकुल सूखी हंसी हंसा था।

‘चलो, हम दोनों कहीं भाग जाते हैं। मेहनत-मजदूरी करेंगे और जी लेंगे। हमारे गांव के बहुते लोग दिल्ली और कलकत्ता गया है। जो गया वहीं कमाने लगा। वहां काम का कमी नहीं है।’

‘और मेरा नाच?’ नकुल ने चौंक कर कहा था।

‘मेरे लिए नाचना नहीं छोड़ सकते?’ पुष्पा ने उसका गाल छूकर कहा था। उफ्फ नकुल को लगा कि वहीं कट कर मर जाए। उसके लिए वह नाच तो क्या पूरी दुनिया छोड़ देगा।

‘कल जीजा को आरा जाना है। कुछ केस मुकदमा का तारीख है। मैं दोपहर में घर से निकल जाउंगी। बस एस्टाप पर रहूंगी। वहीं आ जाना। बस से भाग जाएंगे। जो होगा देखा जाएगा। अब जाती हूं। याद रखना कल भोरे बस एस्टाप पर।’

 पुष्पा धड़धड़ाती हुई निकल गई थी। नकुल उसे देर तक जाते हुए देखता रहा। गजब लड़की है भाई। न कोई डर न भय। वह लड़की होकर इतनी निडर है तो उसे डर क्यों लग रहा है?

 और नकुल ने भी जैसे फैसला कर लिया था। अब सब बंद। पुष्पा के साथ वह कलकत्ता भाग जाएगा। मेहनत-मजदूरी करेगा और पुष्पा के साथ गृहस्थी बसायेगा। न तो कोई नाच और ना गाना। अब वह माधुरी दीक्षित नहीं बनेगा। अब वह नकुल मांझी बनकर जीएगा। पुष्पा के साथ रहेगा। राजन महतो की तरह उसका भी परिवार होगा।

सोचते-सोचते कब उसकी आंख लग गई पता ही नहीं चला। नींद में उसने कलकत्ता के सपने देखे। पुष्पा को कलकत्ता की सड़कों पर उसका हाथ पकड़कर चलते देखा। आंख खुली तो सामने राजन महतो खड़े थे। माथे पर अंगोछा बांधे हुए और गुनगुनाते हुए। पूरी मस्ती में। नकुल समझ गया कि कोई बड़ा सट्टा है। जब भी बड़ा सट्टा मिलता था तो ऐसे ही मस्ती में आ जाते थे राजन महतो। नकुल के उठकर बैठते ही चहक कर बोले- ‘चल मेरी माधुरी दीक्षित। तैयारी कर ले। कल हमें छपरा निकलना है। बड़ा परोगराम है। बहुत पैसे मिलने वाले हैं राजा। तुम पर तो पैसे बरसेंगे मेरी जान। तुम्हारी खास फरमाइश है।’

नकुल चुपचाप राजन महतो का चेहरा देखता रह गया। उसने सोचा कि वह बता दे कि वह छपरा जाने वाला नहीं है। अपनी नाच पार्टी के लिए वे किसी दूसरे लवंडा का इंतजाम कर लें। लेकिन इतनी जल्दी वे इंतजाम कैसे करेंगे? और फिर यदि वह राजन महतो को बतायेगा तो बात खुल जाएगी कि कल पुष्पा उसके साथ भागने वाली है। यही नहीं अभी राजन महतो छपरा के नाच को लेकर कितने खुश हैं। अगर वह अभी नाच छोड़ने की बात कह देगा तो उनपर क्या गुजरेगी? विचारों का हिलकोरा चल रहा था नकुल के माथा में। कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

थोड़ी देर पहले नाच छोड़ने और पुष्पा के साथ जीवन गुजारने के विचार भर से रोमांचित हो रही उसकी देह जैसे सुस्त पड़ गई थी। शाम होते-होते मंडली के बाकी कलाकार भी पहुंच गये। सभी अपनी तैयारी में लग गये लेकिन नकुल को कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। उसके ध्यान में बार-बार पुष्पा घूम रही थी। कभी हंसती-इठलाती पुष्पा आ जाती तो कभी लंहगा-चोली पहने वह खुद। कभी पुष्पा की हंसी कान में गूंजती तो कभी नाच का नगाड़ा। अचानक दस साल पहले की बात याद आने लगी- नाच में आने के पहले क्या था वह? बक्सर के मुसहर टोल में दूसरे लड़कों के साथ ऐसे ही घूमता और जो मिलता खा लेता। ना तो मां का पता था और ना ही बाप का। एक बूढ़े आदमी के घर वह रहता था जिसको वह फूफा कहता था। एक दिन कहीं गाना बज रहा था और वह अपने दोस्तों के साथ नाच रहा था। उधर से गुजरते राजन महतो ने उसे नाचते देखा और रुक गये। उसका माथा सहलाया और फूफा से उसे मांग लिया। फूफा के लिए तो वह बोझ ही था। फूफा ने कुछ पैसे लिए और उसे राजन महतो के साथ लगा दिया। उस दिन पहली बार राजन महतो ने कहा था- ‘तू तो माधुरी दीक्षित जैसा नाचता है राजा। चल तुझको असली माधुरी दीक्षित बनाता हूं।’

पहले तो लड़की बनकर नाचने में बहुत खराब लगा था नकुल को। लेकिन धीरे-धीरे सब कुछ अच्छा लगने लगा था।

रात के आठ बज गये थे। कल सुबह पुष्पा उसका इंतजार करेगी और इधर छपरा के लिए गाड़ी खुलेगी। पुष्पा के साथ कलकत्ता गया तो नाच खत्म और छपरा गया तो पुष्पा नहीं मिलेगी। पुष्पा और नाच। नाच और पुष्पा। कभी मन कहता कि पुष्पा तो तेरे भीतर है रे पागल। बाहर की पुष्पा के लिए क्यों मरा जा रहा है? तू तो शिव है। आखिर दुनिया में कौन ऐसा मरद होगा जिसके भीतर एक औरत रहती होगी। तू अनोखा है।

कभी मन कहता, पुष्पा ने कितना भरोसा किया है तुझ पर। तेरे लिए रिश्ता नाता और घर-परिवार सब छोड़ने को तैयार है। तू उसे छोड़ देगा। ये तो भरोसे का खून होगा। तभी मन के भीतर बैठा लवंडा कहता- और तेरे भीतर की माधुरी दीक्षित? तेरे अंदर की पुष्पा? तेरे अंदर की स्त्री? तु इन सबको मार देगा? नाच के बगैर जी लेगा क्या तुम? पुष्पा का भरोसा तुमसे टूटेगा तो कहीं और जुटेगा। उसके लिए तो यह अच्छा भी होगा। अभी वह बच्ची है। कल कोई न कोई उसका हाथ पकड़ ही लेगा।

पसीने से तर-बतर हो गया नकुल। ठंडी हवा के लिए ओसारे के बाहर निकल आया। आसमान में पूरा चांद चमक रहा था। तभी कुछ हलचल हुई और उसने पीछे मुड़कर देखा। राजन महतो ओसारे में खड़े थे। हाथ में नया लंहगा और चोली। उसे दिखाते हुए उन्होंने कहा- ‘इ तुम्हारे लिए कलकत्ता से मंगाये थे रे नकुल। दुकान वाला बोला था कि तेजाब सिनेमा में माधुरी दीक्षित ऐसा ही चोली लंहगा पहनी थी। इसको तू पहनेगा तो एकदम माधुरी दीक्षित लगेगा। चल एक बार इसको पहनकर दिखा तो।’

नकुल ने चुपचाप उनके हाथ से लहंगा-चोली ले ली थी। पीले रंग का लंहगा और लाल रंग की चोली। चोली के पीछे छोटा-छोटा आइना। उसने आइना में अपना चेहरा देखा था। लेकिन भरी आंख से कुछ साफ नहीं दिखाई पड़ रहा था। उसने लहंगा-चोली एक तरह रखकर आंखों पर पानी के छींटे मारे, चेहरे को कसकर पोछा और फिर उस आइने में झांका। लेकिन उसे आइने में अपने चेहरे की जगह माधुरी दीक्षित नजर आ रही थी। राजन महतो ने नकुल का चेहरा गौर से देखा। उन्हें समझ में नहीं आया कि नकुल के गालों पर पानी की लकीर कैसे बन गई है। उसने तो अपना चेहरा तुरंत पोंछा था। तभी नकुल ने चेहरा ऊपर उठाया था- ‘छपरा के लिए गाड़ी कितने बजे खुलेगी महतोजी?’

राजन महतो देर तक नकुल का चेहरा देखते रहे। पता नहीं क्यों उन्हें नकुल पर अभी बहुत प्यार आ रहा था।

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    By: कमलेश

    बक्सर में जन्म और वहीं पढ़ाई-लिखाई। शुरूआती दौर में छात्र आन्दोलन और फिर भोजपुर के किसान आन्दोलनों से जुड़ाव। बाद में पत्रकारिता से जुड़ाव और अब तक जारी। कहानियां हाल में लिखनी शुरू की। हंस, कथादेश, परिकथा और पाखी समेत कई पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित

    शिक्षा: एमए (दर्शनशास्त्र)
    रंगमंच पर भी सक्रिय. एक आलेख ‘भगत सिंह फांसी की कालकोठरी से’ की कई जगहों पर नाट्य प्रस्तुति.
    हिन्दुस्तान, पटना में डिप्टी एडीटर के पद पर कार्यरत

    संपर्क: फ्लैट नं. 301
    निरंजन अपार्टमेंट
    आकाशवाणी मार्ग, खाजपुरा
    बेली रोड, पटना, बिहार।

    मो.: 09934994603

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    बांध: कहानी (कमलेश)

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4 Responses

  1. विजयानंद विजय

    एक विवश प्रेम का दु:खद अंत।सामाजिक विषमता की खाई में न जाने कितनी ही प्रेम कथाएँ इसी तरह दम तोड़ती रही हैं।बहुत ही स्वाभाविक,मार्मिक और हृदयस्पर्शी कथा।साधुवाद मान्यवर।

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  2. ashok prajapati

    achhi aur sasakt kahani.60-70 ke dasak me es tarah ke paridrisaya dekhane ko mialte the.badhaie

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  3. रेशमा प्रसाद

    इस कहानी के प्रमुख अंश को छूटा हुआ महसूस हो रहा है क्योंकि बिहार में कोई भी मउगा या लौंडा के ऊपर यौनिक रुप से शारीरिक उत्पीड़न जरूर ही होता है पता नहीं कमलेश भैया ने उसकी मानसिक पक्ष को बिना पढ़े कहानी का निर्माण किया जो कि बहुत जरूरी है सभी मउगा की जीवन में एक महिला जरूर ही आती है परंतु उन महिलाओं की क्या स्थिति है इसके बारे में सोचने की जरूरत है इसमें तो जाति विमर्श दिखाई देता है परंतु लैंगिकता के स्तर पर कोई भी स्पष्ट नजरिया नहीं आता है मउगा नाम के शीर्षक से लिखी गई कहानी मैं बिहार के मउगा या लवंडा लोगों के जिंदगी की यौनिकता के विषय पर जो और स्पष्टता है यह भी प्रमुख कारण है कि सामाजिक बनावट के अनुसार वह अपने आपको एक महिला के करीब लेकर जाता है परंतु उसकी मानसिकता तो खुद ही एक महिला स्वरूप होती है जो कि महिला के साथ प्यार के जो नाटकीय स्वरूप सामने आते हैं वह क्षड़ीक ही होते हैं इस कहानी में मानसिकता के अस्तर पर कोई भी ऐसा स्पष्ट संदेश नजर नहीं आता है नकुल माझी खुद एक माधुरी दीक्षित की फोटोकॉपी है उसके बाद भी वह महिला उसे पसंद करती है और वह उसके मन में महिला के प्रति झुकाव को जागृत कर देती है एक समय तक वह अपने आप को उस लौंडा नाच जिसमें की जरुर से शारीरिक रूप से यौनिक रिश्ते बनते हैं जोकि समलैंगिक पहचान के रिश्ते बनते है क्या उनको झूठ लाया जा सकता है ऐसी लौंडा पहचान के साथ वह अपने आप को पूरी तरीके से रच बस जाने के बाद भी उसकी जिंदगी की कोपलों में नया ज्वार पुष्पा के रूप में आता है मैं खुद असलियत में इस तरीके की कहानी को देखती हूं कि एक सर्कस वाला जिसके यहां चंदन नाम का लवंडा काम करता है और उसकी बेटी के साथ उसके रिश्ते बन जाते हैं और यहां तक की उसकी शादी भी हो जाती है उसकी बेटी यहां तक भी जानती है जिसके साथ में रिश्ता बना रही हूं वह खुद अपने आप को औरतों की तरह सजना सवरना और एक पुरुष को अपने पति के रुप में प्यार करना उसके साथ योनि का रिश्ते बनाना पसंद है तू भी उसके बड़े-बड़े बालों को कटवा कर के उससे एक पुरुष स्वरूप में परिवर्तित करने का असफल प्रयास करती है सामाजिक दबाव को झेलते हुए वह अपने आप को प्रयास भी करता है कि वह पुरुष पहचान के साथ सामने आए परंतु असफल प्रयास जिंदगी का होता है जो की उसके लिए इस जिंदगी का ना मिटने वाली लकीरों की तरह रहता है इस कहानी में इस मावा या लवंडा को मानसिक रूप से पुरुष साबित करने का प्रयास होता है परंतु इसमें उसे अंत में लौंडा नाच उसकी पहली प्यार नजर आती है इसी से समझा जा सकता है कि ऐसी लाखों कहानियां बिहार में ज्वलंत तरीके से सामने है बहुत से ऐसे लवंडा और मौगा लोग स्त्री के साथ रिश्ता रखते हुए भी अपने आप को हिजड़ा समुदाय से जोड़ लेते हैं यह अधकचरी ट्रांसजेण्डर पहचान बहुत ही व्यवसायिक स्वरूप में होती है एक समय में वह हिजड़ा स्वरुप में आकर के अपने आप को असहाय दिखा कर के अपनी जीविका के और परिवार की जीविका के लिए सामने आता है परंतु उसके घरवालों और उसको खुद पता रहता है कि उसके जिंदगी की सच्चाई क्या है उसकी लैंगिकता क्या है उसकी यौनिकता क्या है आज जिस तरीके से मौगा या लवंडा के एक स्त्री के प्यार को बहुत ही सुंदर तरीके से सजाकर के जाति आधारित समाज के ऊपर चोट की गई है कही न कही यौनिकता के स्तर पर कमजोर दिखाई देती है उसकी मानसिक पहचान के बारे में कोई भी कहानियों में कड़ी को नहीं जोड़ा गया है जबकि मैं सामने से देखती हूं कोई भी लवंडा सामाजिक मजबूरी में पुरुष पहचान में जीता है अगर उसे सामाजिक मजबूरी के पर्दे को हार के सामने आ जाता है तो वह एक शहर या गांव के हिजड़ा पहचान के रुप में ही सिर्फ पहचान बना पाता है लवंडा या मोगा पहचान जातीय स्तर पर सबसे ज्यादा अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जातियों में ही होती है क्योंकि आर्थिक स्तर पर कमजोर अस्पष्ट यौनिकता और लैंगिकता के साथ जीविकापार्जन के लिए भी साधन होती है आज तक मुझे कोई ऐसा लवंडा या मौगा को नही देखी जो कि उच्चतम जातियों से आता हो तथा लवंडा नाच करता हो बहुत कम हा आर्थिक स्तर पर कमजोर मउगा उच्चतम जातियों से भी लवंडा नाच करने से कतराता है क्योकि उसकी लैंगिक अल्पसंख्यकोक की पहचान सामने आने का डर होता है

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  4. Akash

    सामाजिक मजबूरियों के हाथों दम घोंटे हुए प्रेम का सजीव चित्रण। बधाई। आपकी कहानियों का हमेशा इन्तेज़ार रहता है।

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