एक बात जो मुझे बचपन से लेकर आज तक मेरे ही घर में चुभती रही है, जब भी मुझे मासिक धर्म शुरू होता है मेरी माँ मुझे अपने पूजा वाले कमरे में नहीं जाने देती हैं। मुझे बहुत खराब लगता है । मैंने उन्हें बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन कभी-कभी व्यक्ति के सामने उसका साक्षर न होना भी बहुत भारी पड़ता है। आप बहुत कुछ उसे वैज्ञानिक तरीके से समझाना चाहते हैं लेकिन नहीं कर पाते है।…… संपादक 

महावारी या महामारी 

मैं पीछे क्यों रहूँ

अनीता चौधरी

अपनी छत से जब कविता को अपने आँगन में बैठा और उसकी माँ को रसोई में खाना पकाते देखा तो बहुत शॉक्ड हुई और आश्चर्यवश पूंछ ही बैठी, घर की सबसे कमेरी बेटी आज कैसे आराम कर रही है। बेटी का संकोचवश चेहरा जमीन में गढ़ता देख माँ तत्परता में बोली,’ आज इसका पीरियड आ गया है। हमारे यहाँ पर इन दिनों कोई काम नहीं करता है।’ मेरे पूँछने पर कि अब तो समय बदल गया है और ये बेटियां भी पढ़ लिख रही है और आप फिर भी यह सब कर रही है तो उस महिला का जबाब आया कि घर में यही होता आया है इन दिनों घर के पुरुष हमारे हाथ से छुआ पानी पीना भी पसंद नहीं करते है। बहिनजी ये तो रिवाज है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है और हमें निभानी पड़ती है |

एक बात जो मुझे बचपन से लेकर आज तक मेरे ही घर में चुभती रही है, जब भी मुझे मासिक धर्म शुरू होता है मेरी माँ मुझे अपने पूजा वाले कमरे में नहीं जाने देती हैं। मुझे बहुत खराब लगता है । मैंने उन्हें बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन कभी-कभी व्यक्ति के सामने उसका साक्षर न होना भी बहुत भारी पड़ता है। आप बहुत कुछ उसे वैज्ञानिक तरीके से समझाना चाहते हैं लेकिन नहीं कर पाते है। अब मैंने भी उनसे ज्यादा बहस न करके कि वह उम्र के लास्ट पड़ाव पर है। उनके कमरे में हमेशा के लिए जाना छोड़ दिया है ।

वहीं मुंबई में रहने वाली बारहवीं पास दीक्षिता इस भेदभाव को बहुत बुरा मानती है और कहती है, “हमारे हिंदू धर्म के हिसाब से माहवारी के चार पांच दिनों के दौरान हमें अलग कर दिया जाता है. हमें खाना पकाने या छूने को मना कर दिया जाता है और हमारा बिस्तर और बर्तन भी अलग कर दिया जाता है. हम सात दिनों तक न तो पूजा कर सकते हैं और न ही मंदिर जा सकते हैं. खासकर किसी त्यौहार के मौके पर ऐसा होने पर काफी दिक्कत और शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है.”

इसके पीछे आम धारणा यह है कि इस दौरान महिलाएं अशुद्ध होती हैं और उनके छूते ही कोई चीज खराब हो सकती है. मेरी सहपाठी रही कल्पना ने पूरे जीवन इन पाबंदियों को इसलिए माना कि घर के बड़ों ने उसे ऐसा करने को कहा था उसे समझाया गया कि अगर उसने ऐसा नहीं किया तो पति की मौत हो जाएगी. बच्चे  बीमार रहेंगे | कल्पना कहती है, “यह चार पांच दिन हमारे लिए किसी सजा से कम नहीं होते हैं | जब हमें अछूत समझा जाता हैं तो हम सोचते हैं कि पुरुषों के साथ ऐसा भेदभाव क्यों नहीं होता. यह सब हमें ही क्यों भुगतना पड़ता है.”

मुस्लिमों में भी ऐसा ही है. इलाहाबाद में रहने वाली नजराना बताती है, “हमारे धर्म में माहवारी के दौरान लड़की को नापाक यानी अपवित्र माना जाता है | उसे इबादत की अनुमति नहीं होता | वह कुरान भी नहीं छू सकती | पहली बार माहवारी होने पर लड़की को घऱ से बाहर नहीं भेजा जाता | सातवें दिन स्नान के बाद वह पवित्र होती है.” जबकि ईसाई धर्म में ऐसा भेदभाव नहीं है. इस धर्म की महिलाएं इस दौरान सामान्य कामकाज करने के अलावा चर्च भी जाती हैं. टीना कहती है, “इस बारे में बात करने में शर्म आती है. लेकिन मैं खुश हूं कि इस दौरान चर्च जाकर प्रार्थना कर सकती हूं.”

यह समस्या सिर्फ एक या दो घरों की या एक देश या दो देशों से जुडी नहीं है। भारत से सटे अपने पड़ोसी देश नेपाल के उन दुर्गम इलाकों में जहाँ पहाड़ियाँ बर्फ से ढकी होने के कारण यहाँ रहना बेहद ही मुश्किल होता है इस ठण्ड में महिलाओं को महावारी के कारण एक सप्ताह के लिए घर से बाहर जानवरों के लिए बनाई गई बहुत ही बदबूदार कोठरियों और दडवों में रहने को छोड़ दिया जाता हैं | उन्हें खाना भी इस तरह से दिया जाता है कि कहीं देने वाले का हाथ उनसे टच न हो जाए उनके साथ अछूतों जैसा व्यवहार किया जाता है | मंदिरों में पूजा करना तो अलग बात है इन्हें तो किसी भी घरेलू या सामाजिक कार्यक्रमों मों भी शामिल नहीं किया जता हैं और न ही पानी के किसी भी स्रोत से और जानवरों के चारे तक को छूने नहीं दिया जाता हैं इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहाँ की तुलना में नेपाल की महिलाओं के साथ किया जाने व्यवहार बहुत ही दर्दनाक और अमानवीय होता है और यह सब सदियों से चली आ रही ‘छाऊपडी प्रथा’ को अपनाने के कारण होता है | कई बार तो अकेले रहने की वजह से इन महिलाओं और लड़कियों के साथ बलात्कार की घटनाएं भी हो जाती हैं |

 महिलाओं के साथ मासिक धर्म के दौरान इस तरह का वर्ताव हर धर्म में होता है। इस मासिक स्राव के चलते महिलाओं की जिंदगी को हम हासिये पर डाले रहते है। जरा सोचकर देखिए कि जिस महावारी के न आने पर हम वैध हकीम डॉक्टर्स के यहाँ इलाज के लिए चक्कर लगाते है क्योंकि अगर यह नहीं होगी तो कोई भी महिला बच्चा पैदा नहीं कर सकती है। पीरियड्स आना जीवन की बहुत ही स्वाभाविक शारीरिक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के कारण ही इंसान अस्तित्व में आता है | पीरियड्स का आना महिलाओं में कोई बीमारी नहीं हैं बल्कि यह किसी भी स्त्री के स्वस्थ होने की गवाही देती है |

मासिक धर्म दस या बारह साल से शुरू होकर चालीस से पचास साल तक की महिलाओं के शरीर में होने वाली शारीरिक प्रक्रिया है! इस प्रकिया के दौरान अंडा बनता है और उसके निषेचित होने के बाद पोषण के लिए एक लेयर तैयार हो जाती हैं | जब अंडा निषेचित नहीं होता तो अंडे के साथ उसके पोषण के लिए तैयार यह लेयर शरीर से बाहर स्रावित हो जाती है ताकि अगले महीने फिर यही प्रक्रिया दोहरायी जा सके! इसी स्राव को महावारी कहा जाता हैं | यह मासिक चक्र अट्ठाईस से तीस दिनों का होता है |

लेकिन हमारा पूरा समाज इसे बहुत ही हेयता से देखता हैं | पूजा मत करो, भगवान् अशुद्ध हो जायेंगें | अचार मत छुओ, खराब हो जाएगा | गाय को हाथ मत लगाओ वरना वह बछडा पैदा नहीं कर पाएगी | मासिक धर्म के समय नहाओ मत नहीं स्त्री को बच्चा पैदा नहीं होगा | शीशे में मत देखो उसकी चमक फीकी पड़ जायेगी |पौधों को हाथ मत लगाओ उन पर फल नहीं लगेंगे | महावारी आये तो चुप रहो घर में किसी मत कहो और स्राव (खून) वाले कपडे को छिपा कर रखो अगर किसी ने देख लिया तो पाप लगेगा आदि आदि |

असल में हमें पीरियड आने को स्वास्थ्य इशू की तरह देखना होगा | इसे छिपाने की मजबूरी के कारण कई तरह के संक्रमण होने की संभावना रहती है | इससे बहुत सारे अंधविश्वास, भ्रांतियां, भेदभाव आदि जुड़े होने कारण यह स्त्रियों की गतिशीलता को कम करके पुरुषवादी सोच को स्थापित करता है | यह महिलाओं के मानवाधिकार का मसला है

आज जब हम इक्कीसवीं सदी के वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं | मंगल ग्रह पर शहर बसाने खाका तैयार कर रहे है | चाँद पर अपनी पहुँच आसान बना रहे है | पूरे देश को डिजिटल बनाने की बात करते हैं महिलाओं को सामान अधिकार और रोजगार के सामान अवसर प्रदान करने कि बात करते है तो ऐसे समय में हम लोगों की मानसिकताओं में कितना बदलाव कर पाए हैं ? आज भी सवाल जस का तस बना हुआ है | अभी भी औरतों को लेकर लोगों की सोच दोयम दर्जे की ही प्रतीत होती है |

ऐसे समय में जरूरी हो जाता है कि हम अपने विचारों को मानसिकताओं को बदले और अंधविश्वासों को ख़त्म करें | इसीलिए घरों में अपनी बच्चियों को माहवारी शुरू होने से पहले ही इसके बारे में सही जानकारी देना शुरू करें | हमें अपने घरों में अन्य बीमारियों की तरह ही इस पर सामान्य तरीके से बात करनी चाहिये जैसे खांसी जुकाम बुखार हो जाने पर हम घर से लेकर मेडिकल तक पर बड़े ही आसान तरीके से दबाई मांग लेते हैं उसी तरह से हम सेनेटरी पेड भी मांग सके | इसके लिए हमारी सरकारों को भी लगातार लोगों को अवेयर करने के लिए स्कूलों, कालेजों, आदि में वर्कशॉप करवानी चाहिए | जिससे लड़के लड़कियों में मासिक धर्म के प्रति सही समझ विकसित हो सके और महावारी आने पर महिलायें शर्मिंदगी महसूस न करें | यह किसी भी धर्म या सेक्सुअलिटी से जुडा हुआ मसला नहीं है | इसमें पुरुष और महिलाओं को अपनी सोच बदलने की आवश्यकता है | शायद तभी हम भ्रांतियों को ख़त्म कर एक बेहतर सामाज की कल्पना कर सकेंगे |

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