‘मायामृग’ की दो कविताएँ….

ठहरी हुई आवाज़ें 

मायामृग

मायामृग

कुआं नींद में है
नहीं लौटेंगी तुम्‍हारी अावाज़ें
स्‍वरभक्षी नहीं है कुआं
पर दीवारों की दरारों में अटक जाते हैं शब्‍द तो अटक जाते हैं—।

जितना गहरा है कुआं
उतनी गहरी है नींद
जितनी गहरी है नींद उतना शांत है जल
जल की शांति नींद भर की है
जागने का इंतजार सुबह तक करना
रात जाने ही वाली है—-।

दरारों मेंं उगे पीपल कल के हैं
जगत पर रस्सियों के निशान पीपल के सहोदर हैं
जब जब घिसती रही रस्‍सी
पीपल चुपके से झांकता रहा जाते हुए दिन तक
आते हुए कल में हो जाना है हरा पत्‍तीदार
भविष्‍यवेत्‍ता नहीं है पीपल
पर आंख उसकी भी आते समय पर है—।

तुम्‍हारे हर पत्‍थर पर प्रतिक्रिया बकाया रही
जिस अावाज को तुमने छप छप सुना था कल तक
वह नासमझी थी, बचपना था, बेवकूफी थी
कुएं का असली स्‍वभाव पत्‍थर के साथ आवाज़ निगल जाना है
इस निष्‍कर्ष में तुम्‍हारी ईर्ष्‍या सही
पर सच्‍चाई भी है—।

कुएं से तत्‍काल लौटी आवाज़ सुनते हुए
अभ्‍यासी हो गए हो तुम
जो नहीं लौटी वे तुम्‍हारे रहस्‍य के संसार में
गूंजती रहेंगी रात भर
तुम्‍हारी बेचैनी कुएं की पहली प्रतिक्रिया है
आशंकाओं में रहो तुम
जाने ि‍कस दिन लौट अाए कुएं में ठहरी हुई आवाज़—-।

उस वक्‍त से भयभीत हो तुम
जिसका लौटना तुम्‍हारी घड़ियों से तय नहीं होता
तुम घड़ी की आवाज़ सुनने भर से सहमे रहोगे
तुम्‍हें पता है कि
ठहरी हुई आवाज़ों के लौट आने का कोई वक्‍त नहीं होता—।

क्‍या आप एक कटे पेड़ की कहानी सुनना चाहेंगे ?

एकदम से नहीं मर जाता पेड़
सांस छोड़ता है, आंख भर ताकता है आसमान को
टहनियां पटकता है जोर जोर से जमीन पर
आखिरी हिचकी के साथ गश खाकर गिरता है
तब मरता है पेड़।

धीरे धीरे सिमटती है छाया
तेजी से बिखरती हैं सूखी पत्तियां
सररर से गुजरती है अब हवा यहां से, दंभ से भरी
धूप नहीं सुस्‍ताती भरी दुपहर भी
बरसात के दिनों में पानी जरा सा झांकता है
बाहर-बाहर डुबोता, नहीं जाता भीतर
जवान शहीद की विधवा की तरह
मिट्टी धीरे धीरे विदा करती है पेड़ को
कटे पेड़ की अपनी कहानी है—-।

बतियाते और खिसियाते हैं पक्षी
शोकसभा में पढ़ा गया पेड़ का भी मृत्‍युपत्र
उन सबके साथ जिनके घोसले टिके थे पेड़ पर।
सांत्‍वना उन क्षणों में एक अभद्र कल्‍पना है बस—।

तिनके कटे तने के नीचे जितना कसमसाते हैं
उतना ही किरचते हैं आंख में भी
घोसलों का छूट जाना अलग बात है
घोंसलो का टूट जाना अलग बात—-।

बरसों बाद इस रास्‍ते पर आए यात्री
ढूंढते हैं पुरानी निशानियां
कुछ आधे गड़े पत्‍थरों पर अब भी लिखी है
इस गांव से उस गांव तक की दूरी
पेड़ से पेड़ के बीच फासला बढ़ गया
यह ना पत्‍थर को पता, ना चलने वालों को—-।

सड़क पर जमे खून के धब्‍बे देखकर–
‘एक पेड़ कटा’, बस इतना लिखेंगे ख़़बरनवीस
कहां-कहां से कटा, कैसे-कैसे कटा
कब-कब कितना कटा
यह लिखने जितनी जगह नहीं होती
अखबार में।

मसखरे भी चुप रहेंगे
सदी के इस सबसे बड़े मजाक पर
उदास कवि की कविताओं में रुदन तो होगा
पेड़ की कहानी नहीं होगी– और सच कहूं तो
एक कटे पेड़ की कहानी में आपको भी क्‍या दिलचस्‍पी है–?

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    By: मायामृग

    जन्म – अगस्त २६,१९६५
    जन्म स्थान – हनुमानगढ़, राजस्‍थान
    शिक्षा -एम ए, बीएड, एम फिल (हिन्‍दी साहित्‍य)
    अपने बारे में मायामृग कहते हैं –
    पिछले तकरीबन 20 साल से जयपुर में हूं
    पहले कुछ नौकरियां की, रेडियो में अस्‍थाई, सरकारी स्‍कूल में, एक दो कॉलेजों में पढ़ाया
    अखबारों में काम किया, हैंडीक्राफ्ट के काम से जुड़ा रहा, अब प्रकाशन और मुद्रण के काम में
    लिखने-पढ़ने की आदत रही, पिताजी की पुस्‍तकों के ढेर से धूल झाड़ते पौंछते किताबों से प्रेम हुआ, जो छूटा नहीं कभी
    प्रकाशित पुस्तकें- 1988 में ‘शब्‍द बोलते हैं’ 1999 में “… कि जीवन ठहर ना जाए”
    विधाएं – कविता, कहानी, ललित निबन्‍ध, रेडियो नाटक व व्‍यंग्‍य लेखन
    सम्पर्क- बोधि प्रकाशन, एफ 77, करतारपुरा इंडस्‍ट्रीयल एरिया, बाइस गोदाम, जयपुर – 302006 (राजस्‍थान)
    ईमेल : bodhiprakashan@gmail.com

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    दौड़ से बाहर: कविता (मायामृग)

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