‘‘पुरुष भी विचित्र है। वह अपने छोटे से सुख के लिए स्त्री को बड़ा से बड़ा दुख दे डालता है और ऐसी निश्चिंतता से, मानो वह स्त्री को उसका प्राप्य ही दे रहा है। सभी कर्तव्यों को वह चीनी से ढकी कुनैन के समान मीठे-मीठे रूप में ही चाहता है। जैसी ही कटुता का आभास मिला कि उसकी पहली प्रवृत्ति सब कुछ जहां-का-तहां पटक कर भाग खड़े होने की होती है।’’

मीठा कुनैन नहीं स्त्री विमर्श 

ज्योति कुमारी

ज्योति कुमारी

आठ मार्च अभी पिछले पखवाड़े ही था। यानी अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस। इस मौके पर महिला सशक्तीकरण की बातें काफी जोर-शोर से हुईं। लेकिन क्या सच में हुईं ? अगर गौर से देखा जाए तो कुछ कामयाब महिलाओं की कहानी को उछाल कर महिला सशक्तीकरण की बातें की गई। ठीक है कि निजी उपलब्धियां समाज को बदलने में प्रेरक की भूमिकाएं निभाती हैं, लेकिन अगर इसका ही जोर रहे तो विमर्श में हम जिस समाज और जिनके उत्थान की बातें करते हैं, वह कहीं दूर छूट जाता है। हाशिए पर ही रह जाता है। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि जब हम इस तरह की बातें करें तो इस तरह की खतरों से भी सचेत रहें। यही वजह है कि सबकुछ व्यक्तिगत उपलब्धियों के दायरे में न देखा जाए, क्योंकि इक्के-दुक्के ऐसे उदाहरण तो हमें समाज के प्राचीनतम इतिहास में भी मिल जाएंगे। इस विमर्श को एक सम्यक दृष्टि देनी जरूरी है।
अनादि काल से सृष्टि के केंद्र में स्त्री रही है। स्त्री सृजन का पर्याय है। विद्वानों, लेखकों, विचारकों ने भी इस सच को स्वीकारा है। साहित्य और इतर कला माध्यमों में स्त्री का ही सर्वाधिक चित्रण और वर्णन हुआ है। विश्व साहित्य और कला के केंद्र में युगों-युगों से स्त्री ही विराजमान है। चित्रकला और शिल्पकला में संसार की पुरातन से अधुनातन सभ्यताओं ने नारी सौंदर्य की ही कलात्मक अभिव्यक्ति की है। रोमन सभ्यता का समूचा सौंदर्य बोध स्त्री के अंग सौष्ठव की प्रतिलिपि है। ग्रीस की वास्तुकला, चीन की शिल्पकारी तथा भारतीय कला और पुरा वस्तुओं का मनमोहक आधार नारी सौंदर्य ही है। इन सभी कला माध्यमों में नारी के सौन्दर्यों को विभिन्न कामुक-कलात्मक तरीके से उकेरा गया है। ग्रीस की एफ्रोडाइट, वीनस और हेलेन, रोम की शाही घरानों की सुंदरियां, भारतीय महाकाव्यों में उर्वशी, मेनका, रंभा, शकुंतला आदि का अप्रतिम सौंदर्य विभिन्न कला माध्यमों में विश्वभर में जगह बनाता रहा हैं।
लेकिन जरा गौर से देखें तो आप इनमें एक समानता पाएंगे- पाएंगे कि जितनी भी संस्कृति और संस्कृति पोषित लेखन और कला रहे हैं, उन सबमें पुरुषवादी नजरिया हावी रहा है। अर्थात इनमें स्त्रियां पुरूषों के नजरिये से आख्यायित-व्याख्यायित और प्रदर्शित होती रही हैं। इसका प्रमुख और एकमात्र कारण यह है कि मानव समाज में पुरुष को प्राचीन काल से विशेष दर्जा हासिल रहा है। यह उसके जैविक (शारीरिक) श्रेष्ठता के सिद्धान्त से संकल्पित है। इसी के बल पर पुरुषों ने अपना वर्चस्व स्थापित किया और स्त्री को आश्रिता बना डाला। मनुस्मृति की मानें तो-
‘‘पिता रक्षति कौमार्ये, भर्ता रक्षति यौवने, सुत: रक्षति वार्धक्ये, न स्त्री स्वातंत्र्यम् अर्हसि।’’
इस सूक्ति के अनुसार पुरुष को पिता, पति और पुत्र के रूप में स्त्री की रक्षा का दायित्व सौंपा गया है, क्योंकि स्त्री स्वतंत्रता के योग्य नहीं है। वह पुरुष के बिना असुरक्षित है। स्त्री की दैहिक सुरक्षा अनिवार्य है और यह सुरक्षा सिर्फ मर्द ही दे सकता है, क्योंकि उसका अस्तित्व उस पुरुष के लिए बहुमूल्य है, जो उसका स्वामी है, उपभोक्ता है और आश्रयदाता भी।
अगर इसे उपयोगितावादी दृष्टि से देखें तो- स्त्री पत्नी के रूप में शयनसुख प्रदान करने वाली, माता के रूप में संतान का पालन-पोषण करने वाली एक सहायिका मात्र नजर आती है, जिसका अपना कोई अस्तित्व नहीं। इसीलिए इस अमूल्य धरोहर की सुरक्षा का भार पुरुषों ने स्वयं पर उठा लिया। इस क्रम में स्त्री को एक ऐसी दासी के रूप में बदल डाला, जो सब कुछ वही करती है, जिसमें उसके स्वामी की खुशी है। और इसकी शिक्षा उसे बाल्यावस्था से ही दी जाने लगती है- कि तुम्हारा जन्म इसलिए हुआ है, ताकि तुम अपने परिवार को संभाल कर रख सके- एक पुत्री, पत्नी और माता के रूप में, कि तुम्हें एक दिन पति (पति का अर्थ भी स्वामी ही होता है) नाम के मालिक का हो जाना है। और वह एक अज्ञात काल्पनिक पुरुष को भजती-पूजती बड़ी होती है। बचपन से भी अपने इसी काल्पनिक पुरुष के लिए सोमवार का व्रत रखने लगती है और उसी की अभिरुचियों की कल्पना कर खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार करने में लग जाती है। गहरे अर्थों में कहें तो बलात ही स्त्री पर संस्काररूपी दासता का बोझ लाद दिया जाता है। और वह भी उसी के अनुकूल बनती चली जाती है। इतनी अनुकूल कि वह इसे ही अपनी नियति मान कर खुश होती रहती है। इसका नतीजा यह होता है कि कालांतर में समाज द्वारा निर्धारित पुरुष वर्चस्व के बंधन में बंध कर वह अपनी ही हाथों अपनी अस्मिता तथा स्वतंत्रता खो देती है और आश्चर्य तो यह कि वह इस बात से बेखबर भी रहती है। इसी स्थिति का चित्रण प्रख्यात फ्रांसीसी स्त्रीवादी विचारक सीमोन द बोऊआर की पुस्तक ‘सेकेंड सेक्स’ में मिलता है, ‘‘स्त्री पैदा नहीं होती, बना दी जाती है।’’ इसी स्थिति का चित्रण महादेवी वर्मा ने अपनी पुस्तक ‘अतीत के चलचित्र’ में कुछ इस प्रकार किया है- ‘‘पुरुष भी विचित्र है। वह अपने छोटे से सुख के लिए स्त्री को बड़ा से बड़ा दुख दे डालता है और ऐसी निश्चिंतता से, मानो वह स्त्री को उसका प्राप्य ही दे रहा है। सभी कर्तव्यों को वह चीनी से ढकी कुनैन के समान मीठे-मीठे रूप में ही चाहता है। जैसी ही कटुता का आभास मिला कि उसकी पहली प्रवृत्ति सब कुछ जहां-का-तहां पटक कर भाग खड़े होने की होती है।’’
बचपन से ही कुछ इसी तरह की शिक्षा बालकों को भी दी जाती है। वह पुरुषवादी-पितृसत्तात्मक समाज में पलता-बढ़ता है, इसलिए पुरुष अहम और वर्चस्व के सारे संस्कार लेकर बड़ा होता है। हालांकि किसी-किसी क्षेत्र-कबीले में मातृसत्तात्मक समाज का भी उदाहरण मिलता है। अव्वल तो ये कि इनकी संख्या बेहद नगण्य हैं और दूजे यह कि अगर आप वहां का गहराई से अवलोकन करेंगे तो पाएंगे कि वहां भी निर्णय लेने का अधिकार पुरुषों के पास ही आरक्षित-सुरक्षित होता है, जिसे बिना किसी आपत्ति-विपत्ति के स्त्रियां स्वीकार भी लेती हैं।
स्त्रियों के प्रति वस्तुवादी और भोगवादी मानसिकता से ग्रस्त पुरुष समाज उनके लिए ऐसी ही भाषिक अभिव्यक्तियां भी गढ़ता है, जो उनकी पहचान को महज एक उपभोग की वस्तु से जोड़ देता है। यहां पर यह भी गौर कर लेना उचित होगा कि जो स्त्रियां समाज में सम्मान पाती हैं, वो हैं कौन- शुरुआत कुछ उदाहरणों से करते हैं- जोन ऑफ आर्क, रानी लक्ष्मी बाई, महारानी दुर्गावती, रजिया सुल्तान, इंदिरा गांधी आदि। यानी ऐसी महिलाएं जो शक्शिाली-महत्वाकांक्षी हैं। जिन पर वर्चस्व जमाना पुरुषों का के लिए कभी आसान नहीं रहा या जमा नहीं पाएं। इतिहास पलट कर देखेंगे तो पता चलेगा कि उस दौर में भी इन्हें ये मुकाम आसानी से नहीं हासिल हुआ। पुरुष प्रधान समाज ने मजबूरी में ही इन्हें स्वीकार किया। हालांकि आज पुरुष इन्हें स्वीकार भी करता है और आदर भी देता है, तो इसकी वजह बस यही है कि पुरुषों को इनमें मर्द की छवि नजर आती है। ये भी पुरुषों की तरह थीं या हो गईं। दूसरे शब्दों में कहें तो पुरुषों की नजर में ये पुरुष ही थीं, इसलिए समाज ने इन्हें पुरुष के रूप में स्वीकार लिया, क्योंकि वीरता और शौर्यता पर तो इन्होंने कॉपीराइट कर रखा है और अगर किसी महिला में ये खूबियां दिखती हैं तो इनकी नजर में वे भी मर्द ही हैं। अत: इनके लिए शब्द और उपमा भी पुरुष की ही तरह के ही ईजाद किए गए- मर्दानी। यानी मर्दों की नजर में जो स्त्री मर्द हो गई, उसे पुरुषों ने आदर दिया। यहां तक कि महिला शौर्य रूप को दिखाने वाली रानी मुखर्जी अभिनीत एक फिल्म भी आती है तो इसका नाम रख दिया जाता है ‘मर्दानी’।
इसे आप बिगड़ैल रूप में भी देख सकते हैं। वर्तमान में महिला सशक्तीकरण, पहचान और आजादी को बैठकी, दारूबाजी, सिगरेट, यौन स्वतंत्रता से जोड़ कर देखा जाता है। यानी मर्दों की फितरत, जैसे एक पार्टनर का विश्वस्त नहीं होना आदि जैसे गुण अगर किसी महिला में आ जाए तो मर्द उसे अपने समाज का हिस्सा मान कर स्वीकार लेते हैं। हालांकि इन्हें भी ये छोड़ते नहीं- पीठ पीछे इनकी खिल्लियां खूब उड़ाते हैं। दूसरी तरफ महिलाएं भी इस सच को समझ नहीं पाईं कि ऐसा कर वे अपनी मौलिक पहचान खो रही हैं और मर्द जैसी होती जा रही हैं। इसी वजह से मर्द उन्हें स्वीकार रहे हैं या प्रछन्न रूप से उनका उपभोग ही कर रहे हैं। यही वजह है कि स्त्री स्वतंत्रता से जुड़े बहस और विमर्श को भी इसी तरफ मोड़ दिया गया, जबकि जरूरत है इस स्थिति बदलने की है। अपनी पहचान खोकर किसी दूसरी पहचान को अपनाने की नहीं।

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