निसंदेह आतंकी या साम्प्रदायिक घटनाओं में जान गवांने वाले निर्दोष लोगों के परिवारों की इन घटनाओं के बाद की स्थितियां बेहद हृदय विदारक और अपूर्णीय होती हैं, लेकिन वहीँ वर्ग विशेष के लिए राजनैतिक हित स्वार्थों के लिए गढ़ी और स्थापित की गई मानसिकता के तहत कितने ही निर्दोषों को अपनी ही न्याय व्यवस्था के हाथों ज़िंदा लाशों में बदलने वाले परिवारों की स्थितियों का अंदाजा लगाना भी मुश्किल नहीं है …. यह भी एक आतंक ही है जो अपने ही घर में और हर समय बना हुआ … ऐसे ही मर्मस्पर्शी हालातों को बयां करती फरीदा ज़मालकी कहानी …. संपादक  

मुआवज़ा

मेन रोड से करीब आधा किलोमीटर अन्दर की ओर जाने वाली गली जो बहुत संकरी थी और उसमें किसी दुपहिया वाहन से ही जाया जा सकता था | बीच में फैला गन्दा नाली का काला बजबजाता पानी दोनों तरफ दरवाजों के सामने पटिया या पत्थर रखकर कपडे धोती स्त्रियां या अपने नंगे अधनंगे बच्चों को घसीटती धौल जमाती रगड़ रगड़ कर नहलाती औरते, किसी दरवाजे के सामने कन्धों पर दुपट्टा कसे और फेंटा मारते एक दूसरे से गाली गलौच करती माँए जो बच्चों के छोटे-मोटे झगड़ों पर आए दिन उलझ पड़ती पर दूसरे ही दिन किसी भी तरह की होने वाली गम-खुरी में कूद कर आगे आगे आकर शामिल होने को भी तत्पर रहती।

शहर का यह घनी आबादी वाला मुस्लिम बाहुल्य इलाका था जिसे स्थानीय भाषा में कुछ मनचलो ने मिनी पाकिस्तान का नाम दे दिया था | ऐसा नहीं था कि वहां देश के खिलाफ गतिविधियां होती थी, पर कुछ कम पढ़े लिखे या मनचले टाइप के कभी पाकिस्तान के मैच जीतने पर पटाखे फोड़ने जैसे नादानी भरे कारनामों की वजह से यह इलाका बदनामी की जिन्दगी जी रहा था। कभी शहर में साम्प्रदायिक तनाव होने का अंदेशा होते ही सबसे पहले प्रशासन की निगाह में यह शाहपुरा मुहल्ला ही आता था और पूरे शहर में कर्फ्यू लगे या न लगे यहां सबसे पहले कर्फ्यू थोप दिया जाता था। यहां के बाशिन्दों में ज्यादातर दिहाडी मजदूर, बुनकर, रेहडी वाले फेरी वाले विसातबाने वाले या फिर लोगों के घरों में काम करने वाले ड्राइवर, धोबी या घरेलू नौकर नौकरानियों की ही रिहाईश थी। ऐसा नहीं था कि इस मुहल्ले में दूसरे सम्प्रदाय के लोग नहीं थे। पिछली कई पीढि़यों से बनी लाला रामप्रसाद जी की हवेली इस मुहल्ले की बीचोबीच मौजूद थी | ये हवेली शायद शहर के उस दौर में बनी होगी जब चैक का यह मुख्य व्यापारिक इलाका रहा होगा । आजादी के बाद हुए बंटवारे को लेकर फैली नफरत ने मुहल्लों को जाति-विरादरी या धर्म के नाम पर अलग-अलग बांट दिया। लाला राम प्रसाद की हवेली के अलावा शहर की सब्जियों का ख्याति प्राप्त सप्लायर भैरो प्रसाद खटिक जो अब भैरों प्रसाद सोनकर के नाम से जाने जाते थे उनका दो मंजिला पुश्तैनी मकान था | रामजी तेली की पुरानी तेल घी की दुकान और मकान भी इसी मुहल्ले के बीचोबीच थी। गोलगप्पे वाले परभू नाना की मशहूर चाट का ठेला आज भी इसी मुहल्ले में हर शाम लगता था पर आजकल गरम हो रहे माहौल ने उन सबके बीच एक अबोली सी दूरी पैदा कर दी थी।

मुहल्लावादी संस्कृति से धीरे धीरे दूर हो जा रही नयी पीढ़ी अब टी0वी0, कम्प्यूटर के आगे सिमट कर रहे गयी थी | एक अनकहा सा तनाव फैला रहता था चारों तरफ | गली के आखिरी मोड पर जो पीछे से शहर को मेन मार्केट की ओर आकर मिलती थी वह काफी बडा व्यापारिक केन्द्र था जो पुराना चौक  के नाम से जाना जाता था। इसी मुहल्ले के रशीद का घर आज पूरे शहर ही नहीं पूरे देश की सुर्खियों का केन्द्र बना हुआ था। दो कमरों का ईट और मिटटी गारे से बना सीमेन्ट की चादर की छत वाला छोटा सा मकान जिसमें बाथरूम के नाम पर चादर और नायलान की पन्नी से घेरकर बनाया गया छोटा सा संडासनुमा शौचालय और बांस के टटटर से घेर कर बनाया गया बाबर्चीखाना, जिसके पीढे पर बैठी सत्तरह साल की नरगिस बार बार स्टोव को पिन करती हुई माथे का पसीना पोंछ रही थी, “आज ये कम्बख्त मारा स्टोव भी नहीं जल रहा। आज अब्बा चौदह सालों बाद अपने घर का खाना खाएंगे”  सोचते सोचते नरगिस की आंखे भर आयी। कुकर का ढक्कन खोलकर कलछुल से सालन निकाल कर सूंघा महक तो अब्बा को जरूर पसन्द आएगी। बांहों से आंखे पोंछते हुए नरगिस मुस्कुराई। अम्मी बताती है तीन साल की थी वह जब अब्बा को पुलिस एक शाम अचानक उठाकर ले गयी थी। तब से आज तक नरगिस ने अब्बा को अखबारों में छपी फोटुओं में ही देखा था, और अब्बा के बारे में छपी घिनौनी बातें पढकर कितना रोती थी नरगिस सबसे छुप-छुपकर।

बाहर, के कमरे में एक दूसरे पर गिर पडने को तैयार लोगों का हुजुम, टी0वी0 चैनलों, के पत्रकारों के झुण्ड के झुण्ड गली मुहल्ले के बच्चे बूढे जवान। भीड़ भाड़ देखकर अम्मी ने पूरा कमरा खाली करके फर्श पर दरी बिछाकर चादर बिछा दी थी। अपनी सिलाई मशीन जो खिडकी से लगी पिछले चैदह सालों से उसकी रोजी रोटी का एकमात्र सहारा थी  उसे भी खिसकाकर कोने में करते वक्त आज नाजमा के हाथ कंपकपा गए थे | कोने से लगाकर खडी करके सिलाई मशीन को नजमा ने मेजपोश से ढक दिया था। आज राशिद शेख चौदह सालों बाद अपनी अग्निपरीक्षा देकर वापस लौट रहा था। हयुमन राईट्स के लोगों ने नजमा को घेर रखा था। तरह-तरह के सवालात किए जा रहे थे। रशीद मियां ने तो जब से घर में कदम रखा था तब से कुछ बोल पाने की कैफिरात में ही नहीं था। बस अपने बच्चों को सीने से लगाए रोये जा रहा था। नजमा भी पिछले 2 तीन घंटों से अपनी आंखे पोंछती ही जा रही थी। पिछले चौदह सालों का दर्द, एक एक पल का भोगा गया वह नरक जो उसने और उसके बच्चों ने जीया था उसकी आंखों के आगे चलचित्र की भांति घूम रहा था। उस खिल्लत की जिन्दगी जिसकी छाया अभी तक उसके जेहन में सांप की तरह रेंग रही थी। उसका गरीबी में भी खुशहाल परिवार एक दिन आयी आंधी में विखर कर तिनका तिनका हो गया था। नजमा अपने ख्यालों में गुम थी तभी हयुमन राइट्स की चेयर पर्सन मिस गायकवाड ने उसके कन्धों पर हाथ रखकर दिलासा देते हुए कहा ‘‘नजमा जी हम आपके साथ है, आपके पति के साथ हुई नाइंसाफी का पूरा मुआवजा हम आप लोगों को दिलाने की लड़ाई लडेंगे।’’
‘‘मुआवजा? … काहे का मुआवजा बहिन जी….? नजमा सिसक पडी। ‘‘हमारे शौहर की जेल में काटी गयी चौदह सालों की बेबसी का मुआवजा दिलायेगी आप?
‘‘पांच बच्चों को कैसे पाला है बिना बाप के, उस एक एक दिन की भूख, प्यास, जिल्लत और नफरत का मुआवजा देगी आपकी सरकार?’’ नजमा की हिचकिया बंध गयी थी। ‘‘ मैं आप के हाथ जोड़ती हूं हमें हमारे हाल पर अकेला छोड़ दीजिये | आप सब इस मुल्क के सियासतदारों और पुलिस, सब पर से हमारा यकीन तो कब का उठ चुका था मैडम जी पर अल्लाह के इन्साफ और यहां के कानून के उपर कायम अकीदा खुदा ने दुरूस्त रखा। आज अदालत की चौखट से हमें इन्साफ न मिलता तो हम अपने मुंह पर यूं ही कालिख लगाए मर जाते पर खुदा का लाख-लाख शुक्र है कि उसने हमारे मुंह पर लगी कालिख को छुटा दिया। ’’ कहते कहते नजमा फूट फूट कर रो पड़ी। ‘‘ आप मुआवजे की बात कर रही हैं मैडम, हमारे बच्चों की छूटी पढ़ाई का मुआवजा इनकी दादी की मरते दम तक बेटे की बेगुनाही की आस में लगी टकटकी का मुआवजा, बाप की उंगली पकड़कर चलने के अरमान लिये तरसते बच्चों के बड़े होने के अरमानों का मुआवजा, गली मोहल्ले में बच्चों के संग खेलने जाने पर ‘‘भागो आतंकवादी के बच्चे हो तुम,’’ कहकर दुत्कारे जाने पर सिसकते आरिफ और नदीम के आंसुओं भरी आंखों से उठते सवालों का मुआवजा दिला पायेंगी आप ? नहीं बहिन जी, हमें अकेले गुमनाम जिन्दगी की आदत पड़ गयी है खुदा के लिये हमें अकेला छोड़ दीजिए। चौदह साल जेल की अंधेरी कोठरी में देशद्रोही और आतंकवादी का तमगा लगाकर जीते-जीते पूरी तरह मुर्दा हो चुके मेरे शौहर को चैन से उसके बीबी बच्चों के पास जीने दो, मेहरबानी करके आप हमसे कुछ न पूंछे।’’

नजमा अपने रौ में बोलती जा रही थी पास खड़े आरिफ नदीम सलमा और चुन्नू सहमे-सहमें मां को देख रहे थे। कम पढ़ी लिखी, और सिलाई कढ़ाई करके अपने बच्चों को पाल पोसकर अपने पति की बेगुनाही को साबित करने की लम्बी लड़ाई को लड़ते लडते नजमा समय से पूर्व ही बूढ़ी नजर आने लगी थी। चौदह साल पहले की नजमा अपनी गिरस्ती में खुश थी पति की साइकिल मरम्मत की दुकान थी, नजमा भी मुहल्ले के बच्चों को कुरान पढाया करती थी साथ ही सिलाई करके अपने पति की गृहस्थी की गाड़ी आसानी से खींच रही थी। अचानक एक दिन शाम को कुछ सादे कपड़ों में आये पुलिस वाले रशीद को उठा ले गये। रात भर वह गली मोहल्ले में रोती फिरती रही। हर किसी से फरियाद की उसका शौहर किसी बुरी लत में नहीं था। पांचों वक्त का नमाजी और तीसों रोजे रखने वाला एक साफ सुथरी जिन्दगी जीने वाला मुसलमान था। लाला रामप्रसाद के तीन साल के पोते को बचाने के लिए बस के आगे कूदकर एक टांग से आजीवन लगड़ा हो जाने वाला रशीद जिसे आज बिना कोई कारण बताये पुलिस उठाकर ले गयी। लोगों ने तरह तरह की अटकलबाजियां की, ‘‘चोरी चकारी की साइकिल खरीदी होगी’’। कुछ तर्जुबेकारों ने कयास लगाए।
‘‘नहीं यार रशीद तो ऐसा नहीं है।’’ दूसरे ने कहा।
‘‘ पर यार यह भी तो पक्का नहीं है कि वे लोग पुलिस वाले ही थे’’।
‘‘हां यार, कपड़े तो सादे थे।’’ रमेश ने कहा।
करीब बीस-पचीस दिनों तक नजमा दर दर की ठोकरें खाती रही। रशीद के उठाये जाने की अर्जी लेकर थाने भी गई थी, जहां उसे यह कहकर भेज दिया गया कि ‘‘ठीक है तुम जाओ जैसे ही कोई सूचना मिलेगी हम खबर कर देंगे। ’’
और ‘‘एक सुबह पड़ोस का अनिल भागता हुआ आया,‘‘अरे नजमा चच्ची ये देखों रशीद चच्चा की फोटो अखबार में छपी है। ’’
और नजमा के पैरों की जमीन ही खिसक गयी। पिछले साल के अन्त में हुये मन्दिर धमाकें में पकडे गये चार आतंकवादियों में रशीद की भी फोटो छपी थी। और उस दिन से कोर्ट कचहरी अदालतों के चक्कर में घर की हर चीज बिेकने लगी। बर्तन भांड़े तक बेच दिये। इतनी लम्बी लड़ाई अकेली कहां तक लड़ पाती वह पर आगे बढ़ते कदमों को सहारा देने वाले मिल ही जाते हैं। कई समाजसेवी और मानव अधिकारों के लिए लड़ने वाली संस्थाओं ने नजमा का साथ दिया। मामला निचली अदालत में खिलाफ ही गया। चारों को फांसी की सजा सुनाई गयी। पर नजमा के टूटते हौसलों को रशीद का यकीन पुख्ता कर देता। जेल पर मुलाकातों के दौरान रशीद उसे अपनी बेगुनाही का यकीन दिलाता और खुदा के इंसाफ पर भरोसा रखने को कहता। देश की सर्वोच्च अदालत का फैंसला रशीद के पक्ष में आया था। अदालत ने चारों को बेगुनाह बताते हुए पुलिस और सरकारी तंत्र के दुरूपयोग के लिए तत्कालीन सरकार की कड़ी भर्त्सना की थी।

आज रशीद चौदह सालों का वनवास काटकर अपने घर लौटा था। वह अपने ऊपर लगे कलंक के मिट जाने के लिए देश के कानून के प्रति शुक्रगुजार था। पर नजमा ने इन चौदह सालों में कितना कुछ खोया था। उसके मासूम बच्चों ने मोहल्ले के बच्चों से कितने ताने सुने थे। चलते फिरते नजमा ने न जाने कितने जुमलों को झेला था जो याद करके नजमा के रीढ की हडडी में कपकंपी उठ जाती है। वो दिन आज भी नजमा नहीं भूल सकती जब नरगिस को पीलिया हो जाने पर इलाज के लिए उधार मांगने गयी नजमा को लाला राम प्रसाद ने धक्का देकर अपनी चैखट से दुत्कार दिया था। ‘‘अरे राम राम…. भईया हाथ जोड़ता हूं हमारे दरवाजे से दूर ही रहो, कब कहां धमाका कर दो तुम लोग। भगवान के घर को तो छोडा नहीं भगवान के इस मामूली भक्त की क्या विसात।’’ कितना रोयी गिड़गिरायी वो लाला के सामने। अपनी निकाह की नथिया गिरवी रखने को लायी थी, पर लाला ने एक न सुनी। रोती बिलखती नजमा हाजी रहीमुददीन के पास भी गयी थी। लाखों रूप्या हर साल जकात के निकालते हैं। अपने अब्बा और अम्मा के नाम पर हर साल दो लागों को हज के लिए भेजते है। पर नजमा की मौसूम बेटी के इलाज के चन्द पैसे न दे सके थे। लाचार मजबूर नजमा को अपने पति की दुकान बेचनी पड़ी थी तब नरगिस की जान बचा सकी थी।

इसी उधेरबुन में खोयी नजमा की विचारतन्द्रा तब टूटी जब टी0वी0 चैनल के पत्रकार से बाते करते हुए रशीद को फूट फूटकर रोते हुए कहते सुना, ‘‘अगर किसी को मुआवजा देना ही है तो मैं यही मांगूंगा कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता। उसमें अश्फाक, और अब्दुल हमीद भी होते हैं। जो कायर होते है वही धमाकें करते है और वो मुसलमान नहीं होते। क्योंकि एक सच्चा मुसलमान कभी किसी बेगुनाह की जान नहीं लेता चाहे वह किसी मजहब का हो। मेरी आप सबसे यही गुजारिश है कि आप सबलोगों से यही कहें कि किसी बेगुनाह पर कभी भी इतना घिनौना इल्जाम लगाने से पहले यह जरूर सोचना कि उसके परिवार पर क्या बीतेगी। लोगों की इस हरकत से मुसलमान इस देश के लोगों से अलग थलग होता जाएगा। जुडेगा नहीं साहब। और यही हमारे लिए सच्चा मुआवजा होगा।’’ 

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