सच फासीवाद की सूली पर है | मौक़ा परस्ती न केवल चरम छू रही है बल्कि यथार्थ  चित्रण  को प्रभावित करती अवसर वादिता …. ऐसे में सच और भ्रम के खांचे में फिट होता इंसानी कोहराम …. इस पीड़ादायक विभीषिका में भी सच के साथ इंसानों को आवाज़ देतीं नित्यानंद गायेनकी कवितायें ……संपादक  

मुझे तुम पर पूरा यकीन हैं

नित्यानंद गायेन

सुनो तुम…
मैं होशवालों की दुनिया से लिख रहा हूँ तुम्हें
देखो कौनसा पहर है रात का
उन सबने मुझे शराबी कहा
सिवा तुम्हारे
मैंने तुम्हारे यकीन को अपना माना
मैंने देखा है किसान को मरते हुए
मैंने सुना है खाफ को सुनाते हुए सज़ा
युगल प्रेमियों के लिए
देखा उन्हें जिंदा जलाते हुए
सच बोलने वालों को पुलिस की गोली से मरते हुए

फ़राह नज़ीर

मैं हारा नहीं हूँ अभी

पर मैं हार जाता हूँ उस वक्त
जब तुम कहते हो कि
नहीं चाहते हो तुम मेरा साथ
मतलब उस वक्त
मैं हो जाता हूँ एकदम अकेला
तब मैं लड़ता हूँ खुद से
और हार जाता हूँ

मुझे अच्छा लगता है
तुम्हारा साथ
मतलब तब मैं सच के साथ होता हूँ
मतलब तब मैं खुद के साथ होता हूँ

तुम साथी हो
तुम नहीं छोड़ोगे मेरा साथ यूँ
बीच राह पर
मुझे तुम पर पूरा यकीन हैं

.हर सच को अपनी आलोचना मानती हैं सत्ता

हम सच बोलेंगे
और क़त्ल कर दिए जाएंगे
सत्ता डरती है सच से
हर सच को अपनी आलोचना मानती हैं सत्ता

हम भूले नहीं हैं
सुकरात को
उसके ज़हर के प्याले में
मिला दिया गया था हमारे हिस्से का ज़हर भी
सत्ता नहीं जानती
ज़हर से व्यक्ति मरता है
सच नहीं ||

.ये जो इतना बड़ा मुल्क है मेरा 

विकल्पों की तलाश कभी न थी
मुझे तुमसे ही उम्मीद थी
आज उम्मीद टूटी
शायद मैं भी

ये जो इतना बड़ा मुल्क है मेरा
कहीं एक हिस्सा
नहीं मेरे नाम

मैंने चाहा तुम्हें
पर हो न पाया तुम्हारा
ये मेरी चाहत की हार है !

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