धूसर समय की विद्रूपताओं को देखती, समझती और मूर्त रूप में मानवीय कोमलता के साथ संघर्षशील स्त्री के समूचे वजूद का एहसास कराती दो कवितायें …..| सम्पादक 

मुट्ठी भर धूप 

अमृता ठाकुर

घुप्प अंधेरा,कभी बेहद रोशनी
जहां सूझता नहीं है अपनी ही आत्मा का प्रतिबिंब।
मृगमरिचिका सी उम्मीद लिए प्रतीक्षारत हूं उस गुनगुनी रोशनी की
जो तुम्हें मुट्ठियों में भर कर लाना है
चाहती हूं उस रोशनी से नहाना
फिर पहनूंगी कपड़े नए जमाने के
पर करूंगी नहीं श्रृंगार
रहने दूंगी उसे अपने सादे रंग में
चाहती नहीं कोई लुकाव छिपाव
पर तुम कहां हो?
समय कंदिल लिए खड़ा है, शायद उसे दिख जाओ तुम
खींच कर ले आए, उस काले गहन गुफा से जिसमें लुप्त होती जा रही हैं तुम्हारी सांसे।

मै तुम, तुम मैं, हम, या ‘अहम् ब्रह्मा अस्मि’
नहीं अद्वैत नहीं, द्वैत हैं हम
अब फिर से इस द्वैत अद्वैत के संघर्ष में खुद को खोना नहीं है
तरेाताजा हो कर खोजना है, खुद को
बस तुम्हारी उस मुट्ठी भर रोशनी की दरकार है
नहाना है जिससे खुद को मल मल कर।।

मेरा तुम्हारा सच

तुमने कहा साथ मैनें कहा दोस्ती
तुमने कहा देह मैंने कहा आत्मा
तुमने कहा पा लिया मैंने कहा खो दिया
तुमने कहा अधूरा मैंने कहा पूर्णता
तुमने कहा हिस्सा मैंने कहा जिंदगी
हम अपनी अपनी परिभाषा लिए स्वनिर्मित परीधियों में खड़े रहे
प्रेम यूंही आ कर आस पास से गुजर गया।

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